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वृत्तांत : प्रत्यक्षा


जाना था रंगून...

प्रत्यक्षा  


No man ever steps in the same river twice, for it's not the same river and he's not the same man. 
- Heraclitus.

यह 
दूसरा चक्कर लगना था चीन का। इस बार लगता था कि तैयारी अच्छी है क्योंकि कुछ चीनी भाषा भी सीख ली थी। चीनी यानी मैन्दरीन, लिखना नहीं सीखा था लेकिन मैन्दरीन फिन्यीन पद्धति से पढ़ना सीखा था तीन महीने। तीन महीने बहुत कम हैं, लेकिन भोलेपन का अपना अभिमान होता है और उस अभिमान ने यह भी भुला दिया था कि सीखे और भूले भी छह महीने के ऊपर निकल चुके थे। फिर इस बार चिंता का विषय यह था कि वहां माईनस तेरह का तापमान था और मेरे पास तरीके के कपड़े नहीं थे।

फ्लाइट वाया हॉंन्गकॉंग थी। बीजींग से दो ढाई घँटे की दूरी पर रेनचियू नाम की जगह। रात की फलाईट। अगले दिन ढलते बीजींग, फिर वहां से गाड़ी से आगे। एअरपोर्ट से ही ठंड का नज़ारा होने लगा। हमने जैकेट और टोपी निकाला। लैस हुए। बिल्डिंग से पार्किंग़ तक के पाँच मिनट में हाथ-पाँव सर्द। गाड़ी में बैठते फिर सुकूनदायक गर्माहट। हाईवे से निकलते ही सड़क के दोनों ओर पतली परतों में बर्फ। हम जितना भीतर जातेउतना लगता कि जैसे बर्फ के खेत फैले हों। सड़कों के डिवाईडर पर पौधों को हरे पॉलीथीन से ढका गया था, पाले से बचाने के लिए। मीलों तक यही नज़ारा।

जॉन, जो हमें रीसीव करने आया था, लगातार बातें कर रहा था। उसकी अंग्रेज़ी अच्छी थी। इस प्रवास में शायद सबसे अच्छी अंग्रेज़ी, पियेर के बाद लेकिन पियेर आधा फ्रेंच था और ज़्यादा कॉस्मोपोलिटन, शायद एक ग्लोबल सिटिज़न, लेकिन पियेर की बात बाद में। जॉन का चीनी नाम कुछ और था लेकिन जैसा पिछली बार के दौरे में पता चला था, यहां लोग विदेशियों की सुविधा के लिये एक कामकाजी अंग्रेज़ी नाम भी रख लेते हैं। खैर, जॉन को भारत का कुछ ज्ञान था, उसने राज कपूर की 'आवारा' देख रखी थी, जिससे वह बहुत प्रभावित था, आगे की सीट से मुड़-मुड़ कर उसने एक हिन्दी गीत भी, कुछ टूटा-फूटा, उत्साह में गाकर सुनाया।

मैं थकान से बुरे हाल में थी, लेकिन उसके उत्साह से उत्साहित। फिर बर्फ की यह दुनिया मेरे लिए नितांत नई थी। खिड़की से बाहर देखना मुझे अजीब से टाईम स्पेस में ले जा रहा था। जाने क्यों मुझे साईबेरिया याद आ रहा था। कोई देखी भूली हुई फिल्म का टुकड़ा, जिसमें कुछ लोग जेल से भागते हैं, साईबेरिया से, बर्फीली ठंडक के विस्तार में रातोंरात।

बर्फ से ढकी ज़मीन, ऊँचे पत्रहीन पेड़, सुन्न खड़े, चुप देखते, और कैसा ठंडा कोहरीला वीराना, लगातार लगातार मीलों तक। मैं शीशे से नाक सटाए अपने ठंडे पाँवों को जुराबों में सिकोड़ते किस दुनिया में हूँ मालूम नहीं। कई बार किसी बेहद खुशनुमा सुंदर जगह में मुझे भयानक उदासी घेर लेती है। एक इंटेंस किस्म की, एक बीहड़ सघन जंगल की आग मेरे भीतर लहक कर जल जाती है, लेकिन आज इस गहराती शाम के ब्लीक घनेपन में उन प्रहरियों से मुस्तैद खड़े चुप पेड़ों से, जिन पर ठूँठ शाखों के अलावा जीवन का कोई अभास मात्र नहीं, जाने क्या छूती हुई मेरे पास आ रही है लगातार कि मेरे भीतर एक कम्फर्ट का एहसास है, जैसे अपने पुराने तकिये पर सर रखकर सो जाने का होता है, क्लांत सुख में।

कोई कस्बेनुमा शहर आ रहा है। हम रुकते हैं, खाने के लिए। रेस्तरां में घुसते ही एक तरफ मांसाहारी भोजन है, दूसरी तरफ शाक सब्ज़ियाँ। कुछ सब्ज़ियाँ मैं चुनती हूँ। माँसाहार सब अनजाना दिखता है। दो चीज़ें उनके बताने पर हिम्मत करती हूँ, खरगोश और कबूतर। कबूतर तो खैर चिकन के करीब है और अपने यहां भी खाया जाता है। पिता, मुझे ध्यान है, लक्का कबूतर की बड़ी तरीफ करते थे, कि उसकी तासीर बड़ी गरम होती है और कुछ खास बीमारियों में तो बाकायदा इलाज के तौर पर खिलाया जाता है। खरगोश के बारे में मेरा तज़ुर्बा पहला था और मैंने कुछ अप्रेहेंशन में ही पहली बोटी चखी। बार-बार प्यारे किसी खरगोश की सूरत आँखों के आगे तैरती रही। ज़्यादा खाया न गया। कबूतर में नमक बहुत तेज़ था। हाँ, सब्ज़ियाँ सही थीं। खीरा और ज़ुकिनी जैसी सब्ज़ियाँ, छोटे टमाटर, बैग़न की सब्ज़ी गुड़ और तिल में, करारे आलू और साग, पत्ता गोभी पानीदार रसे में और अंत में गीला चावल। हमारे ड्राईवर ने तो असके बाद एक बाउल भरके नूडल्स भी खाए।

