Saturday, March 30, 2013

रानीखेत एक्‍सप्रेस - दूसरा अंश - गीत चतुर्वेदी


[युवा कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का उपन्‍यास 'रानीखेत एक्‍सप्रेस' शीघ्र प्रकाश्‍य है. 
सबद पर इससे पहले इस उपन्‍यास का एक अंश प्रकाशित हो चुका है. यह दूसरा अंश-]

Pic by : Henri Cartier-Bresson, Romania, 1975.


जिस समय मुझे चाय चाहिए थी, जि़ंदगी ने मेरे सामने डिनर रख दिया। और जिस समय डिनर चाहिए था, उस समय चाय रख दी।

अब सूरज कोई मेरा ससुरा तो है नहीं कि आधी रात उग आए और कहे, तुम चाय पी सको, इसलिए मैंने उगने का अपना समय बदल लिया।

यह एक छोटी-सी कहानी है। एक छोटी-सी चिडिय़ा की छोटी-सी कहानी। काश, ये एक लंबी कहानी होती, उम्र से लंबी एक कहानी, तब शायद यह बहुत सुंदर होती।

छोटी कहानियां जल्दबाज़ होती हैं। वे अपनी उम्र को जल्दी-जल्दी जीती हैं, वे ख़त्म होने का इंतज़ार नहीं कर पातीं, बस, जल्दी से ख़त्म हो जाना चाहती हैं।

हा हा। हड़बड़े पुरुषों के शीघ्र-स्खलन की तरह।

पर छोटी कहानियां अपने असंतोष के कारण बची रह जाती हैं। होता यह है कि कई बार लंबी कहानियां आपको इतना संतुष्ट कर देती हैं कि आप उन्हें भूल जाते हैं। जबकि छोटी कहानियां आपको इस क़दर असंतोष देती हैं कि आपकी स्मृति से चिपक जाती हैं।

असंतोष संजीवनी बूटी की तरह होता है। आपको बार-बार जि़ंदा करता है।

इस कहानी में चीज़ें बहुत जल्दी-जल्दी घटित हुईं। उन घटनाओं में कोई तारतम्य न रहा। इसलिए इसके दोनों किरदारों को ज़रा-भी संतोष न मिला। जबकि घटनाएं ऐसी थीं कि अगर तारतम्य में होतीं, तो जीवन बेहद सुंदर बन जाता।

यह प्रेम उस तरह है, जैसे दो लोग, दो अलग-अलग महाद्वीपों में रहकर एक-दूसरे से प्रेम करते हों। मान लो, लड़का भारत में रहता हो और लड़की अमेरिका में। जब एक के यहां दिन होगा, तब दूसरे के यहां रात होगी। जब एक रोना चाहेगा, तब दूसरे को हंसी आ रही होगी। जब एक सोना चाहेगा, तब दूसरा सुबह उठकर काम पर जाने की तैयारी कर रहा होगा।

ना। हंसना मत। हममें से ज़्यादातर लोग ऐसा ही प्रेम करते हैं। कंप्यूटर की भाषा में कहूं, तो सिन्क नहीं होता।

*

वह मुझसे बीस साल बड़ा था, जबकि वह ख़ुद अपनी उम्र से दस साल बड़ा दिखता था। अगर हम दोनों साथ खड़े हो जाएं, तो हमारे बीच बीस जोड़े दस बराबर तीस साल का फ़ासला साफ़ दिखने लग जाए।

मैं निर्वाना सुनती थी, वह बीटल्स सुनता था। मुझे पियर्स ब्रोसनन पसंद था, वह शॉन कॉनरी से आगे बढ़ता ही नहीं था। मैं जूलिया रॉबर्ट्स की तरह बाल कटाती थी, वह चाहता था, मैं विवियन ली की तरह उंगलियां दबाते हुए बात करूं।

मैं उसे रंगीन फिल्म की तरह देखती थी।

वह मुझे ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा की तरह देखना चाहता था। वो भी साइलेंट वाला।

मुझे कभी-कभी हंसी आ जाती थी। महसूस होता कि हम प्रेम कम कर रहे हैं, बल्कि टीवी का रिमोट छीन लेने के लिए लड़ रहे हैं।

मैं कहती, 'तुमसे बात करते समय लगता है, मैं अपने पिताजी से बहस कर रही हूं।'
वह कहता, 'अगर तुम मेरी बेटी होती, तो मैं तुम्हारी पिटाई कर देता।'

उस दौरान मुझे पहली बार लगा, प्यार में भी जनरेशन गैप होता है।

*
Pic by Katerina Lomonosov.
इगतपुरी के विपश्यना केंद्र से लौटने के बाद मैं बेहद टूटी हुई थी। मेरे सिवाय इस टूटन को हर कोई स्वीकार कर चुका था। मैं उस पुराने मकान में न रह पाई। वहां अब सभी यह जानने लगे थे कि मेरे साथ क्या हुआ है। इगतपुरी ने मेरे भीतर को शुद्ध किया था, लेकिन मैं जिस समाज में रहती थी, उसे शुद्ध करने के लिए कोई विपश्यना अभी तक ईजाद नहीं हो पाई है।

मेरा उस बिल्डिंग में रहना दूभर हो गया था। जब मैं कॉलेज से लौटकर आती, तो बिल्डिंग के अहाते से लोग मुझे घूरना शुरू कर देते। वे मेरी आंखों में देखते, ऊपर से नीचे तक देखते, मेरी चाल देखते, जैसे कि वे ड्रग्स के निशान खोज रहे हों।

जो मनचले थे, वे वहीं सीढिय़ों पर मेरे साथ संभोग कर लेना चाहते थे।

और कुछ ने मेरे साथ अतिरिक्त सहानुभूति दिखानी शुरू कर दी थी, ताकि वे मेरी दहलीज़ में प्रवेश कर सकें।

सभी जानते थे कि मैं अकेली रहती हूं।

वे हर संभव कोशिश करते कि मैं मदपुरुष को भूल ही न सकूं। शायद वे सब उसके ज़रख़रीद थे। मैं उन सबसे दूर हो जाना चाहती थी।

मैं वहां से इस फ्लैट में आ गई। यहां अकेलेपन का अहसास बहुत तेज़ी से हुआ। मैं बार-बार उस नींद में चली जाना चाहती थी, जो किसी के प्रेम में डूबे होने पर मिलती है। लेकिन सच तो यह है कि मैं प्रेम करने की कल्पना से भी डरने लगी थी। लोगों को प्रेम करता देख मैं अचरज में आ जाती थी। सोचती, अभी कुछ दिनों बाद ये अलग हो जाएंगे और प्रेम से ज़्यादा पीड़ा के पड़ोस में रहेंगे।

तब मुझे पहली बार यह अहसास हुआ कि प्रेम एक असंभव परिकल्पना है।

सोने से पहले टेबल लैंप जलाती, बुझाती, फिर जलाती। जलता छोड़ देती। लेटे-लेटे अपने जीवन में आए सभी प्रेमियों को याद करती। बहुत धीमे-से बुदबुदाते हुए उनके नाम का उच्चारण करती, ताकि पहले के नाम की वर्तनी, कहीं दूसरा न जान ले। कभी-कभी मैं इतनी बार उनका नाम लेती कि लगता, मैं कोई मंत्र पढ़ रही हूं। निद्रा की देवी की स्तुति में पढ़ा गया मंत्र।

अपने जीवन के सारे प्रेमियों के नामों को बिना रुके, एक साथ दोहरा कर देखना कभी, ऐसा लगेगा, प्रेम-रोग भगाने वाला मंत्र पढ़ रहे हो।

उसी समय मैं मदपुरुष के बारे में सोचती। वह ऐसा प्रेम था, जिसमें मेरे पास सिर्फ़ सवाल ही सवाल थे, जवाब एक भी नहीं था। हर सवाल का अंत एक ही तरह होता था: क्यों? आखि़र क्यों?

जिस प्रेम में आपके पास सिर्फ़ सवाल होते हैं, वह प्रेम ताउम्र आपका पीछा करता है।

जिस तरह मदपुरुष रोज़ मेई-हुआ की हत्या कर देना चाहता था, उसी तरह मैं भी हर रोज़ योजना बनाया करती थी कि किसी तरह मैं मदपुरुष को माफ़ कर दूं। गुनहगार वह था, लेकिन ग्लानि में मैं रहती थी। मैं कल्पनाएं करती थी कि कहीं से कोई करिश्मा हो जाए और क़ुदरत उसे बेगुनाह साबित कर दे।

एक रोज़ मैं ख़ुद से ही थक गई।

आधी रात मैं नींद की मंझधार से उठी। टेबल लैंप ऑन किया। दराज़ में उंगलियां टटोलीं। नोटपैड निकाला। फिर दराज़ को टटोलने लगी। क़लम नहीं मिल रही थी। अपना पर्स खंगाला। उसमें भी क़लम नहीं थी। नींद की ख़ुमारी में झल्लाते हुए मैंने काजल की पेंसिल उठा ली।

पीली रोशनी में टेबल पर झुककर मैंने एक काग़ज़ पर लिखा। काजल की नोंक पतली नहीं थी। इस नाते सिर्फ़ पांच शब्दों में पूरा पेज भर गया। मैंने दूसरा पेज खोला और उस पर भी लिखा। इस बार मैंने शब्दों के आकार का ध्यान रखा। इस पेज पर सात शब्द लिख लिए गए।

फिर पेज नंबर लिखा। पहले पन्ने पर पेज 1 और दूसरे पन्ने पर पेज 2। फिर क़रीने से उन्हें स्टैपल कर दिया। वह मेरे जीवन की सबसे छोटी कहानी है। सिर्फ़ दो पंक्तियों की। कोई उसे पढ़ेगा, तो वह ऐसे बनेगी :

जाओ, मैंने तुम्हें माफ़ किया।
आ जाओ, कि मैंने तुम्हें माफ़ किया।

Pic by Henri Cartier-Bresson. San Fransisco. 1960

मैंने दोनों पन्नों को गोल किया। उसे ऑस्ट्रेलियन शिराज़ पसंद थी। मैंने वह बोतल खोजी। किसी रात पीने के बाद मैंने पलंग के नीचे लुढ़का दी थी। उन काग़ज़ों को उस बोतल में डाला और बोतल को अपने पर्स में।

उसके बाद मुझे बहुत गहरी नींद आई। इतनी गहरी कि मैं सुबह कॉलेज जाने के समय उठ ही नहीं पाई। जागने में दोपहर हो गई। बहुत इत्मीनान से तैयार होकर मैं नरीमन पॉइंट पर उसी जगह पहुंची, जहां पहली बार मदपुरुष से मुलाक़ात हुई थी।

वहां मेरे बैठने का कोई निशान न था। वहां उसके होने का भी कोई निशान न था।

मैं थोड़ी देर तक वहीं बैठी रही। मुझे अरब सागर से कोई शिकायत न थी। वह भी हमेशा की तरह ठाठें मार रहा था। मेरा और उसका रिश्ता बल खाती लहरों और उफनते झाग का रिश्ता था।

मैं देख रही थी कि लहरें हर चीज़ को किनारे पर ले आ रही थीं। मुझे यह जगह सही नहीं लगी।

वहां से मैं गेटवे ऑफ़ इंडिया गई। फिर वहां से एलीफेंटा जाने वाली फेरी में बैठ गई। जब वह समंदर के ऐन बीच में थी, मैंने अपने पर्स से बोतल निकाली। बिना किसी की ओर देखे मैंने बहुत धीरे-से उसे पानी पर छोड़ दिया। इतनी नज़ाकत से, मानो बोतल अगर ज़ोर से गिरी, तो पानी से टकराकर टूट जाएगी।

फेरी एलीफेंटा पहुंची, तो मैं अपनी जगह से हिली भी नहीं। उसी सीट पर बैठे-बैठे मैं लौट आई। मैंने अपना संदेश बीच धार छोड़ा था, ताकि वह लौटकर नरीमन पॉइंट के ही तट पर न आ जाए।

एक पानी, दूसरे पानी से बात करता है। मेरा संदेसा पानी पहुंचाएगा। भटकता हुआ अरब सागर का पानी कभी तो हांगकांग की खाड़ी तक पहुंचेगा, कभी तो मकाऊ के किनारों की रेत को छुएगा। वह चीन के पानी में घुले इस मुंबइया पानी को पहचान लेगा। मैं दो पंक्तियों की अपनी कहानी उसमें छोड़ आई हूं।

जाने कैसी कि़स्मत लिखाकर लाई हैं मेरी कहानियां कि वे हमेशा खारे समंदरों में ही तैरती हैं। मैं मीठे पानी की मछली रचना चाहती हूं।

जाओ, मैंने तुम्हें माफ़ किया।
आ जाओ, कि मैंने तुम्हें माफ़ किया।


 *

Pic by Jean Loup.
जीवन में एक चीज़ कभी नहीं सोचनी चाहिए, वह यह कि - मैं अब से प्रेम नहीं करूंगी।

