सबद
vatsanurag.blogspot.com

कथा गंगुबाई की



{ किराना घराने की सुप्रसिद्ध ख़याल गायिका गंगुबाई हंगल की आत्मकथा के चुनिन्दा अंश सबद की पांचवीं वर्षगाँठ पर आपके सम्मुख हैं । यह आत्मकथा गंगुबाई ने एन. के. कुलकर्णी को बोल कर लिखाई थी। कुलकर्णी जी ने इसे अंग्रेजी में लिपिबद्ध किया। अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद युवा कवि-लेखक मृत्युंजय ने किया है। सबद के लिए इससे पूर्व मृत्युंजय ने ख़याल गायक पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर पर एकाग्र गद्य का भी अनुवाद किया था। सबद पर इसके अलावा बिस्मिल्लाह खान और भीमसेन जोशी सरीखे संगीतकारों पर भी आलेख प्रकाशित किये गए हैं.  }






तखल्लुस हंगल

१९१३  में ०५  मार्च के रोज धारवाड़ के शुक्रवारपेट इलाके में मेरी पैदाइश हुई। वहीं हमारा घर था। इसी जगह पालने में उलटते-पलटते मैंने माँ से लोरियाँ सुनीं। माँ कर्नाटक शैली की जानी-मानी गायिका थीं। तब के जमाने में शुक्रवारपेट ब्राह्मणों का इलाका था। आज भी है। मेरी माँ घर-बार बेहद ध्यान से चमका कर रखती थीं। एक तरह से कहिये तो इससे उनके मन की पवित्रता की झलक मिलती थी। पीतल और तांबे के बर्तनों को राख और इमली से वे तब तक घिसतीं, जब तक वे शीशे की तरह झिलमिलाने नहीं लग जाते।

          एक बार गर्मी की किसी दोपहर एक वृद्ध ब्राह्मण हमारे घर पधारे और पीने का पानी माँगा। माँ दुविधा में पड़ीं, पानी दें कि न दें। हम तो ब्राह्मण नहीं हैं, निचली जाति से हैं। माँ  की हिचकिचाहट देख ब्राह्मण महोदय कलयुग को कोसने लगे कि क्या जमाना आ गया है, लोग पानी तक नहीं पिलाते। तो जब माँ ने अपनी दुविधा उनके सामने रक्खी, उन विप्रदेव ने कहा, "देवि, जल तो जाति से परे है, और आपके घर की सुघराई  देख कौन कहेगा कि आप ब्राह्मण नहीं हैं? पानी पिलाईये।" तब उन ब्राह्मण की बातों से माँ ने बढ़कर थोड़े से गुड़ के साथ उन्हें पानी दिया। तृप्त ब्राह्मण देव अशीषते हुए विदा हुए। और माँ ने सोचा, "उद्गम स्थान पर गंगा हमेशा ही पवित्र होती हैं।"

मेरी परदादी का नाम था गंगव्वा। हमारा पुरखे हंगल के रहने वाले थे, सो हमारा तखल्लुस हंगल हुआ। हमारे दादा नारगुंड की छोटी सी रियासत में मुंसिफ थे। उस जमाने में पुणे से पेशवा राजा सरकार चलाया करते थे। तो नारगुंड के राजा श्री बाबा साहेब के साथ हमारे परदादा भी अंग्रेज-विरोधी बगावत में शरीक हुए। जब बरतानवी सिपाहियों ने उनका पीछा किया तो वे अनजानी जगह को छू-मंतर हो गए। फिर बाद में उनका कोई पता नहीं लगा। बाद इसके परदादी गंगव्वा ने घोड़े की जीन कसी और नारगुंड से हंगल आ पहुँचीं, और यहीं अपना ठिकाना किया। छुटपन में परदादी की यह साहस-गाथा सुन मैं रोमांचित हो गयी थी। तब मैं सात बरस की ही थी, और तुरत-तुरत मेरा दाखिला राष्ट्रीय विद्यालय में हुआ था। कन्नड़ के नामी कवि श्री डी. आर. बेंद्रे साहब हमारे गुरुओं में से एक थे। बेंद्रे गुरूजी से बाद की जिंदगी में भी मेरा लंबा जुड़ाव रहा। वे मेरे गुरु, निर्देशक और शुभेच्छु थे। हमने एक-दूसरे के सुख-दुःख साझा किये।    

 खूब खाना और खूब गाना


संगीत में मेरी दिलचस्पी तब भी थी जब मैं बहुत छोटी थी और स्कूल जाना शुरू ही किया था।  मेरी माँ कर्नाटक शैली में शास्त्रीय बंदिशें, भक्ति और रोमांटिक गीत गाती थीं। रेनेबेन्नूर के श्री शामाचार्य और हरपनहल्ली के इमामसाहेब उनके गुरु थे। किराना घराने के संस्थापक महान गायक अब्दुल करीम खान साहब माँ द्वारा गाई गयी श्री त्यागराज (कर्नाटक संगीत की त्रिमूर्तियों में से एक) की रचनाओं के प्रशंसक थे। खासकर माँ जिस स्वर-लिपि व्यवस्था का इस्तेमाल करती थीं, वह उनको बहुत रुचता था। एक बार जब खान साहब हारे घर पधारे, मैंने भी उनके सामने गाया। तारीफ करते हुए खान साहब ने मेरी पीठ ठोंकते हुए फरमाया, "गला अच्छा है, बेटी। खूब खाना और खूब गाना।´ मेरे लिया यह उनका आशीष था। माँ और मेरी, हम दोनों की ख्वाहिश थी कि मुझे हिन्दुस्तानी संगीत सीखना चाहिए।