रास्ता अभी करीब आधा बाकी था। बर्फबारी की वजह से कुछ हाईवे बन्द कर दिए गए थे। कहीं-कहीं जाम लगा था। लेकिन हमारे होशियार ड्राईवर ने कुछ डाईवर्शन लेकर हमें समय से रेनचियू पहुँचा दिया। रेनचियू उनके हिसाब से छोटा शहर था: हेबेई प्राविंस का एक शहर, जहां तेल के फैकटरीज़ हैं। लेकिन जितना हम शहर घूमे, सब तरतीब से बना दिखा। सुंदर रोड, सजे इमारत, भीड़भड़क्का नहीं। ठंड के बावज़ूद सब तरतीब में। हमें रिसीव करने पियेर, स्तिफां और झांग थीं। पियेर आधे चीनी और आधे फ्रेंच हैं और बकायदा फ्रेंच सिटिज़ेन हैं। स्तिफां फ्रेंच हैं और चार साल से चीन में रह रहे हैं, उनकी पत्नी चीनी हैं और झांग खालिस चीनी हैं। पियेर बढ़िया फ्रेंच, चीनी और अंग्रेज़ी बोलते हैं, स्तिफां फ्रेंच और अँग्रेज़ी और कामचलाउ चीनी, झाँग चीनी और कामचलाऊ अंग्रेज़ी, और मैं हिन्दी-अँग्रेज़ी और बेहद टूटी-फूटी सौ शब्दों की भूली वोकैबलरी वाली चीनी। मेरे सहकर्मी सिर्फ हिन्दी और अपने खुद के सबमिशन से हरियाणवी अंग्रेज़ी। तो ये था हमारा मोटली कुनबा अगले एक हफ्ते के लिए।

हमने होटल के कमरों मे सामान पटका और तय हुआ कि ठीक सामने सड़क पार जो दूसरा होटल है, वहां रात का भोजन कर लिया जाए। इसी बीच जो कमरा मुझे मिला, वह किसी दूसरे विंग में था, जो औरों से काफी दूर था। चूंकि हमें सुबह उसी होटल के कॉनफरेंस रूम में काम करना था, तय यह हुआ कि मेरा कमरा भी दूसरों के विंग में ही कर दिया जाए ताकि सहूलियत हो। पियेर और झाँग रिसेप्शनिस्त से मैन्दरीन में बहस करते रहे। मैं उल्लूओं की तरह खड़ी थी। एक शब्द मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा था। बीच-बीच में पियेर मेरी तरफ मुड कर मुझे तीन लाईन समझाते कि कोई दिक्कत नहीं मुझे दूसरा कमरा आसानी से मिल जाएगा। खैर, कुछ देर बाद कमरा अलॉट हुआ, मैं दोबारा अपना सामान एक कमरे से दूसरे शिफ्ट कर आई। हिन्दुस्तानी होटलों की तरह बेलब्याय का सिस्टम नहीं था और न तो यहां लिफ्ट था। अपने बड़े सूटकेस को एक फ्लोर से दूसरे ढो कर ले जाना आसान नहीं था, खासकर चौबीस घँटे के थका देने वाले सफर के बाद। लेकिन नए  कमरे में एक नई समस्या थी। यहां कम्प्यूटर नहीं था। मैं लैपटॉप की बजाय आईपैड लेकर आई थी और मुझे वाईफाई कनेक्टीविटी चाहिए थी, जो इस होटल में नहीं थी। फिर मेरा एकमात्र सहारा कमरे में डेस्कटॉप ही था, जिसमें मैं कॉम्प्रोमाईज़ नहीं करना चाह रही थी। रिसेप्शन पर वापस आकर पियेर को अपनी समस्या बताई। मैं वापस पुराने कमरे में जाने को तैयार थी। उसने फिर रिसेप्शन पर बात की। तय यह हुआ कि हम खाना खा आएं और उसके बाद मैं कमरा वापस बदल लूँ।

होटल से निकलते ही तेज़ बर्फीली हवा का सामना हुआ। अब तक हम गाड़ी की गर्माहट में थे। चारों ओर बर्फ। कपड़ों के अनगिन लेयर्स के बावज़ूद सर्दी की बर्छी चेहरे पर लग रही थी। सड़क पर फिसलन थी और पाँव जमा जमा कर चलना पड़ रहा था। हमें सिर्फ रोड पार करना था, पर उतने में ही हमारी हालत देखने लायक थी। ऐसे ठंड का सामना मेरे लिए पहला था। दो बार सड़क पर मैं फिसलते गिरते बची। फिर मैं डर गई। मुझे लगा पहले दिन की शुरुआत ही में मैं अपनी टांगे तुड़वा लूँगी। पियेर मेरे डर को देख कर मज़े ले रहा था। उसने अपने पाँव जमा कर नाचने का-सा अभिनय किया। खुदा-खुदा करके हम होटल पहुँचे। भीतर गर्माहट भरी रौशनी थी, हलचल और खाने की खुशबू। 