ऐसा सोचना प्रेम की देवी अफ्रोडाइटी को नाराज़ करने जैसा है। आप जितनी बार दुबारा प्रेम न करने के बारे में सोचेंगे, फिर से प्रेम में पड़ जाने की संभावनाओं को बलवती करेंगे।

अफ्रोडाइटी, प्रेम की सृष्टि को इसी क़दर, नाइंसाफि़यों से ही चलाती है।

उस शाम जब मैं अपने घर की सीढिय़ां चढ़ रही थी, मुझे यह व्यक्ति मिला, जो मेरा गुलाबी प्रेमी बनेगा। जैसा कि मैंने इस कहानी के शुरू में बताया, वह वैसा ही था। मुझसे भी लंबा।

मिलते ही उसने कहा, 'आपके नाम एक वीपीपी आया था। डाकिया लौट रहा था, तो मैंने छुड़ा लिया। यहां है।'

मैंने उसी के सामने लिफ़ाफ़ा खोला। उसमें नेरूदा की किताब थी: 'ट्वेंटी लव पोएम्स एंड अ सॉन्ग ऑफ़ डिस्पेर'। जब तक मैं किताब पलट रही थी, वह मेरे दरवाज़े पर ही खड़ा था। एकदम चुप। मेरे लिए वह अनुपस्थित था। मैं पतली-सी उस किताब के भीतर उपस्थित थी।

जब मुझे उसका ख़याल आया, मैंने देखा, उसका पूरा ध्यान किताब पर था। मैं उसे भीतर ले आई। उसने दरवाज़ा खुला ही रखा।

जब तक मैं भीतर से पैसे लेकर आती, वह किताब पलट रहा था। अब उसके लिए मैं दृश्‍य से अनुपस्थित थी।
उसने लेखक के नाम पर उंगली रखकर कहा, 'ये राइटर है?'
मैंने कहा, 'हां।'
'बंगाली है या पोर्चुगीज़?'
किताब के पहले ही वरक़ पर नेरूदा का परिचय लिखा था। मैंने उसे दिखाया। उसने यह भी नहीं देखा, तो अब तक किताब क्यों पलट रहा था?
झेंपते हुए उसने कहा, 'मुझे लगा, बंगाली होगा, उनमें भी हर नाम के आगे 'दा' लगा होता है न। मोनूदा, सोनूदा, वैसे ही नेरूदा।'
मुझे उसके चुटकुले पर ज़रा भी हंसी नहीं आई। वह और झेंप गया। फिर कहा, 'मुझे पंद्रह साल से ज़्यादा हो गया, आखिरी बार कोई किताब पढ़े।'
मैं मुस्करा दी। जैसे किसी ने यह कहा हो, मुझे पंद्रह साल से ज़्यादा हो गया, आखि़री बार सांस लिए।

मेरी तरह वह भी अकेला रहता था। मेरी तरह वह भी अकेलेपन को नकारता रहता था। मेरी तरह वह भी अपने सिवाय सबकुछ को अनुपस्थित मानता था। मेरी तरह वह भी झूठा था।

तीन दिन बाद मेरे दरवाज़े की घंटी बजी। सामने वह खड़ा था। उसके हाथ में दो किताबें थीं। एक 'इस्ला नेग्रा' और दूसरी 'कांतो जनरल'। दोनों नेरूदा की थीं।
उसने कहा, 'यह आपके लिए?'
मैंने कहा, 'अरे! यह कहां से ले आए?'
उसने बताया, 'मेरी दुकान के बग़ल में ही रद्दी की एक बहुत बड़ी दुकान है। उसके पास से ले ली। दरअसल, मुझे लेखक का नाम याद रह गया था। मैंने उससे यूं ही पूछा कि नेरूदा की कोई किताब है? तो उसने ये दोनों दे दीं।'
'अच्छा? रद्दी वाला नेरूदा का नाम जानता है?'
'मुझे नहीं पता, लेकिन उसने यही कहा कि यह? यह तो आसानी से मिल जाता है। अक्सर इसकी किताबें उसके पास आ जाती हैं।'

दरवाज़े पर खड़े होकर कही गई उस बात ने जैसे मेरे ऊपर से टनों भारी बोझ हटा दिया हो। मैं एकदम हल्की हो गई। हवा जितनी हल्की। मेरे चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं आई, दुख आया, लेकिन इसी दुख ने मुझे हल्का कर दिया। जैसे दुख की गोटियों से बना हुआ एक पहाड़ हो। दुख की सबसे छोटी गोटी, सबसे नीचे बुनियाद में है। उस सबसे छोटी गोटी को बुनियाद से हटा दो, पूरा पहाड़ भसक कर गिर जाएगा। हम ताउम्र इसी गोटी को पहचानने से इंकार करते हैं।

मेरे चेहरे पर जो दुख आया था, वह यही था- दुख की सबसे छोटी गोटी।

दुख की यह सबसे छोटी गोटी मुझसे कह रही थी-- 'अगर लोग नेरूदा की किताबों को भी रद्दी में बेच सकते हैं, तो तुम्‍हारी क्या बिसात है? फिर तो कोई भी, कभी भी, किसी को भी रद्दी में निकाल सकता है। कोई भी, किसी को भी प्रेम में धोखा दे सकता है। उसके प्रेम को इस्‍तेमाल की हुई एक सुंदर किताब की तरह बेच सकता है, ताकि उसे कोई दूसरा पढ़ ले। किताबों को रद्दी में किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं बेचा जाता। वैसे ही किसी के प्रेम को बेच खाना व्‍यवसाय नहीं होता, ब‍स सीने पर से एक बोझ हटाने जैसा होता है।'

नेरूदा की किताबों को देखते हुए मैंने सोचा, सर्वश्रेष्ठ का वरण ही नहीं होता, उसका उतना ही तिरस्कार भी होता है।

उस पल मैं यह भूल गई थी कि प्रेम में धोखा खाना भी कोई दुख है। उस भूल जाने ने मेरे मन पर पड़े वज़न को कम कर दिया।

इस तरह वह गुलाबी प्रेमी, नेरूदा के ज़रिए मेरे जीवन में आया।

*

Pic by Andre Kertesz.

वह मेरी बग़ल में ही रहता था। उससे मिलना आसान था। लेकिन हम बहुत देर तक दरवाज़े पर खड़े होकर बातें नहीं कर सकते थे। बहुत देर तक दरवाज़ा खुला रखकर, सोफ़े पर बैठकर भी नहीं। तो उसने बग़ल के फ्लैट से मुझे फ़ोन करना शुरू कर दिया।

वह कई बार कहता, 'किसी भी लड़की के लिए इतना आकर्षण महसूस किए मुझे पंद्रह साल से ज़्यादा हो गए।'

उसे बोलने की झक थी। अगर वह एक बार बोलना शुरू हो जाए, तो आप कुछ नहीं कर सकते। उसका बोलना बड़े नींबू की तरह था, जिसे बहुत ज़ोर लगाकर निचोड़ा जाए, तो ही एक बूंद रस गिरेगा। यानी वह जितने भी शब्‍द बोलता था, उनमें से बहुत कम रस टपकता था।

मैं इंतज़ार करती रहती कि कब वह एक बूंद गिर जाए। कई बार यह इंतज़ार पूरा भी नहीं होता था। मैं ऊबकर विदा कह देती। फिर भी हर शाम घर पहुंचने के बाद एक तय समय पर मैं इंतज़ार करती थी कि अब दरवाज़े पर घंटी बजेगी।

मैं अपना इंतज़ार नहीं जता पाती थी। उसने दो-तीन घंटी नहीं बजाई और मैंने उससे पूछा भी नहीं, जबकि वह पूछे जाने की उम्मीद में था। मैं चाहती थी कि मुझे उसकी ख़बर मिल जाए, लेकिन मैं इस इच्छा को प्रकाशित नहीं करती थी।

तीन दिन नागा करने के बाद उसने फिर शाम को घंटियां बजानी शुरू कर दीं। मुझे अच्छा लगा। पर मैंने यह अच्छा लगना भी उसे नहीं बताया।

मैं हर सुबह कॉलेज जाने से पहले उसकी घंटी बजा देती थी, ताकि वह उठ जाए। वह अलार्म से नहीं उठ पाता था। इसलिए चार-पांच बार लगातार कॉलबेल बजानी होती थी। घंटी बजाकर मैं कॉलेज चली जाती थी। पीछे वह उठता, तैयार होता, और अपनी दुकान पर चला जाता था।

जब उसने तीन दिन का नागा किया था, उसके ठीक सात रोज़ बाद मैंने भी तीन दिन का नागा कर दिया। मैं चाहती थी कि वह शाम को मुझसे पूछे कि सुबह मैंने घंटी क्यों नहीं बजाई। पर उसने भी नहीं पूछा। उसने भी मेरी तरह सोचना शुरू कर दिया था।

इस तरह हम दोनों एक-दूसरे से उम्मीद करते थे और उम्मीद का टूटना नहीं बताते थे।

बिना शिकायत किए प्रेम को समझा भी नहीं जा सकता।

फिर भी वह कहता था, 'मैं किसी से कोई उम्मीद नहीं करता। दरअसल, किसी से भी उम्मीद किए हुए मुझे पंद्रह साल से ज़्यादा हो गए।'

*

Pic by Diana Catherine.

रात को टेलीफ़ोन पर बात होते-होते हम धीरे-धीरे पर्सनल होते गए। हम क्या, वह होता गया। एक रात उसने सीधे पूछ लिया, 'क्या इस समय मैं तुम्हारे फ्लैट में आ सकता हूं?'
मैंने कहा, 'नहीं।'
उसने कहा, 'पूरी बिल्डिंग सो रही होगी। मैं कॉलबेल भी नहीं बजाऊंगा। तुम दरवाज़ा थोड़ा-सा खुला रख दो, मैं चुपके से आ जाऊंगा।'
मैंने कहा, 'नहीं।'
उस समय मेरे पीरियड्स चल रहे थे। और तब वे बहुत दर्दनाक दिन होते थे।
दरअसल, मुझे कहना था, 'आज नहीं।' मैं 'आज' शब्द भूल गई थी।
'नहीं' और 'आज नहीं' में कितना बड़ा फ़र्क़ होता है, मुझे बाद में समझ आया।


एक रोज़ मैंने उसे बताया, 'मुझे गुलाब बहुत पसंद हैं।'

वह मेरे लिए गुलाबी रंग का गुलाब ले आया। मैंने धीरे से कहा, 'मुझे तो लाल पसंद है।'

वह गुलाबी रंग का गुलाब वापस ले गया।

उस रात उसने फ़ोन पर कहा, 'जब मैं तुम्हारी उम्र में था, तब मुझे भी लाल गुलाब पसंद था। लाल रंग जब एकदम घिस जाता है, तब उसका रंग गुलाबी हो जाता है। इस उम्र में मैं तुम्हें सिर्फ़ गुलाबी रंग दे सकता हूं।'

मैंने कहा, 'गुलाबी टीनएज का रंग है। तुम्हारी उम्र का नहीं।'

उसने कहा, 'दुनिया पागल है। जब सूरज उगता है, तब भी वह वैसा ही दिखता है, जैसा वह ढलते समय दिखता है। केवल तस्वीर देखकर आप सूर्योदय और सूर्यास्त का फ़र्क़ नहीं बता सकते। उसके लिए यात्रा करनी पड़ती है। अगर आपने दिन-भर यात्रा की है, तो आप सूर्यास्त को सूर्यास्त की तरह पहचानेंगे। और अगर रात-भर यात्रा की है, तो सूर्योदय को सूर्यास्त मानने की ग़लती नहीं करेंगे।'

गुलाबी मेरे लिए नज़ाकत का रंग था। उसकी व्याख्या ने मेरी परिभाषा को हिला दिया।

*

Pic by Jean Loup. Rains.


उसने सिर्फ़ एक बार ही अपनी उम्मीद मुझसे बताई थी। तब हम बांद्रा स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर बैठे थे। आसपास रोज़ के लोगों के भीड़ थी। सामने से कोई ट्रेन धड़धड़ाते हुए गुज़र जाती।

उसने मुझसे पूछा, 'मैं तुम्हारे कंधे पर सिर रख लूं?'

मैं मुस्करा दी। उसने मेरे कंधे पर सिर रख लिया और दूर देखने लगा।

तभी धड़धड़ाती हुई एक ट्रेन गुज़री। उसके शोर के बीच मेरे कानों में फुसफुसाहट की एक आवाज़ आई, 'आय लव यू!'

मैंने हैरान होकर उसकी ओर देखा। ट्रेन अभी पूरी तरह गुज़री नहीं थी। वह उसी तरह मेरे कंधे पर सिर रखे हुए था, लेकिन वह सीढिय़ों की तरफ़ देख रहा था।

मैंने उससे पूछा, 'तुमने कुछ कहा?'

