Thursday, February 14, 2013

तुम सभी रंग हो : के. सच्चिदानंदन की नई कविताएं


Sergei Inkatov

मैं तुम्हें याद करता हूं 

मैं तुम्हें याद करता हूँ
जैसे खो गई चाबी
अपने घर को याद करती है

तुम भागती हुई आती हो मेरे पास,
जैसे दफ़्न नदियों का गड़गड़ाता उछाह
शहर के हल्ले के साथ आये

सुनहला और भूरा सपना
कैनवस से गुज़रता, जहाँ देवी का अभ्युदय हो रहा है,
छिपछिपाकर इतिहास में दाखिल हो जाता है

जमे हुए समुद्र के भीतर
पक्षी पंख पसार लेते हैं
आसमान हरा है
लाशें तीरों की मानिंद तेज़ी में

2

तुम सभी रंग हो
तुम लाल और काला हो
खून का गुलाब
रात की इकलौती एकाकी हवा
तुम नीला और हरा हो
समुद्र का अनंत कमल
टिड्डे की पृथ्वी पर सवारी

तुम पीला और भूरा हो
कुमकुम के फूलों का सागर
समुद्र तट का पूरा चंद्रमा
सफ़ेद नहीं, प्लीज़

3

ये आईनाखाना है
हरेक आईने में से
एक खुद झलकता है तुम्हारा

तुम खुद से घिरी हुई
खुद से बाहर खुद की शक्ल बनाती हुई खुद से
यह शक्ल सिमटती है, फैलती है, कई गुना हो जाती है
इन अनगिन छवियों में मैं कौन हूँ
इनका ब्रश या पैलेट

यहाँ, मैं, टूटा हुआ
बस एक अनाथ आत्मा
एक तबाह गाँव
एक बंद गली

4

मुझे खोलो
विस्मृति की बर्फ से बाहर निकालो
तंग गलियों, धान के खेतों,
भारीभरकम शिलाओं, कुलदेवियों,
उनके करीब नाचते हुए लोगों से

सारे प्रवाह काँटों में उलझ गए
सभी पर्व रेत में जाकर सूख गए
हमारे कुछ कहने से पहले ही चले गए सभी महापुरुष
चिड़ियों के घोसलों में गूँजती घंटा-ध्वनि
जड़ों में डूबे सभी हाथ
जंगलों के व्याकरण

तुम्हारी आँखों में एक शेरनी है
और उस शेरनी की आँखों में
हूँ मैं
****

John Sokol

आखिरी नदी

आखिरी नदी में
पानी की बजाय खून बहता था
लावे की तरह खौलता हुआ
जिन आखिरी मेमनों ने उसका पानी पिया
वे बेआवाज़ मर गए
जो पक्षी उसके ऊपर से होकर उड़े
वे मूर्च्छित हो गए नदी में ही गिर गए
आंसू से भीगे चेहरे और रुकी हुई घड़ियाँ
खिड़कियों से गिरती ही रहीं

आखिरी नदी में एक माँ का चेहरा
डूब उतरा रहा था
एक लड़का नाव से उसे पार कर रहा था
उसके हाथ में एक जादुई घंटी थी
माँ से मिला आखिरी उपहार
उसकी स्मृति एक घर थी
हंसी से गूंजता घर

क्या तुम मुझसे डरते नहीं हो?
लड़के से पूछा आखिरी नदी ने
'नहीं', उसने कहा, 'आखिरी नदियों की संवेदना
रक्षा करती है मेरी
वे मेरी देखभाल करती रही हैं
मेरे पूर्वजन्मों में'
'तुम्हारे पिता ने मार डाला था उनको'
नदी बोली, उनका खून मुझमें प्रवाहित हो रहा है;
यह उनका क्रोध है जो मुझमें उबल रहा है

जवाब में लड़के ने घंटी बजा दी
बारिश होने लगी, प्यार ने नदी को शांत कर दिया
उसकी रक्तिमा नीले में बदल गई
मछलियाँ वापस आ गईं
नदी किनारे के पेड़ों में फूटने लगीं
आगामी कोपलें
घड़ियाँ फिर से चलने लगीं
यों, शुरू हुआ मनुष्यता का इतिहास

वह घंटी अब तलक गूँजती है
बच्चों की हँसी में
***

[ मलयाली भाषा के मशहूर कवि के. सच्चिदानंदन की इन नई कविताओं का अनुवाद हिन्दी के युवा कवि व्योमेश शुक्ल ने किया है। इसी जुगलबंदी का एक पूर्वरंग यहाँ भी। ]

10 comments:

Rukaiya said...

Adbhut shilp me rachi basi .. Lajawaab Kavitaiyan ... Aur behad sunder aur sateek anuwaad...

Kanchan Lata Jaiswal said...

यों, शुरू हुआ मनुष्यता का इतिहास

वह घंटी अब तलक गूँजती है
बच्चों की हँसी में.............बेहतरीन कविता.

Pawan Tiwari said...

kya khoob..

Priyankar Paliwal said...

वाह !

Shayda Bano said...

bahut sundar

SATCHIDANANDAN said...

Sundar anuvaad. dhanyavaad,donom ko. Satchida

चन्दन said...

बन्द कमरे में ये कविताएँ मुझ तक उसी अन्दाज में आई हैं जैसे इन दिनों खुले में बसंत आया होगा, यह मेरा अनुमान है. गज़ब की कविताएँ और बहुत सुन्दर अनुवाद. साधुवाद !

Ravi Shankar Kumar said...

bahut khoob!

Kamal Choudhary said...

Kavi aur anuvaadak badhai ke paatra . Abhaar

Sangya Upadhyaya said...

कविताएँ तो अच्छी हैं ही, व्योमेश शुक्ल ने अनुवाद भी बहुत अच्छा किया है.