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कथा : ११ : चन्दन पाण्डेय की नई कहानी




Ryan Hewett

कथायुक्ति का अपराधबोध

धूर्जटि पाण्डेय उमी देई के प्रथम, द्वितीय और आखिरी पुरुष हैं. घर में कोई मेहमान हो न हो, सब्जी में नमक उमी उतना ही डालती है, जितना धूर्जटि को पसन्द है. एक-दूसरे में इनका जीवन इस कदर सम्पूर्ण है कि दोनो को एक-दूसरे के सारे अन्दाज पता हैं : भोजन करते हुए किसे क्या बोलना है और क्या सुनना है, प्रेम करते हुए किसे कितनी देर तक थामे रखना है यह सब, दिशाओं की तरह तय है. समय, अनुपात, मात्रा. संयोग का इनके जीवन में कोई स्थान नहीं, जैसे यह संयोग जीवन के बजाय गल्प सूत्र हो.

आज, दृश्य कुछ अलग है. जीवन ने अनेक वर्षों की केंचुल उतार दी है, तब उमी का भाई राधे घर आया है. कल रात दरवाजे पर दस्तक हुई, तब उमी नीँद में कुनमुनाई, जैसे किसी याद ने दस्तक दी हो. दस्तक दुबारा हुई, तो नीँद खुली. दरवाजे पर भाई था. विस्मय, लकीर की तरह उमी की आत्मा पर उभर आया. वह किनारे हुई ताकि राधे अन्दर आ सके. बहन यह भी नहीं पूछ सकी, नए घर का पता कैसे चला?

राधे जब से आया है, धूर्जटि उद्विग्न हैं. नींद तकिए के इधर-उधर कहीं गुम गई है. उन्हें अपने साले के आगमन से कोई ऐतराज नहीं, पर वह ईनामी है. बहुत साल पहले कुछ किताबों और इंसानी मुश्किलों को हल करने में ऐसा उलझा कि जमींदोज ( अंडरग्रॉऊण्ड ) होना पड़ा.

धुर्जटि से विलग इस संसार में उमी का एक मुँह बोला भाई भर है : राधे. जब धुर्जटि, उमी को ब्याह कर लाए थे, उन्हीं किन्हीं रातों में उमी ने उनके निढाल शरीर पर खुद को बिछा कर आग्रह किया कि राधे के लिए इस घर के दरवाजे खुले रहें. उसका इस दुनिया में कोई नहीं. धुर्जटि ने उमी का रक्ताभ मुख चूमते हुए सहर्ष हामी भर दी. उन दिनों राधे आठ या दस वर्षों का था, इसलिए पाण्डेय जी ने उसका नामांकन औसत से अच्छे विद्यालय में करा दिया.

छोरा समझदार था. पढ़ा, लिखा और धीरे-धीरे जंगल से हिल मिल गया. यह सब इतनी शाईस्तगी से हुआ कि धूर्जटि कुछ समझ पाते, तब तक राधे अपनी तेजी और हेल-मेल के नाते नामजद हो चुका था और उसके चौकोर सिर पर बीस हजार रुपये का ईनाम पड़ गया. घर छूट गया. कभी कांकेर के जंगल, कभी मैनपाट की पहाड़ी, कभी बस्तर, इन जगहों से आई कोई खबर उसकी मुँहबोली बहन बड़े गौर से पढ़ती. प्रेमपटु पतिदेव को इन जगहों की खबरें सुनाती. इससे धुर्जटि को फायदे होते थे.

दोनों ही बातें थी. पुलिस की लाठी का वास्तविक भय और धुर्जटि का अदृश्य परंतु गहरा भय. दफ्तर में किसी फ़ाइल को अपनी स्याही से सींचते हुए ही उन्हें ख़याल आता कि राधे उनका मुँहबोला ही सही पर रिश्तेदार है और इस ख़याल भर से उनके दवात की स्याही सूख जाती. इसका फायदा यह होता कि वह उस फ़ाइल को दुबारा तिबारा पढ़ते और बची-खुची गलतियाँ सुधारते. उनके काम की तारीफ होने लगी. उन्हें दफ्तर की कार्यशालाओं में ट्रैनिंग देने के मौके दिये जाने लगे. प्रोन्नति हुई. पैसा बनाया. नया घर कर लिया.