उसने कहा, 'नहीं तो। मैं तो उन लोगों को देख रहा हूं।'

मैं उसे बहुत देर तक देखती रही। सच में, उसने कुछ नहीं कहा होगा, लेकिन शायद मेरे कान उस समय यही सुनना चाहते थे।
काश! वह शरारत में ही कह देता।

दूर एक दंपति सीढिय़ां उतर रहा था। पुरुष की उम्र लगभग सत्तर साल होगी और स्त्री की उम्र पचास के आसपास। पुरुष के हाथों में छड़ी थी। वह कांपते हुए चल रहा था। उसके कंधे झुके हुए थे। स्त्री ने उसे सहारा दे रखा था। वह हर सीढ़ी पर उसका हाथ मज़बूती से पकड़े हुए थे। वे एक-एक क़दम नाप कर उतर रहे थे। हर दूसरे क़दम पर पुरुष ठिठक जाता। फिर वह अपनी स्त्री की तरफ़ देखता। स्त्री उसे देख मुस्करा उठती। जवाब में पुरुष बहुत हौले-से मुस्कराता। उसकी मुस्कान में थोड़ी-सी बेबसी थी। स्‍त्री दूसरे हाथ से उसके कंधे को सहलाती। दोनों सीढ़ी उतरने लगते। स्त्री उसका हाथ और मज़बूती से पकड़ लेती।

उन्हें देखकर लग रहा था, उतार में भी लय होती है। उनके चलने में ऐसी भव्यता और कोमलता थी कि बांद्रा जैसे व्यस्त स्टेशन की सीढिय़ों पर भी लोग उनसे दो हाथ दूर ठिठक जाते, किनारे हटकर उनके लिए जगह बना देते।

उसने कहा, 'मैं उन दोनों को देख रहा हूं। पता नहीं, कितने बरसों का साथ होगा इनका, लेकिन उम्र के इस दौर में भी जब बूढ़ा अपनी स्त्री को देखता है, तो वह उसके देखने का स्वागत मुस्कान से करती है। यह बूढ़ा इस स्त्री से बहुत प्रेम करता होगा, तभी इस स्त्री के चेहरे पर मुस्कान बची हुई है। इतने लंबे साथ के बाद भी। इस उम्र में भी। किसी के चेहरे पर इस उम्र में भी मुस्‍कान बची रहे यानी उसका साथी उससे बहुत प्रेम करता है।'

मैं कुछ न बोली। मैं उस दंपति को चलता देखती रही।

उसने कहना जारी रखा, 'मैं चाहता हूं कि जब मैं उतना बूढ़ा होऊं, तो तुम इसी तरह, बहुत संभाल-संभालकर मुझे एक-एक क़दम नीचे उतारो। मृत्‍यु के गंगा-घाट पर मैं तुम्‍हारा हाथ पकड़कर उतरना चाहता हूं, एक-एक सीढ़ी।'

मुझे कोई जवाब न सूझा। हर बात का जवाब नहीं होता। कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने कहा, 'मुस्कराने में चेहरे की 34 मांसपेशियों का प्रयोग होता है। मुझे नहीं पता, तब तक उन सबमें इतनी क़ूवत बची रहेगी। चार मांसपेशियां भी कमज़ोर हुईं, तो हमारी मुस्‍कान का आकार बदल जाता है।'

उसने कुछ नहीं कहा। बहुत धीरे-से अपना सिर उसने मेरे कंधे से हटा लिया। जैसे हटाने में उसे बहुत संकोच हो रहा हो।

मैंने गला साफ़ किया और थोड़ी साफ़ आवाज़ में कहा, 'यानी मुझे इस बात का यक़ीन ही नहीं है कि कोई इतने लंबे समय तक मुझसे प्यार करता रह सकता है।'

हम आधे घंटे तक वहां चुप रहे। बांद्रा का प्लेटफॉर्म नंबर तीन अपनी भीड़ के वैभव में था। बीच-बीच में प्लेटफॉर्म नंबर एक से शोर उठता। एक पागल औरत दौड़कर यहां से वहां जा रही होती। कुछ मनचले लड़के उसके पीछे दौड़ रहे होते, चीख़कर उसे डरा रहे होते। अचानक बीच में कहीं से किसी कुत्ते के झौंझिया के भौंकने की आवाज़ आती। हम देखते, चार नंबर पर एक पुलिसवाला एक कुत्ते पर डंडा ताने खड़ा है और कुत्ता डरकर भाग भी नहीं रहा, उल्टे पूंछ दबाकर पुलिसवाले पर गुर्रा रहा है।

उठते हुए उसने कहा, 'सिर्फ़ धोखेबाज़ ही यक़ीन दिलाने में मेहनत करते हैं।'

उसके साथ मैं भी उठ गई।

सामने, चार नंबर पर पुलिसवाले ने अपना तना हुआ डंडा नीचे कर दिया था। उसने कुत्ते की पिटाई का विचार त्याग दिया था। कुत्‍ता अब भी सहमा हुआ गुर्रा रहा था।

*

Pic by Henri Cartier-Bresson. Paris. 1960.

अगले रोज़ उसने फ़ोन पर कहा, 'तुम्हें पता है, मैंने पंद्रह बरस बाद किसी महिला के कंधे पर अपना सिर रखा था।'

मैंने उससे पूछा, 'हर चीज़ तुम्हारे साथ पंद्रह बरस बाद ही क्यों होती है? कुछ हुआ था क्या, पंद्रह बरस पहले?'

उसने कहा, 'कुछ नहीं। बस, घूरे के दिन बारह साल में फिरते हैं। ऐसा समझो, मेरे दिन पंद्रह साल बाद फिरे हैं।'

मैं कभी नहीं जान पाई कि पंद्रह साल पहले क्या हुआ था। शायद उसके जीवन में कोई लड़की थी, जिससे उसे अलग हुए पंद्रह साल हो गए हों और इस पूरे वक़्फ़े में वह भरसक प्रेम से दूर भागता रहा हो। प्रेम की किसी भी स्थिति की निर्मिति का निषेध करता रहा हो।

उस रात बिना कुछ बोले उसने मेरे दरवाज़े पर दस्तक दी। उसने अभी-अभी फ़ोन रखा ही था, इसलिए मैं जाग रही थी। मैंने झांककर देखा, वही था। मैं उसे आने से रोक नहीं पाई। मैं उसे किसी चीज़ से रोक नहीं पाई। आज मुझे लगता है कि मैं उसे रोकना भी नहीं चाहती थी।

मैंने उसे किसी चीज़ से न रोका और इसीलिए वह मेरे जीवन में रुका भी नहीं।

उस रात उसने मेरे आगे एक और उम्मीद जताई, 'मैं चाहता हूं, हमारे फ्लैट्स के बीच की ये जो दीवार है, यह टूट जाए। हम दोनों का वन बीएचके फ्लैट जब जुड़ जाएगा, तो थ्री बीएचके फ्लैट बन जाएगा।'

मैंने कहा, 'अगर दीवारें टूटने को राज़ी न हों, तब?'

'तुम राज़ी होगी, तो दीवारें इनकार नहीं करेंगी। तुम पर दीवारों की मर्जी़ थोड़े चलती है।'

'हम्म। मुझे लगता है, मुझ पर दीवारों की ही मर्जी़ चलती है।'

'ना। मुझे ऐसा नहीं लगता।'

'हम्म। मुझे लगता है, हम दोनों ही एक-दूसरे को नहीं समझते।'

'ना। मुझे ऐसा लगता है कि हम दोनों से बेहतर हम दोनों को कोई नहीं समझ सकता।'

'हम्म। हम दोनों बहुत अलग सोचते हैं। जीवन से हम दोनों की उम्मीदें अलग हैं। और हम दोनों दो अलग-अलग युग हैं। जिसे मैं सूर्योदय समझती हूं, उसे तुम सूर्यास्त समझते हो।'

'लेकिन मेरे सामने ऐसी कोई घटना नहीं आई, जिससे यह बात ज़ाहिर हो सके।'

'हम्म। मेरे सामने भी नहीं आई। लेकिन मुझे अंदर से लगता है कि हम दोनों एक-दूसरे को नहीं समझते।'

'तो फिर समझना कोई ज़रूरी है क्या? यह प्रेम है, कोई माइंड-गेम तो है नहीं कि समझा ही जाए। बिना समझे भी प्रेम किया जा सकता है।'

मैंने कुछ नहीं कहा।

वह उसी तरह लेटा रहा। फिर बोला, 'पंद्रह साल पहले भी ऐसा ही हुआ था। प्रेम चाहे जैसा भी हो, उसे सफल कह लो या असफल, दीर्घ कह लो या क्षणिक, हर प्रेम अंतत: एक ही बिंदु पर पहुंचता है- 'तुम मुझे नहीं समझ पाए।' हक़ीक़त यह है कि प्रेम का समझ से कोई लेना-देना ही नहीं होता, लेकिन सारा प्रेम अंतत: 'समझ' नाम के इस पिद्दी शब्द में जाकर रिड्यूस हो जाता है। अगर कोई समझदार हो, तो प्रेम करे ही क्यों?'

मैंने फिर कुछ नहीं कहा।

लंबी सांस लेने के बाद वह फिर बोला, 'ना। मैं कभी नहीं मान सकता कि प्रेम कोई माइंड-गेम है, या गणित का सवाल है, जिसे समझना ज़रूरी हो। प्रेम कोई द्वंद्व नहीं है, जिसमें आपका सारा ध्यान सामने वाले की माइंड-रीडिंग करने में ही लगा रहे। इतना जागृत रहकर प्रेम नहीं किया जा सकता।'

मैंने फिर कुछ नहीं कहा।

वह मेरी बग़ल में लेट अपनी उंगलियों से मेरे निप्पल्स को सहला रहा था। उसने अपना हाथ बहुत धीरे-से हटाया। जैसे हटाने में उसे बेतहाशा संकोच हो रहा हो।

वह बोला, 'देखो, इस समय हमारी देह पर कोई कपड़ा नहीं है। हम पर कोई आवरण नहीं है। चादर तक नहीं। हम प्रेम करने के बाद, प्रेम के क्षणों में एक-दूसरे के पास लेटे हैं। फिर भी देखो, इस समय भी हम एक-दूसरे से सहमत नहीं हैं।'
'हां। हम अक्सर नहीं होते', मैंने कहा।

'हम दोनों एक जैसे हैं, फिर भी एक जैसे नहीं हैं।'
'हां। सही कह रहे।

'इस समय मुझे भी लग रहा है कि हम दोनों एक-दूसरे को नहीं समझते, वरना मुझे यह सब कहने की ज़रूरत ही न होती।'
'हां। सही कह रहे हो।'

'सुनो, क्या मैंने तुम्हें खो दिया है?'
'मुझे नहीं पता।'

'क्या मैंने तुम्हें कभी पाया भी था?'
'मुझे नहीं पता।'

पहले वह मुझसे सहमत नहीं था, लेकिन कुछ ही पलों में वह मेरे जैसा हो गया था। इसीलिए वह मुझसे सहमत हो गया।

मैंने उसे किसी चीज़ से न रोका था। इस समय भी मैं उसे किसी चीज़ से नहीं रोक रही।

मैंने उससे यह नहीं कहा था कि मैं दीवारों को राज़ी न करा पाऊंगी। मैंने उसे आखि़री $फैसला लेने से भी नहीं रोका।

कुछ दिनों तक मेरे दरवाज़े पर शाम की घंटी नहीं बजी। एक रोज़ सुबह-सवेरे उसने मुझे एक कैसेट दिया और कहा, 'आधी रात कमरे में जब पूरा अंधेरा हो, तभी इसे सुनना।'

मुझे उन दिनों पूरे अंधेरे से डर लगता था। मैंने बेड के किनारे लैम्प्स को चालू रखा और उसका कैसेट चलाया।

रुको, तुम ख़ुद सुनो। मैं इसे चलाती हूं। सुनो, यह उसकी आवाज़ है। इसे सैकड़ों बार सुनने के बाद मैं यह कह सकती हूं कि हां, वह प्रेम करता था। किसी की आवाज़ में शायरी तभी गूंज सकती है, जब वह प्रेम कर रहा हो। उसकी बस यही बातें मेरे पास हूबहू हैं। यहां एक-एक शब्द उसका कहा हुआ है।'

लो, यह सुनो :

Pic by Kevin Pinardy

लगता है, जैसे मैंने तुम्हें खो दिया। मैं तुम्हें पाना नहीं चाहता था। मुझे पता नहीं था कि तुम कौन हो और दुनिया के किस कोने में बैठी हो? जब फ़ोन पर तुम मुझसे बात कर रही होती हो, तो नज़ाकत से मुस्करा रही होती हो या शातिराना तरीक़े से? लेकिन मैं तुमसे बात करता रहा।
एक दिन मैंने कहा था, बातों-बातों में सब हो जाता है। तब तुमने पलटकर पूछा था, सब मतलब?
मैंने कहा था, सब मतलब सब!
और जवाब में तुम हंस दी थी।
तुम मेरी तरफ़ इस तरह आ रही थी, जैसे मृत्यु आती है। उसका आना तय होता है, लेकिन फिर भी उसके आने के बारे में हमें पता नहीं होता।
तुम्हारा भी आना तय था।
बहुत धीरे-धीरे तुम मेरी तरफ़ आई। नहीं, बहुत रफ़्तार से आई।
सिर्फ़ दो महीने ही तो हुए। दो महीने में तो लोग एक-दूसरे को जान तक नहीं पाते, जबकि तुमसे बात करते हुए मुझे हमेशा ऐसा लगा कि तुम्हें जानने की ज़रूरत भी नहीं है, क्योंकि मैं तुम्हें बहुत पहले से, हमेशा से जानता रहा हूं।
मैं उस दिन से तुम्हें जानता हूं, जब उद्यान में तुमने सेब खाने की जि़द की थी और मैंने उचककर तुम्हारे लिए एक सेब तोड़ा था। उसकी सज़ा हम दोनों को ही मिली थी।
अब जबकि तुम नहीं हो, मुझे लग रहा है, मैंने तुम्हें खो दिया है। तुम्हारे जाने से पहले तक मुझे अहसास भी नहीं था कि मैंने तुम्हें पा लिया है।
जब तक खो जाने का डर न हो, पा लेने की अनुभूति भी नहीं पैदा होती क्या?