स्कूल के रास्ते में किनारे की एक दुकान पर मैं अक्सर हिन्दुस्तानी संगीत के रिकार्ड सुनती थी। इनमें मेरी खास पसंद थे श्रीमती जोराबाई अगरवाली के रिकार्ड। वहाँ एक हारमोनियम बजाने वाले थे श्री श्रीपादराव तमहंकर, जो हम लोगों के करीबी वाकिफकार थे। हारमोनियम सुधारने के अलावा वे अपनी दुकान में ग्रामोफोन रिकार्ड भी बेचा करते थे। और सबकुछ भूल-भाल मैं घंटो-घंटों मैं ग्रामोफोन रिकार्ड सुना करती। ख़ासकर "अनबन जिया में मिला" मुझे बेहद पसंद था। मैंने इसे इतनी बार सुना कि यह मेरे दिल पर नक्श हो गया।
माँ को अक्सर मैं घर पर और शादियों के जलसों में गाते हुए सुना करती थी। वे जवाडी (रोमानी) गीत गाती थी और इन गीतों के बोल में छुपे हुए सूक्ष्म अर्थ खींच लाती थीं।

जयपुर घराने के नामी संगीतकार श्री भास्करबुआ बाखले उन दिनों धारवाड़ में संगीत पढ़ाया करते थे। उनकी ही कृपा थी जो हिन्दुस्तानी संगीत लोगों में काफी पसंद किया जाने लगा। पर मुझे किराना घराना की संगीत-शैली ने अपनी ओर ज्यादा खींचा, जिसको अब्दुल करीम खान गाते थे। उन्होंने ही इस घराने की संगीत-शैली को लोकप्रिय बनाया था।

मैं तब प्राथमिक शाला में ही थी जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन १९२४ के साल बेलगाम में हुआ। इसकी सदारत और कोई नहीं, खुद गांधी जी कर रहे थे। हमारे एक मास्टर साहब हम कुछ लड़कियों को स्वागत गान सिखाने लगे। हालांकि श्री नारायणराव हुइलगोल ने इस मौके के लिए ख़ास एक गीत "उदयावगाली नम्मा चेलुवा कन्नडा नाडु" रचा था, पर मैंने उपस्थित सज्जनों के स्वागत में अपने मास्साब का सिखाया हुआ गाना ही गाया।  महात्मा जी ने गाने की तारीफ भी की। गांधी जी को इतने करीब से देखकर मैं रोमांचित थी और फख्र महसूस कर रही थी।  मुझे लगा कि मुझे बहुत कुछ मिल गया है। खान साहब की दुवा मुझे पहले ही हासिल थी, अब गांधी जी की तारीफ का आशीष भी मुझे मिल गया। आगे चलकर मेरे गुरू बनने वाले श्री रामभाऊ कुंडगोलकर (सवाई गन्धर्व) भी इस मौके पर वहाँ मौजूद थे और उन्होंने गाया भी था। यहीं पहली बार मैंने उन्हें और मैसूर के वीणा के उस्ताद श्री शेषन्ना को देखा था।

माँ को रही संगीत की तालीम की फ़िक्र

स्कूल की पढ़ाई से ज्यादा मेरी माँ को मेरी संगीत की तालीम की फ़िक्र थी। उन्होंने सोचा कि हुबली में रहने से मेरी संगीत की तालीम ज्यादा आसानी से जारी रह सकेगी। १९२४ से लगाय १९३२ तक मैं धारवाड़ से हुबली आती-जाती रही। आखिर में घर वालों ने मेरी संगीत की तालीम के लिहाज से हुबली में बसने का फैसला किया। इसी हिसाब से हमने हुबली के गणेश पीठ इलाके में किराए पर एक घर लिया। धारवाड़ में मुझे भास्करबुआ बाखले, श्री पित्रे (जो पेशे से वकील थे) और मास्टर कृष्णराव को सुनने का सौभाग्य हासिल था। अलावा इसके मैंने श्रीमती हीराबाई बडोदकर और खान साहब अब्दुल करीम खान का गायन भी सुना। मुझे याद है, एक बार तो श्रीमती हीराबाई बडोदकर हमारे साथ हफ्ते भर ठहरी भी थीं।

हुबली में घर ले लिया, तो नतीजे में मेरी शुरुआती पढ़ाई हो गयी खत्म। अभी मैं पांचवीं में ही थी। अब आगे क्या हो?  तो गुरू की खोज शुरू हुई।

माँ ने कर्नाटक शैली में गाना बंद कर दिया ताकि उनकी गायकी की शैली से कहीं मैं प्रभावित न हो जाऊं। बारह साल कर्नाटक संगीत में महारत हासिल करने लगाने वाली माँ ने, सोचिये, कितनी बड़ी कुर्बानी दी! और तो और, अब उन्होंने संगीत सम्मेलनों में गाने का न्योता  स्वीकारना भी बंद कर दिया।

हुबली में बसे दो बरस बीत गए थे। खाली बैठने की बजाय मैंने श्री शामलाल और प्रतापलाल से कथक नृत्य सीखना शुरू किया। आप दोनों राजस्थान से धारवाड़ आये थे। मेरा झुकाव तो संगीत की तरफ था, नृत्य की तरफ नहीं, अगरचे मैंने इन उस्तादों से ठुमरी, दादरा, गज़ल सहित हिन्दुस्तानी संगीत के और दूसरे प्रकार भी सीखे। चूंकि माँ की भारी इच्छा थी कि मैं अपने को हिन्दुस्तानी संगीत को समर्पित कर दूं, सो कथक, ठुमरी वगैरह का सिलसिला जल्दी ही बंद हुआ।

