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विचारार्थ : तीरथ में भई पानी



भारत की नदियाँ



-- राममनोहर लोहिया 

अब मैं ऐसे मुद्दे पर बोलना चाहता हूँ जिसका ताल्लुक आमतौर पर धर्माचार्यों से है लेकिन जब से वे ग़ैरज़रूरी और बेकार बातों में लिप्त हो गये हैं, इससे विरत हैं. जहाँ तक मेरा सवाल है, यह साफ़ कर दूँ कि मैं एक नास्तिक हूँ. किसी को यह ग़लतफ़हमी न हो कि मैं ईश्वर पर विश्वास करने लगा हूँ. आज के और अतीत के भी भारत की जीवन-पद्धति, दुनिया के दूसरे देशों की ही तरह, लेकिन और बड़े पैमाने पर, किसी न किसी नदी से जुड़ी रही है. राजनीति की बजाय अगर मैं अध्यापन के पेशे में होता तो इस जुड़ाव की गहन जाँच करता. राम की अयोध्या सरयू के किनारे बसी थी. कुरु, मौर्य और गुप्त साम्राज्य गंगा के किनारों पर फले-फूले, मुग़ल और शौरसेनी रियासतें और राजधानियाँ यमुना के किनारों पर स्थित थीं. साल भर पानी की ज़रूरत एक वजह हो सकती है, लेकिन कुछ सांस्कृतिक वजहें भी हो सकती हैं. एक बार मैं महेश्वर नाम की जगह में था जहाँ कुछ समय के लिए अहल्या ने एक शक्तिशाली शासन स्थापित किया था. वहाँ ड्यूटी कर रहे संतरी ने यह पूछकर मुझे दंग कर दिया कि मैं किस नदी का हूँ. यह दिलचस्प सवाल था क्योंकि मेरी भाषा, मेरे शहर या मेरे क़स्बे  के बारे में पूछताछ करने की बजाय उसने मुझसे मेरी नदी के बारे में पूछा. सभी बड़े साम्राज्य नदी-तटों पर बसते आए हैं, - चोल, पांड्य और पल्लव साम्राज्य क्रमशः कावेरी, व्यगीर और पालर नदियों के किनारों पर थे.

हमारे देश की कुल चालीस करोड़ की आबादी में से तक़रीबन  एक या दो करोड़ लोग रोज़ाना नदियों में डुबकी लगाते हैं और पचास से साठ लाख लोग नदी का पानी पीते हैं. उनके दिल और दिमाग़ नदियों से जुड़े हुए हैं. लेकिन नदियाँ शहरों से गिरने वाले मल और अवजल से प्रदूषित हो गयी हैं. गंदा पानी ज़्यादातर फैक्ट्रियों का होता है और कानपुर में ज़्यादातर फैक्ट्रियां चमड़े की हैं जो पानी को अब और भी नुक़सानदेह बना रही हैं. फिर भी हज़ारों लोग यही पानी पीते हैं, इसी में नहाते हैं. साल भर पहले इस दिक़्क़त  पर कानपुर में मैं बोला भी था.

क्या हमें नदियों के प्रदूषण के ख़िलाफ़ एक आंदोलन शुरू करना चाहिए? अगर ऐसा आंदोलन सफल हो जाय तो अकूत धन की बचत भी हो पायेगी. अवजल को शोधित करके गंगा या कावेरी में ही डाल देने की बजाय ड्रेन पाइपों के ज़रिये उन्हें नदी से दस-बीस मील दूर ले जाया जाय और मैदानों में छोड़ा जाय. इस जगह पर खाद बनाने की फैक्ट्री खोली जा सकती है. देखने में यह ख़र्चीला लगता है. लेकिन समूची दृष्टि को क्रांतिकारी तरीक़े  से बदलना होगा. ख़र्च  करोड़ों में होगा लेकिन सरकार पंचवर्षीय योजनाओं में २२०० करोड़ रूपये सालाना क्या नहीं ख़र्च  कर दे रही है? मुमकिन है, कुछ अन्य परियोजनाओं के अमल को टालना पड़े. लेकिन ऐसी योजना को लागू करने के रास्ते में आने वाले अवरोधों को भी मैं जानता हूँ. हमारे वर्तमान शासक और भविष्य में शासक बनने के आकांक्षी जन नक़ली और सतही तौर- तरीक़ों से देश का यूरोपीयकरण कर डालने के बारे में सोचते हैं. और आज के शासक हैं कौन? वे एक लाख होंगे, या इससे भी कम, जो ज़रा-सी अंग्रेज़ी जानते हैं. वे जानते हैं कि छुरी-काँटे का इस्तेमाल कैसे किया जाता है और टाई और कोट कैसे पहनना चाहिए. उन्होंने एक ताक़तवर संसार बना लिया है और उनके नेता हैं पंडित नेहरू. श्री संपूर्णानंद भी उसी संसार का प्रतीक हैं, हालाँकि अपने कपड़े-लत्ते से वह यूरोपियन नहीं लगते लेकिन अगर श्रीयुत नेहरू को अमेरिका जाना हो तो वहाँ वह भी ऐसी ही शख्सियतों में गिने जायेंगे.