दाम्पत्य के शुरुआती दस साल अमंगल बीते और निसंतान होने की चिंता भोजन के हर कौर में घुलने लगी थी. उन्हीं दिनों राधे के ईनामी होने की घटना घटी. फिर तो अबाधित प्रेम खंड-खंड होने लगा पर इसके भी फायदे धुर्जटि ने उठाए. होता यों कि किसी बेसुध क्षण में उमी राधे का जिक्र उठा देती और इतने भर से धुर्जटि निस्तेज और ध्वस्त हो जाते. पुलिस की लाठी उन्हें दीखने लगती. पत्नी उन्हें बिखरे महुए की भाँति बटोरती और प्रेम के लिए पुन: तैयार करती. एक तरफ यह होना था कि दूसरी तरफ साल अंतराल पर इन्हें दो बेटियों का जन्म इनके घर आँगन में हुआ. स्नेहल और सुवर्णा.

सुबह-सकारे राधे की मुलाकात भाँजियों से हुई. दोनों सहमी हुई थीं. पास आने से घबरा रही थीं. बड़ी अपने कमरे से ही ‘वॉच’ कर रही थी पर छोटी, सुवर्णा, माँ के पीछे खड़ी होकर राधे को देखे जा रही थी और जब भी राधे उसे बुलाए, वह माँ की साड़ी में छुप जाती. उमी वो सारी बातें भाई को बता रही थी, जो इस बीच घटी.

करते-धरते दोनों भांजियाँ इसके पास आईं. इसने कुछ दिलाने का वादा किया, तब दोनों बच्चियाँ खुल पाईं. खुलते ही पहला सवाल बड़ी ने किया : मामा, आप आदमी हैं ? राधे ने हल्के मूड में जबाव दिया : हूँ तो. इस पर बड़ी ने तमक कर कहा : फिर मेरे स्कूल टीचर्स आपको नक्सली कहते हैं. इस प्रश्न पर राधे ठठाकर हँस पड़ा. बच्ची को गोद में उठा लिया और खुली हँसी के साथ उमी से कहा : दिदिया रे, तोर बिटियवा सब तो भारी तेज हन!

असली मुश्किल धुर्जटि से मुखातिब थी. राधे के आगमन पर उनका दिल बैठ गया. पलँग के पाटे पर और फिर ‘कमोड’ पर बैठे-बैठे सोचते रहे कि किसी ने इसे आते हुए देख लिया होगा, तब तो यह जीवन भी गया और नौकरी भी. बच्चों का क्या होगा. पत्नी का ? पत्नी का ख्याल आते ही उनका गला रूँध गया. दाँत माँजने में उन्हे बीस से पच्चीस मिनट लग गए. फिर कुछ सोचने की हाजत महसूस हुई तो कमोड पर जा बैठे. एक यही जगह बची थी, जहाँ उनके ख्याल किसी खास तरतीब से आ जा रहे थे.

नाश्ते की मेज पर इनकी अटल मुलाकात हुई. सरकारी मुस्कान के साथ धूर्जटि ने राधे का अभिवादन स्वीकारा. एक ही प्रश्न पूछा : आन्दोलन कहाँ तक पहुँचा, साले साहब? हालाँकि अब तक वह पसीने से तरबतर डूब चुके थे. सीने के भीतर घूमती हवा महसूस हुई और बेचैनी थी कि बढ़ी जा रही थी. नाश्ते में पत्नी ने उनके ही स्वाद का ख्याल रखा था, पर इस उम्र में भी भाई से भेंट की चहक उसके चेहरे पर मौजूद थी. राधे ने यहाँ आने के जो कारण बताए उसमें न तो धूर्जटि को विश्वास था और ना ही दिलचस्पी.

