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मनोज कुमार झा की दो नई कविताएं



Himmat Shah

सूखा

जीवन ऐसे उठा
जैसे उठता है झाग का पहाड़
पूरा समेटूं तो भी एक पेड़ हरियाली का सामान नहीं
जिन वृक्षों ने भोर दिया, साँझ दिया, दुपहरी को ओट दिया
उसे भी नहीं दे सकूँ चार टहनी जल
तो बेहतर है मिट जाना
मगर मिटना भी हवाओं की संधियों के हवाले
मैं एक सरकार चुन नहीं पाता
तुम मृत्यु चुनने की बात करते हो !
****


बाँधना एक सुन्दर क्रिया थी

उठ के न जाए कहीं रात में माँ
मैं शर्ट के कोने को माँ के आचल से बाध लेता था
और जब वह उठती
तो जगाते थपथपाते  कहती कि मैं बन्धन खोल रही हूं
कई बार तो मुझे याद भी नहीं रहता था सुबह में
सोचता हूँ काँपता हूँ कि मझनींद में माँ बच्चे को उठा रही है
स्तुति करूँगा कि वह जानती थी भरोसे को खोलना
अभी सुबह के चार बजे दरभंगा स्टेशन पर भटकते सोचते संशय में हूँ
कि किसी गाड़ी पर बैठ हो जाऊँ अज्ञात
या इन्तजार करूँ उस प्यारी ट्रेन का जो मुझे सही जगह पहुंचा देगी।
****

{ सबद पर मनोज कुमार झा की अन्य कविताएं यहां पढ़ें। }

Comments

peer educators said…
ठहर - ठहर कर पढ़ने को मन करता है ऐसी कवितायेँ ! सुन्दर !

अनुपमा तिवाड़ी
qaabil-e-ta'areef , shukriya dost.
इन्तजार करूँ उस प्यारी ट्रेन का जो मुझे सही जगह पहुंचा देगी...

गहरे भाव लिये कवितायें
Priyankar said…
इधर के कवियों की जमात में मनोज निस्संदेह सबसे सहज-सच्चे और प्रामाणिक कवि हैं. ये कविताएं मेरे इस विश्वास को पुष्ट करती हैं.
कविता उस समय को तलाशती है , जिस समय किसी चीज़ की तलाश नहीं होती, हर चीज़ बरबस ही अपनी लगती है , लेकिन इतने मासूम लम्हों में सरकार जैसी चीज़ क क्या काम /
Ajit Azad said…
umda kavitayen. vicharottejak.
kumar anupam said…
manoj bhai ki lajawaab kaviton kisht mein ek (do) aur izaafaa. Manoj Bhai Ko Badhai Aur "Sabad" Ko Dhanywaad.
Bhupinder Brar said…
Wonderful poems. I also greatly appreciate Sabad's design and layout.
मनोज कुमार झा शिल्प ही नहीं कथ्य, भाषा, और शैली पर भी पूरे अधिकार के साथ अपनी कविताओं को समृद्ध करते हैं.
अद्भुत कथ्य...!
सुन्दर कवितायेँ!
Leena Malhotra said…
Sundar ship .. shandar Kathy a. .. adbhut bhaav

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