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रानीखेत एक्‍सप्रेस - दूसरा अंश - गीत चतुर्वेदी


[युवा कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का उपन्‍यास 'रानीखेत एक्‍सप्रेस' शीघ्र प्रकाश्‍य है. 
सबद पर इससे पहले इस उपन्‍यास का एक अंश प्रकाशित हो चुका है. यह दूसरा अंश-]

Pic by : Henri Cartier-Bresson, Romania, 1975.


जिस समय मुझे चाय चाहिए थी, जि़ंदगी ने मेरे सामने डिनर रख दिया। और जिस समय डिनर चाहिए था, उस समय चाय रख दी।

अब सूरज कोई मेरा ससुरा तो है नहीं कि आधी रात उग आए और कहे, तुम चाय पी सको, इसलिए मैंने उगने का अपना समय बदल लिया।

यह एक छोटी-सी कहानी है। एक छोटी-सी चिडिय़ा की छोटी-सी कहानी। काश, ये एक लंबी कहानी होती, उम्र से लंबी एक कहानी, तब शायद यह बहुत सुंदर होती।

छोटी कहानियां जल्दबाज़ होती हैं। वे अपनी उम्र को जल्दी-जल्दी जीती हैं, वे ख़त्म होने का इंतज़ार नहीं कर पातीं, बस, जल्दी से ख़त्म हो जाना चाहती हैं।

हा हा। हड़बड़े पुरुषों के शीघ्र-स्खलन की तरह।

पर छोटी कहानियां अपने असंतोष के कारण बची रह जाती हैं। होता यह है कि कई बार लंबी कहानियां आपको इतना संतुष्ट कर देती हैं कि आप उन्हें भूल जाते हैं। जबकि छोटी कहानियां आपको इस क़दर असंतोष देती हैं कि आपकी स्मृति से चिपक जाती हैं।

असंतोष संजीवनी बूटी की तरह होता है। आपको बार-बार जि़ंदा करता है।

इस कहानी में चीज़ें बहुत जल्दी-जल्दी घटित हुईं। उन घटनाओं में कोई तारतम्य न रहा। इसलिए इसके दोनों किरदारों को ज़रा-भी संतोष न मिला। जबकि घटनाएं ऐसी थीं कि अगर तारतम्य में होतीं, तो जीवन बेहद सुंदर बन जाता।

यह प्रेम उस तरह है, जैसे दो लोग, दो अलग-अलग महाद्वीपों में रहकर एक-दूसरे से प्रेम करते हों। मान लो, लड़का भारत में रहता हो और लड़की अमेरिका में। जब एक के यहां दिन होगा, तब दूसरे के यहां रात होगी। जब एक रोना चाहेगा, तब दूसरे को हंसी आ रही होगी। जब एक सोना चाहेगा, तब दूसरा सुबह उठकर काम पर जाने की तैयारी कर रहा होगा।

ना। हंसना मत। हममें से ज़्यादातर लोग ऐसा ही प्रेम करते हैं। कंप्यूटर की भाषा में कहूं, तो सिन्क नहीं होता।

*

वह मुझसे बीस साल बड़ा था, जबकि वह ख़ुद अपनी उम्र से दस साल बड़ा दिखता था। अगर हम दोनों साथ खड़े हो जाएं, तो हमारे बीच बीस जोड़े दस बराबर तीस साल का फ़ासला साफ़ दिखने लग जाए।

मैं निर्वाना सुनती थी, वह बीटल्स सुनता था। मुझे पियर्स ब्रोसनन पसंद था, वह शॉन कॉनरी से आगे बढ़ता ही नहीं था। मैं जूलिया रॉबर्ट्स की तरह बाल कटाती थी, वह चाहता था, मैं विवियन ली की तरह उंगलियां दबाते हुए बात करूं।

मैं उसे रंगीन फिल्म की तरह देखती थी।

वह मुझे ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा की तरह देखना चाहता था। वो भी साइलेंट वाला।

मुझे कभी-कभी हंसी आ जाती थी। महसूस होता कि हम प्रेम कम कर रहे हैं, बल्कि टीवी का रिमोट छीन लेने के लिए लड़ रहे हैं।

मैं कहती, 'तुमसे बात करते समय लगता है, मैं अपने पिताजी से बहस कर रही हूं।'
वह कहता, 'अगर तुम मेरी बेटी होती, तो मैं तुम्हारी पिटाई कर देता।'

उस दौरान मुझे पहली बार लगा, प्यार में भी जनरेशन गैप होता है।

*
Pic by Katerina Lomonosov.
इगतपुरी के विपश्यना केंद्र से लौटने के बाद मैं बेहद टूटी हुई थी। मेरे सिवाय इस टूटन को हर कोई स्वीकार कर चुका था। मैं उस पुराने मकान में न रह पाई। वहां अब सभी यह जानने लगे थे कि मेरे साथ क्या हुआ है। इगतपुरी ने मेरे भीतर को शुद्ध किया था, लेकिन मैं जिस समाज में रहती थी, उसे शुद्ध करने के लिए कोई विपश्यना अभी तक ईजाद नहीं हो पाई है।

मेरा उस बिल्डिंग में रहना दूभर हो गया था। जब मैं कॉलेज से लौटकर आती, तो बिल्डिंग के अहाते से लोग मुझे घूरना शुरू कर देते। वे मेरी आंखों में देखते, ऊपर से नीचे तक देखते, मेरी चाल देखते, जैसे कि वे ड्रग्स के निशान खोज रहे हों।

जो मनचले थे, वे वहीं सीढिय़ों पर मेरे साथ संभोग कर लेना चाहते थे।

और कुछ ने मेरे साथ अतिरिक्त सहानुभूति दिखानी शुरू कर दी थी, ताकि वे मेरी दहलीज़ में प्रवेश कर सकें।

सभी जानते थे कि मैं अकेली रहती हूं।

वे हर संभव कोशिश करते कि मैं मदपुरुष को भूल ही न सकूं। शायद वे सब उसके ज़रख़रीद थे। मैं उन सबसे दूर हो जाना चाहती थी।

मैं वहां से इस फ्लैट में आ गई। यहां अकेलेपन का अहसास बहुत तेज़ी से हुआ। मैं बार-बार उस नींद में चली जाना चाहती थी, जो किसी के प्रेम में डूबे होने पर मिलती है। लेकिन सच तो यह है कि मैं प्रेम करने की कल्पना से भी डरने लगी थी। लोगों को प्रेम करता देख मैं अचरज में आ जाती थी। सोचती, अभी कुछ दिनों बाद ये अलग हो जाएंगे और प्रेम से ज़्यादा पीड़ा के पड़ोस में रहेंगे।

