सबद
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दो नई कविताएं : कुंवर नारायण



फोटो : गूगल 


बाद की उदासी

कभी-कभी लगता
बेहद थक चुका है आकाश
अपनी बेहदी से

वह सीमित होना चाहता है
एक छोटी-सी गृहस्ती भर जगह में,
वह शामिल होना चाहता है एक पारिवारिक दिनचर्या में,
वह प्रेमी होना चाहता है एक स्त्री का,
वह पिता होना चाहता है एक पुत्र का,
वह होना चाहता है किसी के आँगन की धूप

वह अविचल मौन से विचलित हो
ध्वनित और प्रतिध्वनित होना चाहता है शब्दों में
फूल फल पत्ते होना चाहते हैं उसके चाँद और तारे
आँसू होना चाहती हैं ओस की बूँदें...

अमरत्व से थक चुकी
आकाश की अटूट उबासी
अकस्मात टूट कर
होना चाहती है
किसी मृत्यु के बाद की उदासी !
***

कविता की मधुबनी में

सुबह से ढूंढ रहा हूँ
अपनी व्यस्त दिनचर्या में
सुकून का वह कोना
जहाँ बैठ कर तुम्हारे साथ
महसूस कर सकूं सिर्फ अपना होना

याद आती बहुत पहले की
एक बरसात,
सर से पाँव तक भीगी हुई
मेरी बांहों में कसमसाती एक मुलाक़ात

थक कर सो गया हूँ
एक व्यस्त दिन के बाद :
यादों में खोजे नहीं मिलती
वैसी कोई दूसरी रात।

बदल गए हैं मौसम,
बदल गए हैं मल्हार के प्रकार --
न उनमें अमराइयों की महक
न बौरायी कोयल की बहक

एक अजनबी की तरह भटकता कवि-मन
अपनी ही जीवनी में
खोजता एक अनुपस्थिति को
कविता की मधुबनी में...
***

[ हाल ही में सबद पर छपी कुंवर नारायण की दो अन्य कविताएं : यहाँ। ]
11 comments:

यादों में खोजे नहीं मिलती
वैसी कोई दूसरी रात।
kavita aur tasveer dono lajwaab


सब कुछ बदला - बदला सा ।
खेत, किसान और मैं भी !

अनुपमा तिवाड़ी


अपनी ही जीवनी में
खोजता एक अनुपस्थिति को...वाह!


कुंवर जी की कविताएँ भीतर का आइना दिखाती हैं. वे परत दर परत उतरते चले जाते हैं और जो कुछ अनछिला या अधूरा है उसे गहरे भेद के साथ रखते है.


थक कर सो गया हूँ
एक व्यस्त दिन के बाद :
यादों में खोजे नहीं मिलती
वैसी कोई दूसरी रात........खूबसूरत अभिव्यक्ति.


bahut khoobsoorat. kuch hi panktiyon mein ek umar bhar ka ehsaas


apratim... kunvar ji ki lines padhne ke baad man jaise apne aap me doob jata hai... kuchh kahna mushkil ho jata hai... baharhaal anurag ke prati haardik aabhaar...


सुबह से ढूंढ रहा हूँ
अपनी व्यस्त दिनचर्या में
सुकून का वह कोना
जहाँ बैठ कर तुम्हारे साथ
महसूस कर सकूं......

beautiful expressions... and it seldom happens that you get that sukun ka kona in your busy life...


अमरत्व से थक चुकी
आकाश की अटूट उबासी
अकस्मात टूट कर
होना चाहती है
किसी मृत्यु के बाद की उदासी !
***
आह!


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

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