Saturday, February 09, 2013

किसी की इच्छा करना, उसके भीतर इच्छा को रोपना है


मैं उन दिनों कविताएं लिखा करता था. क्यों लिखता था, मुझे नहीं पता. कब से लिखना शुरू किया था, यह भी नहीं पता. मुझे लगता है कि मैं हमेशा से लिखता था. मां के गर्भ के भीतर मैंने स्पर्श लिखा. दुलार लिखा. कुछ हरकतें लिखीं, जिन्हें सिर्फ़ मेरी मां ने पढ़ा. उन्हें पढ़ कर वह ख़ुश हुई. बहुत धीरे-धीरे मैंने देह लिखी. मैं सृष्टि का वह कवि हूं, जिसने बीज से पिंड तक सबकुछ लिखा. मैंने अपना होना लिखा, होने का आकार लिखा.
गर्भ से निकलने के बाद मैंने एक लंबी चुप्पी लिखी. उसके बाद एक दीर्घ रुदन लिखा.

कई बार मैंने सुबक के छंद में लिखा. कई बार गला रुंधने को मात्राओं की तरह प्रयोग किया. हिचकियों को तुक की तरह मिलाया. धरातल पर जैसे मेरे पैर चलते हैं, अ-धरा पर जैसे मेरा मन चलता है, उन तमाम चलने की लय पर लिखा.

मैंने कथ्य को रूप और रूप को कथ्य लिखा.

मैंने अपनी इच्छाओं के व्याकरण में लिखा.

जब मेरे पैदा होने का बीज भी नहीं बोया गया था, तब से मेरे भीतर इच्छाएं पलने लगी थीं. मेरे मां-पिता ने मेरी इच्छा की थी.

किसी की इच्छा करना, उसके भीतर इच्छा को रोपना है.

मैं तब से लिख रहा हूं, जब मैं इस धरती पर आया भी न था. इसीलिए मैं जो कुछ भी लिखता था, अपने न होने की वर्तनी में लिखता था.

इस तरह मैंने अपने न होने का अनाकार लिखा.

****
                                          
                                                                              [ गीत चतुर्वेदी की यह कविता उनकी नवीनतम रचना है.]

45 comments:

sarita sharma said...

गीत की कविता पढ़ रही थी.साथ में तुकाराम पर डी डी भारती पर कार्यक्रम चल रहा था.उनकी कवितायेँ-'सांसारिक दुखों से मैं दुखी हो गया' और 'बन्दर चने लेने के लिए मटके में हाथ डालता है.हाथ फंस जाता है मगर बन्दर चने गिर जाने के भय से मुठ्ठी नहीं खोलता है.' गीत की यह कविता इसी तरह मन की अव्यक्त इच्छाओं की लिपि है. जीवन की शुरुआत से अब तक भिन्न भिन्न स्थितियों में मनोभावों को नए बिम्बों से व्यक्त करती प्रवाहपूर्ण कविता.

Asma Saleem said...

a very touching experience and expression of being...

neeles.sharma said...

jab man thak jata hai, dimag kaam nahi karta, tarkon aur kutarkon se ladte ladte haar jaata hun,
jab khud me hi jhankne ki ichha hoti hai tab main chupchap bina kisi ko bataye geet ki kavitayen padhne chala aata hun...aur recharge hone ke baad fir apni raah pakad leta hun..aise kavi durlabh hi milte hain jo kisi shansha ki neend se bhi bahut jyada uchai par virajte hain.

expression said...

बेहतरीन.......
गीत जी की लेखनी के तो हम कायल हैं...

अनु

Navratan Purohit said...

गीत जी ...में धन्य हुआ ,इतनी सुंदर कविता ...बस ओरिअना फलासी की बरबस ही याद आ गयी ....बहुत सुंदर..सुभकामनाये

Neelotpal Ujjain said...

गीत जी की कविताएँ गहरे और सारगर्भित अर्थो का गुलदस्ता हैं.

usha verma said...

man ki gooRh ichchhaoN ki tarah sundar hai ye kawita :)

Sushobhit Saktawat said...

