Sunday, June 02, 2013

अविनाश मिश्र की डायरी से कुछ नई सतरें



प्रेरणाएं करीब-ए-मर्ग हैं मगर यह रियाज का वक्त है

- एक लहर में आती हैं वे मेरे पास 
- वे आयतों की तरह उतरती हैं मुझ पर 
- जब मैं बेहद उदास होता हूं 
मैं प्रेरणा में यकीन रखता हूं 
मुझे स्मृतियां अच्छी लगती हैं 
वर्ष के सबसे नीरस महीनों में 
- वे धूल भरी आंधियों की तरह उठती हैं                                                                                                                                     

एक क्रम में एक ‘गलत कविता’ से प्रतीत होते ऊपर के वाक्य दरअसल भिन्न-भिन्न ‘रचना प्रक्रियाएं’ हैं। वैसे कई लंबी कविताएं भी मैंने लिखी हैं, लेकिन अब जब सब कुछ सर्वथा अपाठ्य होता जा रहा है, ऐसे में स्वरचित लंबी कविताओं का सार्वजनिक प्रकटीकरण मुझे एकदम गैरजरूरी लगता है। और अगर आप यह टेप रिकॉर्डर बंद कर दें तब मैं कुछ और भी काम की बातें बता सकता हूं। 

मसलन, यह एक सच है कि जो अच्छे कवि नहीं बन पाते, वे अच्छे आलोचक बन जाते हैं। जो अच्छे आलोचक नहीं बन पाते, वे अच्छे निर्णायक बन जाते हैं। जो अच्छे कहानीकार नहीं बन पाते, वे अच्छे संपादक बन जाते हैं और जो अच्छे संपादक नहीं बन पाते, वे अच्छे दलाल बन जाते हैं। वैसे ये सब व्यक्तित्व बनने की प्रक्रियाएं हैं, लेकिन इन्हें ‘रचना प्रक्रियाएं’ भी समझा जा सकता है।

यहां मैं विषय से कुछ हटता हूं और कुछ प्रश्न करता हूं कि क्यों वह ‘महाकाव्यात्मकता’, जो एक उपन्यास में प्राप्त होती है, एक अरब कविताओं में भी दुर्लभ है? क्यों कुछ लंबी कविताएं सुंदर गद्य का निर्माण करती हैं? और क्यों कई लंबी कहानियां केवल वाग्जाल होती हैं? क्यों कुछ डायरियों में जीवन सीलिंग फैन की मानिंद घूमता रहता है, जबकि जीवन सीलिंग फैन-सा नहीं है, डायरियों-सा है कतई। 

वैसे कई डायरियां भी मैंने लिखी हैं। एक बार एक डायरी में मैंने लिखा था : यह काव्य जैसे काव्य और गद्य जैसे गद्य से रिहाई का वक्त है। प्रेरणाएं करीब-ए-मर्ग हैं मगर यह रियाज का वक्त है। यह महंतों के महांतों के इंतजार का वक्त है।

विषय में विषयातीत हो जाना मेरा लक्ष्य होता है, लेकिन इस विषयांतर से हटकर यदि विषय पर आऊं तब कह सकता हूं कि कोई कब और कैसे कविता, कब और कैसे कहानी, कब और कैसे डायरी या कब और कैसे कुछ और रचता है यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि यह कि वह आखिर यह सब कुछ क्यों करता है। क्या वह कुछ बनना चाहता है- कवि, कहानीकार, आलोचक, संपादक या निर्णायक? वह शर्तिया नष्ट होगा क्योंकि वह माध्यम से उम्मीदें पाल रहा है। ...और ‘रचना-प्रक्रिया’- सरीखा धुंधला और कुछ भी नहीं है एक रचनाकार के जीवन में। इसलिए इस पार्थिव परंतु अप्रकट को उद्घाटित करना वैसे ही अपराध है, जैसे सार्वजनिक सिनेमाघरों में ‘ब्लू फिल्म’ प्रदर्शन। वैसे कई सार्वजनिक सिनेमाघरों में ब्लू फिल्म्स भी मैं देखता रहता हूं। वैसे यह आपने बहुत अच्छा किया था जो टेप रिकॉर्डर बंद कर दिया था, वर्ना कई मुश्किलें आती हैं इससे इस मौसम में।
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वे तुम्हें एक ‘ध्रुव’ से मिलाएंगे और तुम्हें घोषित कर देंगे इस वर्ष का ‘निराला’ या ‘मुक्तिबोध’ या ‘शमशेर’ या ‘केदार’...
                                                                       
मैं लख न सका वे दृग विपन्न (सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’)

विराट झूठ के अनंत छंद सी (गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’)

टूटी हुई बिखरी हुई (शमशेर बहादुर सिंह)

आज क्रूर कर्कश विश्व भर में सभ्यता के गाल बजते (केदारनाथ अग्रवाल)

वे यह काम कई दशकों से कर रहे हैं। वे दक्ष हैं इस विधा में।
उनकी घोषणाएं ठहराव के लिए एक उम्र जितनी लंबी नींद चाहती हैं।
वे तुम्हें कह सकते हैं ‘कवियों का कवि’ या हिंदी का ‘शुंतारो तानीकावा’ या ‘जोजेफ ब्राडस्की’ या मध्य प्रदेश का ‘दिलीप चित्रे’ या पहाड़ का ‘पाश’ या बिहार ‘वरवर राव’।
वे तुम्हें कुछ भी कह सकते हैं। शब्द बहुत कम हैं उनके पास और पुरस्कार बहुत ज्यादा।
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मैं नकारात्मकता से बचना चाहता हूं और इस बचाव में मेरी आंखें मेरी आत्मा की पवित्रता को उजागर करती हैं।
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मैं सुदूर से आता हूं यह सोचकर कि एक दिन उस केंद्रियता को नष्ट कर दूंगा जो मुझे नकारात्मक बनाती है। मेरी यह कोशिश मुझे आत्मघाती बनाती है।
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श्रीकृष्ण गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन से कहते हैं : जो सदा सबसे अमित्रता रखता है (स्वयं से भी) वह अविचलित और आत्म स्थित है।                                           