हम एक कमरे में बैठ गए। हैंगर पर हमने अपने लबादे टाँगे और आराम से बैठ गए। खाना सर्व होना शुरु हुआ। वही सब्ज़ियाँ, साबुत मछली, लच्छेदार पत्ता गोभी, साग, साथ में हरी चाय और लाल वाईन। हम वाईन और चाय सब साथ पीते रहे। चॉप स्टिक से सब्ज़ियाँ उठाना एक कला ही है। गोल शीशे का टेबल धीमा घूमता जाता था। हल्के हाथों से उसे रोक कर चॉपस्टिक से खाने का सामान उठाना आसान नहीं था। खासकर जब सबकी निगाह आप पर हो। मैंने बेशरमी से उँगलियाँ, फोर्क और चॉपस्टिक सबका इस्तेमाल किया। वाईन का सुरूर अब थकान के सुरूर के ऊपर चढ़कर चुका था। खाना कोर्स बाई कोर्स खत्म हुआ। हमने अपने जैकेट्स और दास्ताने चढ़ाये और होटल से बाहर निकले। रात के सन्नाटे में हल्की रौशनी में सब किसी और दुनिया का समय था।

दो मिनट में हम वापस अपने होटल थे। मुझे नया कमरा दिखा दिया गया। सब अचानक मिनट भर में गायब हो चले थे अपने अपने कमरों की तरफ और तब मुझे ध्यान आया कि मेरा सामान मेरे कमरे में नहीं है। रिसेप्शन पर फोन किया तो उस तरफ से मैन्दरीन में आवाज़ आई। मैंने सब्र से पूछा, कि क्या कोई अंग्रेज़ी में बात कर सकता है? जवाब फिर मैन्दरीन में आया, दो तीन मिनट हम इसी तरह बात करते रहे फिर फोन कट गया। मैंने फिर फोन लगाया। फिर वही ढाक के तीन पात। मैंने मैनदरीन जितनी सीखी थी उसको याद करते और पैनिक न करते हुए फिर फोन लगाया और पूछा, नी तुंग इंगयू मा? (क्या आप अंगरेज़ी समझते हैं?) अब लगभग हिसटेरिकल जवाब उधर से आया फिर मैन्दरीन में। उधर से अब शायद दो लोग बात कर रहे थे। नतीजा यह हुआ कि दो मिनट में एक लड़की मेरे कमरे में दाखिल हुई लेकिन उसकी अंग्रेज़ी भी वही माशा अल्लाह थी, ज़ीरो। चौबीस घँटे के सफरी थकान के बाद अब मेरा मन सचमुच रोने का कर रहा था। लगता था अलिस इन वंडरलैंड वाले किसी ऐसे मायावी दुनिया में पहुँच गई हूँ, जहां कोई मेरी बात नहीं समझता। लड़की मैनदरीन में तेज़ी से कुछ बोलती, मैं अंगरेज़ी फिर हिन्दी में धीरे धीरे बोलती, हे भगवान कहाँ फँस गई! मैं फिर वाईन के नशे में हँसने लगी। शायद रो नहीं सकती थी इसलिए। प्यास लग रही थी। पानी माँगा। शूये, उसने बाथरूम का नल चला दिया। मैंने माईम किया सामान, ट्रॉली का, वह हँसी, मैने सोने की हरकत दिखाई उसे, वह मुस्कुराई, मैंने कागज पर पुराना रूम नम्बर लिखा फिर नया रूम नम्बर लिखा और अचानक उसके चेहरे की बत्ती जल गई। उसने मेरी बाँह पकड़ी और मुझे खींचती हुई कॉरिडॉर में ले गई। एक पल को मुझे लगा कि यह कमरा भी गया क्या! रात के ग्यारह बज रहे थे लेकिन किसी भूलभुलैया कॉरिडॉर से होते हुए उसने मुझे पुराने कमरे तक पहुँचाया। कमर से चाभी का गुच्छा निकाला, कमरा खोला, और वायला, मेरा सूटकेस ठीक बीचओबीच खड़ा था। दस मिनट बाद मैं वापस अपने कमरे में थी, बिस्तर में दुबकी, रज़ाई के भीतर क्लांत और बेहद थकी और नींद से कोसों दूर। मेरे पैर ठंडे थे और कमरे का तापमान शायद तेरह पर टिका था और मेरे भीतर अब और ताकत नहीं बची थी कि मैं एयरकंडीशनर के स्विच के ऊपर चाईनीज़् कैरकटरज़ डीसाईफर कर सकूँ और तापमान बढ़ा सकूँ। मैंने ऊनी मोज़े पहने और थकान की नींद में गिर पड़ी आखिरकार।

सुबह ठंड के बावज़ूद मेरी नींद खुशी में खुली। खिड़की के महीन परदे के पार बरफ का सफेद संसार था। लोहे की सीढ़ी घुमावदार पिछवाड़े बरफ की चादर के ऊपर तनी थी और झाड़ियों पर एक अकेला लाल फूल दिखता था। गर्मियों में ये कोर्टयार्ड हरियाली चादर होता होगा, अभी इतना गुल गुला सफेद और उसपर कोई चला था कि उसपर किसी के चलने के एक पैरों के निशान थे, फूटस्टेप्स ऑन द वर्जिन स्नो। चाय का कप हथेलियों में पकड़े मैं कमरे का मुआयना करती रही, और रात की अपनी मायूसी पर चुपके हँसती भी रही। कमरे में डेस्कटॉप था। लेकिन सब बेकार क्योंकि सिर्फ चीनी साईट्स खुल रहे थे। जीमेल खोलने का अथक प्रयास किया लेकिन डाईवर्ट होकर कहीं और साईट पर चला जाता और रोमन कैरैकटरस की बजाय चाईनीज़ करेक्टर्ज़ खुलते।

भाषा और स्क्रिप्ट पर चाय पीते, कमरे में टहलते मैं सोचती रही। क्या रहस्यवाद है? और कितना मुश्किल! कैसे एक मिनट में हम धराशाई हो जाते हैं, अपने कम्फर्ट ज़ोन से निकलते ही!!

