Thursday, April 18, 2013

कला का आलोक : ६ : रॉबर्ट ब्रेसां




कला का आलोक शीर्षक स्तम्भ की इस छठी कड़ी में महान फ्रेंच फ़िल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां की किताब ' नोट्स ऑन द सिनेमैटोग्राफर' से एक चयन दिया जा रहा है, जिसे हिंदी में युवा कवि-लेखक व्योमेश शुक्ल ने मुमकिन किया है। 


अप्रत्याशित का आह्वान

रॉबर्ट ब्रेसाँअनुवाद : व्योमेश शुक्ल

महान फ्रेंच फ़िल्मकार राबर्ट ब्रेसाँ की किताब 'नोट्स ऑन द सिनेमेटोग्राफरके वाक्यों में से एक चयन। इन्हें यहाँ यादृच्छिक तरीके से संयोजित कर लिया गया है। जोनाथन ग्रिफ़िन के अंग्रेज़ी अनुवाद में 1986 में क्वारटेट बुक से पहली बार प्रकाशित यह पुस्तक आवागमन की इतनी आज़ादी अपने पाठक को देती है कि उसे कहीं से भी शुरू और खत्म किया जा सकता है। ऐसी रचना अपनी विषयवस्तुलेखक के आत्मसंघर्षविचार की असाधारणता और कलाकर्म की नैतिकता से गुज़रते हुए उनके पार चली जाती है और 'एक साहित्यिक की डायरीकी तरह हमेशा चेतना में मौजूद रहती है।
अप्रत्याशित का आह्वान करो। उनकी उम्मीद करो।
कुछ भी न बदलो और सब कुछ बदल जाए।

किये धरे पर अंतर्दृष्टि धीरे से तुम्हारे कान में जो फुसफुसाती है उस पर गौर करो और अपने दिमाग में दस बार उस बात को पक्का कर लो।

सत्यनिष्ठ बनो। वास्तव से जुड़ी हर उस चीज़ को खारिज कर दो जो सच नहीं हैजैसे झूठ की भयावह वास्तविकता को।

कला से बैर नये से बैर है। अनदेखे से भी।

पढ़ाई से हासिल विचार किताबी होंगे। लोगों और वस्तुओं तक सीधे पहुँचो।

चित्रकार की नज़र होनी चाहिए। चित्रकार निगाह से दृश्य बनाता है।
चीज़ों को आदतों से दूर जाने दो। उन्हें जगने दो।

शुरूआत कहाँ से होउस विषय से जिसे अभिव्यक्त किया जाना हैभावना सेक्या दो जगहों से?

कुछ लोग सिनेमा के असर से रंगमंच और अन्य माध्यमों को बदलने की कोशिश कर रहें हैंवहीं अपनी प्राचीनतम आदतोंनियमों और बंधनों से आच्छन्न दूसरे कुछ लोग ज्यों का त्यों सिनेमा बनाते चले जा रहे हैं।

यह हाल में ही और धीरे-धीरे हुआ कि मैंने संगीत को चुप किया और इस खामोशी को संरचना के तत्व और भावना के औज़ार की तरह इस्तेमाल किया। यह कहूँ या बेइमानी का वरण करूँ?

अभिनेताओं के आँसुओं के ज़रिये लोगों की आँखों में आँसू ले आने की न कोशिश करोन उम्मीद। बल्कि यहउस दृश्य की बजाय इस दृश्यउस ध्वनि के स्थान पर इस ध्वनि से मुमकिन होना चाहिए— जो उनकी उपयुक्ततम जगह है।

अंतर्दृष्टि। इस शब्द को उन दो उदात्त मशीनों के सिलसिले में क्यों न बरता जाय जिन्हें मैं अपने काम में इस्तेमाल करता हूँ। कैमरा और टेपरिकॉर्डर मुझे उस चातुर्य से बहुत दूर ले जाते हैं जो हर चीज़ को उलझा देता है।

'यह हुई न बातया 'बात कुछ नहीं बनी'। पहली नज़र में। तर्क बाद में आता है। हमारी 'पहली नज़रको सत्यापित करने के लिये।

