Tuesday, January 01, 2013

दो नई कविताएं : कुंवर नारायण



फोटो : गूगल 


बाद की उदासी

कभी-कभी लगता
बेहद थक चुका है आकाश
अपनी बेहदी से

वह सीमित होना चाहता है
एक छोटी-सी गृहस्ती भर जगह में,
वह शामिल होना चाहता है एक पारिवारिक दिनचर्या में,
वह प्रेमी होना चाहता है एक स्त्री का,
वह पिता होना चाहता है एक पुत्र का,
वह होना चाहता है किसी के आँगन की धूप

वह अविचल मौन से विचलित हो
ध्वनित और प्रतिध्वनित होना चाहता है शब्दों में
फूल फल पत्ते होना चाहते हैं उसके चाँद और तारे
आँसू होना चाहती हैं ओस की बूँदें...

अमरत्व से थक चुकी
आकाश की अटूट उबासी
अकस्मात टूट कर
होना चाहती है
किसी मृत्यु के बाद की उदासी !
***

कविता की मधुबनी में

सुबह से ढूंढ रहा हूँ
अपनी व्यस्त दिनचर्या में
सुकून का वह कोना
जहाँ बैठ कर तुम्हारे साथ
महसूस कर सकूं सिर्फ अपना होना

याद आती बहुत पहले की
एक बरसात,
सर से पाँव तक भीगी हुई
मेरी बांहों में कसमसाती एक मुलाक़ात

थक कर सो गया हूँ
एक व्यस्त दिन के बाद :
यादों में खोजे नहीं मिलती
वैसी कोई दूसरी रात।

बदल गए हैं मौसम,
बदल गए हैं मल्हार के प्रकार --
न उनमें अमराइयों की महक
न बौरायी कोयल की बहक

एक अजनबी की तरह भटकता कवि-मन
अपनी ही जीवनी में
खोजता एक अनुपस्थिति को
कविता की मधुबनी में...
***

[ हाल ही में सबद पर छपी कुंवर नारायण की दो अन्य कविताएं : यहाँ। ]

11 comments:

Maitreyee said...

... yaad aur thakaan!

Vipin Choudhary said...

यादों में खोजे नहीं मिलती
वैसी कोई दूसरी रात।
kavita aur tasveer dono lajwaab

peer educators said...

सब कुछ बदला - बदला सा ।
खेत, किसान और मैं भी !

अनुपमा तिवाड़ी

Reenu Talwar said...

अपनी ही जीवनी में
खोजता एक अनुपस्थिति को...वाह!

neelotpal said...

कुंवर जी की कविताएँ भीतर का आइना दिखाती हैं. वे परत दर परत उतरते चले जाते हैं और जो कुछ अनछिला या अधूरा है उसे गहरे भेद के साथ रखते है.

Kanchan Lata Jaiswal said...

थक कर सो गया हूँ
एक व्यस्त दिन के बाद :
यादों में खोजे नहीं मिलती
वैसी कोई दूसरी रात........खूबसूरत अभिव्यक्ति.

AK said...

bahut khoobsoorat. kuch hi panktiyon mein ek umar bhar ka ehsaas

pranava priyadarshee said...

apratim... kunvar ji ki lines padhne ke baad man jaise apne aap me doob jata hai... kuchh kahna mushkil ho jata hai... baharhaal anurag ke prati haardik aabhaar...

Sanjay Jha said...

Nice..........

jp jain said...

सुबह से ढूंढ रहा हूँ
अपनी व्यस्त दिनचर्या में
सुकून का वह कोना
जहाँ बैठ कर तुम्हारे साथ
महसूस कर सकूं......

beautiful expressions... and it seldom happens that you get that sukun ka kona in your busy life...

अनुपमा पाठक said...

अमरत्व से थक चुकी
आकाश की अटूट उबासी
अकस्मात टूट कर
होना चाहती है
किसी मृत्यु के बाद की उदासी !
***
आह!