तब मुझे पहली बार यह अहसास हुआ कि प्रेम एक असंभव परिकल्पना है।

सोने से पहले टेबल लैंप जलाती, बुझाती, फिर जलाती। जलता छोड़ देती। लेटे-लेटे अपने जीवन में आए सभी प्रेमियों को याद करती। बहुत धीमे-से बुदबुदाते हुए उनके नाम का उच्चारण करती, ताकि पहले के नाम की वर्तनी, कहीं दूसरा न जान ले। कभी-कभी मैं इतनी बार उनका नाम लेती कि लगता, मैं कोई मंत्र पढ़ रही हूं। निद्रा की देवी की स्तुति में पढ़ा गया मंत्र।

अपने जीवन के सारे प्रेमियों के नामों को बिना रुके, एक साथ दोहरा कर देखना कभी, ऐसा लगेगा, प्रेम-रोग भगाने वाला मंत्र पढ़ रहे हो।

उसी समय मैं मदपुरुष के बारे में सोचती। वह ऐसा प्रेम था, जिसमें मेरे पास सिर्फ़ सवाल ही सवाल थे, जवाब एक भी नहीं था। हर सवाल का अंत एक ही तरह होता था: क्यों? आखि़र क्यों?

जिस प्रेम में आपके पास सिर्फ़ सवाल होते हैं, वह प्रेम ताउम्र आपका पीछा करता है।

जिस तरह मदपुरुष रोज़ मेई-हुआ की हत्या कर देना चाहता था, उसी तरह मैं भी हर रोज़ योजना बनाया करती थी कि किसी तरह मैं मदपुरुष को माफ़ कर दूं। गुनहगार वह था, लेकिन ग्लानि में मैं रहती थी। मैं कल्पनाएं करती थी कि कहीं से कोई करिश्मा हो जाए और क़ुदरत उसे बेगुनाह साबित कर दे।

एक रोज़ मैं ख़ुद से ही थक गई।

आधी रात मैं नींद की मंझधार से उठी। टेबल लैंप ऑन किया। दराज़ में उंगलियां टटोलीं। नोटपैड निकाला। फिर दराज़ को टटोलने लगी। क़लम नहीं मिल रही थी। अपना पर्स खंगाला। उसमें भी क़लम नहीं थी। नींद की ख़ुमारी में झल्लाते हुए मैंने काजल की पेंसिल उठा ली।

पीली रोशनी में टेबल पर झुककर मैंने एक काग़ज़ पर लिखा। काजल की नोंक पतली नहीं थी। इस नाते सिर्फ़ पांच शब्दों में पूरा पेज भर गया। मैंने दूसरा पेज खोला और उस पर भी लिखा। इस बार मैंने शब्दों के आकार का ध्यान रखा। इस पेज पर सात शब्द लिख लिए गए।

फिर पेज नंबर लिखा। पहले पन्ने पर पेज 1 और दूसरे पन्ने पर पेज 2। फिर क़रीने से उन्हें स्टैपल कर दिया। वह मेरे जीवन की सबसे छोटी कहानी है। सिर्फ़ दो पंक्तियों की। कोई उसे पढ़ेगा, तो वह ऐसे बनेगी :

जाओ, मैंने तुम्हें माफ़ किया।
आ जाओ, कि मैंने तुम्हें माफ़ किया।

Pic by Henri Cartier-Bresson. San Fransisco. 1960

मैंने दोनों पन्नों को गोल किया। उसे ऑस्ट्रेलियन शिराज़ पसंद थी। मैंने वह बोतल खोजी। किसी रात पीने के बाद मैंने पलंग के नीचे लुढ़का दी थी। उन काग़ज़ों को उस बोतल में डाला और बोतल को अपने पर्स में।

उसके बाद मुझे बहुत गहरी नींद आई। इतनी गहरी कि मैं सुबह कॉलेज जाने के समय उठ ही नहीं पाई। जागने में दोपहर हो गई। बहुत इत्मीनान से तैयार होकर मैं नरीमन पॉइंट पर उसी जगह पहुंची, जहां पहली बार मदपुरुष से मुलाक़ात हुई थी।

वहां मेरे बैठने का कोई निशान न था। वहां उसके होने का भी कोई निशान न था।

मैं थोड़ी देर तक वहीं बैठी रही। मुझे अरब सागर से कोई शिकायत न थी। वह भी हमेशा की तरह ठाठें मार रहा था। मेरा और उसका रिश्ता बल खाती लहरों और उफनते झाग का रिश्ता था।

मैं देख रही थी कि लहरें हर चीज़ को किनारे पर ले आ रही थीं। मुझे यह जगह सही नहीं लगी।

वहां से मैं गेटवे ऑफ़ इंडिया गई। फिर वहां से एलीफेंटा जाने वाली फेरी में बैठ गई। जब वह समंदर के ऐन बीच में थी, मैंने अपने पर्स से बोतल निकाली। बिना किसी की ओर देखे मैंने बहुत धीरे-से उसे पानी पर छोड़ दिया। इतनी नज़ाकत से, मानो बोतल अगर ज़ोर से गिरी, तो पानी से टकराकर टूट जाएगी।

फेरी एलीफेंटा पहुंची, तो मैं अपनी जगह से हिली भी नहीं। उसी सीट पर बैठे-बैठे मैं लौट आई। मैंने अपना संदेश बीच धार छोड़ा था, ताकि वह लौटकर नरीमन पॉइंट के ही तट पर न आ जाए।

एक पानी, दूसरे पानी से बात करता है। मेरा संदेसा पानी पहुंचाएगा। भटकता हुआ अरब सागर का पानी कभी तो हांगकांग की खाड़ी तक पहुंचेगा, कभी तो मकाऊ के किनारों की रेत को छुएगा। वह चीन के पानी में घुले इस मुंबइया पानी को पहचान लेगा। मैं दो पंक्तियों की अपनी कहानी उसमें छोड़ आई हूं।

जाने कैसी कि़स्मत लिखाकर लाई हैं मेरी कहानियां कि वे हमेशा खारे समंदरों में ही तैरती हैं। मैं मीठे पानी की मछली रचना चाहती हूं।

जाओ, मैंने तुम्हें माफ़ किया।
आ जाओ, कि मैंने तुम्हें माफ़ किया।


 *

Pic by Jean Loup.
जीवन में एक चीज़ कभी नहीं सोचनी चाहिए, वह यह कि - मैं अब से प्रेम नहीं करूंगी।

ऐसा सोचना प्रेम की देवी अफ्रोडाइटी को नाराज़ करने जैसा है। आप जितनी बार दुबारा प्रेम न करने के बारे में सोचेंगे, फिर से प्रेम में पड़ जाने की संभावनाओं को बलवती करेंगे।