स्वयं पर अनिवार्य और संपूर्ण आत्मविश्वास के बारे में मैडम डी सिवाइन का वाक्य : 'जब मैं सिर्फ खुद की सुनती हूँ तो आश्चर्य संभव करती हूँ।'

टेलीफोन। आवाज़ उसे दृश्य बना देती है।

एक फ़िल्म बनाने के लिए बहुत से लोगों की ज़रूरत है।

अपनी फ़िल्म को सफेद परशांति और स्थैर्य पर निर्मित करो।

सिज़ाने : 'हर स्पर्श पर मैं जान का जोख़िम उठाता हूँ।'

खामोशी संगीत के लिए अनिवार्य है और संगीत का हिस्सा नहीं है। संगीत खामोशी पर अवलंबित है।

न जाने कितनी फ़िल्मों में संगीत के पैबंद लगे हुए हैं। लोग उस फ़िल्मी संगीत में डूब जाते हैं जबकि वे फ़िल्में हमें यह देखने से रोक रही हैं कि उन दृश्यावलियों में कुछ नहीं है।

मछली पकडऩे के लिए तालाब खाली करो।

जब लोग जानने से पहले अनुभव के लिए प्रस्तुत हैंअनेकानेक फ़िल्में इन्हें क्यों सबकुछ बतलाती रहती हैंक्या व्याख्या करती रहती हैं?

लियोनार्डो के मुताबिक वस्तु के दस तत्व : प्रकाश और अंधकाररंग और आशयशिल्प और स्थितिदूरी और करीबीगति और विराम।

चरम चटिल। तुम्हारी फ़िल्में। कोशिशेंप्रयोग।

जो एकाग्रता को भटकाएउसे काटकर निकाल दो।

तुम्हारे काम में एक नये संसार के लक्षण हों। उपलब्ध कलाओं में से कोई भी हमें उसकी कल्पना की इजाज़त नहीं देती।

अपनी फ़िल्मों को गतिमान धाराओं और ध्वनियों के विन्यास की तरह देखो। उन्हें किसी और चीज़ का नुमाइंदा मत बनाओउसमें प्रतीकार्थ आदि आरोपित   न करो।
न सुंदर बनाने की कोशिश करोन असुंदर। अप्राकृतिक मत बनो।

कुछ यथार्थ को कुछ और यथार्थ से सँवारो।
तुम्हारी गोपन कामनाओं के तुम्हारे अभिनेताओं में प्रवाह की शुरूआत है तुम्हारी फ़िल्में।

तुम्हारे अभिनेताओं को कभी यह अनुभव नहीं करना चाहिए कि वे नाटकीय हैं।
सरल या भीतर से आता अभिनय मुद्दा नहीं हैबस बिल्कुल अभिनय नहीं करना है।

अभिनेता। उसका सारतत्व। पवित्र।

अपने शुद्धतम रूप में कला कठोर को भंग करती है।

शुद्ध और संक्षिप्त के तर्क से तुम लापरवाह आँखों और कानों को एकाग्र करते हो।
अपने अभिनेताओं का सही चुनाव करो ताकि वे तुम्हें वहाँ ले जायँ जहाँ तुम जाना चाहते हो।

दो फ़िल्मों में कभी भी उन्हीं अभिनेताओं को मत लो। क्योंकिपहली बातदर्शक उन पर यकीन नहीं करेगा। दूसरी बातवे खुद को पहली फ़िल्म की तरह देखेंगेजैसे कोई खुद को आइने में देखता है। वे कामना करेंगे कि लोग उन्हें वैसे ही देखें जैसे वे दिखना चाहते हैंखुद पर वही अनुशासन आयद करेंगे और जादू को पिछली बार की ही तरह तोड़ेंगे। वे पहले ही की तरह खुद को परिष्कृत कर लेंगे।
उन्हीं आँखों और कानों से आज फ़िल्मांकन जिनसे कल हुआ था। एकत्व। एकसापन। 

खामोशी। अपने गुंजायमान में संगीतमय।

आख़िरी शब्द का आख़िरी अक्षर या अंतिम ध्वनि — मानों एक अटका हुआ सुर।
चीज़ें बहुत विपर्यस्त हों या बहुत विन्यस्तएक ही हो जाती हैंउन्हें बहुत दूर तक अलगाया नहीं जा सकता। वे ऊब और विरक्ति पैदा करती हैं।