हुबली के उत्साही संगीतकार दत्तोपंत देसाई हमारे परिवार के जाने-पहचाने तो थे ही, बुजुर्गवार हमारे खैरख्वाह भी थे। माँ का पक्का मानना था कि अगर दत्तोपंत देसाई की कोशिश से मैं श्री सवाई गन्धर्व (रामभाऊ कुंडगोलकर) की देख-रेख में चली जाऊं तो इससे मेरी संगीत की तालीम की खोज में भारी फायदा होगा। पर जीवन-यापन के लिए श्री रामभाऊ एक मराठी नाटक मंडली में शामिल हो गए थे, और फिलवक्त संगीत सिखाने के लिए खाली न थे। अस्थाई बंदोबस्त यह हुआ कि श्री भातखंडे की किताबों के निर्देशन में श्री दत्तोपंत खुद ही मुझे पढ़ाने लगे। हारमोनियम पर संगत करते श्री कृष्णाचार्य कोउलागी और और तबले पर होते श्री नानप्पा अन्निगेरी। यों घर पर ही हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की मेरी औपचारिक तालीम शुरू हुई।

श्री कृष्णाचार्य हुलगुरु किन्नारी के नामचीन उस्ताद थे। हुबली के बाशिंदे थे। खुद ही किन्नारी वाद्य बनाया था। मेरे शुभेच्छु श्री दत्तोपंत ने कृष्णाचार्य को मनाया कि वे मुझे संगीत-ज्ञान दें। कृष्णाचार्य से एक साल में मैंने साठ रचनाएँ सीखीं।

‘जीवन-संगीत’ का उदास हिस्सा

इसी बीच एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी। मेरी संगीत-कक्षाओं के दौरान माँ मेरे बगल में बैठतीं। कभी-कभी खांसी का वक्फ़ा आता, और मेरा ताल के साथ सम पर लौटना मुश्किल हो जाता। माँ पीठ पर थपकियाँ देकर ताल पकड़ने में मेरी मदद किया करती थी। बचपन में मुझे सुलाने के लिए माँ सर पर थपकियाँ देती थी, ये थपकियाँ वैसी ही थीं।  ये मेरी रहनुमाई करने वाली फरिश्ता थीं।  एक बार माँ ने कृष्णाचार्य से कहा कि “गंगू ताल को पकड़ने में थोड़ी कमजोर है। कृपा करके इसकी ताल पर थोड़ा और ध्यान दीजिए।” इस गुजारिश का कृष्णाचार्य बुरा मान गए। दूसरे उनकी सेहत भी गिर गयी थी। नतीजे में उन्होंने मुझे पढ़ाना बंद कर दिया और जिद करने लगे कि पढ़ाने की एक साल की फीस, एक सौ बीस रूपये उन्हें तत्काल दी जाए। बेचारी माँ ने अपनी पांच तोले (लगभग छप्पन ग्राम) वजन की सोने की चूड़ियों की पेशकश की पर उन साहब की जिद कि नकद रूपये अदा किये जाएँ। मुझे उस घटना की याद से बहुत ही दुःख होता है। सोने की चूड़ियां बेचकर सिर्फ सौ रूपये हासिल हुए और यही रूपये गुरु-दक्षिणा की थाली में सजा कर कृष्णाचार्य के सम्मुख पेश किये गए। उन्होंने रूपये गिने और बीस रूपये कम पाकर न सिर्फ दक्षिणा लेने से इनकार किया, बल्कि बेइज्जत करते हुए रूपये वापस कर दिए। माँ ने कसम खाई कि मरने से पहले उनका बीस रूपये का कर्ज़ उतार देंगी। तब से लगाकर आज के दिन तक इस घटना के दुःख की अमिट छाप मेरे मन पर टंकी हुई है।


गणेश पेट में रिहाईश के दिनों की एक और बात मुझे भुलाए नहीं भूलती। घर पर जब मैं रियाज़ करती, सीढ़ियों के ऊपर वाले पड़ोसी टीन का खाली डिब्बा जोर-शोर से पीटते हुए उपद्रव मचाने लगते, जिससे कि मेरे रियाज़ में खलल डाल सकें।


जब मैं सोलह साल की थी, १९२९ में पेशे से वकील, पढ़े-लिखे और सुसंस्कृत श्री गुरुराव कोउलागी से मेरी शादी हुई। उनकी पहले शादी हुई थी, पर पत्नी चल बसीं थीं। उनको मेरा गाना पसंद था। इसलिए कि मैं अपनी संगीत की तालीम को आगे बढ़ा सकूं,  उन्होंने शादी के बाद भी मुझे माँ के साथ रहने की इजाजत दे दी। मेरे पिताजी श्री चिक्काराव भी मेरी शादी से खुश थे। खैर, वक्त गुजरता गया और मेरे पति पर उनके परिवार वाले दबाव बनाने लगे कि वे अपनी बड़ी बहन की बेटी से शादी कर लें। मैंने अपने पति को माँ-पिता की बात का मान रखने के लिए समझाया और इस शादी के लिए रजामंदी दे दी। इस रजामंदी ने मुझे इनके माँ-पिता का प्यारा बना दिया और वे अक्सर मुझे बुलावा भेजते कि हमसे मिलने घर आओ।  मेरे पति ने संगीत साधना करने में मेरी हरसंभव हौसला-आफजाई की। पिताजी जब भी रनबेन्नूर से हुबली आते तो अक्सर मुझे तानपूरे पर रियाज करता पाते। मुझे चिढाते हुए मजाक-मजाक में कहते “बहुत हुआ आ आ आ .... बंद करो और ई तानपूरे को दूर हटाओ”।