अफ्रोडाइटी, प्रेम की सृष्टि को इसी क़दर, नाइंसाफि़यों से ही चलाती है।

उस शाम जब मैं अपने घर की सीढिय़ां चढ़ रही थी, मुझे यह व्यक्ति मिला, जो मेरा गुलाबी प्रेमी बनेगा। जैसा कि मैंने इस कहानी के शुरू में बताया, वह वैसा ही था। मुझसे भी लंबा।

मिलते ही उसने कहा, 'आपके नाम एक वीपीपी आया था। डाकिया लौट रहा था, तो मैंने छुड़ा लिया। यहां है।'

मैंने उसी के सामने लिफ़ाफ़ा खोला। उसमें नेरूदा की किताब थी: 'ट्वेंटी लव पोएम्स एंड अ सॉन्ग ऑफ़ डिस्पेर'। जब तक मैं किताब पलट रही थी, वह मेरे दरवाज़े पर ही खड़ा था। एकदम चुप। मेरे लिए वह अनुपस्थित था। मैं पतली-सी उस किताब के भीतर उपस्थित थी।

जब मुझे उसका ख़याल आया, मैंने देखा, उसका पूरा ध्यान किताब पर था। मैं उसे भीतर ले आई। उसने दरवाज़ा खुला ही रखा।

जब तक मैं भीतर से पैसे लेकर आती, वह किताब पलट रहा था। अब उसके लिए मैं दृश्‍य से अनुपस्थित थी।
उसने लेखक के नाम पर उंगली रखकर कहा, 'ये राइटर है?'
मैंने कहा, 'हां।'
'बंगाली है या पोर्चुगीज़?'
किताब के पहले ही वरक़ पर नेरूदा का परिचय लिखा था। मैंने उसे दिखाया। उसने यह भी नहीं देखा, तो अब तक किताब क्यों पलट रहा था?
झेंपते हुए उसने कहा, 'मुझे लगा, बंगाली होगा, उनमें भी हर नाम के आगे 'दा' लगा होता है न। मोनूदा, सोनूदा, वैसे ही नेरूदा।'
मुझे उसके चुटकुले पर ज़रा भी हंसी नहीं आई। वह और झेंप गया। फिर कहा, 'मुझे पंद्रह साल से ज़्यादा हो गया, आखिरी बार कोई किताब पढ़े।'
मैं मुस्करा दी। जैसे किसी ने यह कहा हो, मुझे पंद्रह साल से ज़्यादा हो गया, आखि़री बार सांस लिए।

मेरी तरह वह भी अकेला रहता था। मेरी तरह वह भी अकेलेपन को नकारता रहता था। मेरी तरह वह भी अपने सिवाय सबकुछ को अनुपस्थित मानता था। मेरी तरह वह भी झूठा था।

तीन दिन बाद मेरे दरवाज़े की घंटी बजी। सामने वह खड़ा था। उसके हाथ में दो किताबें थीं। एक 'इस्ला नेग्रा' और दूसरी 'कांतो जनरल'। दोनों नेरूदा की थीं।
उसने कहा, 'यह आपके लिए?'
मैंने कहा, 'अरे! यह कहां से ले आए?'
उसने बताया, 'मेरी दुकान के बग़ल में ही रद्दी की एक बहुत बड़ी दुकान है। उसके पास से ले ली। दरअसल, मुझे लेखक का नाम याद रह गया था। मैंने उससे यूं ही पूछा कि नेरूदा की कोई किताब है? तो उसने ये दोनों दे दीं।'
'अच्छा? रद्दी वाला नेरूदा का नाम जानता है?'
'मुझे नहीं पता, लेकिन उसने यही कहा कि यह? यह तो आसानी से मिल जाता है। अक्सर इसकी किताबें उसके पास आ जाती हैं।'

दरवाज़े पर खड़े होकर कही गई उस बात ने जैसे मेरे ऊपर से टनों भारी बोझ हटा दिया हो। मैं एकदम हल्की हो गई। हवा जितनी हल्की। मेरे चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं आई, दुख आया, लेकिन इसी दुख ने मुझे हल्का कर दिया। जैसे दुख की गोटियों से बना हुआ एक पहाड़ हो। दुख की सबसे छोटी गोटी, सबसे नीचे बुनियाद में है। उस सबसे छोटी गोटी को बुनियाद से हटा दो, पूरा पहाड़ भसक कर गिर जाएगा। हम ताउम्र इसी गोटी को पहचानने से इंकार करते हैं।

मेरे चेहरे पर जो दुख आया था, वह यही था- दुख की सबसे छोटी गोटी।

दुख की यह सबसे छोटी गोटी मुझसे कह रही थी-- 'अगर लोग नेरूदा की किताबों को भी रद्दी में बेच सकते हैं, तो तुम्‍हारी क्या बिसात है? फिर तो कोई भी, कभी भी, किसी को भी रद्दी में निकाल सकता है। कोई भी, किसी को भी प्रेम में धोखा दे सकता है। उसके प्रेम को इस्‍तेमाल की हुई एक सुंदर किताब की तरह बेच सकता है, ताकि उसे कोई दूसरा पढ़ ले। किताबों को रद्दी में किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं बेचा जाता। वैसे ही किसी के प्रेम को बेच खाना व्‍यवसाय नहीं होता, ब‍स सीने पर से एक बोझ हटाने जैसा होता है।'

नेरूदा की किताबों को देखते हुए मैंने सोचा, सर्वश्रेष्ठ का वरण ही नहीं होता, उसका उतना ही तिरस्कार भी होता है।

उस पल मैं यह भूल गई थी कि प्रेम में धोखा खाना भी कोई दुख है। उस भूल जाने ने मेरे मन पर पड़े वज़न को कम कर दिया।

इस तरह वह गुलाबी प्रेमी, नेरूदा के ज़रिए मेरे जीवन में आया।

*

Pic by Andre Kertesz.

वह मेरी बग़ल में ही रहता था। उससे मिलना आसान था। लेकिन हम बहुत देर तक दरवाज़े पर खड़े होकर बातें नहीं कर सकते थे। बहुत देर तक दरवाज़ा खुला रखकर, सोफ़े पर बैठकर भी नहीं। तो उसने बग़ल के फ्लैट से मुझे फ़ोन करना शुरू कर दिया।

वह कई बार कहता, 'किसी भी लड़की के लिए इतना आकर्षण महसूस किए मुझे पंद्रह साल से ज़्यादा हो गए।'

उसे बोलने की झक थी। अगर वह एक बार बोलना शुरू हो जाए, तो आप कुछ नहीं कर सकते। उसका बोलना बड़े नींबू की तरह था, जिसे बहुत ज़ोर लगाकर निचोड़ा जाए, तो ही एक बूंद रस गिरेगा। यानी वह जितने भी शब्‍द बोलता था, उनमें से बहुत कम रस टपकता था।