संगीत। यह तुम्हारी फ़िल्म को तुम्हारी फ़िल्म के जीवन से अलग कर देता है। यह वास्तव का एक शक्तिशाली विशेषण है। विध्वंसक शराब या मादक द्रव्य की तरह।

अभिनेताओं के इरादों को कुचल दो।

रचना करना लोगों और वस्तुओं को बदल डालना या खोज डालना नहीं है। यह लोगों और वस्तुओं के बीच नए रिश्तों का निर्माण है।
तुम उनके भीतर अभिनय करते हो। वे तुम्हारे भीतर।

अपने आप को कम ज़रूरी छवियों में झोंक दो।

अगर एक दृश्य अतिरिक्त तीखेपन के साथ कुछ अभिव्यक्त करता हैअगर उसे व्याख्या की ज़रूरत हैतो वह दूसरे दृश्यों की सोहबत में नहीं बदलेगा। दूसरे दृश्यों का उस पर कोई बस नहीं होगा। कोई क्रिया नहीं। प्रतिक्रिया भी नहीं। फ़िल्मकार की पद्धति में वह इतना अतिनिश्चित कि निष्प्रयोज्य होगा। एक व्यवस्था सभी संबद्ध तत्वों का नियमन नहीं कर सकती। यह कुछ पाने के लिए कुछ खोना है।
फ़िल्म बनाना निगाह के ज़रिये लोगों को एक दूसरे से और चीज़ों से जोड़ देना है।
फ़िल्मकार की फ़िल्म में दृश्य जैसे शब्दकोष में शब्द। अपने संदर्भ और संबध-प्रणाली के बगैर वे दृश्य शक्तिहीनमूल्यहीन हैं।

मनुष्य की प्रकृति का सम्मान करो। उसके और इंद्रियसंवेद्य हो जाने की कामना किये बगैर।

दो तरह की फ़िल्में : एक वह जो थियेटर के संसाधनों का इस्तेमाल करती हैं — अभिनेताओं और निर्देशकों आदि के ज़रिये। वै कैमरे की मदद से सचाई की नकल करती हैं। दूसरी वह जो फ़िल्मांकन के तत्वों का प्रयोग करती हैं और कैमरे की ताकत से रचना करती हैं।

एक दृश्य को दूसरे दृश्यों के सान्निध्य में ज़रूर बदलना चाहिएजैसे रंग दूसरे रंग के सम्पर्क में बदल जाता है। हरे के साथ नीला वही नीला नहीं रह जाता। रूपान्तरण के बिना कोई कला संभव नहीं।

फ़िल्मांकन का सत्य मंच का सच नहीं हो सकता। न उपन्यास कान चित्रकला का।
फ़िल्मकार जिस तत्व को अर्जित करता है वह वही नहीं होगा जो थियेटरउपन्यास या चित्रकला अपने माध्यम में पाते हैं।

छिप्रतम अभिव्यक्ति। जो बात कहने में लेखक दस पन्ने रँगताउसे एक बिंब के ज़रिये बतला पाना।

ध्वनि ने खोजी है खामोशी।
संपूर्ण शांति और मंद्र शोर से हासिल शांति।

अपने सभी दोषों और झूठों का परित्याग। शक्ति के स्रोतों का ज्ञान। उनके प्रति   आश्वस्ति।

हरेक शॉट में अपनी कल्पना से ऊपर और कल्पना के पार जाती तीक्ष्णता। स्पॉट पर आविष्कार। यानी पुनराविष्कार।

किसी को नहीं उस खास को निर्देशित करना।
अभिनेता नहीं।
(अभिनेता का निर्देशन नहीं।)
(भेदोपभेद का ज्ञान नहीं।)
मंचन नहीं।
(बल्कि जीवन-संलग्न लोगों का विन्यास।)
लगने की बजाय होना।