गुरु बिन कैसे गुण गावे

कृष्णाचार्य हुलगुरु से संगीत सीखना बंद करने के बाद, एक बार फिर दत्तोपंत देसाई सवाई गंधर्व के पास अर्जी लेकर पहुंचे कि वे मुझे शिष्या स्वीकार करें। जब कभी भी वे हुबली या कुंडगोल में हों और नाटक-मंडली की जिम्मेदारियों से खाली हों, मुझे तालीम दिया करें। कृपा कर गुरूजी तैयार हुए और हमारे घर पर गुरुदक्षिणा के साथ औपचारिक रूप से गंडा-बंधन संस्कार संपन्न हुआ। मैंने ‘गुरु बिन कैसे गुण गावे’ से शुरू किया। इस तरह किराना घराने ने मुझे बेटी की तरह गोद लिया और मैं ज्ञान की देवी शारदा की शरण में प्रवेश पा गयी। पूरिया और पूरिया धनाश्री के बाद राग यमन का नंबर आया। गुरूजी ने मुझे उषाकाल में षडज रियाज (मंद्र सप्तक के सुरों के अभ्यास) की सीख दी। वे मुझे किसी राग का एक या दो सुर सिखाते और बारम्बार इसे दोहराने को कहते। जो वो एक दिन सिखाते, उसका अभ्यास मुझे हफ्ते भर तक करना होता था। कभी-कभार वही चीज बार-बार गाते हुए मैं बोर हो जाया करती और भुनभुनाने लगती। लेकिन माँ मुझे सांत्वना देते हुए उत्साहित किया करतीं। कहतीं कठिन अभ्यास से आवाज़ प्रशिक्षित होगी। उनकी इस बात की सच्चाई का भान मुझे बाद में हुआ।

जब भी गुरूजी हुबली या कुंडगोल में होते, मेरी तालीम चलती। पर जब वे मुम्बई या और कहीं चले जाते, तो इसमें लंबे-लंबे अंतराल हो जाया करते। जब कभी गुरूजी की नाट्य-मंडली हुबली में डेरा डालती, दत्तोपंत देसाई, माँ के सुझाए मुताबिक नाटक के पूर्वाभ्यास की व्यवस्था मेरे घर पर ही करते। इन पूर्वाभ्यासों के दौरान जब भी गुरूजी गाते, माँ राग पहचानतीं, स्वरलिपि बनातीं, और इन्हीं स्वरलिपियों पर आधारित अलग-अलग संयोजन मुझे सिखाया करतीं। गुरूजी अक्सर और काफी-काफी वक्त के लिए निकल जाया करते थे। उनकी नामौजूदगी के दौरान मेरे अभ्यास-सत्र दत्तोपंत की देख-रेख में चलते। मुझे धीरे-धीरे बढते देखने में उनकी दिलचस्पी और प्रयास को मैं ताजिन्दगी नहीं भुला सकती।

छोटे मौसा रामन्ना अभ्यास में मेरी मदद के लिए तबले पर संगत किया करते थे। जहां-जहां मुझे प्रस्तुति देनी होती थी, मैं उनके साथ जाती। वे मेरे संरक्षक थे और मेरी बहुत मदद किया करते थे। हाँ, मेरे पति भी निश्चय ही मुझे हर तरह से उत्साहित करते थे।

जब माँ नहीं रहीं

१९३२ का साल मेरे लिए बहुत दुःख भरा था। माँ को पेट का अल्सर था। देर से वे ऑपरेशन के लिए गयीं। इस बीमारी से जूझते हुए उनका देहांत हुआ। अब मैं अनाथ थी।  पिताजी उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए पर माँ की मौत से लगे भारी धक्के से उबर नहीं सके और वे भी साल भर के भीतर हमें छोड़कर चले गए। परिवार में एक खालीपन का बोध पैठ गया था। दुःख की इस विषम घड़ी में रामन्ना मेरे लिए हिम्मत का स्रोत  थे। माँ की पहली बरसी के मौके पर पर दत्तोपंत ने जो मदद की थी, उसे मैं सादर याद करती हूं।  हमारे पास रस्म के मुताबिक़ सुमंगली को देने के लिए साड़ी नहीं थी, पैसा नहीं था, तब उस मौके पर दत्तोपंत ने ही साड़ी का इंतजाम किया था।

मानो मेरी माँ को आने वाली मृत्यु का बोध हो गया था। दो बरस पहले माँ सवाई गन्धर्व के बेटे के उपनयन संस्कार में नरसोवावाड़ी गयी थी। उस समय वहाँ मौजूद पुरोहित ने माँ को छोड़ और सबका नाम लिया। माँ ने इसे अपशकुन की तरह लिया और दो बरसों के भीतर चल बसी।

दत्तोपंत और रामन्ना ने मुझे संगीत-साधना के पथ पर वापस लाने की कोशिश की। सुर मिले हुए तानपूरे के साथ दत्तोपंत और रामन्ना तबला लेकर मेरे साथ बैठते और मुझसे गाने को कहते। पर मां की स्मृतियों से बिंधी और दुःख में डूबी हुई मैं गा नहीं पा रही थी। मेरा मन-मिजाज पूरी तरह तबाह था।
खैर, कुछ संगीत प्रेमी हर शनिवार को भक्ति-संगीत का मेरा कार्यक्रम आयोजित करते थे। मेरी माँ के वक्त से ही यह रिवाज चला आ रहा था। हर कार्यक्रम के आखिर में वे लोग कुछ सम्मान-राशि देते थे। हालांकि आँखें दुःख से भरी होतीं, दिमाग में यादों के अंधड चल रहे होते, मन में दुःख उमड़ रहा होता, फिर भी ऐसे कार्यक्रमों ने उबरने में मेरी मदद की और धीरे-धीरे मैं तानपूरे के तारों के साथ गाने लगी।

माँ के देहांत के कुछ दिन पहले ग्रामोफोन कंपनी एच.एम.वी. (हिज मास्टर्स वायस) के नुमाइंदे नयी प्रतिभाओं की खोज में हुबली आये थे। माँ और मेरे साथ उन्होंने कुछ गाने गाने का अनुबंध किया था। परन्तु दुर्भाग्य, गाना रिकार्ड कराने से पहले ही माँ नहीं रही। अगर उसके गीत रिकार्ड हो जाते तो वे रिकार्ड मेरे लिए बहुमूल्य खजाना होते, उनमें माँ की मीठी याद होती।