नौ बजे तैयार होकर हम लॉबी में पहुँचे, झाँग पहले से मजूद थी। नाश्ते में सब्ज़ियाँ थीं और मड़गीले चावल, जो हमारे यहाँ पेट खराब में खिलाया जाता है, फिर डम्पलिंग्स थे जिन्हें हम मोमो कहते हैं, हरी चाय तो थी ही। और फल तो क्या शानदार। छोटे संतरे इतने मीठे और ड्रैगंस आई, मैंने जाने कितने  खाये होंगे दिनभर में, काम करते हुए लगातार, नैपकिन पर छिलकों के अम्बार, अपने स्वाद और रस में भरपूर। एक बात मैंने नोटिस की कि यहाँ कोई पानी नहीं पीता, लेकिन लगातार ये लोग चाय पीते हैं, हरी चाय। जैसे ही प्याली आधी होती है कोई गर्म पानी प्याली में डाल जाता है। किसी दफ्तर भी जाएं, वहाँ पानी की बजाय चाय और संतरा, केला और छोटे चेरी टमाटर पेश होते। मुझे बड़ा मज़ा आता। मैं ठंड का मज़ा ले रही थी, चाय का और फल का। उस दिन हम रात बारह बजे तक काम करते रहे थे।


अगले दिन हमें संगज़्हाऊ के लिये निकलना था। रेनचियू से संगज़्हाऊ लगभग तीन चार घँटे का सफर था लेकिन सड़क पर बर्फ थी और हमारी गाड़ी एक बार बुरी तरह से स्किड हुई। हम हिन्दी में चीख रहे थे, ब्रेक लगाओ ब्रेक लगाओ। पीछे की सीट पर पियेर और स्तीफां थे और आगे ड्राईवर की बगल में झांग। सड़क के बगल में गहरा गड्ढा था और गाड़ी गड्ढे तक फिसलती जा रही थी। कुछ हाथ की दूरी पर गाड़ी थम गई। हम सकते में बैठे रहे चुप। स्तीफां ने दरवाज़ा एकदम से खोला, उतरा और फिसल कर चारो खाने चित्त। हम कुछ समझते कि उसके पहले उसने खुद को सँभाला और पैर जमाते हुये सड़क के किनारे खड़ा हो गया। हम अब तक स्त्ब्ध थे। हमारे पीछे गाडियाँ धीमे रुकती जा रही थीं। कुछ देर बाद ड्राईवर ने गाड़ी स्टार्ट की फिर धीमे बैक किया, सँभालते-सँभालते एहतियात से गाड़ी वापस मोड़ी। स्तिफां ने बाद में बताया कि उसे यह भय हुआ था कि चूँकि वो सबसे किनारे बैठा था और गाड़ी लगभग सड़क पर नब्बे का कोण बना रही थी, पीछे से आती पहली गाड़ी सीधा टक्कर मारती और पहला शिकार वही होता। बाद में हमने उसकी खूब खिंचाई की कि हमें तो ऐसे बीच मझधार में छोड़ कर खुद भाग खड़ा हुआ।

जो रास्ता दो घँटे का था वो हमें दुगुने समय का लगा। संगज़्हाऊ पहुँचते ही पहली चीज़ जो दिखी वो खूबसूरत स्ट्रीटलाईट्स, बिलकुल झाड़फानूस जैसी। शाम गहरी घिर आई थी और हमें यहाँ से ट्रेन पकड़नी थी चिंगडाऊ के लिए। चिंगडाऊ समन्दर के किनारे का शहर था और हम खुश थे कि हमें इस ठठुरती ठंड से कुछ राहत मिलेगी। लेकिन पहुँचना हमें वहाँ देर रात को ही था और फिलहाल रेलवे स्टेशन के बाहर के बर्फीले प्रदेश को टैकल करने का था। मैं स्तीफां की तरह गिरना नहीं चाहती थी और मेरा सारा फोकस इस बात पर था कि सही सलामत स्टेशन के भीतर पहुँच जाऊँ। शायद सब इसी फिराक में थे। अपने अपने सामान सँभाले पैर जमाते हम स्टेशन के भीतर पहुँचे। बुलेट ट्रेन पर बैठने का पहला अवसर था लेकिन उसके पहले खुले में प्लैटफॉर्म पर पाँच मिनट खड़े रहना अत्यंत कष्टदायक। इतनी ठंड कि चेहरा तक जम जाए जैसे। ट्रेन के भीतर फिर बेहद आरामदायक वातावरण। दूसरी ही दुनिया। मुझे योरप के यूरोरेल याद आए। साफ और सुंदर। ट्रेन ने तुरत स्पीड पकड ली, तीन सौ दो किलोमीटर प्रति घँटा।

बाथरूम साफ थे लेकिन कुछ देर बाद भारतीय रेल की तरह ही गंदे भी होने लगे। यह और बात थी कि सफाई वाली लड़कियाँ तुरत आ कर साफ भी करती जातीं। ये लड़कियाँ यूनिफॉर्म में मुस्तैद और ज़्यादा ऐयरहोस्टेस जैसी थीं और इस मामले में हमारे रेल कर्मियों से एकदम अलहदा। चाय और जूस यहाँ भी बिक रहे थे, खाने-पीने की चीज़ें भी और लोग भी तुरत अपनी चीज़ें फैला कर खाने पीने में मशगूल हुए। मुझे भारत बेतरह याद आया। हमने भी सूरज मुखी के बीज टूँगे और ठँडी चाय के घूँट भरे, फिर नींद की एक झपक़ी ली।