जब पत्नी से उन्होंने बेचैनी निवारक टिकिया माँगी, तो पत्नी परेशान हुई, पूछा : हुआ क्या है आपको? इन्हीं किसी पल में राधे ने बताया कि वह बस निकलने वाला है. बहन ने भाई को शाम तक रूकने की बात कही. पत्नी ने पति को दवा थमाई और दफ्तर से छुट्टी ले लेने की सलाह दी. भाई जानता था, बहनोई को क्या बीमारी है? बहनोई जानता था कि बेटियों ने अगर स्कूल या कहीं कुछ भी बता दिया या फिर किन्हीं और माध्यम से साले के आने की खबर फैल गई तो यह ‘पुलिस जिला’ उनके सरकारी अधिकारी होने की बात भूल जाएगा. जाने क्या सोच कर उन्होंने भी रिश्तेदार को शाम तक रूकने के लिए कहा और आसन्न जीवन की भयभीत कल्पना के साथ जैसे-तैसे दफ्तर के लिए निकले.

उनके कहने पर ड्राईवर ने गाड़ी पुलिस अधीक्षक के दफ्तर की तरफ घुमा दी. मुलाकात सम्भव हुई, तो उन्होने अपनी सारी वाकपटुता धकेल दी. अधीक्षक से अर्ज किया, इस सूचना के ईनाम में उन्हें बस इतना ही चाहिए कि उनकी पत्नी को कोई भनक न लगे. अधीक्षक, पुलिस जिले का राजा होता है. सर्वेसर्वा. उसने धूर्जटि को नागरिक कर्तव्य निभाने की खातिर शुक्रिया कहा, गले मिला, फिर पीठ थपथपाईफिर-फिर गले मिला, शुक्रिया कहा, जैसे कह रहा हो कि धूर्जटि तुम नही जानते तुमने कितनी बड़ी मदद की है.

यहाँ जरा भी निगाह दोष होता, तो धूर्जटि के अपराधबोध पर कितना कुछ लिखा जाता, कुछ ऐसा लिखा जाता, जिसे प्रकाशित करने वाले और लेखक दोनों पर पेड़ काटने का मुक़दमा लिखा दिया जाना चाहिए. दरअसल, यहाँ उस अपराधबोध का जिक्र होना था, जो ‘संयोग’ नामक कथायुक्ति महसूस कर रही थी.

'पत्नी को कुछ भी भनक ना लगे' की बात पर अधीक्षक ने धूर्जटि को ‘संयोग सूत्र’ की कथा सुनाई. बताया कि भारतीय पुलिस को जितनी मदद संयोग ने की है, उतनी वर्दी या बड़ी से बड़ी लड़ाई भी नहीं कर सकती. जनमानस में संयोग को इतना ऊँचा दर्जा हासिल है कि हमें कभी कोई परेशानी नहीं होती. संयोग कोई पात्र होता, तो हम उसे ईनाम देकर अपने पास रखते. उधर, ‘संयोग’ था कि बार-बार पुलिसिया इस्तेमाल से तंग आकर आत्महत्या कर लेना चाहता था, पर उसके हाथ बँधे थे. उसके ठोस आँसू हवा में फैल रहे थे पर लोगों का सहज ज्ञान ऐसा कमतर था कि उन आँसूओं को लोग अभ्रक, कोयले या अन्य खनिज की धूल समझ फाँक रहे थे.

अधीक्षक ने धूर्जटि को एक पौराणिक किस्सा सुनाया. किस्सा शिव, पार्वती, सुग्गे और मृत्यु से सम्बन्धित था. इसमें एक पहाड़ी गुफा का जिक्र आया, जिसके बारे में अधीक्षक ने बताया कि इस दफा वह पहाड़ी गुफा केदारपुर के जंगल में होनी चाहिए. किस्से का पहला हिस्सा पाण्डेय ने कंठाग्र कर अपनी पत्नी के लिए रख लिया, जिस हिस्से में यमदूत सुग्गे को घूरता है. पार्वती सुग्गे का जीवन बचाने की खातिर शंकर जी से जिद करती हैं. शंकर, जो कि स्वयं ही मृत्यु के ईश्वर हैं, पत्नी की इस मनुहार पर मन-ही-मन खुश होते हुए सुग्गे को सौ योजन दूर एक पहाड़ी पर भेज देते हैं. उसी पौराणिक किस्से का आखिरी हिस्सा यह था, जिसे अधीक्षक ने जोर देकर बताया :