माँ के साथ के बगैर रिकार्डिंग के लिए दत्तोपंत और रामन्ना के साथ मैं मुम्बई पहुँची। मेरे पास मुम्बई जाने लायक ढंग के कपड़े-लत्ते भी नहीं थे। गुरूजी पूना में थे, सो उनसे मिलाने के लिए हम पूना रुक गए। मैंने अपनी पसंद के गाने गुरूजी के सामने गाये। पुराने परिचित एक सज्जन चिंतोपंत गुराव ने मेरी ओर नजर फेर कर तंज किया "पूना-बंबई में नयी आयी लगती हो।" साफ़-साफ़ यह तंज मेरे साधारण कपड़ों और वैसे ही तौर-तरीकों के नाते था। जवाब में सिर्फ "हाँ" कहते हुए मैं हँसी। लोगों के किसी तीखे तंज पर एक खामोशी से हँसना और कभी-कभार खुद पर हँसना मेरे स्वभाव की खासियत बन गया।

'जो डर डर बोले'

एच.एम.वी. के रूपजी ने मुझे और मेरे संगतियों को रिकार्डिंग के लिए स्टूडियो बुलाया। खास रिकार्डिंग के काम के नाते एक इंजीनियर लन्दन से आया था (उन दिनों 'कट' के लिए मोम के रिकार्ड इस्तेमाल होते थे और रिकार्डिंग की अवधि लगभग तीन मिनट हुआ करती थी)। अलग-अलग जगहों से ढेरों युवा कलाकार बुलाये गए थे और दक्षिण मुम्बई के गिरगांव के एक होटल में हम सब को ठहराया गया था। गीत, गज़ल, उप-शास्त्रीय आदि को लेते हुए हर कलाकार को कुल बारह गीत चुनने थे। मैंने राग सुघराई में 'जो डर डर बोले' की बंदिश रिकार्ड करवाई, जो एक दूसरे गायक ने मुझे बदले में दी थी। राग मियाँ की मल्हार के साथ माँ के संगीत-खजाने से मैंने कर्नाटक-शैली के दो राग नटकुरंजी और मध्यमावती चुने। अलावा इसके मैंने नामी मराठी नाटककार मामा वरेरकर के बनाए हुए कुछ  मराठी गीत भी रिकार्ड करवाए। इन गानों की तान कर्नाटक-शैली की थी, जिसे मैंने माँ से सीखा था।

न तो किसी कलाकार को इन रिकार्डिंगों के लिए कोई 'मेहनताना' मिलता था, न कोई इसकी उम्मीद ही करता था। खैर, सभी भागीदारों के लिए यह एक खुशी भरा अनुभव था। वे इसी बाट से उमगे हुए थे कि एच.एम.वी. कंपनी ने किराया-भाड़ा, रहने-ठहरने, खाने-पीने के साथ-साथ मुम्बई-दर्शन का भी जिम्मा अपने ऊपर लिया था। यों, मेरी पहली मुम्बई यात्रा मीठी यादों से भरी है।

एच.एम.वी. के मैनेजर श्री जी. एन. जोशी खुद एक लोकप्रिय गायक भी थे। उन्हें एक महिला कलाकार के साथ मराठी में युगल-गीत रिकार्ड करवाना था। इस युगल-गीत के गायन में इन महिला ने मध्य सप्तक में चढ़े सुर (ब्लैक-5) से गाना शुरू किया। हालांकि उन्होंने बारंबार कोशिश की पर जोशी जी संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे। वे लगभग निराश थे। ठीक इसी वक्त स्टूडियो में मैं पहुँची, मौके के मुताबिक उन्होंने मुझसे युगल-गीत में अपना साथ निभाने को कहा। दूसरे कलाकार का ख्याल रखते हुए मैंने मना किया पर वहाँ मौजूद हर किसी ने मुझे प्रेरित किया तो मैंने पहला बंद उठाया। "शाबाश", तारीफ़ करते हुए  रिकार्डिंग इंजीनियर चिल्लाया, संगत के साजों के साथ मैं सटीक सुर में थी। रिकार्डिंग इंजीनियर ने जोर दिया कि मुझे श्री जोशी के साथ गाना चाहिए और रिकार्डिंग पूरी करनी चाहिए। जो हो, मैं तो इससे थोड़ी हिचक रही थी और पशोपेश में थी। इस युगल-गीत के लिए पहले चुनी गयी महिला ने बगैर दिक्कत खुद मुझसे जोशी जी के साथ गाने के लिए कहा। बाद इसके मैंने दो गज़लें 'शाम सुन्दर तोर' व 'आँखे चुराना', कुछ ठुमरियां और मामा वरेरकर के कुछ गीत रिकार्ड करवाए। 'मियां की मल्हार' और 'सुघराई' रागों में ख्याल (शास्त्रीय) बंदिशों के अलावा ये रिकार्डिंगें मेरा हासिल थीं।

दूसरे एच. एम. वी. के साथ रिकार्डिंग सत्र के सिलसिले में मुझे फिर से मुम्बई जाना था। हमेशा की तरह मैं गुरूजी से मिली, उनका निर्देशन लिया और अभ्यास किया। इस बार मैंने कुछ शास्त्रीय बंदिशें रिकार्ड करवाईं और कुछ रूपये का भुगतान भी मिला। डी. वी. पलुस्कर भुगतान को साक्षात्कार कहा करते थे। अक्सर वे मजा लेते हुए कहते, "महफ़िल तो जमी, पर साक्षात्कार से संतोष नहीं मिला।"

पंद्रह मिनट गायन का जादू

कुमार गंधर्व के साथ मैंने गया के एक संगीत सम्मेलन में भाग लिया। कुमार छुटपन से ही उस्ताद गायकों की नकल करने में माहिर था। एक दिन बंद कमरे के भीतर वह पंडित ओंकारनाथ ठाकुर की शैली में गा रहा था। नकल इतनी अद्भुत थी कि आयोजकों में से एक जन आए और दरवाजा खटखटाने लगे, “पंडितजी, अभी मंच पर आने की आपकी बारी नहीं है।” कुमार ने दरवाजा खोलते हुए फरमाया, “पंडितजी तो यहाँ नहीं हैं।” अब वे सज्जन तो गड़बड़ा गए और हमारे हंसी के फव्वारे छूट पड़े।