देर रात हम चिंगडाऊ पहुँचे। स्टेशन बड़ा प्यारा-सा। सीढियाँ चढकर ऊपर। टैक्सी की। रात को शहर बेहद शाँत और सुंदर। पहाड़ी रास्ते और ढलवाँ सड़कें। बहुत पहले जर्मन कॉलॉनी हुआ करता था। और इसे स्विटज़र्लैंड ऑफ द ऑरियेंट भी कहा जाता है। पुरानी ढब की यूरोपियन इमारतें, लओशान पहाड़ी, समुद्री तट। पीली रौशनी में शहर अपने को दिखाता कितना खूबसूरत। मुझे मालूम था कि दिन में मेरा इम्प्रेशन कुछ और बनेगा लेकिन अभी आधी नींद में जागा शहर मुझे अपने भीतर समा रहा था। मेरे आसपास सब बात कर रहे थे। मैं उनकी बातचीत का हिस्सा होते हुए भी नहीं थी। मैं सुन रही थी लेकिन उसके परे भी थी। मैं शहर को जी रही थी। हवा में तुर्शी थी। हमने अपने भारी लबादे उतार दिए थे। हल्के महसूस कर रहे थे। तय हुआ कि पहले खाना खा लें फिर होटल जाएं। किसी रेस्तरां में हम रुके, जहाँ सफाई का काम चल रहा था। फर्श की घिसाई हो रही थी। ऊमे, जो हमें वहाँ रीसीव करने आई थी और जिसकी पहचान की वजह से हम वहाँ थे, की वजह से वे हमें कुछ खिला देने को राजी हुए। चिंगडाऊ में सिंगताऊ बियर मशहूर है, तो बियर और बर्गर और फ्रेंच फ्राईज़, और फ्राईड चावल, बस। आज चीनी खाना नहीं। इतनी रात को नहीं, सुलभ नहीं।

रात को होटल में धाराशाई। सुबह शहर वाकई अलग था। होटल के पिछवाड़े स्टेडियम था। शहर ताज़ादम और हाईटेक़ लग रहा था। रात का अधसोया क्वेंट मेडीवल शहर तो कतई नहीं। हमें काफी भीतर इंटीरीयर में जाना था और हम नाश्ते के बाद तुरत निकल पड़े थे। हाईवे से हम भीतर सड़क पर मुड़ गए थे। सड़कों पर बर्फ की पतली परत थी लेकिन ठंड उतनी नहीं थी। लगता था कि बर्फ  की खेती हो रही हो। सलीके से मेड़ बने हुए थे और दूर-दूर तक ज़मीन पर जैसे हल चली हुई हो। पहली दफा हमें कुछ टूटी सड़कें मिलीं। पेड़ पत्रहीन पर नज़ारा उदास नहीं था। हल्की धूप खिली थी और मिट्टी गहरी भूरी। सड़कों के किनारों एकाध तेज़ी से उड़ान भरते कोई एक पनडुकी नुमा पक्षी भी। हम गाड़ी से उतर गए थे। दूर खेतों में वृक्षों के कतार के पार एक घर दिख रहा था। पीछे सूरज की किरणों का सुनहला मुकुट उसकी छतों पर चमक रहा था। लगता था, सपनों-सा संसार हो। मेरा बहुत मन हुआ सब छोड़ कर उन खेतों में चली जाऊँ, उस घर के भीतर जाकर देखूँ, वह संसार क्या है, कौन रहता होगा, कैसे रहता होगा? क्या होता होगा उस दुनिया में? मैंने अपना आईपैड निकाला और कुछ पल कैद कर लिए।

रास्ते भर हम बात करते रहे थे। फ्रांस और चीन और भारत के बारे में, रहन-सहन और अर्थव्यवस्था और कुछ राजनिति। स्तिफां बताता रहा था कि सोशल नेटवरिकिंग साईट्स बैन हैं यहाँ लेकिन बदले में एक चाईनीज़ नेटवर्किंग साईट वीबो है, जो ट्विटर जैसा है फिर रेनरेन है, जो फेसबुक की तरह है, तेनसेंट है, जो सोशल मिडिया हब की तरह है। फिर तूपान है, जो कि एक खुला फोरम है। यह बुद्धिजिवियों के बीच पॉपुलर है और यहाँ फिल्मों संगीत और किताबों की समीक्षाएं मिलती हैं। यह भी कि नेट पर कुछ भी सर्च करने पर एक दो बार के बाद से साईट नहीं खुलता, विकी भी नहीं कई बार। यहाँ के रेस्ट्रिक्शन्स की बात बता रहा था लेकिन फ्लिप साईड यह भी कि चाईना मे कितनी चीज़ें है, जो सँभावनाओं से भरपूर हैं, जो कि अब योरप में नहीं। हम भारत और चीन के विकास पर बात करते रहे थे। सोशल फैब्रिक कितना स्टैगनेंट कर गया पश्चिमी देशों में, उनकी अर्थव्यवस्था किस रिसेशन में चली गई है और उसके बनिस्बत चीन और भारत में सब कितना होने को बचा है, कितनी पॉसिबिलीटीज़ हैं अभी। मैं हुकोऊ के बारे में पूछना चाहती थी। हुकोऊ माने फामिली रेजिस्ट्रेशन सिसटम, जो एक तरह से माएग्रैंट लेबर मूवमेंट को रेग्यूलेट करता है। चीन के ग्रामीण और शहरी असामनता में हुकोऊ का काफी हाथ है, लेकिन स्तिफां गलत आदमी था इस बारे में बात करने के लिए, पियेर भी शायद और मेरी चीनी इतनी काबिल नहीं थी कि झाँग से मैं कोई गहरी मानीखेज़ बात कर पाऊँ।