...देवताओं की सभा सम्पन्न होते ही शिव जी ने उस यमदूत को बुलाया और पूछा कि वह तोते को किस उद्देश्य से घूर रहा था. यमदूत ने महादेव को साष्टांग प्रणाम किया और उत्तर देने लगा कि महाराज, मैं उसे संशयदृष्टि से देख रहा था. कारण कि आज के दिन, यहाँ से सौ योजन दूर एक पहाड़ी गुफा में कोई साँप उस तोते को निगलने वाला था और वह आज यहाँ था. यहाँ से सौ योजन दूर तक उड़ना उस कमजोर जीव के वश मे कहाँ? यमराज से जरूर कोई चूक हो गई है. तब शिव शंकर ने यमदूत को बताया कि उस तोते को अपने प्रताप से उन्होने उसी पहाड़ी पर भेज दिया है. 

इस किस्से में उनके भविष्य की चिड़िया जीवित थी, इसलिए धूर्जटि इसे एकसार समझ गए. उन्हें छोड़ने, अधीक्षक दरवाजे तक आया और निश्चिंत रहने की पुलिसोचित सलाह दी.
 
धूर्जटि, खराब तबीयत लिए, भरी दुपहरी में घर लौट आए, तो पत्नी बेहद चिंतित हुई. दवा लेकर अपने कमरे में लेट गए. उनकी तबीयत की वजह भाँपते हुए राधे जाने की तैयारी करने लगा. बहन के लिए अब भी वह छोटा भाई ही था और वह उसी अधिकार भाव से उसे रोकती रही, पर अब वह रूकने वाला नहीं था. वह निकल गया होता, पर धूर्जटि ने उसे अपने पास बिठा लिया.

घड़ी-सवा घड़ी देर की बात है, उनके दरवाजे पर दस्तक हुई. सादी वर्दी में कुछ सिपाही थे. उन्होने बताया कि वे लोग जन जागरण कार्यक्रम अभियान के तहत नागरिकों से मिलते हैं. उन्हें आसन्न हमलों के प्रति सचेत करते हैं तथा सूचनाएँ लेते हैं. वे घर के भीतर चले आए. संकटो के प्रति आगाह किया. एक सिपाही बार-बार राधे को देखे जा रहा था. इनके जमादार ने दो सवाल किए. जाते-जाते उस सिपाही ने एक बार फिर राधे की ओर देखा. यह ‘देखना’ बहन देख रही थी. वह  बहुत डर गई.

पुलिस के जाते ही राधे निकलने के लिए तैयार हो गया, पर बहन की चिंता आड़े आ गई. राधे को अपने जीवन का मोल मालूम था और भावुक बहन की फिक्र उसे रोक नही सकती थी. पर बहन थी कि पत्नी के किरदार में आकर पति से बार-बार मनुहार कर रही थी: कुछ कीजिए, पुलिस वाले मेरे भाई को बार बार देख क्यों रहे थे? इसे शहर से बाहर निकालिए. भाई कह रहा था, दिदिया तू फिकिर जिन कर, हम चलि जईबे. भाई को खीझ भी आ रही थी. पत्नी पति से उसके पहुंच पहचान आदि इस्तेमाल करने की बात कर रही थी. पति ने कहा, अब संयोग ही है कि आज ही पुलिस को जन जागरण कार्यक्रम अभियान शुरु करना था, मैं क्या कर सकता हूँ? भाई भी कह रहा था, आप सब नाहक फिक्र उठा रहे हैं.

जब भाई घर से लगभग निकल चुका था, तब पति ने अपना अधिकार जताया : मेरी गाड़ी ले कर केदारपुर की तरफ निकल जाओ. जहाँ कहोगे ड्राईवर छोड़ देगा. बहन की जिद से भाई को यह मँहगी बात माननी पड़ी.