यह कैसेट सुनने के बाद मुझे कुछ नहीं हुआ।
मैंने उससे कुछ भी न कहा।

बस, हर सुबह उसकी घंटी बजा देती थी, ताकि वह उठ जाए।
और हर शाम इंतज़ार करती थी कि वह मेरे दरवाज़े की घंटी बजा जाए।

एक सुबह उसकी घंटी बजाई, तो किसी महिला ने दरवाज़ा खोला। उसने बताया कि वे लोग इस मकान के किराएदार हैं। उसने बिना कुछ बोले अपना मकान किराए पर दे दिया था और दूसरी जगह रहने चला गया था।

उस पूरे दिन मैं मुस्कराती रही। बहुत हल्की मुस्कान। वह पता नहीं, मेरे होंठों के कोष में छिपी हुई कौन-सी मुस्कान थी? वह वैसी नहीं थी, जैसा तुम कहते हो, कि मेरे होंठ बने ही ऐसे हैं कि अगर मैं न भी मुस्कराऊं, तब भी लगता है कि मैं मुस्करा रही हूं।

दिन-भर मुस्कराते हुए मैंने कई बार मन ही मन उससे बातें कीं और कहा, 'तुमने मुझे यक़ीन दिला दिया कि कोई भी, मुझे इतने लंबे समय तक प्यार नहीं कर सकता।'

पा लेने की अनुभूति खोने के बाद ही होती है।

उसने बीटल्स की जो कैसेट मुझे दी थी, जिसकी शुरुआत का गाना मिटाकर उसने अपनी आवाज़ रिकॉर्ड की थी, उसी कैसेट में एक गाना है- नॉर्वेजियन वुड।

मैं जब भी उसकी आवाज़ में वह आखि़री संदेसा सुनती हूं, बीटल्स का यह गाना भी ज़रूर सुनती हूं। जॉर्ज हैरिसन का सितार मुझे दुनिया के किसी भी प्रेमी के प्रणय-निवेदन से ज़्यादा भावुक लगता है। गुलाबी प्रेमी का वह संदेस सुनकर पहले मुझे कुछ नहीं हुआ था, लेकिन अब मैं रो पड़ती हूं और जॉर्ज हैरिसन का गिटार सुनकर ख़ुद को सांत्वना देती हूं।

मुझे बीटल्स पसंद आने लगे।


pic - Henri Cartier-Bresson, Martin. 1960.

वह गाना सुनने के बाद मैंने अपनी डायरी में यह लिखा था। इसे लिखने के बाद मैं भी इसे पहली बार पढ़ रही हूं। सुनो :

कविताएं, चिडिय़ों के उडऩे के बाद लिखी जाती हैं।

किसी रोज़ उनकी देह से एक मुलायम-सा पंख टूटकर हमारी गोद में गिरता है। हम उसे बहुत सहेजकर रखते हैं। किताबों के पन्नों के बीच। या अपनी देह की परतों के बीच। हम सोचते हैं कि एक दिन हम इस पंख को अपनी बांह पर लगाएंगे और उड़ जाएंगे।

चिडिय़ा जब तक हमारे सामने होती है, हम इस पंख को भूले रहते हैं।

जिस दिन चिडिय़ा उड़ जाती है, हम उसका यह पंख खोजते हैं। उसके डंठल को स्याही में डुबोकर उसी की कहानी लिखते हैं।
एक छोटी-सी चिडिय़ा की छोटी-सी कहानी।

*


लेकिन सच में, यह कहानी मैंने तो नहीं लिखी थी, इसे ईश्वर ने लिखा था।

कुछ कहानियों को पढऩे-जीने के बाद लगता है कि ईश्वर बहुत नौसिखिया लेखक है। वह साधारण-सी एक कहानी को भी ख़ूबसूरत नहीं बना सकता। इस कहानी में सबकुछ था, एक अच्छा प्लॉट, कुछ अच्छी घटनाएं, दो अच्छे किरदार... बस, उसे यह नहीं पता कि किस घटना को कहां रखा जाए, किस किरदार से क्या बुलवाया जाए। इसीलिए दो लोग जो एक-दूसरे के सर्वश्रेष्ठ प्रेमी हो सकते थे, ईश्वर अपनी कहानियों में उनकी मुलाक़ात बहुत देर से कराता है, या फिर कराता ही नहीं है।

ईश्वर, तुम सच में बेहद ख़राब लेखक हो।

* * *

Author's pic by Sushobhit Saktawat.

( गीत चतुर्वेदी हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ कवि-कथाकार हैं.
उनका अब तक का लेखन यों है : कविता संग्रह 'आलाप में गिरह' 
और दो कहानी संग्रह 'सावंत आंटी की लड़कियां' व 'पिंक स्लिप डैडी' प्रकाशित.
वर्ष 2007 में 'मदर इंडिया' कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार से सम्‍मानित. 
अंग्रेज़ी दैनिक 'इंडियन एक्‍सप्रेस' द्वारा वर्ष 2011 में देश के दस सर्वश्रेष्‍ठ युवा लेखकों में से एक घोषित. 
उनकी कविताओं का आठ से ज़्यादा भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.  
विश्‍व कविता से अनुवाद के कई बहुप्रशंसित काम. 

Saturday, March 16, 2013

वृत्तांत : प्रत्यक्षा


जाना था रंगून...

प्रत्यक्षा  


No man ever steps in the same river twice, for it's not the same river and he's not the same man. 
- Heraclitus.

यह 
दूसरा चक्कर लगना था चीन का। इस बार लगता था कि तैयारी अच्छी है क्योंकि कुछ चीनी भाषा भी सीख ली थी। चीनी यानी मैन्दरीन, लिखना नहीं सीखा था लेकिन मैन्दरीन फिन्यीन पद्धति से पढ़ना सीखा था तीन महीने। तीन महीने बहुत कम हैं, लेकिन भोलेपन का अपना अभिमान होता है और उस अभिमान ने यह भी भुला दिया था कि सीखे और भूले भी छह महीने के ऊपर निकल चुके थे। फिर इस बार चिंता का विषय यह था कि वहां माईनस तेरह का तापमान था और मेरे पास तरीके के कपड़े नहीं थे।

फ्लाइट वाया हॉंन्गकॉंग थी। बीजींग से दो ढाई घँटे की दूरी पर रेनचियू नाम की जगह। रात की फलाईट। अगले दिन ढलते बीजींग, फिर वहां से गाड़ी से आगे। एअरपोर्ट से ही ठंड का नज़ारा होने लगा। हमने जैकेट और टोपी निकाला। लैस हुए। बिल्डिंग से पार्किंग़ तक के पाँच मिनट में हाथ-पाँव सर्द। गाड़ी में बैठते फिर सुकूनदायक गर्माहट। हाईवे से निकलते ही सड़क के दोनों ओर पतली परतों में बर्फ। हम जितना भीतर जातेउतना लगता कि जैसे बर्फ के खेत फैले हों। सड़कों के डिवाईडर पर पौधों को हरे पॉलीथीन से ढका गया था, पाले से बचाने के लिए। मीलों तक यही नज़ारा।

जॉन, जो हमें रीसीव करने आया था, लगातार बातें कर रहा था। उसकी अंग्रेज़ी अच्छी थी। इस प्रवास में शायद सबसे अच्छी अंग्रेज़ी, पियेर के बाद लेकिन पियेर आधा फ्रेंच था और ज़्यादा कॉस्मोपोलिटन, शायद एक ग्लोबल सिटिज़न, लेकिन पियेर की बात बाद में। जॉन का चीनी नाम कुछ और था लेकिन जैसा पिछली बार के दौरे में पता चला था, यहां लोग विदेशियों की सुविधा के लिये एक कामकाजी अंग्रेज़ी नाम भी रख लेते हैं। खैर, जॉन को भारत का कुछ ज्ञान था, उसने राज कपूर की 'आवारा' देख रखी थी, जिससे वह बहुत प्रभावित था, आगे की सीट से मुड़-मुड़ कर उसने एक हिन्दी गीत भी, कुछ टूटा-फूटा, उत्साह में गाकर सुनाया।

मैं थकान से बुरे हाल में थी, लेकिन उसके उत्साह से उत्साहित। फिर बर्फ की यह दुनिया मेरे लिए नितांत नई थी। खिड़की से बाहर देखना मुझे अजीब से टाईम स्पेस में ले जा रहा था। जाने क्यों मुझे साईबेरिया याद आ रहा था। कोई देखी भूली हुई फिल्म का टुकड़ा, जिसमें कुछ लोग जेल से भागते हैं, साईबेरिया से, बर्फीली ठंडक के विस्तार में रातोंरात।

बर्फ से ढकी ज़मीन, ऊँचे पत्रहीन पेड़, सुन्न खड़े, चुप देखते, और कैसा ठंडा कोहरीला वीराना, लगातार लगातार मीलों तक। मैं शीशे से नाक सटाए अपने ठंडे पाँवों को जुराबों में सिकोड़ते किस दुनिया में हूँ मालूम नहीं। कई बार किसी बेहद खुशनुमा सुंदर जगह में मुझे भयानक उदासी घेर लेती है। एक इंटेंस किस्म की, एक बीहड़ सघन जंगल की आग मेरे भीतर लहक कर जल जाती है, लेकिन आज इस गहराती शाम के ब्लीक घनेपन में उन प्रहरियों से मुस्तैद खड़े चुप पेड़ों से, जिन पर ठूँठ शाखों के अलावा जीवन का कोई अभास मात्र नहीं, जाने क्या छूती हुई मेरे पास आ रही है लगातार कि मेरे भीतर एक कम्फर्ट का एहसास है, जैसे अपने पुराने तकिये पर सर रखकर सो जाने का होता है, क्लांत सुख में।

कोई कस्बेनुमा शहर आ रहा है। हम रुकते हैं, खाने के लिए। रेस्तरां में घुसते ही एक तरफ मांसाहारी भोजन है, दूसरी तरफ शाक सब्ज़ियाँ। कुछ सब्ज़ियाँ मैं चुनती हूँ। माँसाहार सब अनजाना दिखता है। दो चीज़ें उनके बताने पर हिम्मत करती हूँ, खरगोश और कबूतर। कबूतर तो खैर चिकन के करीब है और अपने यहां भी खाया जाता है। पिता, मुझे ध्यान है, लक्का कबूतर की बड़ी तरीफ करते थे, कि उसकी तासीर बड़ी गरम होती है और कुछ खास बीमारियों में तो बाकायदा इलाज के तौर पर खिलाया जाता है। खरगोश के बारे में मेरा तज़ुर्बा पहला था और मैंने कुछ अप्रेहेंशन में ही पहली बोटी चखी। बार-बार प्यारे किसी खरगोश की सूरत आँखों के आगे तैरती रही। ज़्यादा खाया न गया। कबूतर में नमक बहुत तेज़ था। हाँ, सब्ज़ियाँ सही थीं। खीरा और ज़ुकिनी जैसी सब्ज़ियाँ, छोटे टमाटर, बैग़न की सब्ज़ी गुड़ और तिल में, करारे आलू और साग, पत्ता गोभी पानीदार रसे में और अंत में गीला चावल। हमारे ड्राईवर ने तो असके बाद एक बाउल भरके नूडल्स भी खाए।