मैं इंतज़ार करती रहती कि कब वह एक बूंद गिर जाए। कई बार यह इंतज़ार पूरा भी नहीं होता था। मैं ऊबकर विदा कह देती। फिर भी हर शाम घर पहुंचने के बाद एक तय समय पर मैं इंतज़ार करती थी कि अब दरवाज़े पर घंटी बजेगी।

मैं अपना इंतज़ार नहीं जता पाती थी। उसने दो-तीन घंटी नहीं बजाई और मैंने उससे पूछा भी नहीं, जबकि वह पूछे जाने की उम्मीद में था। मैं चाहती थी कि मुझे उसकी ख़बर मिल जाए, लेकिन मैं इस इच्छा को प्रकाशित नहीं करती थी।

तीन दिन नागा करने के बाद उसने फिर शाम को घंटियां बजानी शुरू कर दीं। मुझे अच्छा लगा। पर मैंने यह अच्छा लगना भी उसे नहीं बताया।

मैं हर सुबह कॉलेज जाने से पहले उसकी घंटी बजा देती थी, ताकि वह उठ जाए। वह अलार्म से नहीं उठ पाता था। इसलिए चार-पांच बार लगातार कॉलबेल बजानी होती थी। घंटी बजाकर मैं कॉलेज चली जाती थी। पीछे वह उठता, तैयार होता, और अपनी दुकान पर चला जाता था।

जब उसने तीन दिन का नागा किया था, उसके ठीक सात रोज़ बाद मैंने भी तीन दिन का नागा कर दिया। मैं चाहती थी कि वह शाम को मुझसे पूछे कि सुबह मैंने घंटी क्यों नहीं बजाई। पर उसने भी नहीं पूछा। उसने भी मेरी तरह सोचना शुरू कर दिया था।

इस तरह हम दोनों एक-दूसरे से उम्मीद करते थे और उम्मीद का टूटना नहीं बताते थे।

बिना शिकायत किए प्रेम को समझा भी नहीं जा सकता।

फिर भी वह कहता था, 'मैं किसी से कोई उम्मीद नहीं करता। दरअसल, किसी से भी उम्मीद किए हुए मुझे पंद्रह साल से ज़्यादा हो गए।'

*

Pic by Diana Catherine.

रात को टेलीफ़ोन पर बात होते-होते हम धीरे-धीरे पर्सनल होते गए। हम क्या, वह होता गया। एक रात उसने सीधे पूछ लिया, 'क्या इस समय मैं तुम्हारे फ्लैट में आ सकता हूं?'
मैंने कहा, 'नहीं।'
उसने कहा, 'पूरी बिल्डिंग सो रही होगी। मैं कॉलबेल भी नहीं बजाऊंगा। तुम दरवाज़ा थोड़ा-सा खुला रख दो, मैं चुपके से आ जाऊंगा।'
मैंने कहा, 'नहीं।'
उस समय मेरे पीरियड्स चल रहे थे। और तब वे बहुत दर्दनाक दिन होते थे।
दरअसल, मुझे कहना था, 'आज नहीं।' मैं 'आज' शब्द भूल गई थी।
'नहीं' और 'आज नहीं' में कितना बड़ा फ़र्क़ होता है, मुझे बाद में समझ आया।


एक रोज़ मैंने उसे बताया, 'मुझे गुलाब बहुत पसंद हैं।'

वह मेरे लिए गुलाबी रंग का गुलाब ले आया। मैंने धीरे से कहा, 'मुझे तो लाल पसंद है।'

वह गुलाबी रंग का गुलाब वापस ले गया।

उस रात उसने फ़ोन पर कहा, 'जब मैं तुम्हारी उम्र में था, तब मुझे भी लाल गुलाब पसंद था। लाल रंग जब एकदम घिस जाता है, तब उसका रंग गुलाबी हो जाता है। इस उम्र में मैं तुम्हें सिर्फ़ गुलाबी रंग दे सकता हूं।'

मैंने कहा, 'गुलाबी टीनएज का रंग है। तुम्हारी उम्र का नहीं।'

उसने कहा, 'दुनिया पागल है। जब सूरज उगता है, तब भी वह वैसा ही दिखता है, जैसा वह ढलते समय दिखता है। केवल तस्वीर देखकर आप सूर्योदय और सूर्यास्त का फ़र्क़ नहीं बता सकते। उसके लिए यात्रा करनी पड़ती है। अगर आपने दिन-भर यात्रा की है, तो आप सूर्यास्त को सूर्यास्त की तरह पहचानेंगे। और अगर रात-भर यात्रा की है, तो सूर्योदय को सूर्यास्त मानने की ग़लती नहीं करेंगे।'

गुलाबी मेरे लिए नज़ाकत का रंग था। उसकी व्याख्या ने मेरी परिभाषा को हिला दिया।

*

Pic by Jean Loup. Rains.


उसने सिर्फ़ एक बार ही अपनी उम्मीद मुझसे बताई थी। तब हम बांद्रा स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर बैठे थे। आसपास रोज़ के लोगों के भीड़ थी। सामने से कोई ट्रेन धड़धड़ाते हुए गुज़र जाती।

उसने मुझसे पूछा, 'मैं तुम्हारे कंधे पर सिर रख लूं?'

मैं मुस्करा दी। उसने मेरे कंधे पर सिर रख लिया और दूर देखने लगा।

तभी धड़धड़ाती हुई एक ट्रेन गुज़री। उसके शोर के बीच मेरे कानों में फुसफुसाहट की एक आवाज़ आई, 'आय लव यू!'

मैंने हैरान होकर उसकी ओर देखा। ट्रेन अभी पूरी तरह गुज़री नहीं थी। वह उसी तरह मेरे कंधे पर सिर रखे हुए था, लेकिन वह सीढिय़ों की तरफ़ देख रहा था।

मैंने उससे पूछा, 'तुमने कुछ कहा?'