उसी अन्धियारी रात में पति ने पत्नी को पौराणिक किस्से का शुरुआती हिस्सा सुनाया, जो उन्हें अधीक्षक ने संयोग की महत्ता पर सुनाया था - जब शंकर पार्वती, देवताओं के सम्मेलन में जा रहे थे, इन्द्र के महल के बाहर ही पार्वती ने देखा कि यमदूत एक सुग्गे को घूरे जा रहा है, जो अमरूद के फल जुठारने में लगा हुआ है. पार्वती, यमदूत की इस हरकत से परेशान हुई और महादेव से आग्रह किया कि वह तोते की रक्षा करें. शंकर जी ने असमर्थता जताई और कहा कि यह तो संयोग का लेखा है, इसे मैं कैसे टाल सकता हूँ? पार्वती जिद पर खड़ी हो गईं. कहा, इस तोते को बचाइये. महादेव रूपसी पत्नी के आगे बेबस थे, सो अपने प्रताप से सुग्गे को इन्द्र महल से सौ योजन दूर एक पहाड़ी पर स्थित एक गुफा में भेज दिया, वरना उतनी दूर उड़ कर जाना एक दिन में तो असम्भव था..

पति ने पत्नी को इस कथा को ऐसे सुनाया, मानो किस्सा यहीं समाप्त हो गया हो. यह किस्सा सुनकर पत्नी किसी किशोरी की तरह उछाह से भर गई और पति के मन से लिपट गई.
***



{ चन्दन पाण्डेय हिंदी के
बहुप्रसंशित युवा कथाकार हैं. सबद पर उनकी यह नई कहानी इन कहानियों के सिलसिले में है : समय के दो भाई , ज़मीन अपनी तो थी , रिवॉल्वर }
 
9 comments:

भाई, यह गज़ब कहानी है. इसे देखने-पढ़ने की कई दृष्टियाँ एक साथ मुमकिन हो रही हैं. इसे पढ़ते वक्त यदि जर्मन कहानियाँ याद आ जाएँ, तो यह महज संयोग भर ही होगा, क्योंकि जर्मन कहानियों में भी इस तरीके से लोककथाओं के उद्धरण और उनकी अनुशंसाएँ मिलती हैं. इतने कठिन पुलिसिया समय में एक नक्सली का एक सुग्गे में बदल जाना और एक आदर्श गृहस्वामी का दोहरा हो जाना बेहद लाजिम है. भारत का लोकतंत्र जिस समय फासीवाद में घुट-घुटकर बदलता जा रहा है, उस समय में ऐसी एक कहानी का आना कुछ सुकून भरा तो है ही.


जब उन्हें अलग अलग जगह से पकड़ा गया था तो फिर एक लडकी तीन अनजान मर्दों के साथ मृत कैसे पायी गयी ? पहले से गिरफ्तार पीयूष गुहा के साथ बिनायक सेन कैसे मिल लिए ? अफजल के घरवालों को खत तीन दिन बाद क्यों मिला ? एक नक्सलवादी के साथ एक पत्रकार भला क्यों मरने के लिए मौजूद था ? इन सबका जवाब है संयोग . क्योंकि -"भारतीय पुलिस को जितनी मदद संयोग ने की है, उतनी वर्दी या बड़ी से बड़ी लड़ाई भी नहीं कर सकती."


गीता के द्वितीय अध्याय को विधिवत याद दिला गयी यह कहानी...सब कुछ तो पहले से हुआ है..


एक अच्छी और पैनी धार वाली कहानी, डरविन का नियम शिव भी मानते थे "सर्वाइवल ऑफ़ द फ़िटेस्ट" अपने को बचाना है तो प्रोटक्टिव रहो। रियलिस्टिक कहानी !बधाई..


बहुत अच्‍छी कहानी। चंदन ने एक बार फिर अपने सामर्थ्‍य को साबित किया है। कहानी अपने आकार और कथ्‍य में कितनी संतुलित है...

शुक्रिया अनुराग इसे साझा करने के लिए।


One of the class apart short story, I read. Issues of Naxal, Police Dominance, Fear of Public Servant, a married sister's affection to her brother and concern for her husband's reputation... educated young turning into rebel... and a perfectly used example stroy.. great work all in all. Best of luck CHandan ji


गजब कहानी, चंदनजी की लेखनी का कमाल है जो इतने कम शब्दों में जीवन और समाज के अनेक पहलुओं को पारदर्शी कर दे.


Story is really awesome. I enjoyed a lot.


"पत्नी उन्हें बिखरे महुए की भाँति बटोरती...
बहुत उम्दा कहानी ...हर बार की तरह . चन्दन जी कभी निराश नहीं करते .


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संपादन : अनुराग वत्स.

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