रास्ता अभी करीब आधा बाकी था। बर्फबारी की वजह से कुछ हाईवे बन्द कर दिए गए थे। कहीं-कहीं जाम लगा था। लेकिन हमारे होशियार ड्राईवर ने कुछ डाईवर्शन लेकर हमें समय से रेनचियू पहुँचा दिया। रेनचियू उनके हिसाब से छोटा शहर था: हेबेई प्राविंस का एक शहर, जहां तेल के फैकटरीज़ हैं। लेकिन जितना हम शहर घूमे, सब तरतीब से बना दिखा। सुंदर रोड, सजे इमारत, भीड़भड़क्का नहीं। ठंड के बावज़ूद सब तरतीब में। हमें रिसीव करने पियेर, स्तिफां और झांग थीं। पियेर आधे चीनी और आधे फ्रेंच हैं और बकायदा फ्रेंच सिटिज़ेन हैं। स्तिफां फ्रेंच हैं और चार साल से चीन में रह रहे हैं, उनकी पत्नी चीनी हैं और झांग खालिस चीनी हैं। पियेर बढ़िया फ्रेंच, चीनी और अंग्रेज़ी बोलते हैं, स्तिफां फ्रेंच और अँग्रेज़ी और कामचलाउ चीनी, झाँग चीनी और कामचलाऊ अंग्रेज़ी, और मैं हिन्दी-अँग्रेज़ी और बेहद टूटी-फूटी सौ शब्दों की भूली वोकैबलरी वाली चीनी। मेरे सहकर्मी सिर्फ हिन्दी और अपने खुद के सबमिशन से हरियाणवी अंग्रेज़ी। तो ये था हमारा मोटली कुनबा अगले एक हफ्ते के लिए।

हमने होटल के कमरों मे सामान पटका और तय हुआ कि ठीक सामने सड़क पार जो दूसरा होटल है, वहां रात का भोजन कर लिया जाए। इसी बीच जो कमरा मुझे मिला, वह किसी दूसरे विंग में था, जो औरों से काफी दूर था। चूंकि हमें सुबह उसी होटल के कॉनफरेंस रूम में काम करना था, तय यह हुआ कि मेरा कमरा भी दूसरों के विंग में ही कर दिया जाए ताकि सहूलियत हो। पियेर और झाँग रिसेप्शनिस्त से मैन्दरीन में बहस करते रहे। मैं उल्लूओं की तरह खड़ी थी। एक शब्द मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा था। बीच-बीच में पियेर मेरी तरफ मुड कर मुझे तीन लाईन समझाते कि कोई दिक्कत नहीं मुझे दूसरा कमरा आसानी से मिल जाएगा। खैर, कुछ देर बाद कमरा अलॉट हुआ, मैं दोबारा अपना सामान एक कमरे से दूसरे शिफ्ट कर आई। हिन्दुस्तानी होटलों की तरह बेलब्याय का सिस्टम नहीं था और न तो यहां लिफ्ट था। अपने बड़े सूटकेस को एक फ्लोर से दूसरे ढो कर ले जाना आसान नहीं था, खासकर चौबीस घँटे के थका देने वाले सफर के बाद। लेकिन नए  कमरे में एक नई समस्या थी। यहां कम्प्यूटर नहीं था। मैं लैपटॉप की बजाय आईपैड लेकर आई थी और मुझे वाईफाई कनेक्टीविटी चाहिए थी, जो इस होटल में नहीं थी। फिर मेरा एकमात्र सहारा कमरे में डेस्कटॉप ही था, जिसमें मैं कॉम्प्रोमाईज़ नहीं करना चाह रही थी। रिसेप्शन पर वापस आकर पियेर को अपनी समस्या बताई। मैं वापस पुराने कमरे में जाने को तैयार थी। उसने फिर रिसेप्शन पर बात की। तय यह हुआ कि हम खाना खा आएं और उसके बाद मैं कमरा वापस बदल लूँ।

होटल से निकलते ही तेज़ बर्फीली हवा का सामना हुआ। अब तक हम गाड़ी की गर्माहट में थे। चारों ओर बर्फ। कपड़ों के अनगिन लेयर्स के बावज़ूद सर्दी की बर्छी चेहरे पर लग रही थी। सड़क पर फिसलन थी और पाँव जमा जमा कर चलना पड़ रहा था। हमें सिर्फ रोड पार करना था, पर उतने में ही हमारी हालत देखने लायक थी। ऐसे ठंड का सामना मेरे लिए पहला था। दो बार सड़क पर मैं फिसलते गिरते बची। फिर मैं डर गई। मुझे लगा पहले दिन की शुरुआत ही में मैं अपनी टांगे तुड़वा लूँगी। पियेर मेरे डर को देख कर मज़े ले रहा था। उसने अपने पाँव जमा कर नाचने का-सा अभिनय किया। खुदा-खुदा करके हम होटल पहुँचे। भीतर गर्माहट भरी रौशनी थी, हलचल और खाने की खुशबू। 

हम एक कमरे में बैठ गए। हैंगर पर हमने अपने लबादे टाँगे और आराम से बैठ गए। खाना सर्व होना शुरु हुआ। वही सब्ज़ियाँ, साबुत मछली, लच्छेदार पत्ता गोभी, साग, साथ में हरी चाय और लाल वाईन। हम वाईन और चाय सब साथ पीते रहे। चॉप स्टिक से सब्ज़ियाँ उठाना एक कला ही है। गोल शीशे का टेबल धीमा घूमता जाता था। हल्के हाथों से उसे रोक कर चॉपस्टिक से खाने का सामान उठाना आसान नहीं था। खासकर जब सबकी निगाह आप पर हो। मैंने बेशरमी से उँगलियाँ, फोर्क और चॉपस्टिक सबका इस्तेमाल किया। वाईन का सुरूर अब थकान के सुरूर के ऊपर चढ़कर चुका था। खाना कोर्स बाई कोर्स खत्म हुआ। हमने अपने जैकेट्स और दास्ताने चढ़ाये और होटल से बाहर निकले। रात के सन्नाटे में हल्की रौशनी में सब किसी और दुनिया का समय था।

दो मिनट में हम वापस अपने होटल थे। मुझे नया कमरा दिखा दिया गया। सब अचानक मिनट भर में गायब हो चले थे अपने अपने कमरों की तरफ और तब मुझे ध्यान आया कि मेरा सामान मेरे कमरे में नहीं है। रिसेप्शन पर फोन किया तो उस तरफ से मैन्दरीन में आवाज़ आई। मैंने सब्र से पूछा, कि क्या कोई अंग्रेज़ी में बात कर सकता है? जवाब फिर मैन्दरीन में आया, दो तीन मिनट हम इसी तरह बात करते रहे फिर फोन कट गया। मैंने फिर फोन लगाया। फिर वही ढाक के तीन पात। मैंने मैनदरीन जितनी सीखी थी उसको याद करते और पैनिक न करते हुए फिर फोन लगाया और पूछा, नी तुंग इंगयू मा? (क्या आप अंगरेज़ी समझते हैं?) अब लगभग हिसटेरिकल जवाब उधर से आया फिर मैन्दरीन में। उधर से अब शायद दो लोग बात कर रहे थे। नतीजा यह हुआ कि दो मिनट में एक लड़की मेरे कमरे में दाखिल हुई लेकिन उसकी अंग्रेज़ी भी वही माशा अल्लाह थी, ज़ीरो। चौबीस घँटे के सफरी थकान के बाद अब मेरा मन सचमुच रोने का कर रहा था। लगता था अलिस इन वंडरलैंड वाले किसी ऐसे मायावी दुनिया में पहुँच गई हूँ, जहां कोई मेरी बात नहीं समझता। लड़की मैनदरीन में तेज़ी से कुछ बोलती, मैं अंगरेज़ी फिर हिन्दी में धीरे धीरे बोलती, हे भगवान कहाँ फँस गई! मैं फिर वाईन के नशे में हँसने लगी। शायद रो नहीं सकती थी इसलिए। प्यास लग रही थी। पानी माँगा। शूये, उसने बाथरूम का नल चला दिया। मैंने माईम किया सामान, ट्रॉली का, वह हँसी, मैने सोने की हरकत दिखाई उसे, वह मुस्कुराई, मैंने कागज पर पुराना रूम नम्बर लिखा फिर नया रूम नम्बर लिखा और अचानक उसके चेहरे की बत्ती जल गई। उसने मेरी बाँह पकड़ी और मुझे खींचती हुई कॉरिडॉर में ले गई। एक पल को मुझे लगा कि यह कमरा भी गया क्या! रात के ग्यारह बज रहे थे लेकिन किसी भूलभुलैया कॉरिडॉर से होते हुए उसने मुझे पुराने कमरे तक पहुँचाया। कमर से चाभी का गुच्छा निकाला, कमरा खोला, और वायला, मेरा सूटकेस ठीक बीचओबीच खड़ा था। दस मिनट बाद मैं वापस अपने कमरे में थी, बिस्तर में दुबकी, रज़ाई के भीतर क्लांत और बेहद थकी और नींद से कोसों दूर। मेरे पैर ठंडे थे और कमरे का तापमान शायद तेरह पर टिका था और मेरे भीतर अब और ताकत नहीं बची थी कि मैं एयरकंडीशनर के स्विच के ऊपर चाईनीज़् कैरकटरज़ डीसाईफर कर सकूँ और तापमान बढ़ा सकूँ। मैंने ऊनी मोज़े पहने और थकान की नींद में गिर पड़ी आखिरकार।

सुबह ठंड के बावज़ूद मेरी नींद खुशी में खुली। खिड़की के महीन परदे के पार बरफ का सफेद संसार था। लोहे की सीढ़ी घुमावदार पिछवाड़े बरफ की चादर के ऊपर तनी थी और झाड़ियों पर एक अकेला लाल फूल दिखता था। गर्मियों में ये कोर्टयार्ड हरियाली चादर होता होगा, अभी इतना गुल गुला सफेद और उसपर कोई चला था कि उसपर किसी के चलने के एक पैरों के निशान थे, फूटस्टेप्स ऑन द वर्जिन स्नो। चाय का कप हथेलियों में पकड़े मैं कमरे का मुआयना करती रही, और रात की अपनी मायूसी पर चुपके हँसती भी रही। कमरे में डेस्कटॉप था। लेकिन सब बेकार क्योंकि सिर्फ चीनी साईट्स खुल रहे थे। जीमेल खोलने का अथक प्रयास किया लेकिन डाईवर्ट होकर कहीं और साईट पर चला जाता और रोमन कैरैकटरस की बजाय चाईनीज़ करेक्टर्ज़ खुलते।

भाषा और स्क्रिप्ट पर चाय पीते, कमरे में टहलते मैं सोचती रही। क्या रहस्यवाद है? और कितना मुश्किल! कैसे एक मिनट में हम धराशाई हो जाते हैं, अपने कम्फर्ट ज़ोन से निकलते ही!!

नौ बजे तैयार होकर हम लॉबी में पहुँचे, झाँग पहले से मजूद थी। नाश्ते में सब्ज़ियाँ थीं और मड़गीले चावल, जो हमारे यहाँ पेट खराब में खिलाया जाता है, फिर डम्पलिंग्स थे जिन्हें हम मोमो कहते हैं, हरी चाय तो थी ही। और फल तो क्या शानदार। छोटे संतरे इतने मीठे और ड्रैगंस आई, मैंने जाने कितने  खाये होंगे दिनभर में, काम करते हुए लगातार, नैपकिन पर छिलकों के अम्बार, अपने स्वाद और रस में भरपूर। एक बात मैंने नोटिस की कि यहाँ कोई पानी नहीं पीता, लेकिन लगातार ये लोग चाय पीते हैं, हरी चाय। जैसे ही प्याली आधी होती है कोई गर्म पानी प्याली में डाल जाता है। किसी दफ्तर भी जाएं, वहाँ पानी की बजाय चाय और संतरा, केला और छोटे चेरी टमाटर पेश होते। मुझे बड़ा मज़ा आता। मैं ठंड का मज़ा ले रही थी, चाय का और फल का। उस दिन हम रात बारह बजे तक काम करते रहे थे।


अगले दिन हमें संगज़्हाऊ के लिये निकलना था। रेनचियू से संगज़्हाऊ लगभग तीन चार घँटे का सफर था लेकिन सड़क पर बर्फ थी और हमारी गाड़ी एक बार बुरी तरह से स्किड हुई। हम हिन्दी में चीख रहे थे, ब्रेक लगाओ ब्रेक लगाओ। पीछे की सीट पर पियेर और स्तीफां थे और आगे ड्राईवर की बगल में झांग। सड़क के बगल में गहरा गड्ढा था और गाड़ी गड्ढे तक फिसलती जा रही थी। कुछ हाथ की दूरी पर गाड़ी थम गई। हम सकते में बैठे रहे चुप। स्तीफां ने दरवाज़ा एकदम से खोला, उतरा और फिसल कर चारो खाने चित्त। हम कुछ समझते कि उसके पहले उसने खुद को सँभाला और पैर जमाते हुये सड़क के किनारे खड़ा हो गया। हम अब तक स्त्ब्ध थे। हमारे पीछे गाडियाँ धीमे रुकती जा रही थीं। कुछ देर बाद ड्राईवर ने गाड़ी स्टार्ट की फिर धीमे बैक किया, सँभालते-सँभालते एहतियात से गाड़ी वापस मोड़ी। स्तिफां ने बाद में बताया कि उसे यह भय हुआ था कि चूँकि वो सबसे किनारे बैठा था और गाड़ी लगभग सड़क पर नब्बे का कोण बना रही थी, पीछे से आती पहली गाड़ी सीधा टक्कर मारती और पहला शिकार वही होता। बाद में हमने उसकी खूब खिंचाई की कि हमें तो ऐसे बीच मझधार में छोड़ कर खुद भाग खड़ा हुआ।