इस कथ्य के आलोक में मेरा मित्रवंचित वैभव उस वर्तमान का विरोध है, जो वंचितों और कवियों को नायक के रूप में स्वीकार नहीं करता।
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मेरे वैभव में बहुत सारी जगहें ऐसी हैं, जो कतई घर नहीं हैं, लेकिन मैं उन्हें बार-बार घर बनाता हूं। उन्हें पुस्तकों, महापुरुषों की तस्वीरों और संगीत से भर देता हूं। बाद इसके इस वैभव में मैं एक स्त्री को आमंत्रित करता हूं, लेकिन ‘वह खटिया पर गिरते ही मर जाती है।‘ वह ‘त्रियाचरित्र’ की नायिका है
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मैं प्रेम करता हूं और बताता नहीं हूं। ‘प्रेम के समान आकर्षणकारी और कुछ भी नहीं...चलो, आगे बढ़ो, मार्ग को सोचकर की क्लांत मत हो जाओ, नहीं तो जा नहीं पाओगे। लेकिन जहां परित्याग करना हो वहां आकृष्ट और आसक्त न होना- दुःख से बचोगे।‘ मन कहता है, मैं सुनता हूं।
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‘मुझे छोड़कर मत जाओ, प्लीज...’ यह वाक्य उसे कई बार कई तरह से बोल-बोलकर बताना था। 
नहीं-नहीं यह कोई पूर्वाभ्यास नहीं था और न ही इस दृश्य को कहीं मंचित होना था।
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दिल्ली में बस समुद्र नहीं है। बाकी सब कुछ है जो मुझे चाहिए। पर्वत और जंगल तक खोजूं तो मिल जाते हैं, और कुछ दूर चला जाऊं तब एक नदी भी और निर्जन भी...।
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नदी का दुःख जल नहीं यात्रा है और जल कभी लौटता नहीं, यही उसके अस्तित्व का वैभव है।
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‘दोहराव से यकीन टूटता है’                                                                    
यह पंक्ति मुझे तब सूझी जब मैं ठहरे हुए नीर में अपनी पीर घोल देने के लिए उसमें पत्थर फेंकने का बेतुका खेल खेल रहा था और मुझसे बहुत दूर वे कहीं कह रहे थे, ‘बस ये कुछ और नाम हैं।‘
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जो अभिव्यक्ति में व्यक्तिगत होने को बुरा मानते हैं, वे व्यक्तिगत रूप से बेहद बुरे लोग हैं। लेकिन श्रेष्ठ कवियों को अपशब्द नहीं कहने चाहिए, रचनात्मक संभावनाएं शेष हो जाती हैं
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[ अविनाश हिंदी में सक्रिय श्रेष्ठ युवतम प्रतिभाओं में से एक हैं। ] 

7 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बनते और बिगड़ते दुनिया के लोग।

वंदना शुक्ला said...

‘रचना-प्रक्रिया’- सरीखा धुंधला और कुछ भी नहीं है एक रचनाकार के जीवन में...सहमत

sarita sharma said...

आत्मचिंतन से उपजा ज्ञान.इस रचनात्मक डायरी में लेखक की भावी दिशा परिलक्षित होती है.उसमें संभावनाएं हैं और इसी प्रकार गंभीरता से लिखते रहने की शुभकामनायें.

GGShaikh said...

"दोहराव से यकीन टूटता है !"
यह ही कह सकते हो अविनाश जी ...

अविनाश जी आपकी आवाज़ हम सुनना चाहें और आपका लिखा पढना चाहें ! तभी तो
आपका कुछ भी लिखा-छपा हमें मिलता है, हम उसे टालते नहीं है ...कितना ही समय का
कंजेशंस क्यों न हो, पढ़ ही लेते हैं ... और खुश भी होते हैं ...आपके व्यक्तित्व की खूबी
है की आप जीवन की और साहित्य की भ्रामकताओं से वाकिफ़ लगो ...

आपने कहा है: "रचना-प्रक्रिया’- सरीखा धुंधला और कुछ भी नहीं है एक रचनाकार के जीवन में।"
इस का मतलब तो यही हुआ की रचनाकार को अपनी हरेक कृति के बाद खुद को एक रचनाकार या
साहित्यकार साबित करना होता है ...एक नया सा आत्मसंतोष पाना होता है...

डायरी का इंतज़ार रहेगा ...

turtle.walks said...

भविष्यवाणियों की बहुलता रही है तुम्हारे पास और ये भविष्यवाणियाँ शुभकामनायों की फसल भी बखूब काट रही है पर इस डायरी के लेखक को उसके वर्तमान में देखें तो वह 'विक्टिम' सरीखा क्यूँ दिख रहा है जबकि उसकी तमाम सक्रियताएं और 'रचना प्रक्रियाएं' उस केन्द्रीयकरण और ध्रुवीयकरण के आतंक के विरुद्ध बेलौस संकल्प की तरह रही हैं और यह आत्मज्ञान यूँ ध्रुवीय रूचि क्यूँ होती जा रही है तुम्हारी ?

मोनिका कुमार

himani said...


जो अभिव्यक्ति में व्यक्तिगत होने को बुरा मानते हैं, वे व्यक्तिगत रूप से बेहद बुरे लोग हैं।
(Y)

Manoj Chaudhary said...

जबरदस्त