उसने कहा, 'नहीं तो। मैं तो उन लोगों को देख रहा हूं।'

मैं उसे बहुत देर तक देखती रही। सच में, उसने कुछ नहीं कहा होगा, लेकिन शायद मेरे कान उस समय यही सुनना चाहते थे।
काश! वह शरारत में ही कह देता।

दूर एक दंपति सीढिय़ां उतर रहा था। पुरुष की उम्र लगभग सत्तर साल होगी और स्त्री की उम्र पचास के आसपास। पुरुष के हाथों में छड़ी थी। वह कांपते हुए चल रहा था। उसके कंधे झुके हुए थे। स्त्री ने उसे सहारा दे रखा था। वह हर सीढ़ी पर उसका हाथ मज़बूती से पकड़े हुए थे। वे एक-एक क़दम नाप कर उतर रहे थे। हर दूसरे क़दम पर पुरुष ठिठक जाता। फिर वह अपनी स्त्री की तरफ़ देखता। स्त्री उसे देख मुस्करा उठती। जवाब में पुरुष बहुत हौले-से मुस्कराता। उसकी मुस्कान में थोड़ी-सी बेबसी थी। स्‍त्री दूसरे हाथ से उसके कंधे को सहलाती। दोनों सीढ़ी उतरने लगते। स्त्री उसका हाथ और मज़बूती से पकड़ लेती।

उन्हें देखकर लग रहा था, उतार में भी लय होती है। उनके चलने में ऐसी भव्यता और कोमलता थी कि बांद्रा जैसे व्यस्त स्टेशन की सीढिय़ों पर भी लोग उनसे दो हाथ दूर ठिठक जाते, किनारे हटकर उनके लिए जगह बना देते।

उसने कहा, 'मैं उन दोनों को देख रहा हूं। पता नहीं, कितने बरसों का साथ होगा इनका, लेकिन उम्र के इस दौर में भी जब बूढ़ा अपनी स्त्री को देखता है, तो वह उसके देखने का स्वागत मुस्कान से करती है। यह बूढ़ा इस स्त्री से बहुत प्रेम करता होगा, तभी इस स्त्री के चेहरे पर मुस्कान बची हुई है। इतने लंबे साथ के बाद भी। इस उम्र में भी। किसी के चेहरे पर इस उम्र में भी मुस्‍कान बची रहे यानी उसका साथी उससे बहुत प्रेम करता है।'

मैं कुछ न बोली। मैं उस दंपति को चलता देखती रही।

उसने कहना जारी रखा, 'मैं चाहता हूं कि जब मैं उतना बूढ़ा होऊं, तो तुम इसी तरह, बहुत संभाल-संभालकर मुझे एक-एक क़दम नीचे उतारो। मृत्‍यु के गंगा-घाट पर मैं तुम्‍हारा हाथ पकड़कर उतरना चाहता हूं, एक-एक सीढ़ी।'

मुझे कोई जवाब न सूझा। हर बात का जवाब नहीं होता। कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने कहा, 'मुस्कराने में चेहरे की 34 मांसपेशियों का प्रयोग होता है। मुझे नहीं पता, तब तक उन सबमें इतनी क़ूवत बची रहेगी। चार मांसपेशियां भी कमज़ोर हुईं, तो हमारी मुस्‍कान का आकार बदल जाता है।'

उसने कुछ नहीं कहा। बहुत धीरे-से अपना सिर उसने मेरे कंधे से हटा लिया। जैसे हटाने में उसे बहुत संकोच हो रहा हो।

मैंने गला साफ़ किया और थोड़ी साफ़ आवाज़ में कहा, 'यानी मुझे इस बात का यक़ीन ही नहीं है कि कोई इतने लंबे समय तक मुझसे प्यार करता रह सकता है।'

हम आधे घंटे तक वहां चुप रहे। बांद्रा का प्लेटफॉर्म नंबर तीन अपनी भीड़ के वैभव में था। बीच-बीच में प्लेटफॉर्म नंबर एक से शोर उठता। एक पागल औरत दौड़कर यहां से वहां जा रही होती। कुछ मनचले लड़के उसके पीछे दौड़ रहे होते, चीख़कर उसे डरा रहे होते। अचानक बीच में कहीं से किसी कुत्ते के झौंझिया के भौंकने की आवाज़ आती। हम देखते, चार नंबर पर एक पुलिसवाला एक कुत्ते पर डंडा ताने खड़ा है और कुत्ता डरकर भाग भी नहीं रहा, उल्टे पूंछ दबाकर पुलिसवाले पर गुर्रा रहा है।

उठते हुए उसने कहा, 'सिर्फ़ धोखेबाज़ ही यक़ीन दिलाने में मेहनत करते हैं।'

उसके साथ मैं भी उठ गई।

सामने, चार नंबर पर पुलिसवाले ने अपना तना हुआ डंडा नीचे कर दिया था। उसने कुत्ते की पिटाई का विचार त्याग दिया था। कुत्‍ता अब भी सहमा हुआ गुर्रा रहा था।

*

Pic by Henri Cartier-Bresson. Paris. 1960.

अगले रोज़ उसने फ़ोन पर कहा, 'तुम्हें पता है, मैंने पंद्रह बरस बाद किसी महिला के कंधे पर अपना सिर रखा था।'

मैंने उससे पूछा, 'हर चीज़ तुम्हारे साथ पंद्रह बरस बाद ही क्यों होती है? कुछ हुआ था क्या, पंद्रह बरस पहले?'

उसने कहा, 'कुछ नहीं। बस, घूरे के दिन बारह साल में फिरते हैं। ऐसा समझो, मेरे दिन पंद्रह साल बाद फिरे हैं।'

मैं कभी नहीं जान पाई कि पंद्रह साल पहले क्या हुआ था। शायद उसके जीवन में कोई लड़की थी, जिससे उसे अलग हुए पंद्रह साल हो गए हों और इस पूरे वक़्फ़े में वह भरसक प्रेम से दूर भागता रहा हो। प्रेम की किसी भी स्थिति की निर्मिति का निषेध करता रहा हो।

उस रात बिना कुछ बोले उसने मेरे दरवाज़े पर दस्तक दी। उसने अभी-अभी फ़ोन रखा ही था, इसलिए मैं जाग रही थी। मैंने झांककर देखा, वही था। मैं उसे आने से रोक नहीं पाई। मैं उसे किसी चीज़ से रोक नहीं पाई। आज मुझे लगता है कि मैं उसे रोकना भी नहीं चाहती थी।

मैंने उसे किसी चीज़ से न रोका और इसीलिए वह मेरे जीवन में रुका भी नहीं।

उस रात उसने मेरे आगे एक और उम्मीद जताई, 'मैं चाहता हूं, हमारे फ्लैट्स के बीच की ये जो दीवार है, यह टूट जाए। हम दोनों का वन बीएचके फ्लैट जब जुड़ जाएगा, तो थ्री बीएचके फ्लैट बन जाएगा।'

मैंने कहा, 'अगर दीवारें टूटने को राज़ी न हों, तब?'

