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कला का आलोक : ७ : छायालोक




आलपिनों से बिंधी तितलियों का संग्रहालय

                                                            सुशोभित सक्‍तावत

एक अपराधी की वह तस्‍वीर थी, जो अपनी मृत्‍यु की प्रतीक्षा कर रहा था (हर अपराधी की तरह)। अंतिमताओं के प्रणेता रोलां बार्थ को, उनकी स्‍वयं की मृत्‍यु के साल में, उस तस्‍वीर ने बहुत तंग किया था। लगभग व्‍याकुल।
महज़ एक तस्‍वीर ही तो थी!

अलेक्‍सांद्र गार्दनर की एक अनिच्‍छुक क्लिक। वर्ष 1865 का किस्‍सा। लुई पेन नामक नौजवान ने तत्‍कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री डब्‍ल्‍यू. एच. सीवर्ड के क़त्‍ल की नाकाम कोशिश की थी। लुई को सज़ा-ए-मौत सुनाई गई। गार्दनर ने काल-कोठरी में मृत्‍यु की प्रतीक्षा कर रहे पेन की एक तस्‍वीर खींच ली थी। बस, इतना ही।

लेकिन इसके पूरे 115 वर्षों बाद जब फ्रांसीसी संरचनावादी दार्शनिक रोलां बार्थ तस्‍वीरों के बेबूझ तिलिस्‍म पर अपनी बेजोड़ किताब कैमेरा ल्‍यूसिडा लिख रहे थे, तो वे इस एक क्लिक पर ठिठक गए। उन्‍होंने लिखा : मैं समझ नहीं पाया इसे कैसे व्‍याख्‍यायित करूं : लुई पेन मर चुका है (यक़ीनन), किंतु ऐन इसी दौरान वह अपनी मृत्‍यु की प्रतीक्षा भी कर रहा है  (जैसा कि तस्‍वीर का वस्‍तुसत्‍य है)। और तब बार्थ ने कहा, गार्दनर की उस क्लिक के बारे में जो सच है, वह शायद सभी तस्‍वीरों के बारे में सच होता है : विगत और वर्तमान की हैरान कर देने वाली सहउपस्थिति, जिसमें आगत का भी एक निवेश है : एक आसन्‍न अवसान का, शाम की मरती हुई धूप का।

वह 1980 का साल था, जब बार्थ ने सहसा छायाचित्रों के भीतर छिपे मृत्‍यु के इस तत्‍व को आविष्‍कृत कर लिया था, जो कि अनिवार्यत: समय और रागात्‍मकता का सहोदर है। हालांकि इससे पहले और बाद में भी तस्‍वीरों पर व्‍यापक विमर्श होता रहा था : सूज़ैन सोंटैग ने उन्‍हें यथार्थ को अपदस्‍थ कर देने वाली कला-नीति कहा था, जैफ़ डायर ने ‘एक अनवरत क्षण’ कहकर उन्‍हें अपूर्व आश्‍चर्यदृष्टि से देखा था तो ग्‍युंटर ग्रास को कैमरे का लेंस ईश्‍वर की आंख के समकक्ष जान पड़ा था : उतना ही बेधक, कीलित कर देने वाला एक आरंभ, जिससे उन्‍होंने अपनी स्‍मृति के अलबम को सजाया था, किंतु इन सबके बावजूद बार्थ की स्‍थापनाओं की कशिश और शिद्दत कुछ और ही रही।
वास्‍तव में तस्‍वीरों के साथ ही यह पहली बार हुआ था कि इतिहास ने कला में सबसे मज़बूती के साथ घुसपैठ करने में सफलता पाई थी। तस्‍वीरें दस्‍तावेज़ीकरण का एक अभिन्‍न आयाम बन गईं। शब्‍दों को झुठलाया जा सकता था, स्‍मृतिलेखा और आंखन देखी तो ख़ैर कभी भी प्रत्‍यक्ष का प्रमाण न थे, शिल्‍प और रूपांकन यथार्थ से विचलन (बकौल प्‍लेटो, दोहरे विचलन!) की शर्त पर ही आकार ग्रहण करते थे, लेकिन एक बार तस्‍वीरों में दर्ज हो जाने के बाद किसी वस्‍तुसत्‍य को नकारना संभव न था। तस्‍वीरें इतिहास की छाती में गड़ा हुआ एक असंदिग्‍ध इशारा साबित हुईं।

लेकिन, इसी के साथ ही इतिहास का अंत भी होता है और एक मिथ आकार ग्रहण करने लगता है, इस सवाल के साथ कि : तस्‍वीरों में दर्ज होने के बाद कोई नाम-रूप और उसका वस्‍तुसत्‍य क्‍या करता है? निश्चित ही वह प्रतीक्षा करता है, किंतु किसकी? कुछ नहीं की? अपने न हो जाने की? ग़ौर से देखें तो सभी छायाचित्र इस प्रश्‍न के समक्ष एक प्रलंबित प्रतीक्षा में ठिठके हुए जान पड़ते हैं  : समय, जिसके बाहर किसी चीथड़े की तरह धूप में सूखता रहता है यथा का अंतिम छोर धारण करता रहता है एक स्‍वप्‍नदेह।