उनके और मेरे बीच : आत्मिक क्रियाईश्वरत्व।

दो किस्म के वास्तव : 1. कैमरे द्वारा रिकॉर्ड कच्चा वास्तव। 2. तथाकथित वास्तव — जिसे हम अपनी स्मृति और कुछ $गलत अटकलों से विरूपित करके देखते हैं।
दिक्कत। खुद के देखे के दिखाने की। एक ऐसी मशीन के ज़रिये जो वैसे नहीं देखती जैसे तुम देखते हो। दिक्कत। जिसे तुमने समझा था उसे समझाने की। एक ऐसी मशीन के माध्यम से जो वैसे नहीं समझती जैसे तुम समझते हो।

जब तुम नहीं जानते कि तुम क्या कर रहे हो तब तुम जो करते हो वह सर्वोत्तम है। वही प्रेरणा है।

सच की नकल नहीं होगी। झूठ को बदला नहीं जा पाएगा।

आँखआमतौर परसतही है। कान गंभीर और सूझबूझ वाले हैं।

रेल इंजन की सीटी की आवाज़ से चेतना में पूरा स्टेशन झलमलाने लगता है।

तुम्हारी फ़िल्म को उड़ान भरना चाहिए। शब्दाडंबर और चित्रात्मकता उसे ऐसा करने से रोकते हैं।

ध्वनि और दृश्य एक दूसरे का निर्वाह करें। कभी दूर से कभी पास से। कोई स्वागत दृश्य या स्वायत्त ध्वनि नहीं।

लोग और वस्तुएँ तुम्हारी फ़िल्म में एक ही संवेग में हों। सहचरों की तरह।
वास्तव। जब वह दिमाग तक पहुँचता है तो वास्तव नहीं रह जाता। धन्य हैं हमारी अतिविचारप्रवणबुद्धिमान आँखें।

बंद आँखों से जो फ़िल्म देखी थीतुम्हारी फ़िल्म ज़रूर उससे मिलनी चाहिए। तुम्हारे पास इतनी शक्ति होनी ही चाहिए कि भीतर ही भीतर उसे सुन और देख सको।

जो आँख के लिए हैवह उससे मेल नहीं खाएगा जो कान के लिए है।

जब तुम्हारे अभिनेता अभ्यास कर रहे हों तो उन पर कोई बंदिश न हो।

आवाज़ को एक दृश्य को बचा लेने की खातिर नहीं आना चाहिए। न दृश्य ध्वनि के बचाव के लिए आए। दृश्य और ध्वनि एक दूसरे की मदद न करें। वे रिले की तरह के विन्यास में हों।

अभिनेता। उसके तर्कातीत स्वयं का फ़िल्मांकन।
अभिनेताओं के लिए। ऐसे बोलो जैसे खुद से बात कर रहे हो। संलाप की बजाय आत्मालाप।

सुनना ज़्यादा आंतरिक है। आँख बाहर की गति है।

कुछ लोग वहाँ समाधान खोजना चाहते हैं जहाँ सब कुछ पहेली है।

जब आवाज़ दृश्य की जगह ले सकती है तो दृश्य को हटा दो या वापस ले लो।

कोई एक साथएक ही वक्त में पूरा कान या पूरी आँख नहीं हो सकता।

वह कर्म तुम्हारे अभिनेताओं का आदर्श होना चाहिए जो बगैर आत्मनियंत्रण के मुमकिन होता है।

अभिनेता। उसका शरीर। उसकी आत्मा। उनकी नकल संभव नहीं है।
अभिनेता के लिए कैमरा लोगों की आँख है।

अपने संवेदन में उतरो। देखो कि वहाँ क्या है। शब्दों में उसका विश्लेषण न करो। 
सहोदर छवियों में उसका अनुवाद करो समानधर्मा ध्वनियों में।

पुरानी चीज़ अभिनव हो जाती है अगर तुम आमतौर पर घेरे रहने वाले तत्वों से उसे अलग कर दो।

बार-बार वही एक काम और तब उसका एक असर।

दरवाज़ों के खुलनेबंद होने की आवाज़। पदचाप। लय की खातिर।

अतीत में लौटना। यह वर्तमान का जादू है।

तुम्हारा अंदाज़ वस्तु को संभव और स्पष्टतर करता है। अंदाज़ यानी वह कुछजो तकनीक नहीं है।

यथार्थशून्य आवाज़ों। होठों से सत्यापित न होती हुईं। वे अपने मुँहों से भटक गई हैं।