'तुम राज़ी होगी, तो दीवारें इनकार नहीं करेंगी। तुम पर दीवारों की मर्जी़ थोड़े चलती है।'

'हम्म। मुझे लगता है, मुझ पर दीवारों की ही मर्जी़ चलती है।'

'ना। मुझे ऐसा नहीं लगता।'

'हम्म। मुझे लगता है, हम दोनों ही एक-दूसरे को नहीं समझते।'

'ना। मुझे ऐसा लगता है कि हम दोनों से बेहतर हम दोनों को कोई नहीं समझ सकता।'

'हम्म। हम दोनों बहुत अलग सोचते हैं। जीवन से हम दोनों की उम्मीदें अलग हैं। और हम दोनों दो अलग-अलग युग हैं। जिसे मैं सूर्योदय समझती हूं, उसे तुम सूर्यास्त समझते हो।'

'लेकिन मेरे सामने ऐसी कोई घटना नहीं आई, जिससे यह बात ज़ाहिर हो सके।'

'हम्म। मेरे सामने भी नहीं आई। लेकिन मुझे अंदर से लगता है कि हम दोनों एक-दूसरे को नहीं समझते।'

'तो फिर समझना कोई ज़रूरी है क्या? यह प्रेम है, कोई माइंड-गेम तो है नहीं कि समझा ही जाए। बिना समझे भी प्रेम किया जा सकता है।'

मैंने कुछ नहीं कहा।

वह उसी तरह लेटा रहा। फिर बोला, 'पंद्रह साल पहले भी ऐसा ही हुआ था। प्रेम चाहे जैसा भी हो, उसे सफल कह लो या असफल, दीर्घ कह लो या क्षणिक, हर प्रेम अंतत: एक ही बिंदु पर पहुंचता है- 'तुम मुझे नहीं समझ पाए।' हक़ीक़त यह है कि प्रेम का समझ से कोई लेना-देना ही नहीं होता, लेकिन सारा प्रेम अंतत: 'समझ' नाम के इस पिद्दी शब्द में जाकर रिड्यूस हो जाता है। अगर कोई समझदार हो, तो प्रेम करे ही क्यों?'

मैंने फिर कुछ नहीं कहा।

लंबी सांस लेने के बाद वह फिर बोला, 'ना। मैं कभी नहीं मान सकता कि प्रेम कोई माइंड-गेम है, या गणित का सवाल है, जिसे समझना ज़रूरी हो। प्रेम कोई द्वंद्व नहीं है, जिसमें आपका सारा ध्यान सामने वाले की माइंड-रीडिंग करने में ही लगा रहे। इतना जागृत रहकर प्रेम नहीं किया जा सकता।'

मैंने फिर कुछ नहीं कहा।

वह मेरी बग़ल में लेट अपनी उंगलियों से मेरे निप्पल्स को सहला रहा था। उसने अपना हाथ बहुत धीरे-से हटाया। जैसे हटाने में उसे बेतहाशा संकोच हो रहा हो।

वह बोला, 'देखो, इस समय हमारी देह पर कोई कपड़ा नहीं है। हम पर कोई आवरण नहीं है। चादर तक नहीं। हम प्रेम करने के बाद, प्रेम के क्षणों में एक-दूसरे के पास लेटे हैं। फिर भी देखो, इस समय भी हम एक-दूसरे से सहमत नहीं हैं।'
'हां। हम अक्सर नहीं होते', मैंने कहा।

'हम दोनों एक जैसे हैं, फिर भी एक जैसे नहीं हैं।'
'हां। सही कह रहे।

'इस समय मुझे भी लग रहा है कि हम दोनों एक-दूसरे को नहीं समझते, वरना मुझे यह सब कहने की ज़रूरत ही न होती।'
'हां। सही कह रहे हो।'

'सुनो, क्या मैंने तुम्हें खो दिया है?'
'मुझे नहीं पता।'

'क्या मैंने तुम्हें कभी पाया भी था?'
'मुझे नहीं पता।'

पहले वह मुझसे सहमत नहीं था, लेकिन कुछ ही पलों में वह मेरे जैसा हो गया था। इसीलिए वह मुझसे सहमत हो गया।

मैंने उसे किसी चीज़ से न रोका था। इस समय भी मैं उसे किसी चीज़ से नहीं रोक रही।

मैंने उससे यह नहीं कहा था कि मैं दीवारों को राज़ी न करा पाऊंगी। मैंने उसे आखि़री $फैसला लेने से भी नहीं रोका।

कुछ दिनों तक मेरे दरवाज़े पर शाम की घंटी नहीं बजी। एक रोज़ सुबह-सवेरे उसने मुझे एक कैसेट दिया और कहा, 'आधी रात कमरे में जब पूरा अंधेरा हो, तभी इसे सुनना।'

मुझे उन दिनों पूरे अंधेरे से डर लगता था। मैंने बेड के किनारे लैम्प्स को चालू रखा और उसका कैसेट चलाया।

रुको, तुम ख़ुद सुनो। मैं इसे चलाती हूं। सुनो, यह उसकी आवाज़ है। इसे सैकड़ों बार सुनने के बाद मैं यह कह सकती हूं कि हां, वह प्रेम करता था। किसी की आवाज़ में शायरी तभी गूंज सकती है, जब वह प्रेम कर रहा हो। उसकी बस यही बातें मेरे पास हूबहू हैं। यहां एक-एक शब्द उसका कहा हुआ है।'

लो, यह सुनो :

Pic by Kevin Pinardy

लगता है, जैसे मैंने तुम्हें खो दिया। मैं तुम्हें पाना नहीं चाहता था। मुझे पता नहीं था कि तुम कौन हो और दुनिया के किस कोने में बैठी हो? जब फ़ोन पर तुम मुझसे बात कर रही होती हो, तो नज़ाकत से मुस्करा रही होती हो या शातिराना तरीक़े से? लेकिन मैं तुमसे बात करता रहा।
एक दिन मैंने कहा था, बातों-बातों में सब हो जाता है। तब तुमने पलटकर पूछा था, सब मतलब?
मैंने कहा था, सब मतलब सब!
और जवाब में तुम हंस दी थी।
तुम मेरी तरफ़ इस तरह आ रही थी, जैसे मृत्यु आती है। उसका आना तय होता है, लेकिन फिर भी उसके आने के बारे में हमें पता नहीं होता।
तुम्हारा भी आना तय था।
बहुत धीरे-धीरे तुम मेरी तरफ़ आई। नहीं, बहुत रफ़्तार से आई।
सिर्फ़ दो महीने ही तो हुए। दो महीने में तो लोग एक-दूसरे को जान तक नहीं पाते, जबकि तुमसे बात करते हुए मुझे हमेशा ऐसा लगा कि तुम्हें जानने की ज़रूरत भी नहीं है, क्योंकि मैं तुम्हें बहुत पहले से, हमेशा से जानता रहा हूं।
मैं उस दिन से तुम्हें जानता हूं, जब उद्यान में तुमने सेब खाने की जि़द की थी और मैंने उचककर तुम्हारे लिए एक सेब तोड़ा था। उसकी सज़ा हम दोनों को ही मिली थी।
अब जबकि तुम नहीं हो, मुझे लग रहा है, मैंने तुम्हें खो दिया है। तुम्हारे जाने से पहले तक मुझे अहसास भी नहीं था कि मैंने तुम्हें पा लिया है।
जब तक खो जाने का डर न हो, पा लेने की अनुभूति भी नहीं पैदा होती क्या?


यह कैसेट सुनने के बाद मुझे कुछ नहीं हुआ।
मैंने उससे कुछ भी न कहा।

बस, हर सुबह उसकी घंटी बजा देती थी, ताकि वह उठ जाए।
और हर शाम इंतज़ार करती थी कि वह मेरे दरवाज़े की घंटी बजा जाए।

एक सुबह उसकी घंटी बजाई, तो किसी महिला ने दरवाज़ा खोला। उसने बताया कि वे लोग इस मकान के किराएदार हैं। उसने बिना कुछ बोले अपना मकान किराए पर दे दिया था और दूसरी जगह रहने चला गया था।

उस पूरे दिन मैं मुस्कराती रही। बहुत हल्की मुस्कान। वह पता नहीं, मेरे होंठों के कोष में छिपी हुई कौन-सी मुस्कान थी? वह वैसी नहीं थी, जैसा तुम कहते हो, कि मेरे होंठ बने ही ऐसे हैं कि अगर मैं न भी मुस्कराऊं, तब भी लगता है कि मैं मुस्करा रही हूं।

दिन-भर मुस्कराते हुए मैंने कई बार मन ही मन उससे बातें कीं और कहा, 'तुमने मुझे यक़ीन दिला दिया कि कोई भी, मुझे इतने लंबे समय तक प्यार नहीं कर सकता।'

पा लेने की अनुभूति खोने के बाद ही होती है।

उसने बीटल्स की जो कैसेट मुझे दी थी, जिसकी शुरुआत का गाना मिटाकर उसने अपनी आवाज़ रिकॉर्ड की थी, उसी कैसेट में एक गाना है- नॉर्वेजियन वुड।

मैं जब भी उसकी आवाज़ में वह आखि़री संदेसा सुनती हूं, बीटल्स का यह गाना भी ज़रूर सुनती हूं। जॉर्ज हैरिसन का सितार मुझे दुनिया के किसी भी प्रेमी के प्रणय-निवेदन से ज़्यादा भावुक लगता है। गुलाबी प्रेमी का वह संदेस सुनकर पहले मुझे कुछ नहीं हुआ था, लेकिन अब मैं रो पड़ती हूं और जॉर्ज हैरिसन का गिटार सुनकर ख़ुद को सांत्वना देती हूं।

मुझे बीटल्स पसंद आने लगे।


pic - Henri Cartier-Bresson, Martin. 1960.

वह गाना सुनने के बाद मैंने अपनी डायरी में यह लिखा था। इसे लिखने के बाद मैं भी इसे पहली बार पढ़ रही हूं। सुनो :

कविताएं, चिडिय़ों के उडऩे के बाद लिखी जाती हैं।

किसी रोज़ उनकी देह से एक मुलायम-सा पंख टूटकर हमारी गोद में गिरता है। हम उसे बहुत सहेजकर रखते हैं। किताबों के पन्नों के बीच। या अपनी देह की परतों के बीच। हम सोचते हैं कि एक दिन हम इस पंख को अपनी बांह पर लगाएंगे और उड़ जाएंगे।

चिडिय़ा जब तक हमारे सामने होती है, हम इस पंख को भूले रहते हैं।

जिस दिन चिडिय़ा उड़ जाती है, हम उसका यह पंख खोजते हैं। उसके डंठल को स्याही में डुबोकर उसी की कहानी लिखते हैं।
एक छोटी-सी चिडिय़ा की छोटी-सी कहानी।

*


लेकिन सच में, यह कहानी मैंने तो नहीं लिखी थी, इसे ईश्वर ने लिखा था।

कुछ कहानियों को पढऩे-जीने के बाद लगता है कि ईश्वर बहुत नौसिखिया लेखक है। वह साधारण-सी एक कहानी को भी ख़ूबसूरत नहीं बना सकता। इस कहानी में सबकुछ था, एक अच्छा प्लॉट, कुछ अच्छी घटनाएं, दो अच्छे किरदार... बस, उसे यह नहीं पता कि किस घटना को कहां रखा जाए, किस किरदार से क्या बुलवाया जाए। इसीलिए दो लोग जो एक-दूसरे के सर्वश्रेष्ठ प्रेमी हो सकते थे, ईश्वर अपनी कहानियों में उनकी मुलाक़ात बहुत देर से कराता है, या फिर कराता ही नहीं है।

ईश्वर, तुम सच में बेहद ख़राब लेखक हो।

* * *

Author's pic by Sushobhit Saktawat.

( गीत चतुर्वेदी हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ कवि-कथाकार हैं.
उनका अब तक का लेखन यों है : कविता संग्रह 'आलाप में गिरह' 
और दो कहानी संग्रह 'सावंत आंटी की लड़कियां' व 'पिंक स्लिप डैडी' प्रकाशित.
वर्ष 2007 में 'मदर इंडिया' कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार से सम्‍मानित. 
अंग्रेज़ी दैनिक 'इंडियन एक्‍सप्रेस' द्वारा वर्ष 2011 में देश के दस सर्वश्रेष्‍ठ युवा लेखकों में से एक घोषित. 
उनकी कविताओं का आठ से ज़्यादा भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.  
विश्‍व कविता से अनुवाद के कई बहुप्रशंसित काम. 
64 comments:

बेहतरीन बुनावट प्रेम की.प्रेम मे अकेलेपन की महक एक नई प्यास जगा रही है पूरे नावेल को एकबारगी पढ जाने की.


इस छोटी-सी कहानी में प्रेम एक अमूर्त चिड़िया जैसा है जो फुर्र होने के बावजूद मन की मुंडेर पर बार- बार आ बैठता है. दो बिलकुल भिन्न आदतों के लोग प्रेम करते हैं और जब बिछुड़ जाते हैं तो प्रेमिका लम्बे अवसाद में रहने के बाद एक कागज पर माफीनामा लिखकर उसे समुद्र में बहा देती है. ऐसा करके वह स्वयं को प्रेमी के प्रति कटुता और नफरत से मुक्त कर लेती है और जीवन में पुनः प्रेम का स्वागत करने के लिए तैयार हो जाती है. अब की बार वह नेरुदा की पुस्तक उस तक पहुँचाने वाले पडोसी से प्रेम करती है. मगर वे एक दूसरे को समझने का दावा नहीं करते. इसीलिए हर प्रेम अंतत: एक ही बिंदु पर पहुंचता है, 'तुम मुझे नहीं समझ पाए".घनानंद ने भी कहा है कि प्रेम सुध-बुध वाले लोगों का काम नहीं है. प्रेम में खोना और पाना अभिन्न हैं. पा लेने की अनुभूति खोने के बाद ही होती है. प्रेम में असंतोष संजीवनी बूटी की तरह होता है जो लोगों बार-बार जि़ंदा करता है. वह अपने पीछे अनेक सवाल छोड़ जाता है जो ताउम्र पीछा करते हैं. यह प्रेम कथा इतनी संवेदनशीलता से लिखी गयी है, मानो सपने में चल रही हो. गीत ने इसमें संगीत, साहित्य और दर्शन पर भी चर्चा की है. नेरुदा की पुस्तकों को रद्दी में बेच देने वाले लोगों को वह समझते हैं जो श्रेष्ठ का तिरस्कार कर देते हैं.श्रेष्ठ प्रेम स्वीकृत हो ऐसा भी जरूरी नहीं. उसकी अपूर्णता छोटी सी गोटी पर टिके दुखों के पहाड़ का निर्माण कर देती है. प्रचलित उपन्यासों से हटकर बिलकुल अलग शैली के इस उपन्यास का स्वागत है.यह अंश पूरा उपन्यास पढने की उत्सुकता जगाता है. यथाशीघ्र यह पुस्तकाकार छपे और गीत को इससे खूब प्रसिद्धि मिले यही हमारी कामना है.


this too is like a poem each word melts leaving no trace of its taste for it is lived as read, that is the beauty of your writing sir ! manav man ke tehkhano mein uttarkar unhi ka saman unhe pesh kar dete hain , bahut sundar ! this book contains collection of stories ?


geet sir, you have written minute things in such a big way that anybody can connect herself or himself. i have gone through this in one sitting. congrats khub sara for giving us a rich story.


prem ki bunavat ka anootha dhang...


Is rachna me Jo marmsprashi shabdo ka sahaj sahaz andaaz me prayog kia gya h vo prashashniya hai.... Mujhe to ise padhne me ek ghanta lag gya.... Aisi panktiyan likhi gyi h Jo khud ko baar baar duharaye bagair aage padhne ki ijazat hi nhi deta.....


Is rachna me Jo marmsprashi shabdo ka sahaj sahaz andaaz me prayog kia gya h vo prashashniya hai.... Mujhe to ise padhne me ek ghanta lag gya.... Aisi panktiyan likhi gyi h Jo khud ko baar baar duharaye bagair aage padhne ki ijazat hi nhi deta.....


mujhe chhote ansh nahi padhne....seedhe novel kareedkar padhhoongi ...lekin usme geet ke signature kaise milenge ?


Behtarein....... izzz touchy and soulfulll as welll.....


behad umdaaaaaaaaaaaaaaaa hai tiny-mini story.....


Awesome!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


poori khani inhi do wakyo me simat jati hai...behtreen!! Ek sher yaad aa gaya..."Tere aane me aur jane me, humne sadiyo ka faasla dekha"


do hi waqt gujre hain qaatil ham pe sari umra me,ek tere aane se pehle ek tere jane ke baad...................


जिस प्रेम में आपके पास सिर्फ सवाल होते हैं, वह प्रेम ताउम्र आपका पीछा करता है।

किसी के छोड़ जाने पर मुस्कराने का साहस शायद प्रेम का ही एक अद्भुत स्वरूप है ...

बहुत ही सुन्दर दुनिया बुनी है आपने प्रेम की ...

सबद पर जाने के बाद आने का मन नही करता ... बहुत कुछ रह जाता हैं वहीं पर ......


kya kahoon shabd hi nahi rah jate hen ...mere paas ....aapko padhkar...shukriya


Bahut badhiya....geet sir.


उद्हरण सुन्दर है ,बधाई


सुन्दर है ,बधाई ..


हर प्रेम अंतत: एक ही बिंदु पर पहुंचता है- 'तुम मुझे नहीं समझ पाए।' हक़ीक़त यह है कि प्रेम का समझ से कोई लेना-देना ही नहीं होता, लेकिन सारा प्रेम अंतत: 'समझ' नाम के इस पिद्दी शब्द में जाकर रिड्यूस हो जाता है। अगर कोई समझदार हो, तो प्रेम करे ही क्यों?'.......dil ki gehrai ko chu gai.........badhai ho.....


bahut bahut badhiya! pratiksha me hoon.


Bahut sundar likh raha hai Geet....


जाओ, मैंने तुम्हें माफ़ किया।
आ जाओ, कि मैंने तुम्हें माफ़ किया...


उकताहट,माफी,आमंत्रण...। उम्दा


show case of your novel is very interesting ...leads to read to last.


Lovely .......leaves u wondering .


Bahut bada dil hai ki bas sab maaf ho gaya ,aao to bhi ya jao to bhi! !!!eccentricity of love !!


umda prem apne yovan ke poorna madhurya par hai....sachha prem...amar, aloukik , apoorna.....


kahani apne poorna madhurya par hai, ek sachha prem - amar, alaukik, apoorna....ati sundar geet ji...abhootpurva bhent hai hindi sahitya ko apki..avismarniya....


Adbhut..adbhut adbhut....is kahani main ruh ko mehsus kiya ja sakta hai....


Adbhut..adbhut adbhut....is kahani main ruh ko mehsus kiya ja sakta hai....


bahut khoob , khoob badhai...


आपका लिखा तो बिना अपने पढ़वाए मानता ही नहीं. कहीं गीत चतुर्वेदी का लिखा हो तो अपने को रोक पाना लगभग असंभव हो जाता है पढ़ने से. बहुत बहुत बधाई व आने वाले उपन्यास के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएँ Geet भाई!


Hum apke ranikhet express ka besabri se entjar kar rahe hai


असंतोष संजीवनी बूटी की तरह होता है। aapne ek panti mai poore jivan ka satya uker kar rakh diya...


एक प्रेम कहानी में प्रेम पर इतनी सारी कोटेशंस शायद ही कहीं देखने को मिलें.घटना मन में अधिक घटती है. असफल होने के बावजूद प्रेम में विश्वास रखना जरूरी है . प्रेम करते हुए भी प्रेमी असहमत रहते हैं और एक दूसरे को समझ नहीं पाते हैं.. बिछुड़ जाने के बाद अनुभूति होती है कि जिसे पा लिया था वह कितना अमूल्य था. यही उतार की लय है.ओशो ने कहा है 'प्रेम इस पार से उस पार ले जाता है'.सच है प्रेम हमें किसी और के जीवन से घनिष्ठता से जोड़ देता है. प्रेम स्मृतियों की धरोहर है . बहुत खूबसूरती से बुनी गयी कोमल प्रेमकथा .बाकी उपन्यास में ऐसी और कहानियां पढने का इंतजार है.


बढ़िया लिखा है। बढ़िया।


how emotional ,ek ek shabd jeewan ke such me piroya hua


aapne Nirmal verma ki yad dila di...........pkka padhna hai mujhe ye upnyas


athah gehrayi liye chand shabd chhand me bandhey..


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