दोपहर हम ऐसे रेस्तरां में गए, जहाँ से येलो सी दिखता था। समन्दर की लहरों को देखते हुए हमने ऑयेस्टर्स, मसेल्स और क्लैम्स खाए। उनको खाने का तरीका मुझे मालूम नहीं था। देखकर सीखा कि टूथपिक से खाया जाता है। झांग की प्लेट के बगल में घोंघों का ढेर लग गया। घोंघे मुझे पसंद नहीं आए, हाँ सीपी ज़रूर आए और काफी पर मैंने भी हाथ साफ किया। मेरे सहकर्मी भारत से लाए पूड़ियाँ ही खाते रहे। वे शाकाहारी हैं और उन्हें खाने की बड़ी तकलीफ रही। आज उनकी लाई पूड़ियाँ पियेर और स्तिफां ने भी चखी। हम इस बात पर हैरान होते रहे कि किसने सोचा होगा कि हज़ारों मील दूर उनकी पत्नी की बनाई पूड़ियाँ इस तरह खाई जाएंगी। वाईन की संगत में पूड़ियाँ जैसी भी हों, ओयस्टर्स शर्तिया शानदार थे ।

शाम हमें ट्रेन से बेजिंग लौटना था। दिल्ली में ही मेरी मित्र प्रीति गिल ने मुझे लिचिया चैंग से मेल द्वारा परिचय कराया था। लिचिया बेजिंग में रहती हैं और वह लेखक, जर्नलिस्ट और पब्लिक स्पीकर हैं। उसने '' सोशलिस्म इज़् ग्रेट, अ वर्कर्स् मेमोआर ऑफ द न्यू चाईना '' किताब लिखी है। लिचिया से मेरी बात मेल से हो रही थी और हमारा बेजिंग में मिलने का कार्यक्रम लगभग तय था सिर्फ शायद लिचिया को गुआंगज़्हाऊ जाने का एक प्रोग्राम भी था, जहाँ उन्हें एक की नोट एड्रेस देना था। मेरा शुरुआत में बेजिंग ही रहने का प्रोग्राम था, जो कि बाद में किन्हीं कारणों से बदलना पड़ा था। रेन चियू के मुश्किल नेट कनेक्टिविटी के बावज़ूद हमने कुछ मेल्स का आदान-प्रदान कर लिया था और यह साफ हो गया था कि जिन दिनों मैं बेजिंग में रहती, उसे गुआँगज़्हाऊ होना था तो हम शायद मिल न पाएं। खैर मैंने ट्रेन से ही लिचिया को फोन करना चाहा कि लेकिन बात नहीं हो पाई। कुछ समय लौटने के बाद गार्जियन में लिचिया का एक अच्छा लेख पढ़ने को मिला, किम ली के तलाक के संदर्भ में चीन में घरेलू हिंसा की गुप्त महामारी। मैंने लीचिया से पूछा था फिर, खासकर तब यहाँ के संदर्भ में भी। उसने कहा था कि उसका लेख और भी बड़ा था और गार्जियन पर काटछांट कर ही छपा था। खैर, अफसोस रहा कि हम मिल नहीं पाए। उम्मीद है, जब वह भारत आएगी, हम ज़रूर मिलेंगे।

बीजिंग पिछली दफा मैं खूब घूम चुकी थी। इस बार घूमने का दबाव नहीं था। बस शहर को महसूस करने का था। रात हम शहर घूमते रहे बेमतलब। गाड़ियाँ, रौशनी, रफ्तार, सब। यह तियननमन स्क़्वायर, यह फार्बिडेन सिटी, यह कैपिटल म्यूज़ियम, यह रास्ता बेईहाई पार्क की तरफ जाता है, इस तरफ बढते हैं हुतोंग शीचहई, उस तरफ लामा मंदिर, इधर ओलम्पिक स्टेडियम बर्ड्स नेस्ट। हम थके थे, फिर भी खिड़की से बाहर देखते शहर देखते थे। पिछली बार से शहर इस बार अलग था। पिछली बार दिन का शहर था। इस बार रात का। हमारी टैक्सी लगभग छोटी-सी बस ही थी। हम सब अपनी दुनिया में मशगूल। पियेर का घर बेजींग में था लेकिन उसने तय किया था कि वह होटल में ही रुकेगा हमारे साथ। स्तिफां का घर भी वहीं था लेकिन लगभग घँटे भर की दूरी पर और चूंकि सुबह हमें सीचिआचुआंग् के लिए निकलना था, हम सब एक साथ एक ही होटल रुकने वाले थे। रात इस तरह बेमतलब सड़क पर घूमना मुझे आहलादित कर रहा था। जैसे शरीर से आत्मा निकल कर विचर रही हो। 

स्विसोटेल फिरंगियों के लिए होटल है, उनके टेस्ट को केटर करता हुआ। मुझे ज़्यादा अच्छा लगता अगर हम कोई खालिस चीनी जगह रुकते, किसी हुतोंग स्टाईल होटल, अगर होता होगा तो, लेकिन पियेर ने शायद हमारी सुविधा के मद्देनज़र ही यहाँ इंतज़ाम किया होगा। यहाँ हमें कुछ वेस्टर्न् खाना भी मुहैया था और पियेर और स्तीफां ने तो स्टेक मंगाया। मैंने तय किया कि खाना स्किप करना है, झाँग को दिक्कत हुई, उसे चीनी खाने के अलावा दूसरा खाना पसंद नहीं। झाँग बड़ी प्यारी पचीस छबीस साल की सुंदर-सी लड़की है। या तो सारे समय खाती रहती है या फिर अपने फोन से बात करती रहती है। या फिर मुझे देखकर मुस्कुराती है। उसकी अंग्रेज़ी ऐसी नहीं कि बहुत बात की जा सके लेकिन छोटी-छोटी चीज़ों में बहुत ख्याल रखती रही है। जैसे मैं छोटी बच्ची होऊँ और वह मेरी बड़ी बहन। पता चलता है कि उसकी हाल में शादी हुई है। तो ये है उसके लगातार फोन पर बात करने का राज़। रेस्तरां में वाईफाई है और मैं कुछ देर नेट कनेक्टेड् हूँ, मेल देखती हूँ, फेसबुक कनेक्ट नहीं होता।