एक छवि मन में कौंधती है : पत्‍थर की ठोस सीढि़यों से उतरकर जल के तरल विस्‍तार में चले जाना।

इयत्‍ता से अनत्‍ता तक की यात्रा को आखिर और किस तरह देखा जाए? अक्‍सर इसे भाव से अभाव की यात्रा की ओर देखा जाता है, अस्ति से नास्ति, वस्‍तु से शून्‍य, धनांक से ऋणांक की ओर एक यात्रा की तरह। किंतु एक बोध यह भी है कि यह वस्‍तुत: एक वृहत्‍तर भाव, वृहत्‍तर अस्तिमूलकता, वृहत्‍तर धनांक की ओर गति है। यह परम व्‍याप्ति की ओर एक प्रस्‍थान है।

किसी की इच्‍छा करना यदि उसके भीतर इच्‍छा को रोपना है तो क्‍या यह संभव है कि मेरी तृष्‍णाओं के तृणमूल किसी अन्‍य-देह में दूर्वाओं की भांति फैले हों? क्‍या इसी तरह तृष्‍णा अपने स्‍वरूप में भवतृष्‍णा नहीं बन जाती? मेरे होने के पूर्व मेरा होना। मेरे होने के मानचित्र।

इस कविता का यश इसी में निहित है कि वह होकर न होने को आलोकित करती है। वह लिखने को आलोकित कर अ-लिखे को आलोकित करती है। वह आकार को आलोकित कर अनाकार को आलोकित करती है। और हमें यह दृष्टि देती है कि तमाम अस्तिमूलकताएं अपने भीतर बसे अनत्‍ता के एक शून्‍य से नि:सृत होती हैं, उसे एक नए स्‍तर पर पुन: रचती हैं।

'मैं तब से लिख रहा हूं, जब मैं इस धरती पर आया भी न था.' क्‍या यह कहने की आवश्‍यकता है कि यह एक बोर्हेशियन कथन है? वस्‍तुत: यह कथन ही नहीं, यह पूरी कविता ही बोर्हेशियन है : अपनी वस्‍तु ही नहीं, रूप में भी।

और तब, याद आता है वह नेत्रहीन कवि, जो असंख्‍य आंखों से देखता था, असंख्‍य देहों में बसता था और असंख्‍य प्रारब्‍धों को धारण करता था।

Suman Jain said...

Aaj samjh aaya ki apka naam Geet kyun rakha gaya....super'b

Pramila Maheshwari said...

there is a myth of Shiva and desire of Parvati ....we as human beings the extended self of her desire as desiring beings

Ravindra Vyas said...

main chup rahker iska aanand le raha hoon!

गाथी (gaathi) said...

अति सुन्दर !!!!

Pratibha Katiyar said...

Waah!

Sarjana Chaturvedi said...

adbhut h shabd lekhan ki yatra ka yeh nirantar chalne wala vratant sir

Ashutosh Sharma said...

SUPERB

Umesh Sharma said...

wahh waaah...ek dam naya prayog..aur anubhav...utkrashta.....

Suryakant Sharma said...

dilkash rachna

Anil Kumar Pathak said...

bahut khoob bhaiya

Vandana Khanna said...

geet ji awsum

Kanchan Lata Jaiswal said...

excellent expression.

Anonymous said...

geet apni kavita me darshan ko bhi naya arth dete hai......kisi ki ichcha karna uske bhitar ichcha ko ropna hai.....bahut vajan hai puri kavita me....

sandy said...

निष्ठाओं का कटोरा
थामे हाथ
दर्द से परेशां
हुए लहूलुहान
हुआ मन परेशां
रह -रह कुचलते
अरमान

निष्ठाएं ----
भरी दोपहर के सूरज की
गरमी सी तपती
बार - बार , हर बार
काली पड़ी दिखी
अमलतास की सी
पीछा छुड़ाने की जद्दोजहद में
लगा रहा मैं
हर निष्ठाओ से,

मगर चिपकी रही
मेरे मन से, मेरे दामन से
मेरी निष्ठाए
निष्ठाओं का कटोरा
छलकने के कगार तक
भरा है लबालब
और नहीं ,जगह खाली
लेशमात्र
बंद है सिलसला अब
निष्ठाओं के आने और जाने का।

संदीप तोमर

Manoj said...