कलाओं और उनमें भी विशेषत: दृश्‍य कलाओं के इतने अनेकानेक आयामों के बीच तस्‍वीरों का विशिष्‍ट इसी में निहित है कि वे नित्‍य और अनित्‍य की संधिरेखा पर ठिठकी हुई होती हैं। तस्‍वीरों में यह अद्भुत क्षमता होती है कि वे हमारे भीतर के अनित्‍य-तत्‍व को एक क्षण में भींचकर दर्ज कर लें, उसे उघाड़कर हमें दिखा दें, लेकिन इसके साथ ही उनमें नित्‍य–तत्‍व को हठात निर्दिष्‍ट कर देने का गुण भी होता है। यह करिश्‍मा वर्तमान और विगत, गति और स्‍थैर्य के एक विलक्षण द्वैत से संभव होता है, जो कि तस्‍वीरों का अनिवार्य क्षितिज है।

और तब यह संभव ही नहीं है कि तस्‍वीरों का यह ‘आदिम रंगमंच’ हमें किसी स्‍तर पर बेध न दे (पेनिट्रेशन की इसी प्रक्रिया को बार्थ ने ‘पंक्‍चम’ कहा है)। तस्‍वीरों में से झांकते उन सफ़ेद चेहरों का रंगमंच, जो एक अंतहीन अंत के कुहासे में थिगे हैं। तब इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि अवसान का क्षण अभी घटित हुआ है या नहीं (वस्‍तुत: वह पहले ही घटित हो चुका है)। यही कारण है कि तस्‍वीरों में दर्ज आकृतियां हमेशा सुदूर-पार की अफ़वाहें सुनाती जान पड़ती हैं : लैज़रस की तरह।

और तब, सोचता हूं कि कैसा हो अगर तस्‍वीरों को जोड़कर नए सिेरे से दुनिया को रचा जाए : आलपिनों से बिंधी तितलियों का एक संग्रहालय!
***






(आगामी १९ अगस्त को विश्‍व छायांकन दिवस पड़ता है. यह युवा कला-मर्मज्ञ सुशोभित सक्तावत का यह लेख उसी रौशनी में. साथ में दी गई तस्वीर रॉबर्ट फ्रैंक की एक यादगार क्लिक )




Comments

चन्दन said…
सुशोभित का लिखा पसन्द आता है, सो इस बार भी.सौंटांग का तस्वीरों पर लिखा पढ़ कर मुझे अपनी एक कहानी शुरु करने में काफी मदद मिली थी. कैमरा लूसिडा बाद में मिली पर क्या खूब मिली. जैसे हम तस्वीरों को देख कर जो बाते करते हैं वो अक्सर वर्तमान काल में चलती हैं और इतनी करीब चलती हैं कि लगता है, उदाहरण के लिए, उसमें जो कुछ गलत है वो ठीक किया जा सकता है. मेरे घर में एक तस्वीर है, जिसमें दीदी बहुत छोटी है और वो अकेले है, रो रही है, बाकी सब काला काला दिख रहा है.. तो उस तस्वीर को देख कर डर लगता है. मानो उस पूरी दुनिया में दीदी अकेली हो, जबकि यह ख्याल अब भी नहीं आता कि जो तस्वीर उतार रहा है, यानी पापा, वो भी वहीं मौजूद है. उस एक तस्वीर से मेरे मन में अपनी दालान को लेकर जो डर बैठा कि क्या बताऊँ, जबकि वो तस्वीर नाना घर की है. सुशोभित ने बहुत अच्छा लिखा है. मुझे उम्मीद है किसी दिन सुशोभित इसी तरह, बल्कि विस्तार से, आर्केड्स प्रोजेक्ट पर भी लिखेंगे.
शुक्रिया चंदन, आप बात को और आगे ले गए। जी हां, आर्केड्स प्रोजेक्‍ट पर मुमकिन हुआ तो अवश्‍य ही। सोंटैग का जिक्र हुआ और बेन्‍यामिन का भी नाम चला आया, यह सुखद है। दोनों, दो अलग-अलग समयों में फंसे हुए परस्‍पर अनुरागी।
बहुत खूबसूरत मानों शब्‍दों की तस्‍वीर ने एक आकार लिया हो..
सुशोभित जी का विज़न मुझे कभी भी Barthes से कम नहीं लगा...
Ravindra Vyas said…
hamesha ki tarah bahut achha!
Leena Malhotra said…
Ek thahre hue lamhe ka Vistar achmbhit Karna Hai . Apni Mrityu ki intzaam karta kaidi

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