सुबह-सुबह बहुत सवेरे हम फिर ट्रेन में हैं। हमें लगता है पुराने ट्रेन सवार हो गए हैं। टिकट और चेक इन वाले सब तामझाम अब हमें समझ में आने लगे हैं, लेकिन हम हमेशा पियेर या झाँग को अपनी नज़र की ज़द में रखते हैं। अगर ये ओझल हुए, तो फिर खैरियत नहीं। हम किसी को अपनी बात समझा नहीं पाएंगे। बैग में पासपोर्ट हमेशा साथ तो रहता है लेकिन भाषा का अज्ञान कितना बड़ा हैंडीकैप है, कैसी इंसेक्योरिटी देता है, यह यहीं आकर समझ आया है। झाँग कई बार भीड़ में मेरी बाँह थाम लेती है। आज हमें अलग कतार में खड़ॆ होना है। हमारे आगे एक लड़का है, गिरी ज़ुल्फें हैं, यू आर फ्रॉम इंडिया? हम भौंचक होते हैं। पहली बार कोई हमसे बोला है। हम कहते हैं, यू नो इंगलिश। वह कँधे उचकाता है, फिर कुछ कहता है। उसकी अंगरेज़ी सिर्फ इतनी ही थी।

सिचियाचुआंग में बहुत सर्दी है । स्टेशन के बाहर हमारी गाड़ी आई नहीं। हमें लगभग आधा घँटा इंतज़ार करना पड़ा। लगा जैसे तबियत खराब हो जाएगी। स्तिफां का चेहरा एकदम लाल हो गया था। मुझे लगा, उसे कुछ हो गया है। बहुत तेज़ हवा है और कोई ओट नहीं। हम एकदम खुले में खड़े हैं। एक परिवार खुले स्कूटर में निकल पड़ता है। दो बच्चे हैं, एस्कीमो लग रहे हैं। दो बच्चों पर मुझे हैरानी होती है। पियेर कहता है मेरे तीन हैं। मैं कहती हूँ, हाउ कम? बिकॉज़ अयम फ्रेंच, वह हँसता है, मेरा बेटा निकोला और बेटी पैरिस में मेरी माँ के साथ रहते हैं, सिर्फ मेरी छोटी बेटी लेया यहाँ बेजिंग में हमारे साथ है। ठंड से बचने के लिए हम पाँव पटक रहे हैं, लेकिन सहा नहीं जा रहा है और जैसे ही हम तय करते है किं भीतर चला जाए, गाड़ी आ जाती है।

इतनी ठंड है कि कोई परिंदा चरिंदा दिखाई नहीं देता। हम खेतों का नज़ारा देखते चलते हैं। वही बर्फ के खेत। जैसे हल चलाए गए हों। ज़रा-सी धूप निकलती है और सब खुशगवार हो जाता है। हम हिन्दी में बात करते हैं कि भारत होता तो इतने ठंड में लोग खेतों में निवृत होने निकल पड़ते। शायद हमारे लहजे में कुछ होगा कि पियेर वही टॉपिक छेड़ देता है कि चीन में भी, आखिर यह तो इंसानी ज़रूरत है। फिर हम बात करते हैं कि फॉरबिडेन सिटी में बाथरूम नहीं है, स्तिफां जोड़ता है पैलेस ऑफ वर्साय में भी नहीं है। हम कहते हैं, हमारे यहाँ महलों में नहाने के बड़े सरंजाम रहते थे और बड़े इंतज़ामात वाले गुसलखाने। हम सब खूब हँसते हैं और तय होता है कि सबसे पहले वाशरूम खोजा जाए। काम की जगह पहुँचते ही एलानिए तौर पर वाशरूम खोजा जाता है और हम सब स्कूली बच्चों की तरह भागते हैं।

लौटते वक्त स्टेशन पर बर्गर और फ्रेंच फ्राईज़ और कॉफी। झाँग नूडल्स खा रही है। मैं सिर्फ कुछ चिकन नगेट्स। ट्रेन में बैठे शरीर क्लांत हैं, लेकिन मन अजीब हलचल में है। मैं और स्तीफां लगातार बात करते हैं। वह अपनी पत्नी से कैसे मिला की कहानी बता रहा है। फ्रांस के बरक्स चीन में रहना, किन चीज़ों की कमी उसे खलती है, क्या अच्छा है। हम खाने की पद्ध्ति पर बात करते हैं, मैं उसे हिन्दुस्तान के बारे में बताती हूँ, उसे बहुत मालूम नहीं, लेकिन कहता है कि उसकी पत्नी भारत घूमना चाहती है। मैं उसे फ्रांस के उस छोटे से गाँव बुगाराश की बात बताती हूँ, जो कहा जाता है कि 2012 के अंत के बाद भी बचा रहता और वो हैरान होता है कि भारत में रहते मुझे उस छोटे से गाँव की बात मालूम है। हम पूरे संसार के छोटे होते जाने की हैरानी से सराबोर हैं। हम इस तरह विचारों, भाषाओं, सभ्यताओं, संस्कृतियों, मसालों, संगीत, किताबों के आदान-प्रदान की बात सहजता से कर सकने की आसानी पर बात करते हैं। रास्ता बड़ी तेज़ी से कटता है। होटल पहुँच कर हमें कुछ बचा काम भी करना है।