हमेशा की तरह बेहतरीन अभिव्यक्ति...
गीत को पढ़ना सचमुच का कुछ नया और सार्थक पढ़ना होता है... उन्हें बधाई

Shashiprabha Gaur said...

Bahut khub !

Zafir Khan said...

kisi ki ichcha karna,uske andar apni ichcha ko ropna, ati uttam rachna

Arun Misra said...

adbhud mitr

Dhiraj Kumar Jha said...

शब्द उकेरना ... शब्दों से जाहिर करना ..
शब्दों को कलम से बांधना, सुना था ...
पर निशब्द कवितायेँ ! आज समझ में आई।आज जाना कि बिना कलम और शब्दों के भी कवितायेँ लिखी जाती है ...
सच !! यह जीवन ही स्वयं मात्र में एक कविता है ... कहीं तो पूरी हो जाती है पर कहीं अधूरी रह जाती है।
और हाँ ... यहाँ तक मेरा पहुँच जाना यूँही नहीं था ... कहीं न कहीं यह इच्छा भी रोपित था।

Sanjay Kumar said...

aapko duniya yaad karegi. vishram nahi lenge. chalte rahiye. hamari shubhkamnayen aapke saath.

Rajkumar Chhabra said...

Bahut hi achha likha hai......

Vijay Tarawade said...

सुंदर

Sandeep Rai said...

Very Nice

Ashish Gusain said...

kya baat hai sir ji..

maheshtt said...

i m speechless.

अपर्णा मनोज said...

भाषा में जिस तरह गीत चलते हैं या गीत में जिस तरह भाषा चलती है -वहां कविता आप ही जन्म ले लेती है . बहुत सुन्दर लिखते हैं गीत .

Riyaz khan khan said...

sarita sharma ji aap ne bilkul thik kaha... Ye kavita mein jiwan ke chakraweew ki anek suxm tatwo ko mala ke fulon ki tarah piroya gaya h, mano hame jiwan ka darpan ye kavita dikha rahi h.

Maya Kaul said...

गीत तुम सचमुच अद्भुद हो।मैं बहुत ऊहापोह में हू।कल्पना करती हूं कि तुम मन की परतों के किस ऊँचे धरातल पर हो।निश्चित की कुछ तो अलग होगा ही तुम्हारा मन।जहाँ तुम्हारी सोच होती है वहां क्या होता होगा निर्मल आकाश वंदनीय हवाएं सुकोमल मन या केवल एक आभामंडल।तुम्हारा आवास ही खोज रही हूं

Mridula Bhardwaj said...

Aap itna pyara kaise likh lete hain.. ek ek word padh kar lagta hai... Mehsoos ho raha h... Aapko padh kar goosebumps hote hain

Sarita Sharma said...

इच्छाओं का आदान-प्रदान. वी-फाई कनेक्शन. कभी यह कप एंड लिप के बीच की स्लिप है तो कभी इच्छापूर्ति के बाद की कहानी. 'कई बार मैंने सुबक के छंद में लिखा.' कितनी सुन्दर बात है.

Kusum Malhotra said...

bahut sunder.

Alpana Suhasini said...

अद्भुत

Sahil V. Dahiya said...

अद्भुत !

Bina Vachani said...

Geet it's so deep , resonote with each of us!Is there a way not to have any desire and impose too? There's always a conflict of mind and intellect within

AMRITA BERA said...

गीत जी की एक और अद्भुत कविता। जितनी बार पढ़ो, हरबार नए-नए अर्थों के साथ, पर्त दर पर्त खुलती है। क्या यह आपकी गद्य फ़ॉर्म में लिखी पहली कविता है? हार्दिक शुभकामनाएं आपको।

Bideshi Sasmal said...

बहुत बहुत धन्यवाद....

Jaswinder Seerat said...

आपकी कविताऐं कलपना का एक नया संसार रचती। हैं