गया में दूसरी बार 1943 के एक संगीत सम्मेलन में मैंने हिस्सा लिया। मुझे इस सम्मेलन का एक दिलचस्प वाकया याद पड़ता है। उस्ताद फ़ैयाज़ खान, दिलीपचंद्र वेदी, बड़े गुलाम आली खान जैसे नामचीन उस्ताद इस सम्मेलन में हिस्सेदारी कर रहे थे। मुझे प्रस्तुति के लिए सिर्फ पंद्रह मिनट ही मिले थे।

गाने के लिए कम वक्त मिलने से मैं इतनी निराश थी कि मेरे आँखों से आंसू छलक पड़े। बगल में बैठे बिस्मिल्ला खान ने मुझे ढांढस बँधाते हुए कहा, “इतना काहे घबरा रही हो? पंद्रह मिनट में तुम श्रोताओं पर अपने गायन का जादू डाल सकती हो।” वहाँ मैंने राग बसंत में ‘पिया संग’ बंदिश गायी। मेरे साथ वॉयलिन पर वी. सी. जोग साहब थे। श्रोता मुग्ध हुए।

अगली शाम को चाय-पार्टी थी। मुझसे गाने को कहा गया पर मेरा मन नहीं था। तब बड़े गुलाम आली खान साहब ने कहा, “तुम भी गाओ बेटी, फिर हम भी गायेंगे।” बढ़िया, तो मैंने तानपूरा लिया और विस्तार से राग शुद्ध कल्याण गाया। श्रोताओं की प्रसन्नता ने मुझमें भी खुशी भर दी। यों गया संगीत सम्मेलन की सुहानी यादें आज भी स्मृति में सुरक्षित हैं।

एक बार किसी बंबई यात्रा में मेरा तआर्रुफ पिछले दिनों की प्रसिद्ध सिने-तारिका श्रीमती नर्गिस की माँ श्रीमती जद्दनबाई से हुआ। उन्होने ही मुझे कलकत्ता के अखिल भारतीय सम्मेलन में शिरकत करने की प्रेरणा दी। मेरी प्रभावहीन छोटी कद-काठी और सामान्य पहनावे-ओढ़ावे को देख महोत्सव के कर्ता-धर्ता मेरे गाने की योग्यता के बारे में शंकाकुल से थे। उन्होने मुझे पहले अभ्यास कर लेने को कहा। रामपुर घराने के बड़े संगीतकार निसार हुसैन खान ने मुझे बताया कि आयोजक मेरे निरी सादगी देख आशंकित हैं। उन्होने बताया कि उनके साथ भी ऐसा ही हुआ था और मुझे सुझाया कि गाओ। इस पूर्वाभ्यास गायन ने मुझे मेरे संगतकारों से परिचित करा दिया। तो लब्बोलुआब यह कि सवाई गंधर्व की इस विनीत और सामान्य कलाकार शिष्या ने गाया और आयोजक परम संतुष्ट हुए।

ठीक-ठीक ऐसा ही दिल्ली में हुआ था, जब मैं पहली बार आकाशवाणी के कार्यक्रम में भाग लेने गई थी। प्रसारण के निर्धारित समय के पहले ही मैं रेडियो स्टेशन पहुँच गई। उन दिनों आमतौर पर कार्यक्रमों के रिकार्ड नहीं बजाए जाते थे। कार्यक्रम ‘सीधे’ प्रसारित होते थे। इंतजार वाले कमरे में मैं अगोरती रही, किसी ने मेरी तरफ ध्यान न दिया। निर्धारित वक्त के कुछ पहले एक संगीत-निरीक्षक महोदय आवाज लगाते हुए प्रकट हुए, “गंगूबाई हंगल कहाँ हैं?” जब मैं स्टूडिओ में घुसी तो उन सज्जन ने मुझसे देरी का कारण पूछा- जबकि असल में तो इंतजार करते-करते मुझे आधे घंटे से भी ज्यादा समय हो चुका था। मैंने तानपूरा उठाया और गाना शुरू किया। स्टेशन निदेशक ने अपने घर पर मेरा कार्यक्रम सुन ड्यूटी अफसर को फोन मिलाया और कार से स्टूडिओ आ गया। उसे  मेरा कार्यक्रम बेहद पसंद आया था। उसने मेरे गायन की तारीफ की। फिर क्या ? सब कोई परम चैतन्य हो गए और चाय आ गई। आकाशवाणी के फैशनपरस्त माहौल में हुबली की देहाती जैसी दिखती महिला एकदम उलट छवि लग रही थी।

1936 से मैंने आकाशवाणी में गाना शुरू किया। शुरुआत में अंशकालिक कलाकार के तौर पर मुझे 50 रूपये मिला करते थे। बाद में मानदेय बढ़कर 75 रूपये हो हो गया पर इससे मेरे और रामन्ना के आने-जाने और होटल में रुकने का खर्च भी नहीं निकल पाता था। पर उन दिनों सस्ती का जमाना था। रेडियो कार्यक्रमों के साथ-साथ दूसरे कार्यक्रम भी होते थे, जिनमें मुझे 125 रूपये मानदेय मिलता था। तबले और सारंगी के संगतकारों को  10-10 रूपये देने के बाद मेरे पास 105 रूपये बच जाते थे। सस्ती के उस जमाने में यह रकम काफी हुआ करती थी।

