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विचारार्थ : जल-जीवन

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जब जल उपजाता है दारुण भय

मनोज कुमार झा

जल के बारे में धार्मिक ग्रंथों से लेकर सामान्य जीवन में प्रशस्तियाँ भरी पड़ी है। ‘आपो ज्योति रसोमृतम्’ कहा गया है। यजुर्वेद का ऋषि कहता है कि ‘जैसे माँ अपनी सन्तान को दूध पिलाती है, वैसे ही हे जल, जो तुम्हारा कल्याणतम रस है, उसे हमें प्रदान करें (यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयेतह नः । उशतीरिव मातर।।) मगर जल विप्लव भी लाता है, जो कि प्रायः हर धर्म  के ग्रंथों में वर्णित है। यह जलप्रलय तो भविष्य में कैद है, किन्तु यहाँ तो रोजमर्रा की जिन्दगी में जल आँखे दिखाते आता है। जिन क्षत्रों में बाढ़ मुसलसल आती है, वहाँ समुद्र में शेषनाग की शैय्या पर सोए विष्णु को बाढ़ के पानी में बह रहा फूले पेट बाले भैंस का बिम्ब कब का अपदस्त कर चुका है।
जल जिसका स्पर्श मन की मिट्टी कोड़ देती है, उसी जल की ऑक्टोपसी भुजाएं हमारे जीवन का रस निचोड़ने के लिए भी बढ़ती है। उतर बिहार (मिथिलांचल) में बाढ़ लोकस्मृति का हिस्सा हो चुकी है। यहाँ कहा जाता है कि ‘जुनि वियाहू बेटी कोसिकनहा, होथि वर चाहे कान्हा (कृष्ण भी वर हों तो भी पुत्री को कोसी किनारे नहीं ब्याहिए।) एक सतत बेघरी का अह…