सचाई उन जीवित व्यक्तियों और यथार्थ वस्तुओं में नहीं होती जिनका प्रयोग तुम करते 
हो। सच की एक हवा होती है। वह वास्तव में दृश्य एक निश्चित क्रम में विन्यस्त हो जाते हैं तो इस सत्य को धारण कर लेते हैं।

खासतौर पर जनता के लिए काम करना बेकार और बेतुका है। रचना के क्षण में मैं खुद के अलावा किसी का भी हिसाब रखने की कोशिश नहीं कर सकता। बड़ी बात है श्रेष्ठ रचना करना।

जिसे तुमने देखाउसे वैसे देखने वाले पहले इंसान बनो।
उसे दृश्य बनाओ जो तुम्हारे बगैर कभी न देखा जा पाता।

4 comments:

sarita sharma said...

फिल्म निर्माण पर जरूरी अंश जिसमें 'सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय' का भाव है.संगीत की ख़ामोशी और छायांकन का जादू, अभिनय की सीमायें और माहौल का प्रभाव- हर वाक्य कई रहस्य खोलता जाता है.शुक्रिया व्योमेश शुक्ल और अनुराग वत्स. ऐसे ही उपयोगी कार्य करते रहो.

Ravindra Vyas said...

ye filmkaaron k liye `kaam-sootra` hain. bahut sunder anuvaad! donon ko badhai!

Sushobhit Saktawat said...

सिनेमा के पैट्रन सेंट रॉबेर ब्रेसां की यह पुस्‍तक सूक्तियों का संग्रहालय है। उसका उतना ही सुंदर अनुवाद। प्रस्‍तुतिकरण भी बहुत आकर्षक।

ब्रेसां ने एक कला-रूप के रूप में सिनेमा को निर्दिष्‍ट किया है। इस किताब के ज़रिये वे यह कर गुज़रते हैं। निर्देशक को वे सिनेमैटोग्राफ़र कहते हैं, अभिनेता को मॉडल। एक सूक्ति में वे कहते हैं : अभिनेताओं के इरादों को कुचल दो। दूसरी में वे कहते हैं : अप्रत्‍याशित को घटित होने दो। वस्‍तुत: सिनेमा इसी तरह व्‍यवहृत होता है। वह इसी तरह अप्रत्‍याशित के पर्यावास में टहलने की कोशिश करता है और निश्चित ही वह मूलत: छायांकन है। अपने प्रदत्‍त परिवेश का चाक्षुष पाठ।

ब्रेसां की सिने-सैद्धांतिकी के साथ दो चीज़ें घटित होती हैं : पहली यह कि सिनेमा की कलागत अवस्थिति के बारे में हमारी समझ साफ़ होती है, दूसरे यह कि हम उसे रंगमंच के अनिवार्य तत्‍वों यथा अभिनय, स्‍टाइलाइज़ेशन, अतिनाटक, प्रत्‍यक्ष का आग्रह इत्‍यादि से अलगाने में क़ामयाब हो पाते हैं। ब्रेसां सिनेमा और रंगमंच के बीच बहुत स्‍पष्‍ट लकीर खींच देते हैं इस किताब के ज़रिए। ठीक उसी तरह, जैसे रोलां बार्थ चित्रकला और फ़ोटोग्राफ़ी के बीच डिस्टिंक्‍शन निर्मित करते हैं : कैमेरा ल्‍यूसिडा के मार्फत।

यह साधु-भाव से किया गया अनुवाद-कर्म है। व्‍योमेश जी रंगकर्म में कितने सक्रिय हैं, हम सभी जानते हैं, फिर भी वे सिनेमा के महर्षि की सैद्धांतिकियों में रमते हैं, जो रंगमंच को लगभग तिरस्‍कार की दृष्टि से देखता है। ऐसा करना ब्रेसां की विवश राजनीति हो सकती थी, लेकिन हमारी भी हो, यह आवश्‍यक नहीं। व्‍योमेश जी इस बात को समझते हैं। इसके लिए उन्‍हें 'साधुवाद' ही दिया जा सकता है, जो इन दिनों परम दुर्लभ हो चला है।

Chandan Pandey said...

yah anuvad bahut achchha bana hai. best part is selection.