रात हम खाना खाने द गेंजेस नाम के भारतीय रेस्तरां जाते हैं। इस बार होस्ट हम हैं। केसरिया  पुलाव, लच्छा पराठा, नान, हैदराबादी बिरयानी, मलाबारी चिकन, कढाई चिकन, लस्सी और न जाने क्या-क्या। उन्हें अपने खाने के बारे में बताते हमें एक प्रकार का अभिमान हो रहा है। ये ऐसे पकता है, ऐसे खाया जाता है, चावल हम हाथ से खाते हैं। झाँग कहती है, हाथ से खाना सबसे मुश्किल काम है। हम कहते हैं, चॉपस्टिक से कम। मैं उसे तरीका सिखाती हूँ। वे स्वाद ले कर खा रहे हैं। हमारा काम खत्म हो गया है तो काम खत्म होने की निश्चितंता भी है। वाईन के साथ अच्छा भोजन और अच्छी बातचीत। सब अच्छा है। मैंने पियेर से पूछा था कि इतने दिन हम चीनी खाना खाते रहे, कभी मीठा नहीं खिलाया गया? उसने बताया कि मीठे का चलन नहीं। कभी इच्छा हुई, तो टमाटर पर चीनी डाल ली। चाय तक तो ये फीकी पीते हैं। तभी सब एक दम चुस्त-दुरुस्त।

खैर हमने रसमलाई और गुलबजामुन मँगाया। स्तीफां ने कहा- नैपकिन पर लिख दो बीवी को बताऊँगा क्या खाया। पियेर बताता रहा कि उसकी पत्नी बेक बहुत अच्छा करती है। अगले दिन बल्कि वह अपनी पत्नी के हाथ का बना केक हमारे लिए लेकर आया । इस शानदार भोजन के बाद स्तिफां ने हमसे विदा ली। पता चला कि अजब संयोग में उसका बेटा क्रिस और मेरा बेटा हर्षिल एक ही दिन पैदा हुए हैं। हफ्ते भर हम साथ रहे, बहुत बढ़िया साथ रहा। अगली सुबह झाँग से विदा ली और फिर देर सुबह ऐयरपोर्ट पर पियेर से।

पियेर ने हाथ मिलाया फिर, इन फ्रेंच स्टाईल, भी अल्विदा किया। इन हफ्ते भर के साथ हमने कई बार एक-दूसरे से बहस की, कई बार स्वत: एक-दूसरे से ऐसी भाषा में बोले, जो दूसरा नहीं जानता था, कुछ ऐसे लफ्ज़ पकड़ लिए, जिसका बार-बार उपयोग किया। पियेर हर वाक्य नीगअ से शुरु करता। मेरा मैंदरीन का अल्पज्ञान नी का मतलब तुम बताता और ग मेशरवर्ड है। मैंने उससे पूछा - नीगा क्या? उसने कहा- दैट। मैं हमेशा दैट को नग़ा बोलती थी। या जैसे स्तीफां ने पूछा कि गुड बाई, ऑ रिवोआ को हिन्दी में क्या बोलते हैं, मैंने एकदम से जबाव दिया, अल्विदा। बेजिंग के वांगफुजिंग शॉपिंग डिस्ट्रिक्ट के सामने की सड़क पर रात के ग्यारह बजे स्तीफां अपने हाथ फैलाए  अलविदा बोलता इतना मासूम और नाटकीय लग रहा था कि हमें हँसी आ रही थी। या फिर पियेर नहीं बोलना सीख गया था और स्तीफां शुक्रिया और हम धड़ल्ले से शियेशिये या फिर जब मैंने छोटे संतरे उठाए, तो झाँग ने हाओ च्र कहा, मुझे लगा संतरा का मैनदरीन हाओ च्र है, फिर स्तीफां ने समझाया हाओ माने अच्छा, च्र माने खाना, तो एकदम मुझे सीखा याद आ गया, मैंने कहा मुस्कुरा कर, हन हाओ, बहुत अच्छा। हम एक साथ एक बार में एक-दूसरे की तरफ अंग्रेज़ी, हिन्दी, फ्रेंच और मैंन्द्रीन फेंकते रहते। कौन किससे किस भाषा में बोल रहा है पता ही नहीं चलता और कई बार इसी हँसी से टेंशन डिफ्यूज़ भी हो जाता। हमने उनको बताया कि हमारे यहाँ तीस अलग भाषाएं  और लगभग दो हज़ार बोलियाँ हैं और हम इस तरह अलग बोलियाँ सुनने के आदी हैं।

शायद हम सबको खूब यात्राएं करनी चाहिएं, कई बार संभव नहीं होतीं शारिरिक यात्राएं, तब मन की करनी चाहिए : लोगों के भीतर उतरने की यात्राएं, जगहों के भीतर, जड़ और चेतन, प्राणवान और प्राणहीन, अंदर और बाहर, अपने भीतर और अपने बाहर तक। भीतर और बाहर की यह आवाजाही ही स्पंदित रहती है हमारे वज़ूद में, जो हमें एक धरातल पर जीवित बनाती है, एक तरह की क्रिया-प्रतिक्रिया का अंवेषण कराती है। मुझे लिशान में मिले टेराकाटा फौज का ख्याल आता है, कहतें हैं वहाँ पूरा शहर खुदाई में मिला और हरेक सिपाही की शक्ल दूसरे से फर्क है। शायद यह अलग होना ही हमें दूसरे के करीब लाता है। जीवन अपनी विविधता में कितना खूबसूरत है। मिट्टी, पानी, धूप, हवा, एक होते हुए भी उनकी किमियागिरी कोई अलहदा चीज़ पैदा कर देती और उस बात का साक्षी होना कैसी खुशी की बात है। एक बार यात्रा खत्म होती है फिर आपका मन बार-बार उस यात्रा पर निकलता है, आपके अंतरतम के किसी गुप्त तहखाने में वह यात्रा लगातार आपके जाने बिना अपना दोहराव करती जाती है।




The only journey is the one within.  
-Rilke. 
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[ सभी तस्वीरें : लेखिका के कैमरे से.
उनका लिखा एक अन्य वृत्तांत यहाँ . ]

4 comments:

विस्तृत, रोचक और सरलता से प्रस्तुत वृत्तान्त


बेहतरीन वृत्तान्त.


अद्भुत यात्रा वृतान्त।आनंद आ गया पढ़कर।


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संपादन : अनुराग वत्स.

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