मराठी के ख्यातिलब्ध नाटककार मामा वरेरकर बंबई के रहने वाले थे। वे बड़े सज्जन पुरुष थे और मेरी गायकी पसंद करने वाले शुभेच्छु थे। नामी-गिरामी नाती-मंडलियाँ उनके लिखे नाटक खेलती थीं। वे मराठी में एक फिल्म बना रहे थे- विजयाचे लग्न (विजय की शादी)। फिल्म की कहानी में एक दृश्य संगीत सम्मेलन का भी था। वरेरकर चाहते थे की इस दृश्य में संगीतकार की भूमिका मैं निभाऊँ। खैर, मैंने कैमरे का सामना करने का मन बना लिया। बत्तियाँ जल उठीं। ‘ऐक्शन’ बोला गया। मैं पंद्रह मिनट तक गाती रही। सिनेमा के रुपहले पर्दे पर किसी फीचर फिल्म में यह मेरे पहली और आखिरी हाजिरी थी।

मेरे बिटिया कृष्णा छुटपन से ही यात्राओं में मेरे साथ रहती आई है और कार्यक्रमों में मुझे स्वरों से सहारा भी देती रही है। जब वह एकदम नादान थी, तब से उसे मुझे अपने साथ ले जाना होता था क्योंकि उसे अक्सर पेट दर्द की शिकायत रहती थी। दर्द जल्दी ही ठीक हो जाता था, इसलिए मैंने इलाज के बारे में बहुत नहीं सोचा। जब मेरी माँ भी पेट दर्द की तकलीफ से गुजरीं और अंततः उसका शिकार हो गईं, तब से मैं कृष्णा के पेट दर्द के बारे में काफी चिंतित रहने लगी। रोज़मर्रा की चीजों के बारे में भी मैं चिंतित हो जाती हूँ। बच्चे कॉलेज से वक्त पर घर नहीं पहुंचे, तो मुझे तब बेचैनी होती थी जब तक वे वापस आ न जाएँ। शायद वे अपने किसी दोस्त से मिलने गए हों, पर मुझे चिंता होती रहती है कि कहीं कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई। यह मेरी कमजोरी रही है। इसी कारण मैं हमेशा कृष्णा को साथ लिवा जाती थी। डर लगता कि कहीं मेरे गैर-हाजिरी में उसका पेट दर्द न उभर जाये। यों उसने संगीत कार्यक्रमों में मुझे काफी सुना और यह उसके लिए एक तरह का प्रशिक्षण था। तो इसलिए अब मुझे उसे औपचारिक रूप से पढ़ाना नहीं पड़ा। जैसे मैंने छुटपन में अपनी माँ से संगीत दीक्षा ली, उसी तरह कृष्णा ने भी छुटपन से ही मुझसे संगीत ग्रहण किया।

पद्म विभूषण

मैं आपसे एक बेहद खास अनुभव सुनाऊँ।  हुआ यों कि भारत सरकार के कुछ अधिकारी 1971 में किसी वक्त हमारे घर आए। मैं तो घर पर थी नहीं, उनसे रामन्ना की भेंट हुई। उन्होने रामन्ना को बताया कि ‘गंगूबाई हंगल को पद्म विभूषण से नवाजे जाने का प्रस्ताव है। हम उनकी इजाजत लेने आए हैं। उन्हें इस सहमति पत्र पर दस्तखत करने होंगे। ’

रामन्ना ने जवाब दिया कि, ‘वे खुशी से अनुमति दे देंगी। लाइये, मैं उनके दस्तखत करा देता हूँ।’


अगले दिन वे दस्तखत किया हुआ सहमति-पत्र ले गए। इस सम्मान की औपचारिक घोषणा गणतन्त्र दिवस पर होनी थी। खैर, पत्रकारों को इसके बारे में पिछली रात को ही पता चल गया और आकाशवाणी से देर रात में सम्मान प्राप्त कलाकारों के नाम की उद्घोषणा भी हुई। तो हुआ यों कि मैंने और रामन्ना ने 25 जनवरी की रात को रात नौ बजे के मुख्य समाचार सुना। किसी कारणवश इस वक्त के समाचार में पुरस्कारों की घोषणा नहीं प्रसारित हुई। खाने के बाद फिर गणतन्त्र दिवस के अवसर पर सम्मानों की घोषणा सुनने के लिए हम दोनों, रामन्ना और मैं रेडियो से चिपक गए। रात के ग्यारह बज गए, सम्मान का समाचार तो गूलर का फूल हो गया था। मुझे थोड़ी शंका हो रही थी, और थोड़ी निराशा भी। मैं सो नहीं पा रही थी और बिस्तर पर करवट बादल रही थी। आधी रात के आस-पास मुझे दरवाजे के बाहर साइकिल की घंटी सुनाई दी- ‘टेलीग्राम’। तरह-तरह की चीजों की शंका-आशंका में मेरी धड़कनें बढ़ गईं, तेज हो गईं। मैंने टेलीग्राम लिया और रामन्ना को पुकारा, जो अभी जाग ही रहे थे। टेलीग्राम में लिखा हुआ था कि, ‘पद्म भूषण सम्मान के लिए बधाई लीजिये- इंदिरा गांधी।’ मैं खुशी से रो पड़ी। मुझे माँ की याद आयी। अगर वे होतीं तो आज कितनी खुश होतीं, कितना गर्व होता उन्हें!



अगली सुबह अखबारों में मुझे पद्मभूषण से नवाजे जाने की खबर प्रमुखता से छपी थी। मेरे फोटो के साथ। बधाई संदेश के साथ आने वालों का तांता लगा हुआ था। फोन पर भी अनवरत बधाइयों के संदेश आते जा रहे थे। आकाशवाणी ने अपनी शुभकामना व्यक्त की। सुबह चार बजे हुबली लौटते हुए पेशे से वकील श्री मातलदिन्नी ने रेलवे प्लेटफॉर्म पर सुबह के अखबार में यह खबर देखी। वहाँ से वे सीधे हमारे घर आए, दरवाजा खटखटाया और मुझे बधाई दी। उन्हें खुद यह सम्मान दे दिया जाता तो भी वे उतने खुश नहीं होते, जितने उस वक्त थे। मैं अपने शुभेच्छुओं के नेह और लगाव भरी प्रतिक्रियाओं से विह्वल थी।