शहर बनारस में भगवान विश्वनाथ को लेकर आंदोलन चला है. अब उनका एक नया मंदिर भी बनाया जा रहा है. दरअसल यह आंदोलन भगवान विश्वनाथ के लिए था ही नहीं. संघर्ष तो ब्राह्मणों के देवता और चमारों के देवता के बीच था. हिन्दू मानस बेकार ही फालतू मामलों में उलझा रहता है. अगर सिर्फ़ करपात्री जी ने उस अंदाज़ में काम कर दिखाया होता जिसका संकेत मैंने किया है, तो समस्या सुलझ गयी होती. लेकिन करपात्री जी कौन सी दुनिया की नुमाइंदगी करते हैं. वे राजस्थान के धनकुबेरों और घनघोर सामंतों के प्रतिनिधि हैं. एक की बजाय दो विश्वनाथ मंदिर बनवा देने से कोई समाधान नहीं होगा. ज़रूरत पूरे देश की पुनर्रचना और गरीबी के उन्मूलन की है.

आज हमारी सेना के जवान कौन हैं? ये ग़रीब के बेटे हैं और वे लोग हैं जो जान देते हैं. ये वे हैं जो देहरादून और सैंडहर्स्ट के नक़ली माहौल में प्रशिक्षित अधिकारियों के हुक्म की तामील करते हैं. अफसर समृद्ध वर्गों के हैं. वे आधुनिक विश्व के नुमाइंदे हैं. वे क्यों इस देश के लाखों लोगों के लिए दिक हों? उनके पास भारतीय दिमाग़ है भी नहीं. अगर ऐसा होता तो नदियों की सफ़ाई की योजनाएँ आज बिल्कुल तैयार होतीं. मैं चाहता हूँ कि पार्टी से बाहर के लोग बैठकें करने, जुलूस निकालने और संगोष्ठियाँ आयोजित करके सरकार को नदी-प्रदूषण-निवारण परियोजनाओं को उठाने के लिए बाध्य करने की ख़ातिर सोशलिस्ट पार्टी से हाथ मिला लें. हमें ख़ुद भी इस संकल्प के साथ तैयार रहना होगा कि यदि तीन से छह महीने के भीतर अवजल के प्रवाह को मैदानों की ओर नहीं मोड़ा गया तो हम वर्तमान ड्रेनेज सिस्टम को तोड़ देंगे और इस तोड़फोड़ में किसी किस्म की हिंसा नहीं होगी. 

कबीर ने कहा है:
माया महाठगनि मैं जानी                                                                                           
केशव की कमला बन बैठी,                                                                                  
शिव के भवन भवानी                                                                                         
पंडा की मूरत बन बैठी,                                                                                     
तीरथ में भई पानी    

तीर्थ में क्या है? – सिर्फ़ पानी. तो लोगों को सरकार को डाँटना चाहिए, ‘तुम बेशर्म लोग, बंद करो यह मलिनता.’ मैं तो फिर भी नास्तिक हूँ. मेरे लिए सवाल तीर्थ का नहीं है, यह है कि हमारा देश तीस लाख लोगों का है कि चालीस करोड़ का.
 ***


अनुवाद : व्योमेश शुक्ल 

{ १९५८ की फरवरी में बनारस में दिया गया भाषण
राममनोहर लोहिया की मशहूर किताब ‘इंटरवल ड्यूरिंग पॉलिटिक्स’, नवहिंद प्रकाशन, हैदराबाद, प्रथम संस्करण १९६५ में शामिल निबंध. साथ में दी गई तस्वीर गूगल से. }               
3 comments:

1958 में डा. लोहिया यह कह रहे थे, आज उसके पचपन साल बाद स्थिति कितनी सुधरी, कौन से आन्दोलन हुए, किसने किये, क्या प्रभाव पड़ा उनका? नदियों को माँ कह पूजने वाले, उसमें नहाने वाले, कम नहीं हुए, बढ़ते ही गये, पर अगर डा. लोहिया के समय में नदियाँ प्रदूषित थीं तो आज वे गन्दे नाले बना दी गयीं हैं.


tum kis nadi ke ho....!! jaante boojhte sab hain.. ab to prakriti swayam path padha rahi hai.. kami cheezon ko dekhne me nahi.. Lohia ji se aaj talak har kisi ki apni ek bhinn drishti rahi hai. kami sab kuchh dekhte samajhte bhi laachaar aur lachar hote chale jaane me hai.....


lohia rajneeti krte the aaj koi badi poloitical party ke liye samaya nahee in muddon ko smjhne ke liye /. aour na samperpit karykarta ke kaam karen


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