जो रास्ता दो घँटे का था वो हमें दुगुने समय का लगा। संगज़्हाऊ पहुँचते ही पहली चीज़ जो दिखी वो खूबसूरत स्ट्रीटलाईट्स, बिलकुल झाड़फानूस जैसी। शाम गहरी घिर आई थी और हमें यहाँ से ट्रेन पकड़नी थी चिंगडाऊ के लिए। चिंगडाऊ समन्दर के किनारे का शहर था और हम खुश थे कि हमें इस ठठुरती ठंड से कुछ राहत मिलेगी। लेकिन पहुँचना हमें वहाँ देर रात को ही था और फिलहाल रेलवे स्टेशन के बाहर के बर्फीले प्रदेश को टैकल करने का था। मैं स्तीफां की तरह गिरना नहीं चाहती थी और मेरा सारा फोकस इस बात पर था कि सही सलामत स्टेशन के भीतर पहुँच जाऊँ। शायद सब इसी फिराक में थे। अपने अपने सामान सँभाले पैर जमाते हम स्टेशन के भीतर पहुँचे। बुलेट ट्रेन पर बैठने का पहला अवसर था लेकिन उसके पहले खुले में प्लैटफॉर्म पर पाँच मिनट खड़े रहना अत्यंत कष्टदायक। इतनी ठंड कि चेहरा तक जम जाए जैसे। ट्रेन के भीतर फिर बेहद आरामदायक वातावरण। दूसरी ही दुनिया। मुझे योरप के यूरोरेल याद आए। साफ और सुंदर। ट्रेन ने तुरत स्पीड पकड ली, तीन सौ दो किलोमीटर प्रति घँटा।

बाथरूम साफ थे लेकिन कुछ देर बाद भारतीय रेल की तरह ही गंदे भी होने लगे। यह और बात थी कि सफाई वाली लड़कियाँ तुरत आ कर साफ भी करती जातीं। ये लड़कियाँ यूनिफॉर्म में मुस्तैद और ज़्यादा ऐयरहोस्टेस जैसी थीं और इस मामले में हमारे रेल कर्मियों से एकदम अलहदा। चाय और जूस यहाँ भी बिक रहे थे, खाने-पीने की चीज़ें भी और लोग भी तुरत अपनी चीज़ें फैला कर खाने पीने में मशगूल हुए। मुझे भारत बेतरह याद आया। हमने भी सूरज मुखी के बीज टूँगे और ठँडी चाय के घूँट भरे, फिर नींद की एक झपक़ी ली।

देर रात हम चिंगडाऊ पहुँचे। स्टेशन बड़ा प्यारा-सा। सीढियाँ चढकर ऊपर। टैक्सी की। रात को शहर बेहद शाँत और सुंदर। पहाड़ी रास्ते और ढलवाँ सड़कें। बहुत पहले जर्मन कॉलॉनी हुआ करता था। और इसे स्विटज़र्लैंड ऑफ द ऑरियेंट भी कहा जाता है। पुरानी ढब की यूरोपियन इमारतें, लओशान पहाड़ी, समुद्री तट। पीली रौशनी में शहर अपने को दिखाता कितना खूबसूरत। मुझे मालूम था कि दिन में मेरा इम्प्रेशन कुछ और बनेगा लेकिन अभी आधी नींद में जागा शहर मुझे अपने भीतर समा रहा था। मेरे आसपास सब बात कर रहे थे। मैं उनकी बातचीत का हिस्सा होते हुए भी नहीं थी। मैं सुन रही थी लेकिन उसके परे भी थी। मैं शहर को जी रही थी। हवा में तुर्शी थी। हमने अपने भारी लबादे उतार दिए थे। हल्के महसूस कर रहे थे। तय हुआ कि पहले खाना खा लें फिर होटल जाएं। किसी रेस्तरां में हम रुके, जहाँ सफाई का काम चल रहा था। फर्श की घिसाई हो रही थी। ऊमे, जो हमें वहाँ रीसीव करने आई थी और जिसकी पहचान की वजह से हम वहाँ थे, की वजह से वे हमें कुछ खिला देने को राजी हुए। चिंगडाऊ में सिंगताऊ बियर मशहूर है, तो बियर और बर्गर और फ्रेंच फ्राईज़, और फ्राईड चावल, बस। आज चीनी खाना नहीं। इतनी रात को नहीं, सुलभ नहीं।

रात को होटल में धाराशाई। सुबह शहर वाकई अलग था। होटल के पिछवाड़े स्टेडियम था। शहर ताज़ादम और हाईटेक़ लग रहा था। रात का अधसोया क्वेंट मेडीवल शहर तो कतई नहीं। हमें काफी भीतर इंटीरीयर में जाना था और हम नाश्ते के बाद तुरत निकल पड़े थे। हाईवे से हम भीतर सड़क पर मुड़ गए थे। सड़कों पर बर्फ की पतली परत थी लेकिन ठंड उतनी नहीं थी। लगता था कि बर्फ  की खेती हो रही हो। सलीके से मेड़ बने हुए थे और दूर-दूर तक ज़मीन पर जैसे हल चली हुई हो। पहली दफा हमें कुछ टूटी सड़कें मिलीं। पेड़ पत्रहीन पर नज़ारा उदास नहीं था। हल्की धूप खिली थी और मिट्टी गहरी भूरी। सड़कों के किनारों एकाध तेज़ी से उड़ान भरते कोई एक पनडुकी नुमा पक्षी भी। हम गाड़ी से उतर गए थे। दूर खेतों में वृक्षों के कतार के पार एक घर दिख रहा था। पीछे सूरज की किरणों का सुनहला मुकुट उसकी छतों पर चमक रहा था। लगता था, सपनों-सा संसार हो। मेरा बहुत मन हुआ सब छोड़ कर उन खेतों में चली जाऊँ, उस घर के भीतर जाकर देखूँ, वह संसार क्या है, कौन रहता होगा, कैसे रहता होगा? क्या होता होगा उस दुनिया में? मैंने अपना आईपैड निकाला और कुछ पल कैद कर लिए।

रास्ते भर हम बात करते रहे थे। फ्रांस और चीन और भारत के बारे में, रहन-सहन और अर्थव्यवस्था और कुछ राजनिति। स्तिफां बताता रहा था कि सोशल नेटवरिकिंग साईट्स बैन हैं यहाँ लेकिन बदले में एक चाईनीज़ नेटवर्किंग साईट वीबो है, जो ट्विटर जैसा है फिर रेनरेन है, जो फेसबुक की तरह है, तेनसेंट है, जो सोशल मिडिया हब की तरह है। फिर तूपान है, जो कि एक खुला फोरम है। यह बुद्धिजिवियों के बीच पॉपुलर है और यहाँ फिल्मों संगीत और किताबों की समीक्षाएं मिलती हैं। यह भी कि नेट पर कुछ भी सर्च करने पर एक दो बार के बाद से साईट नहीं खुलता, विकी भी नहीं कई बार। यहाँ के रेस्ट्रिक्शन्स की बात बता रहा था लेकिन फ्लिप साईड यह भी कि चाईना मे कितनी चीज़ें है, जो सँभावनाओं से भरपूर हैं, जो कि अब योरप में नहीं। हम भारत और चीन के विकास पर बात करते रहे थे। सोशल फैब्रिक कितना स्टैगनेंट कर गया पश्चिमी देशों में, उनकी अर्थव्यवस्था किस रिसेशन में चली गई है और उसके बनिस्बत चीन और भारत में सब कितना होने को बचा है, कितनी पॉसिबिलीटीज़ हैं अभी। मैं हुकोऊ के बारे में पूछना चाहती थी। हुकोऊ माने फामिली रेजिस्ट्रेशन सिसटम, जो एक तरह से माएग्रैंट लेबर मूवमेंट को रेग्यूलेट करता है। चीन के ग्रामीण और शहरी असामनता में हुकोऊ का काफी हाथ है, लेकिन स्तिफां गलत आदमी था इस बारे में बात करने के लिए, पियेर भी शायद और मेरी चीनी इतनी काबिल नहीं थी कि झाँग से मैं कोई गहरी मानीखेज़ बात कर पाऊँ।

दोपहर हम ऐसे रेस्तरां में गए, जहाँ से येलो सी दिखता था। समन्दर की लहरों को देखते हुए हमने ऑयेस्टर्स, मसेल्स और क्लैम्स खाए। उनको खाने का तरीका मुझे मालूम नहीं था। देखकर सीखा कि टूथपिक से खाया जाता है। झांग की प्लेट के बगल में घोंघों का ढेर लग गया। घोंघे मुझे पसंद नहीं आए, हाँ सीपी ज़रूर आए और काफी पर मैंने भी हाथ साफ किया। मेरे सहकर्मी भारत से लाए पूड़ियाँ ही खाते रहे। वे शाकाहारी हैं और उन्हें खाने की बड़ी तकलीफ रही। आज उनकी लाई पूड़ियाँ पियेर और स्तिफां ने भी चखी। हम इस बात पर हैरान होते रहे कि किसने सोचा होगा कि हज़ारों मील दूर उनकी पत्नी की बनाई पूड़ियाँ इस तरह खाई जाएंगी। वाईन की संगत में पूड़ियाँ जैसी भी हों, ओयस्टर्स शर्तिया शानदार थे ।

शाम हमें ट्रेन से बेजिंग लौटना था। दिल्ली में ही मेरी मित्र प्रीति गिल ने मुझे लिचिया चैंग से मेल द्वारा परिचय कराया था। लिचिया बेजिंग में रहती हैं और वह लेखक, जर्नलिस्ट और पब्लिक स्पीकर हैं। उसने '' सोशलिस्म इज़् ग्रेट, अ वर्कर्स् मेमोआर ऑफ द न्यू चाईना '' किताब लिखी है। लिचिया से मेरी बात मेल से हो रही थी और हमारा बेजिंग में मिलने का कार्यक्रम लगभग तय था सिर्फ शायद लिचिया को गुआंगज़्हाऊ जाने का एक प्रोग्राम भी था, जहाँ उन्हें एक की नोट एड्रेस देना था। मेरा शुरुआत में बेजिंग ही रहने का प्रोग्राम था, जो कि बाद में किन्हीं कारणों से बदलना पड़ा था। रेन चियू के मुश्किल नेट कनेक्टिविटी के बावज़ूद हमने कुछ मेल्स का आदान-प्रदान कर लिया था और यह साफ हो गया था कि जिन दिनों मैं बेजिंग में रहती, उसे गुआँगज़्हाऊ होना था तो हम शायद मिल न पाएं। खैर मैंने ट्रेन से ही लिचिया को फोन करना चाहा कि लेकिन बात नहीं हो पाई। कुछ समय लौटने के बाद गार्जियन में लिचिया का एक अच्छा लेख पढ़ने को मिला, किम ली के तलाक के संदर्भ में चीन में घरेलू हिंसा की गुप्त महामारी। मैंने लीचिया से पूछा था फिर, खासकर तब यहाँ के संदर्भ में भी। उसने कहा था कि उसका लेख और भी बड़ा था और गार्जियन पर काटछांट कर ही छपा था। खैर, अफसोस रहा कि हम मिल नहीं पाए। उम्मीद है, जब वह भारत आएगी, हम ज़रूर मिलेंगे।

बीजिंग पिछली दफा मैं खूब घूम चुकी थी। इस बार घूमने का दबाव नहीं था। बस शहर को महसूस करने का था। रात हम शहर घूमते रहे बेमतलब। गाड़ियाँ, रौशनी, रफ्तार, सब। यह तियननमन स्क़्वायर, यह फार्बिडेन सिटी, यह कैपिटल म्यूज़ियम, यह रास्ता बेईहाई पार्क की तरफ जाता है, इस तरफ बढते हैं हुतोंग शीचहई, उस तरफ लामा मंदिर, इधर ओलम्पिक स्टेडियम बर्ड्स नेस्ट। हम थके थे, फिर भी खिड़की से बाहर देखते शहर देखते थे। पिछली बार से शहर इस बार अलग था। पिछली बार दिन का शहर था। इस बार रात का। हमारी टैक्सी लगभग छोटी-सी बस ही थी। हम सब अपनी दुनिया में मशगूल। पियेर का घर बेजींग में था लेकिन उसने तय किया था कि वह होटल में ही रुकेगा हमारे साथ। स्तिफां का घर भी वहीं था लेकिन लगभग घँटे भर की दूरी पर और चूंकि सुबह हमें सीचिआचुआंग् के लिए निकलना था, हम सब एक साथ एक ही होटल रुकने वाले थे। रात इस तरह बेमतलब सड़क पर घूमना मुझे आहलादित कर रहा था। जैसे शरीर से आत्मा निकल कर विचर रही हो। 

स्विसोटेल फिरंगियों के लिए होटल है, उनके टेस्ट को केटर करता हुआ। मुझे ज़्यादा अच्छा लगता अगर हम कोई खालिस चीनी जगह रुकते, किसी हुतोंग स्टाईल होटल, अगर होता होगा तो, लेकिन पियेर ने शायद हमारी सुविधा के मद्देनज़र ही यहाँ इंतज़ाम किया होगा। यहाँ हमें कुछ वेस्टर्न् खाना भी मुहैया था और पियेर और स्तीफां ने तो स्टेक मंगाया। मैंने तय किया कि खाना स्किप करना है, झाँग को दिक्कत हुई, उसे चीनी खाने के अलावा दूसरा खाना पसंद नहीं। झाँग बड़ी प्यारी पचीस छबीस साल की सुंदर-सी लड़की है। या तो सारे समय खाती रहती है या फिर अपने फोन से बात करती रहती है। या फिर मुझे देखकर मुस्कुराती है। उसकी अंग्रेज़ी ऐसी नहीं कि बहुत बात की जा सके लेकिन छोटी-छोटी चीज़ों में बहुत ख्याल रखती रही है। जैसे मैं छोटी बच्ची होऊँ और वह मेरी बड़ी बहन। पता चलता है कि उसकी हाल में शादी हुई है। तो ये है उसके लगातार फोन पर बात करने का राज़। रेस्तरां में वाईफाई है और मैं कुछ देर नेट कनेक्टेड् हूँ, मेल देखती हूँ, फेसबुक कनेक्ट नहीं होता।

सुबह-सुबह बहुत सवेरे हम फिर ट्रेन में हैं। हमें लगता है पुराने ट्रेन सवार हो गए हैं। टिकट और चेक इन वाले सब तामझाम अब हमें समझ में आने लगे हैं, लेकिन हम हमेशा पियेर या झाँग को अपनी नज़र की ज़द में रखते हैं। अगर ये ओझल हुए, तो फिर खैरियत नहीं। हम किसी को अपनी बात समझा नहीं पाएंगे। बैग में पासपोर्ट हमेशा साथ तो रहता है लेकिन भाषा का अज्ञान कितना बड़ा हैंडीकैप है, कैसी इंसेक्योरिटी देता है, यह यहीं आकर समझ आया है। झाँग कई बार भीड़ में मेरी बाँह थाम लेती है। आज हमें अलग कतार में खड़ॆ होना है। हमारे आगे एक लड़का है, गिरी ज़ुल्फें हैं, यू आर फ्रॉम इंडिया? हम भौंचक होते हैं। पहली बार कोई हमसे बोला है। हम कहते हैं, यू नो इंगलिश। वह कँधे उचकाता है, फिर कुछ कहता है। उसकी अंगरेज़ी सिर्फ इतनी ही थी।

सिचियाचुआंग में बहुत सर्दी है । स्टेशन के बाहर हमारी गाड़ी आई नहीं। हमें लगभग आधा घँटा इंतज़ार करना पड़ा। लगा जैसे तबियत खराब हो जाएगी। स्तिफां का चेहरा एकदम लाल हो गया था। मुझे लगा, उसे कुछ हो गया है। बहुत तेज़ हवा है और कोई ओट नहीं। हम एकदम खुले में खड़े हैं। एक परिवार खुले स्कूटर में निकल पड़ता है। दो बच्चे हैं, एस्कीमो लग रहे हैं। दो बच्चों पर मुझे हैरानी होती है। पियेर कहता है मेरे तीन हैं। मैं कहती हूँ, हाउ कम? बिकॉज़ अयम फ्रेंच, वह हँसता है, मेरा बेटा निकोला और बेटी पैरिस में मेरी माँ के साथ रहते हैं, सिर्फ मेरी छोटी बेटी लेया यहाँ बेजिंग में हमारे साथ है। ठंड से बचने के लिए हम पाँव पटक रहे हैं, लेकिन सहा नहीं जा रहा है और जैसे ही हम तय करते है किं भीतर चला जाए, गाड़ी आ जाती है।

इतनी ठंड है कि कोई परिंदा चरिंदा दिखाई नहीं देता। हम खेतों का नज़ारा देखते चलते हैं। वही बर्फ के खेत। जैसे हल चलाए गए हों। ज़रा-सी धूप निकलती है और सब खुशगवार हो जाता है। हम हिन्दी में बात करते हैं कि भारत होता तो इतने ठंड में लोग खेतों में निवृत होने निकल पड़ते। शायद हमारे लहजे में कुछ होगा कि पियेर वही टॉपिक छेड़ देता है कि चीन में भी, आखिर यह तो इंसानी ज़रूरत है। फिर हम बात करते हैं कि फॉरबिडेन सिटी में बाथरूम नहीं है, स्तिफां जोड़ता है पैलेस ऑफ वर्साय में भी नहीं है। हम कहते हैं, हमारे यहाँ महलों में नहाने के बड़े सरंजाम रहते थे और बड़े इंतज़ामात वाले गुसलखाने। हम सब खूब हँसते हैं और तय होता है कि सबसे पहले वाशरूम खोजा जाए। काम की जगह पहुँचते ही एलानिए तौर पर वाशरूम खोजा जाता है और हम सब स्कूली बच्चों की तरह भागते हैं।

लौटते वक्त स्टेशन पर बर्गर और फ्रेंच फ्राईज़ और कॉफी। झाँग नूडल्स खा रही है। मैं सिर्फ कुछ चिकन नगेट्स। ट्रेन में बैठे शरीर क्लांत हैं, लेकिन मन अजीब हलचल में है। मैं और स्तीफां लगातार बात करते हैं। वह अपनी पत्नी से कैसे मिला की कहानी बता रहा है। फ्रांस के बरक्स चीन में रहना, किन चीज़ों की कमी उसे खलती है, क्या अच्छा है। हम खाने की पद्ध्ति पर बात करते हैं, मैं उसे हिन्दुस्तान के बारे में बताती हूँ, उसे बहुत मालूम नहीं, लेकिन कहता है कि उसकी पत्नी भारत घूमना चाहती है। मैं उसे फ्रांस के उस छोटे से गाँव बुगाराश की बात बताती हूँ, जो कहा जाता है कि 2012 के अंत के बाद भी बचा रहता और वो हैरान होता है कि भारत में रहते मुझे उस छोटे से गाँव की बात मालूम है। हम पूरे संसार के छोटे होते जाने की हैरानी से सराबोर हैं। हम इस तरह विचारों, भाषाओं, सभ्यताओं, संस्कृतियों, मसालों, संगीत, किताबों के आदान-प्रदान की बात सहजता से कर सकने की आसानी पर बात करते हैं। रास्ता बड़ी तेज़ी से कटता है। होटल पहुँच कर हमें कुछ बचा काम भी करना है।

रात हम खाना खाने द गेंजेस नाम के भारतीय रेस्तरां जाते हैं। इस बार होस्ट हम हैं। केसरिया  पुलाव, लच्छा पराठा, नान, हैदराबादी बिरयानी, मलाबारी चिकन, कढाई चिकन, लस्सी और न जाने क्या-क्या। उन्हें अपने खाने के बारे में बताते हमें एक प्रकार का अभिमान हो रहा है। ये ऐसे पकता है, ऐसे खाया जाता है, चावल हम हाथ से खाते हैं। झाँग कहती है, हाथ से खाना सबसे मुश्किल काम है। हम कहते हैं, चॉपस्टिक से कम। मैं उसे तरीका सिखाती हूँ। वे स्वाद ले कर खा रहे हैं। हमारा काम खत्म हो गया है तो काम खत्म होने की निश्चितंता भी है। वाईन के साथ अच्छा भोजन और अच्छी बातचीत। सब अच्छा है। मैंने पियेर से पूछा था कि इतने दिन हम चीनी खाना खाते रहे, कभी मीठा नहीं खिलाया गया? उसने बताया कि मीठे का चलन नहीं। कभी इच्छा हुई, तो टमाटर पर चीनी डाल ली। चाय तक तो ये फीकी पीते हैं। तभी सब एक दम चुस्त-दुरुस्त।

खैर हमने रसमलाई और गुलबजामुन मँगाया। स्तीफां ने कहा- नैपकिन पर लिख दो बीवी को बताऊँगा क्या खाया। पियेर बताता रहा कि उसकी पत्नी बेक बहुत अच्छा करती है। अगले दिन बल्कि वह अपनी पत्नी के हाथ का बना केक हमारे लिए लेकर आया । इस शानदार भोजन के बाद स्तिफां ने हमसे विदा ली। पता चला कि अजब संयोग में उसका बेटा क्रिस और मेरा बेटा हर्षिल एक ही दिन पैदा हुए हैं। हफ्ते भर हम साथ रहे, बहुत बढ़िया साथ रहा। अगली सुबह झाँग से विदा ली और फिर देर सुबह ऐयरपोर्ट पर पियेर से।

पियेर ने हाथ मिलाया फिर, इन फ्रेंच स्टाईल, भी अल्विदा किया। इन हफ्ते भर के साथ हमने कई बार एक-दूसरे से बहस की, कई बार स्वत: एक-दूसरे से ऐसी भाषा में बोले, जो दूसरा नहीं जानता था, कुछ ऐसे लफ्ज़ पकड़ लिए, जिसका बार-बार उपयोग किया। पियेर हर वाक्य नीगअ से शुरु करता। मेरा मैंदरीन का अल्पज्ञान नी का मतलब तुम बताता और ग मेशरवर्ड है। मैंने उससे पूछा - नीगा क्या? उसने कहा- दैट। मैं हमेशा दैट को नग़ा बोलती थी। या जैसे स्तीफां ने पूछा कि गुड बाई, ऑ रिवोआ को हिन्दी में क्या बोलते हैं, मैंने एकदम से जबाव दिया, अल्विदा। बेजिंग के वांगफुजिंग शॉपिंग डिस्ट्रिक्ट के सामने की सड़क पर रात के ग्यारह बजे स्तीफां अपने हाथ फैलाए  अलविदा बोलता इतना मासूम और नाटकीय लग रहा था कि हमें हँसी आ रही थी। या फिर पियेर नहीं बोलना सीख गया था और स्तीफां शुक्रिया और हम धड़ल्ले से शियेशिये या फिर जब मैंने छोटे संतरे उठाए, तो झाँग ने हाओ च्र कहा, मुझे लगा संतरा का मैनदरीन हाओ च्र है, फिर स्तीफां ने समझाया हाओ माने अच्छा, च्र माने खाना, तो एकदम मुझे सीखा याद आ गया, मैंने कहा मुस्कुरा कर, हन हाओ, बहुत अच्छा। हम एक साथ एक बार में एक-दूसरे की तरफ अंग्रेज़ी, हिन्दी, फ्रेंच और मैंन्द्रीन फेंकते रहते। कौन किससे किस भाषा में बोल रहा है पता ही नहीं चलता और कई बार इसी हँसी से टेंशन डिफ्यूज़ भी हो जाता। हमने उनको बताया कि हमारे यहाँ तीस अलग भाषाएं  और लगभग दो हज़ार बोलियाँ हैं और हम इस तरह अलग बोलियाँ सुनने के आदी हैं।

शायद हम सबको खूब यात्राएं करनी चाहिएं, कई बार संभव नहीं होतीं शारिरिक यात्राएं, तब मन की करनी चाहिए : लोगों के भीतर उतरने की यात्राएं, जगहों के भीतर, जड़ और चेतन, प्राणवान और प्राणहीन, अंदर और बाहर, अपने भीतर और अपने बाहर तक। भीतर और बाहर की यह आवाजाही ही स्पंदित रहती है हमारे वज़ूद में, जो हमें एक धरातल पर जीवित बनाती है, एक तरह की क्रिया-प्रतिक्रिया का अंवेषण कराती है। मुझे लिशान में मिले टेराकाटा फौज का ख्याल आता है, कहतें हैं वहाँ पूरा शहर खुदाई में मिला और हरेक सिपाही की शक्ल दूसरे से फर्क है। शायद यह अलग होना ही हमें दूसरे के करीब लाता है। जीवन अपनी विविधता में कितना खूबसूरत है। मिट्टी, पानी, धूप, हवा, एक होते हुए भी उनकी किमियागिरी कोई अलहदा चीज़ पैदा कर देती और उस बात का साक्षी होना कैसी खुशी की बात है। एक बार यात्रा खत्म होती है फिर आपका मन बार-बार उस यात्रा पर निकलता है, आपके अंतरतम के किसी गुप्त तहखाने में वह यात्रा लगातार आपके जाने बिना अपना दोहराव करती जाती है।




The only journey is the one within.  
-Rilke. 
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[ सभी तस्वीरें : लेखिका के कैमरे से.
उनका लिखा एक अन्य वृत्तांत यहाँ . ]

Friday, March 08, 2013

जस्ट टियर्स


 




[ इस लम्बी कविता में दर्ज़ लोग और भूगोल, दर्द और दिक्क़तें नई नहीं हैं, नया है वह कहन, जिसे व्योमेश शुक्ल अपनी कविताओं में मुमकिन करते रहे हैं । आत्मधन्य निज और नकली प्रतिकार की बजाय यहाँ ख़ुद अपनी और परिवेश की बेधक पहचान है, उसमें बहाल, बुलंद और बर्बर होती जा रही चीज़ों, लोगों और घटनाओं को उनके सही नाम से पुकारने का साहस और विवेक है। कई आईने हैं, कई अक्स । ] 


                       { व्योमेश शुक्ल की नई कविता } 



Jaya Suberg

भीड़ बढ़ी तक़लीफ़ें बढ़ीं मामा की दवा की दुकान में आकर लोग दवाई माँगने लगे. कुछ लोग सिर्फ़ फुटकर करवाने आते थे जिनसे कहना होता था कि ‘नहीं’. कुछ लोग कुछ लोगों का पता पूछने आते थे जिनसे कहना होता था ‘उधर से उधर से उधर’.

ज़िला अस्पताल के बाहर एक पेड़ था और मरीज़ को उसका नाम नहीं मालूम था. वसंत में उसका यौवन और उसकी खिली हुई आपत्तियां नहीं मालूम थीं. उसे अपनी बीमारी का नाम नहीं मालूम था. उसे अपने गाँव का नाम मालूम था. एक दिन एक लड़की ने मुझसे पूछा कि तुमने अस्पताल के बाहर वाले पेड़ का अजीब देखा है तो मैंने कहा कि हाँ. यह देखने का साझा था. मैं उस पेड़ को हिमाक़त या व्यस्त सड़क पर अतिक्रमण मानना चाहता था लेकिन लड़की के सवाल के बाद कुछ दिनों के लिए मैंने यह मानना चाहना टाल दिया.

लुब्रिकेशन कम हो गया था. हर चीज़ दूसरी चीज़ से रगड़ खा रही थी. माँ के घुटनों की तरह. हर पहले और हर दूसरे के बीच तीसरे तत्व का अभाव था. पलक झपकाने में भी बड़ा घर्षण था. लोग एकटक देखते रह जाते थे. यह देखने की मजबूरी थी. आँखों की बीमारी. कुछ लोगों को लगता था कि इसका इलाज हो सकता है. अब आँखों और पलकों के बीच की चीज़ गायब थी तो रोना मुश्किल हो गया. लोग रोने के लिए घबरा गए. बांधों, घड़ियालों और दलालों को भी दिक्कत हो गई. डॉक्टर पेड़ के अजीब के पड़ोस में बैठकर लुब्रिकेशन की दवा लिखने लगे. दवाई का नाम था जस्ट टियर्स.

मैं बहुत खुश होकर रोने की दवाई बेचने लगा.

जस्ट टियर्स. यह जस्ट फिट का कुछ लगता था. फूफा के लड़के का दोस्त टाइप कुछ. जस्ट फिट और जस्ट टियर्स के बीच कुछ था जो हर पहले और हर दूसरे के बीच के तीसरे तत्व की तरह आजकल नहीं था जैसे जस्ट फिट नाम की दुकान के ऊपर रहने वाले इंसान और जस्ट टियर्स नाम की दवाई बेचने वाले इंसान के बीच कुछ था जो आजकल नहीं था.


रोना लुब्रिकेशन की कमी दूर कर देता. मैं रोना चाहने लगा. बाँधों, घड़ियालों और दलालों की तरह. मैं बाँध होना चाहने लगा. भाखड़ा नांगल, हीराकुंड या रिहंद. मैं नेहरू के ज़माने का नवजात बाँध होता तो राष्ट्र की संपत्ति होता. मेरे बनने में सबकी दिलचस्पी होती. पन्द्रह दिन पर पंत जी और महीना पूरा होने पर पंडित जी मेरा जायज़ा लेने आते. मैं बहुत-से लोगों को विस्थापित कर देता और बहुत-सी मछलियों को संस्थापित लेकिन विस्थापितों के लिए रोने में मुझे जस्ट टियर्स की ज़रूरत न पड़ती. लुब्रिकेशन खत्म न हो गया होता. मेरे और विस्थापितों के बीच कुछ न कुछ होता. मेरे भीतर बहुत-सा पानी होता और बहुत-सी बिजली और बहुत-सी नौक़री और बहुत-से फाटक और बहुत-सी कर्मठता और और बहुत-सी ट्रेड यूनियनें और बहुत-सी हड़ताल और और बहुत-सी गिरफ़्तारी और बहुत-सी नाफरमानी.

मैं कहना न मानता. अन्धकार और दारिद्र्य में मैं पीले रंग का बल्ब बनकर जलता. मुझे बचाने और बढ़ाने की कोशिशें होतीं. मेरा भी दाम्पत्य होता और वसंत पंचमी होती मेरी शादी की सालगिरह. मैं मिठाई बाँटता और पगले कवि की तरह कहता कि मेरा जन्मदिन भी आज ही है. पेड़ के अजीब के साथ मेरा बराबरी का रिश्ता होता. मैं उसके कान में फुसफुसाता : ‘फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन...मफैलुन, मफैलुन...’. मेरे पेट में गाद न जमा होती. मुश्किल में मेरे दरवाज़े कभी भी खुल सकते होते. बिना घूस लिए उत्तर प्रदेश जल निगम जारी करता मेरे स्वास्थ्य का प्रमाण-पत्र. मैं बार-बार खाली होता और बार-बार भरा जाता. मुझसे कमाई होती और कुछ लोग मुझे आधुनिक भारत का मंदिर बताते. मैं सपाइयों-बसपाइयों के हत्थे न चढ़ा होता.

मैं सिद्धांत होता और कुछ देर के लिए ही सही, मैं बहस के एजेंडे को पलट देता. फिर सारी बातचीत पानी पर होने लगती. नागरी प्रचारिणी सभा की तरह मेरा पटाक्षेप न हो गया होता. नेशनल हेराल्ड की तरह, मैं धीरे-धीरे खत्म होता और कुछ कम भ्रष्ट लोग ही मेरे आसपास नज़र आ पाते. मेरे विनाश के अकल्पनीय नतीजे होते. मैं कुत्ते की मौत न मरा होता. मेरे उद्धार की कोशिशें होतीं और अंततः मैं एक प्रहसन बन गया होता. मैं बीमार हो पाता मेरे भी आँसू खत्म हुए होते मुझे भी जस्ट टियर्स की ज़रूरत होती.

David Pearce
मैं बाँध नहीं हो पाया मेरी चिता पर मेले नहीं लगे मैं दवा की दुकान पर बैठने लगा तो मैं पेड़ के अजीब को हिमाक़त या व्यस्त सड़क पर अतिक्रमण मानने ही वाला था कि एक लड़की ने मुझसे पूछा कि हर पीछे आगे होता है और हर आगे पीछे होता है न ? तो मैंने जवाब देने की बजाय सोचा कि जीवन कितना विनोदकुमार शुक्ल है फिर मैंने सोचा कि विनोदकुमार शुक्ल जा रहे होते तो यह कहने की जगह कि जा रहा हूँ, कहते कि आ रहा हूँ फिर मैंने सोचा कि अगर संभव हुआ तो मैं विनोदकुमार शुक्ल से वाक्यविन्यास से ज़्यादा कुछ सीखूंगा फिर मैं आगे चला गया फिर मैंने पाया कि जीवन कितना कम विनोदकुमार शुक्ल है.
 
लुब्रिकेशन विनोदकुमार शुक्ल की तरह कम हो गया था. हर चीज़ दूसरी चीज़ से रगड़ खा रही थी. जर्जर पांडुलिपियाँ एकदूसरे से रगड़ खाकर टूट रही थीं. महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘सरस्वती’ की पांडुलिपियों का बंटाधार हो गया. भारतेंदु की ‘कवितावर्धिनी सभा’और ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ की फ़ाइलें पहले ही ठिकाने लग गई थीं. आचार्य रामचंद्र शुक्ल-संपादित ‘हिंदी शब्द सागर’ को ‘सभा’ के ठेकेदारों ने गैरकानूनी तरीक़े से, पैसा लेकर ‘डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन’, युनाइटेड स्टेट्स की ‘साउथ एशियन डिक्शनरीज़’ नाम की वेबसाइट को बेच दिया है. यानी, अब वह शब्दसागर बनारस में नहीं है अमेरिका में है. लेकिन जैसा कि अमेरिकीकरण के हर आयाम के बारे में सच है, उसमें कुछ न कुछ मज़ा ज़रूर होता है, वह शब्दसागर भी इन्टरनेट पर लगभग मुफ़्त देखा जा सकता है. ठीक है कि पिछले पचास सालों में यह डिक्शनरी एक बार भी अपडेट नहीं हुई है, होगी भी नहीं, लेकिन अब, कम-से-कम देखी तो जा सकती है. एक मज़ा और भी है. इस बार पहले और दूसरे के बीच तीसरा तत्व है. हमारे और शब्दसागर के बीच अमेरिका है. और क्या तो लुब्रिकेशन है.


मैं पेड़ के अजीब को हिमाक़त या व्यस्त सड़क पर अतिक्रमण मानने ही वाला था कि एक लड़की ने मुझसे पूछा कि पब्लिक सेक्टर क्या होता है तो मुझे लगा कि यह खंडहर में जाने की तैयारी है. मैंने लड़की से कहा कि कल बताऊंगा. फिर मैं एक उजाड़ विषय का अध्यापक होना चाहने लगा. पेड़ के अजीब, बाँध और शब्दसागर की तरह मैं पब्लिक सेक्टर होना चाहने लगा. पब्लिक सेक्टर बनने के बाद ज़ोरज़ोर से बोलना पड़ता, फिर भी लोग सुन न पाते तो मैं और ज़ोर से बोलने की तैयारी करने लगा. यह तेज़ आवाज़ में अप्रिय बातें कहने का रिहर्सल था. फिर लड़की ने पूछा कि पहले सरकार ब्रेड क्यों बनाती थी और होटल क्यों चलाती थी तो मन हुआ कि कह दूँ कि अरुण शौरी उन्हें दलाली लेकर बेच सकें इसलिए, लेकिन तभी यह ख़याल आया कि सरकारी ब्रेड की मिठास लुब्रिकेशन की तरह खत्म है तो मैंने बुलंद आवाज़ में कहना शुरू किया कि तब तीसरी दुनिया के किसी भी देश में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सम्मेलन करने लायक कांफ्रेंस हॉल और शामिल देशों के प्रमुखों को टिकाने की जगह नहीं थी. आईटीडीसी का दिल्ली वाला होटल इसीलिए बना था. फिर यह जानते हुए कि कितना भी तेज़ बोलूँ, यह बात किसी को सुनाई नहीं देगी, मैंने कहना शुरू किया कि प्रतिकार के लिए कभी-कभी पाँच सितारा होटल भी बनाना पड़ता है. फिर मैंने पेड़ के अजीब की तरह कहा कि प्रतिकार भी करें हम रचना भी करें और बाँध की तरह कहा कि हमारी रचना हमारा प्रतिकार और शब्द सागर की तरह कहा कि प्रतिकार रचना होता ही है. 


Sonia Agosti
लुब्रिकेशन प्रतिकार की तरह कम हो गया था. मैं प्रतिकार की सही दिशा और उसका ठीक समय होना चाहने लगा. मैं प्रतिकार पढ़ना चाहने लगा तो मेरे अध्यापक ने मुझसे कहा कि पहले तुम्हें नकली प्रतिकार से चिढ़ना सीखना होगा. उन्होंने खाँसते-खाँसते कहा कि जिस बात से लोकतंत्र में तुम्हारा भरोसा कम होता हो वह अराजनीतिक बात है फिर उन्होंने कहा कि सारी बातें राजनीतिक बातें होनी चाहिए फिर उन्होंने कहा कि आंदोलन अगर लोकतंत्र को मज़बूत नहीं बनाता तो वह व्यक्तिवाद और पाखंड है फिर उन्होंने कहा कि अत्याचारी का कहना मत मानो.
 
मैं घूमने चला गया तो जो आदमी घूमने की जगह के बाहर संतरी बनकर खड़ा था उसने पूछा कि तुम किस नदी के हो. मैंने कहा कि मैं एक परिवार एक गाँव एक कस्बे एक शहर एक राज्य का हूँ और यह पहली बार तुमसे पता चला कि मुझे किसी नदी का भी होना चाहिए उसने कहा कि तुम किसी-न-किसी नदी के होते ही हो क्योंकि हरेक किसी-न-किसी नदी का होता है. हमलोग किसी-न-किसी नदी के होते हैं और यह हमें कभी पता होता है कभी नहीं पता होता. उसने आगे कहा कि यह न जानना कि हम किस नदी के हैं, नदी की हत्या करना है. मैंने कहना चाहा कि नदियाँ लुब्रिकेशन की तरह कम हो गई हैं लेकिन संतरी से डर गया.

तब से मैंने कुछ नहीं कहा है.


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( कविता के साथ दी गई तस्वीरें आर्ट एंड आर्ट गैलेरी से। कवि की तस्वीर सिद्धांत मोहन तिवारी के सौजन्य से। )