इतने लंबे वक्त तक मिलकर दुख-सुख बांटने वाले रामन्ना 1974 में हमें अकेला छोड़ गए। एक बार फिर अकेलेपन के बोध ने मुझे घेर लिया। कन्नड़ की एक कहावत का मतलब कितना सही है, मुझे तब पता चला कि, ‘माँ चली जाती हैं तब भी आपके पास मौसा होते हैं न।’

ऑरकेस्ट्रा में जैसे बाजों की आवाज घुली मिली होती है, वैसे ही मेरी जिंदगी में दुख-सुख और कडवे-मीठे अनुभव घुले-मिले। उदास कर देने वाले कुछ अनुभव ज्यादा देर टिकने वाले न थे और अच्छा हुआ, समय बीतने के साथ मैंने उनको भुला दिया।
****

[ सभी तस्वीरें गूगल से. ]
14 comments:

अनुराग मित्रवर,
अपनी औनी-पौनी वाकपटुता की कृत्रिम आभासी रेखांकन से परे, मै सीधे सपाट शब्दों में गंगुबाई के इस आत्मकथात्मक के पठन के बाद इसके मूल्यांकन की उपेक्षा,इसका चित्तात्मक बोध और प्रभाव को उद्धत करना चाहूँगा ! जाने क्यों मुझे सदैव ही ऐसे युग-पलट महाभूतियों का आकर्षण रहा है !
लेख के आरंभिक दौर के पठन से पुरे शरीर में एक त्वरित इलेक्ट्रोनिक प्रवाह सा दौड़ जाता है ! शायद रोंगटे "गंगुबाई जी" की सलामी में खड़े हो जाते हैं ! ऐसा आत्मबोध जो हमारी सुप्त अलसाई रचनात्मकता को पुनर्जीवित करते है !
क्योंकि कुछ लोग ही हमारे दिल से भी आगे हमारी आत्मा तक पहुँचते है !
"सबद" को पांचवे जन्मदिन की बधाई और लम्बी उम्र की शुभकामनाएं !

"महाभूत चन्दन राय"


बेहतरीन आत्मकथा....जीने की सादगी और सहजता से भरपूर..
सबद को ढेरों शुभकामनाएं.


kya baat hai...bahut dino baad dil ko choo lene vala kuch padha ...


किसी दूसरे काम में व्यस्त था. पर गंगुबाई हंगल पर इस सामग्री का पता चलते ही एक बार उस काम को छोड़कर पूरा पढ़ गया. और फिर आराम से भी पढूंगा. खासकर जो जिंदगी के चुने हुए हिस्से इसमें हैं वे ग्लैमर और प्रचार के कंधे पर सवार कलाओ के इस दौर में साधना, सादगी और सहजता वाले उस दौर की याद दिलाते हैं, जो हमारे कई महान कलाकारों की पहचान रही. मृत्युंजय को धन्यवाद बढ़िया अनुवाद के लिए.


गुड.

हैप्पी बड्डे ! सबद जी . :-)


Kya baat hai, bahut achcha laga. Janmadin ko is tarah se manaane ke liye bhi badhai.


bahut sundar...itni gahri aur sundar baat ke liye mujhe jada shabd dene ki jaroort nahi lgti...


Bahut bahut sundar मृत्युं जय.. Man se kiya gaya behtareen anuvaad.. Desh ki pratishthit gayika Gangubai ke jeevan sangharshon ko darshata ek umda lekh.. Mrityunjay aur Sabad dono ko badhai....


अनु कोहली

आत्मकथाएँ वो चलचित्र उपलब्ध कराती हैँ जिसे पढते हुए सम्बन्धित व्यक्ति के जीवन के सारे अनुभव सजीवता से पाठक के हृदय पटल को छूते निकल जाते है। गंगूबाई हंगल के जीवन के संघर्षोँ और अथक प्रयासोँ की इस गाथा को पढ़ना एक लाजवाब अनुभव रहा। सबद को धन्यवाद व शुभकामनाएँ।


अर्चना पंत

बहुत सुंदर आलेख .....
संगीत प्रेमियों के लिए तो निश्चित ही संग्रहणीय !

ऐसी माँएँ थीं .... तभी ना इतना कुछ संभव हुआ ....
कैसी साधना ... कैसा त्याग*... कैसी आस्था .... कैसी लगन ....
सब अद्भुत !
पढवाने के लिए, बहुत आभार आपका ....
और 'सबद' को पाँचवे जन्मदिन की ढेरों बधाइयाँ और अनंत शुभ कामनाएँ !


* : माँ ने कर्नाटक शैली में गाना बंद कर दिया ताकि उनकी गायकी की शैली से कहीं मैं प्रभावित न हो जाऊं। बारह साल कर्नाटक संगीत में महारत हासिल करने लगाने वाली माँ ने, सोचिये, कितनी बड़ी कुर्बानी दी! और तो और, अब उन्होंने संगीत सम्मेलनों में गाने का न्योता स्वीकारना भी बंद कर दिया।


गंगुबाई की आत्मकथा के इस अंश से उनके संघर्षपूर्ण जीवन की झलक मिल जाती है.आगे बढ़ने के लिए बस हौसला और कला के प्रति समर्पण होना चाहिए.उनके महान होने में मां और मौसा की भूमिका महत्वपूर्ण रही है. "सबद" को पांचवे जन्मदिन की बधाई और यह बहुमूल्य सामग्री पढवाने के लिए आभार.


रोचक और ज्ञानवर्धक , हमने सिर्फ सामान्य ज्ञान के तौर पर बस नाम ही सुना था , आज बहुत कुछ जान पाया उनके बारे मे... साझा करने के लिए शुक्रिया


प्रभावित करता आत्मकथ्य..


बहुत सुन्दर ...प्रेरणा दायक ...


सबद से जुड़ने की जगह :

सबद से जुड़ने की जगह :
[ अपडेट्स और सूचनाओं की जगह् ]

आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी