Sunday, January 06, 2013

कथा : 10 : कुमार अम्बुज की नई कहानी



घोंघों को तो कोई भी खा जायेगा

कुमार अम्बुज

(एक)
सबसे ज्यादा गुस्सा इन पैदल चलनेवालों पर आता है। साइड से चलेंगे नहीं। फुटपाथ होगा तब भी सड़क पर चलेंगे। सड़क पार करने में तो गजब ही कर देते हैं। दाएँ देखेंगे तो बाएँ नहीं देखेंगे। बाएँ देखेंगे तो दाएँ देखने का सवाल ही नहीं। फिर दो कदम आगे, एक कदम पीछे। अचानक दौड़ भी लगा सकते हैं।

मरना मुझे भी है। इसी ट्रैफिक में।

अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं और मेरे जैसे ज्यादातर लोग किसी दूसरी मारक बीमारी से नहीं मर सकते। एड्स जैसी बीमारियों के प्रति हम सावधान हैं, बाकी बीमारियों का इलाज कराने में सक्षम हैं। महामारियों का युग रहा नहीं। लेकिन इस ट्रैफिक का कुछ नहीं किया जा सकता। लेकिन आप इस तरह डर डरकर जी भी नहीं सकते। यह जीवन ऐसा ही है। जैसा आपको मिला है, जैसा आपको दिख रहा है। इसे ऐसा ही स्वीकार करना होगा। इसका व्यावहारिक अर्थ यह भी है कि आपको कोई टक्कर न मार पाए। लेकिन सड़क पर ड्राइव करते हुए, आप चाहें तब भी हर एक के जीवन के पक्ष में खड़े नहीं हो सकते।

मैं शुरूआती वर्षों में यह करके देख चुका हूँ कि मेरी कार के नीचे कहीं चींटी भी न आ जाए। सड़क पर पड़े फूल, तरबूज के छिलके और कागज तक को मैं बचाकर निकलता था। गाड़ी दाएँ-बाएँ कर लेता था, लहराकर निकल जाता था और देर तक खुश होता था कि मैं ऐसा कर पाया। पैदल, साइकिल सवार, स्कूटर- मोटरसाइकिल चलानेवाले बच्चों का भी बहुत ध्यान रखता था। कभी कोई दूर से ही कोई बच्चा आता-जाता दिखता था तो मैं एकदम सड़क किनारे होकर गाड़ी तक खड़ी कर लेता था। लेकिन बार-बार हुआ कि इन्हें बचाने की कोशिश में मेरी जान पर बन आती थी। मेरे दाएँ-बाएँ होने से या अचानक रुक जाने से कई बार मैं बहुत मुश्किल में फँसा। एक बार चैराहे पर एक बच्ची को बचाने के चक्कर में दूसरी गाड़ी से टकरा गया। मुआवजा दिया और चालान तक बन गया। मेरी एक बच्ची बड़ी हो रही है और बड़ा बेटा बेरोजगार है। अब मैं अपने लिए कोई जोखिम नहीं ले सकता।

(दो)
राहगीरों को समझना चाहिए कि उन्हें जानबूझकर कोई टक्कर नहीं मारेगा। लेकिन यदि एक तरफ से ट्रक जा रहा होगा और दूसरी तरफ राहगीर सड़क छोड़ने तैयार न होंगे तो आदमी अपनी गाड़ी लेकर ट्रक में तो नहीं घुसेगा।

मैं पैदल चलनेवालों पर इतना क्रोध न करूँ यदि वे सड़क ठीक तरह से पार करें। हद यह है कि सड़क पार करने में गिलहरियाँ, बंदर, कुत्ते, बिल्लियाँ भी इनसे बेहतर हैं। हालाँकि जानवर भी गाडि़यों के नीचे आते ही हैं लेकिन सर्वे किया जाए तो पता लग जाएगा कि वे पैदल चलनेवालों से ज्यादा चपल और समझदार हैं।
माना कि फुटपाथ नहीं हैं, सड़क किनारे चलने की भी जगह नहीं है। लेकिन इसमें मैं, एक अदना-सा कार चालक, भला क्या कर सकता हूँ? आप सरकार से कहिए। आंदोलन चलाइए। अभी तक दुर्घटना में मरे लोगों की स्मृति में स्मारक या चैराहा बनवाइए और तम्बू लगाइए। मेरी तरफ से सरकार आपके लिए, अलग से एक पूरी सड़क ही बनवा दे। मैं कहता हूँ पूरी रिंग रोड बना दे। अभी तो इस पैदल सेना की वजह से मेरे मरने का अंदेशा भी कुछ ज्यादा बना रहता है।

यकीन कीजिए, मैं बहता हुआ खून नहीं देख सकता। मुझे पिल्ले, बिल्ली या कबूतर तक का कुचला हुआ सिर पागल बना सकता है। इसलिए कभी मुझसे किसी को टक्कर लग जाती है तो मैं फिर वहाँ एक क्षण के लिए भी नहीं रुक सकता। मैं किसी को मरते हुए तो छोडि़ए, उसे कराहते हुए भी नहीं देख सकता। हो सकता है मुझे वमन हो जाए, गश आ जाए। फिर पुलिस का और अचानक इकठ्ठी हो जानेवाली भीड़ का कोई भरोसा नहीं। आपकी गलती न होने पर भी वे आपके साथ दुर्व्यवहार कर सकते हैं। जानलेवा किस्म की मारपीट कर सकते हैं। आपकी कार को तो वे खा ही जाएँगे। राख कर देंगे। वे जितने हुड़दंगी दिखते हैं, उससे कहीं ज्यादा ईर्ष्यालु हैं।

पहली बार भागने की घटना मैं कभी नहीं भूल सकता। मैं गाँधी मार्केट से लौट रहा था। रिवर्स गियर में मुझे थोड़ी दिक्कत होती थी वरना गाड़ी मैं अच्छे से चला लेता था। जिस मुख्य सड़क से मुझे घर लौटना था, वहाँ ट्रैफिक कुछ ज्यादा दिखा। तो मैंने एक पतली सड़क को पकड़ा जिस पर बहुत कम आवाजाही थी। आसपास कुछ झुग्गियाँ और ऐसे ही मैले-कुचैले, अतिक्रमणवाले घर बने हुए थे। खाली सड़क पर स्पीड अपने आप तेज हो जाती है। इसमें चालक की कोई गलती भी नहीं। अचानक उस पतली, सुनसान-सी सड़क पर एक सात-आठ साल का नंग-धडंग बच्चा दौड़ता हुआ आ गया, उसके पीछे तेजी से एक सुअर दौड़ रहा था। बहुत बचाते-बचाते भी कार का दायाँ हिस्सा बच्चे को लग गया और बायाँ हिस्सा सुअर को। सुअर अपनी चीं-चीं भरी गुर्राहट के साथ पलटकर बायीं तरफ चला गया लेकिन बच्चा वहीं कुछ छिटककर गिर पड़ा। दुपहर थी। जैसा कि बताया, एक सुनसान सा पसरा था। मैं कुछ सद्भाव में, कुछ आकस्मिकता में कार बंद करके, उतरने ही वाला था कि कुछ लोग झपटते दिखाई दिये। मैंने तत्परता नहीं दिखाई होती तो कुछ भी हो सकता था। बैक-व्यू मिरर में देखा कि वहाँ दस सेकंड में इतनी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी मानो हाट-बाजार का दिन हो। ये लोअर क्लास के लोग बहुत जल्दी इकट्ठा होते हैं। इन्हें कोई काम-धाम भी नहीं है। बच्चों को छुट्टा छोड़ देते हैं और लगता है कि ताक में हैं कि कोई उन्हें टक्कर मार दे। हो सकता है पैसा ऐंठने का यह उनका तरीका हो। इससे तो मिडिल क्लास के लोग बेहतर हैं। मुश्किल से इकट्ठा होते हैं। जब तक चीखो-पुकार हो, लोग आएँ और घेरा बनाएँ, आप आराम से भाग सकते हैं।

(तीन)
एक और मजेदार बात बताता हूँ। शहर के बीचों बीच जो सबसे लंबी पाँच किलोमीटर की सड़क, पंडित दीनदयाल मार्ग है न, अरे वही, जो इस सरकार के आने से पहले लिंक रोड कहलाती थी, उस पर एक दिन मुझे, ट्रैफिक के एक सिपाही ने हाथ देकर, अँगूठा दिखाकर रोका। हल्की बारिश हो रही थी और मैं कुछ अच्छे मूड में था। मैंने गाड़ी रोक दी। उसने कहा कि मैं लिफ्ट देकर उसे उधर कोर्ट जानेवाले चैराहे तक छोड़ दूँ। मैंने बैठा लिया। मैंने हल्की आवाज में एमपी 3 प्लेयर भी शुरू कर दिया। कजरारे-कजरारे। वह अभिभूत और कृतज्ञ हो गया। ऐसा मुझे लगा। हम सब जानते हैं कि ट्रैफिक के सिपाहियों को कितना कम पैसा मिलता है और कितनी कठिन ड्यूटी करना पड़ती है। कारवाले उन्हें अक्सर लिफ्ट नहीं देते और धूप में, बारिश में भी मोटरसाइकिलवालों से ही उन्हें काम चलाना पड़ता है। मुझे भी अच्छा लग रहा था कि चलो, इसी बहाने सही इस बेचारे को लक्झरी गाड़ी का लुत्फ उठाने का मौका मिल रहा है। मैं अपने इस नेक काम के बारे में, यह सब सोच ही रहा था कि बारिश तेज हो गई और गुब्बारे बेचनेवाले एक आदमी ने बारिश से बचते हुए, गुब्बारों सहित दौड़कर सड़क क्रॉस करनी चाही।

अब आप ही बताइए, दीनदयाल मार्ग को आप इस तरह, अंधों की तरह क्रॉस करेंगे तो क्या होगा। यह तो शहर का इंटरनल हाईवे है जनाब! ब्रेक लगाते-लगाते भी उसका गुब्बारोंवाला डंडा चपेट में आ गया और वह खुद भी उस वजह से लड़खड़ाकर गिर पड़ा। अब क्या होगा! बगल में सिपाही है। मैं पहली बार ऐसा घबराया कि पसीना आ गया। लेकिन उस सिपाही ने तत्काल मुझसे कहा कि भाई साहब, आप रुकिए मत, एकदम निकल चलिए। यहाँ बेकार ही लफड़ा हो जाएगा। आप भले आदमी हैं। मेरी तो जान में जान आ गयी। फिर मैंने कोर्ट चैराहे पर पहुँचकर दम ली। उस भले सिपाही को मैंने जिद करके एक सौ रुपए दिए। इन सिपाहियों का भी कोई भरोसा नहीं किया जा सकता। इसलिए मैं उसे उतारकर कुछ इस कोण से भागा कि कहीं उसे मेरी गाड़ी का नम्बर न दिख जाए। तो इस तरह के हादसे भी होते रहते हैं। आपकी नीयत साफ हो तो बचानेवाला कोई न कोई मिल ही जाता है।

(चार)
आपको कहीं-कहीं लग सकता है जैसे मैं कोई संवेदनहीन या अमानुषिक हूँ। जबकि ऐसा है नहीं। मैं अपनी किशोरावस्था की एक बात बताता हूँ। मेरी उमर कोई सोलह साल की रही होगी, मेरे पिताजी मारुति चला रहे थे। उस समय मारुति फैशन में थी। गल्र्स हॉस्टल के सामने उनसे एक पिल्ला कुचल गया। उस पिल्ले की कूं-कूं भी ज्यादा तेज नहीं निकली। पिताजी ने गाड़ी कतई धीमी नहीं की, वे उसी रफ्तार से चलते रहे। जैसे स्पीड ब्रेकर भी न आया हो। मुझे तो लगा कि उल्टी हो जाएगी। उबकाई आई भी। मैंने खिड़की के बाहर सिर निकाला तो मुँह से कुछ खट्टा पानी निकला। मुझे तीन दिन तक मितली आती रही। पिताजी को मैंने क्या कुछ नहीं कहा। लेकिन उन्होंने ज्यादा तवज्जो नहीं दी और आखिर एक बार इतनी जोर से डाँटा कि मामला ही खत्म हो गया। पिताजी पर मुझे कई दिनों तक काफी गुस्सा रहा। लेकिन अब जाकर, इतने सालों तक ड्रायविंग करते हुए मैं उनकी मुश्किल और मजबूरी समझ पाया हूँ। कोई भी चालक मजे के लिए न तो टक्कर मारता है और न ही कुचलता है। यह टैªफिक ही इतना पेचीदा और जानलेवा हो गया है कि इसके लिए किसी एक व्यक्ति को उत्तरदायी ठहराना एकदम नाजायज है। लेकिन शहर में सबसे आसान शिकार तो बेचारा कार ड्राइव करनेवाला ही होता है। आप न तो गाय-भैंस को कुछ कहेंगे, न ही कुत्तों, सुअरों, नंगधडंग बच्चों को, न सड़क के गढ्ढों को, न काले अदृश्य डिवाइडरों को, न गलत ढ़ंग से लहराकर चलनेवाली स्कूटियों और मोटरसाइकिलों को और न ही इन गंवार पैदल चलनेवालों को। हद यह है कि लोग कुत्तों को तो गले में पट्टा बाँधकर, सावधानी से सड़क पर घुमाते हैं लेकिन बच्चों को ऐसा खुला छोड़ देते हैं जैसे कि उनकी कोई परवाह ही नहीं है। और ये हादसे ही होते हैं जो आपकी संवेदना को लगातार भौंथरा करते जाते हैं।

ऐसा नहीं कि मैं किसी से नहीं डरता। ट्रक, मिनी बस, डम्पर और ट्रैक्टर देखकर तो मेरी भी हवा निकल जाती है। मैं इनसे बचता हूँ, इन्हें ओवरटेक भी बहुत एहतियात से करता हूँ। बस इतनी सी सावधानी ने मुझे जिंदा बचाए रखा है। हालांकि कब तक, मैं खुद नहीं जानता। लेकिन मैं मर्दानेपन से गाड़ी चलाता हूँ। गाड़ी चलाने में जो डर गया सो समझो कि मर गया। जैसी कि लोकप्रिय और महान कहावत हैः यहाँ जो डरेगा वही तो मरेगा।

(पाँच)
मेरी कुछ मुश्किलें और बताता हूँ। जिससे साबित होगा कि किस कदर मजबूरी में टक्कर होती है। एक रात साढ़े बारह बजे मैं मेन रेल्वे स्टेशन से, दोस्त को छोडकर घर लौट रहा था। चैदह किलोमीटर का सफर था और सूनी सड़क। ड्रायविंग का आनंद आ रहा था। सरकारी अस्पताल के मोड़ पर यकायक दिखा कि दो लड़के, लगभग बीच सड़क पर चल रहे थे। यह मेरी सावधानी ही थी कि एक बच गया।

लेकिन मेरा मूड खराब हो गया था। रात में मैं ठीक से सो भी नहीं पाया। फिर मैंने सोचा कि चलो, अस्पताल पास में ही था। बेड-टी पीते हुए अखबार में पढ़ा कि एक अज्ञात सफेद रंग की गाड़ी से, सरकारी अस्पताल के सामने धक्का लगने से गिरकर आईआईटी में पढ़नेवाले लड़के की मृत्यु हो गई। साथवाला लड़का केवल गाड़ी का रंग देख पाया। नम्बर तो छोडि़ए वह तो यह भी नहीं बता पा रहा है कि गाड़ी थी कौनसी, मारुति, होण्डा सिटी, फोर्ड या सेन्ट्रो। मुझे बहुत रंज हुआ। आखिर मेरे भी बाल-बच्चे हैं। लेकिन तरस भी आया कि इतना समझदार लड़का, जो आईआईटी में था और जिसकी अक्ल पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए, वह सड़क पर चलना नहीं सीख पाया। तुम लाख जहीन हो, गणितज्ञ हो या गजब के खिलाड़ी। लेकिन सड़क पर चलना तो सीखना ही पड़ेगा। यहाँ कोई दूसरा मौका नहीं मिल सकता। और फिर देर रात इस बुद्धिमान को टहलने की क्या सूझी थी! इतने पास अस्पताल होते हुए भी कोई उसे बचा नहीं पाया। कहो, डॉक्टर ही ड्यूटी पर न रहे हों। ओफ्फो, आखिर मैं क्या करूँ? क्या मर जाऊँ? या इस शहर में पैदल चलने लगूँ? इन सब लोगों ने तो मिलकर मेरा जीना ही हराम कर दिया है। मरो साले। मरो। लेकिन तुम मेरी कार के नीचे आकर ही क्यों मरना चाहते हो। ये अखबारवाले भी गजब के हैं। रात साढ़े बारह बजे की घटना, सुबह छः बजे छपकर आ गयी। सच कहूँ, उस दिन भर मेरा सिर दुखता रहा। लेकिन जीवन की आपाधापी और विशालता सामने थी। एक काम्बीफ्लेम से मेरा काम चल गया। एसीडिटी से बचने के लिए मैंने एक रेनाटिडीन की टेबलेट भी खायी।

(छह)
लोगों की लापरवाही के भी अनंत किस्से हैं। एक दिन मैंने देखा कि मई की दुपहरी में, पुरानी विधानसभा के सामने, दायीं तरफ एक हाथठेलेवाला आदमी हतप्रभ खड़ा है। उसके ठेले पर हरे गहरे रंग के तरबूजों का ढेर है। उससे दस-बारह फीट दूर एक तरबूज फटा पड़ा है और उसका कुछ लाल हिस्सा दिख रहा है, उसका रस भी बह रहा है। लेकिन जल्दबाजी में देखने से, ऐसा हो जाता है। मुझे क्षमा करें। दरअसल पास ही एक मोटरसाइकिल भी पड़ी थी और जिसे मैं तरबजू समझ रहा था, वह तरबूज नहीं था, गहरे हरे, लगभग मूँगिया रंग के हेलमेट के अंदर एक लड़के का फटा हुआ सिर था। पास खड़े तरबूज के ठेले ने उस पूरे दृश्य को समझने में अजीब घालमेल कर दिया था। पता लगा कि हेलमेट का बेल्ट ठीक से नहीं बँधा था और वह कोई चालू कंपनी का हेलमेट था। इस हद तक लोग लापरवाही करते हैं। आई एस आई मार्के का हेलमेट ठीक से पहना होता तो सिर तरबूज की तरह नहीं फटा होता। क्या अब भी आप सिर्फ मिनी बसवाले ड्रायवर को दोष देंगे?

एक हादसा तो मेरे ही साथ होने से बचा। स्टेट बैंक के चैराहे पर एक बुढ्ढा इतनी तेजी से सड़क पार करने लगा कि मुझे उसके बुढ्ढे होने पर संदेह हुआ। और ठीक बीच सड़क पर वह अचकचाकर गिर गया। वह तो गनीमत थी कि चैराहे की भीड़ की वजह से मेरी कार बेहद धीमी थी। समय पर ब्रेक लग गया। बहुत से लोग इस घटना के दर्शक थे। सबने मुझे शाबासी दी कि कितनी सावधानी से ड्राइविंग करते हैं। उत्साहित होकर मैंने गाड़ी एक तरफ पार्क करके, उन बुजुर्ग को उठाने में मदद की और गुलमोहर के पेड़ के नीचे बैठाया। कुछ संयत होने पर उन्होंने बताया, ‘बेटा, मुझे शुगर की बीमारी है। ब्लड प्रेशर भी रहता है।’ गाड़ी चलानेवाले करें तो करें क्या? यों किसी की शुगर अचानक बढ़ जाए, या हाइपोग्लोसोमिया हो जाए, बी.पी. बढ़ने से चक्कर आ जाएँ और बीच सड़क पर वह किसी आसमानी आफत की तरह गिर पड़े तो कुशल से कुशलतर चालक भी आपको नहीं बचा सकता। (आश्चर्य है कि लोग अपने बुजुर्गों की ंिचता नहीं करते। जैसे कुछ लोग अपने बच्चों की भी नहीं करते। दोहराने के लिए माफ करें लेकिन लगता है कि सिर्फ अपने कुत्तों की फिक्र करते हैं।)

(सात)
मुझे संगीत सुनने का बहुत शौक है। लेकिन वक्त की सख्त कमी है। कई बार तो मैं नहाते हुए, रेडियो तेज कर गाने सुनने की कोशिश करता हूँ। शावर की और संगीत की आवाज का बेमेल सहन करता हूँ। फिर अंतःवस्त्र पहनते हुए, कंघा करते हुए और कपड़े पहनते हुए। इसके बाद थोड़ा समय कार ड्राइव करते हुए मिलता है। तो मैं, एफ एम सुन रहा था। इन एफएमचियों की भाषा में कहूँ तो मिर्ची खाकर खुश हो रहा था, लाइफ बना रहा था, बजाते रहो की तर्ज़ पर बजा रहा था और जिंदगी में रोशनी भर रहा था। एक लड़की और एक लड़का रेडियो पर इस अंदाज में बात कर रहे थे कि उनकी वास्तविक आवाज कभी पहचानी नहीं जा सकती थी। लड़की की आवाज में तो आशा भौंसले और गीता दत्त की आवाजों की खरोंच शामिल थी और वह लगातार इठला रही थी। तभी मोबाईल पर भी एक जरूरी काॅल लेना पड़ा। कि सामने गाय आ गयी।

अब आगे गाय। बगल में एक साइकिलवाला। दायीं तरफ टाटा सफारी और उसके ठीक पीछे स्टार पब्लिक बस। फिर भी मैंने भरसक कोशिश की और उस साइकिल सवार को बचाने के चक्कर में थोड़ी सी टक्कर गाय को लग गयी। उसकी टाँग में गाड़ी का बम्पर लगा। पीछे ट्रेफिक था। मुझे उतरना ही पड़ा। मैं तत्काल समझ गया कि गाय को टक्कर मारकर आप इतनी आवाजाही के बीच भाग नहीं सकते। (माफ करें, यों जब मैं पिछली बार यूरोप गया था, मैंने गाय का मांस तक खाया है, और मुझे कोई ऐसा खास फर्क भी नहीं लगा था। यानी न तो अच्छा और न बुरा। भूख जो न कराए सो कम।) लेकिन वक्त की नजाकत को समझकर मैं एकदम रुआँसा हो गया और मैंने अफसोस में अपने माथे पर तीन-चार बार हाथ मारा और जोर से कहा कि हाय, यह मुझसे क्या हो गया। मैंने तुरंत जाकर, सींगों से बचते हुए उसके अगले दोनों खुर छू लिए और सरेआम क्षमायाचना की। एकत्र हो गए फुरसती जनसमूह पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ा।

उसी समय न जाने कहाँ से एक पीताम्बरी प्रकट हो गया और बताने लगा कि वह गोरक्षा समिति का उपाध्यक्ष है। मैंने उसके भी पैर छुए और कहा, ऐसी संकट की घड़ी में आप अच्छे आये। उन्हें मैंने बिना माँगे, पाँच सौ रुपए दिए और आग्रह किया कि वे कृपा कर इस गाय माता के इलाज का प्रबंध कर देंगे। उसने धीरे से कहा कि एक हजार लगेंगे। मैंने बिना हुज्जत के पाँच सौ रुपए का एक और नोट पकड़ाया। एक मात्र यही दुर्योग था कि मैं भीड़ में फँस गया था लेकिन प्रत्युन्न्मति ने मुझे बचा लिया। मैंने शिक्षा ली कि गाय को छोड़कर किसी को भी टक्कर मारी जा सकती है।

(आठ)
पैदल चलनेवाले लोगों की हरकतों का मुझ पर भी काफी असर आ गया है। पिछले इतवार शाम 7 बजे मैं सोडा और कुरकुरे लेने सामने के साँची प्वाइंट पर जा रहा था। सड़क पार करते हुए मैं भी अचानक आगे-पीछे होने लगा। वह तो अच्छा हुआ कि एक मोटरसाइकिल सवार ने मुझे सिर्फ माँ की गाली दी और सर्र से चला गया। वह टक्कर भी मार सकता था। ये पैदल चलनेवाले अपनी हरकतों से सबको प्रभावित कर रहे हैं। इनको देखकर तो अच्छे भले लोग भी बिगड़ रहे हैं और सड़क पार करने में लड़खड़ा रहे हैं। उसी दिन से मैंने कसम ली कि भूल से भी अब पैदल नहीं चलना है। पैदल, सड़क पार तो कभी नहीं करना। अब मैं जरा सी दूर के लिए भी, यहाँ सामने तक के लिए भी कार से ही जाता हूँ। इसीमें सुरक्षा है। हो सकता है पैदल न चलने से मुझे गठिया हो जाए, जोड़ों में दूसरी तरह की तकलीफें हो जाएँ। मगर जान तो बची रहेगी।

लेकिन ये सब सिर्फ सावधानियाँ हैं। चालाकियाँ हैं। भय हैं और उपाय हैं। इनसे आप केवल दुर्घटनाओं को, असामयिक मौतों को स्थगित कर सकते हैं। रोक नहीं सकते। सबको इन्हीं सड़कों पर मरना है। आज या कल। परसों तो पक्का। मैं इस यथार्थ भरे जीवन दर्शन से परिचित हूँ। लेकिन मैं रुक नहीं सकता। ट्रैफिक ऐसा है कि मैं धीमा भी नहीं चल सकता। हम सब वध्य हैं। जैसे समुद्र का नियम है कि बड़ी मछली, छोटी मछली को खा जाती है, वैसे ही यह सड़क का नियम है। यहाँ बड़ी गाड़ी, छोटी गाड़ी को खा जाती है। पैदल चलनेवाले घोंघों को तो कोई भी खा जाएगा।

ज्यादा से ज्यादा आप बीमा राशि और मुआवजा वसूल सकते हैं। हर घर में दुर्घटना में मारे गए लोगों की तस्वीर है। लेकिन घर का कोई आदमी यह अफोर्ड नहीं कर सकता कि वह मोटरसाइकिल या कार न चलाए। पैदल की तो बात क्या, सार्वजनिक बसों में, इंटरसिटियों में भी एक दिन उसे मरना है। रोज पायदान पर लटकने की कोशिश में घिसटकर मरनेवालों की सूचना के लिए तो अब अखबारों में भी एक अगल काॅलम आने लगा है।

(नौ)
जैसी आशंका थी, आखिर सूख गयी महानदी की रेत भरकर लाते हुए ट्रक ने मेरी कार में सीधी टक्कर मारी। अब यदि मैं बच भी गया तो फिर सड़कों पर, इसी तरह से अपना जीवन दाँव पर लगाने के लिए प्रस्तुत रहूँगा। विवश हूँ। कुल मिलाकर यही जीवन है। जैसा है, जहाँ है। मैं विकल्पहीन हूँ। जानबूझकर न मैंने कभी किसी को मारा है और न ही किसी ने लक्ष्य बनाकर मुझे मारने की कोशिश की है।

मुझे अपनी इस दुर्घटना के बारे में केवल इतना याद आ रहा है कि उस समय, ट्रक को एकदम सामने देखकर, दरअसल मैं डर गया था। अन्यथा, साइड में कुछ जगह थी, जहाँ से इक्का-दुक्का लोग पैदल जा रहे थे। लेकिन न जाने क्या हुआ था कि मैं डर गया।
***




[ कुमार अम्बुज हिंदी के जाने-माने कवि-कहानीकार हैं। 
सबद पर कुमार अम्बुज की अन्य रचनाएँ यहाँ
इस स्तम्भ के तहत छपी  अन्य कहानियां यहाँ।  
तस्वीर : गूगल से। ]  

Tuesday, January 01, 2013

दो नई कविताएं : कुंवर नारायण



फोटो : गूगल 


बाद की उदासी

कभी-कभी लगता
बेहद थक चुका है आकाश
अपनी बेहदी से

वह सीमित होना चाहता है
एक छोटी-सी गृहस्ती भर जगह में,
वह शामिल होना चाहता है एक पारिवारिक दिनचर्या में,
वह प्रेमी होना चाहता है एक स्त्री का,
वह पिता होना चाहता है एक पुत्र का,
वह होना चाहता है किसी के आँगन की धूप

वह अविचल मौन से विचलित हो
ध्वनित और प्रतिध्वनित होना चाहता है शब्दों में
फूल फल पत्ते होना चाहते हैं उसके चाँद और तारे
आँसू होना चाहती हैं ओस की बूँदें...

अमरत्व से थक चुकी
आकाश की अटूट उबासी
अकस्मात टूट कर
होना चाहती है
किसी मृत्यु के बाद की उदासी !
***

कविता की मधुबनी में

सुबह से ढूंढ रहा हूँ
अपनी व्यस्त दिनचर्या में
सुकून का वह कोना
जहाँ बैठ कर तुम्हारे साथ
महसूस कर सकूं सिर्फ अपना होना

याद आती बहुत पहले की
एक बरसात,
सर से पाँव तक भीगी हुई
मेरी बांहों में कसमसाती एक मुलाक़ात

थक कर सो गया हूँ
एक व्यस्त दिन के बाद :
यादों में खोजे नहीं मिलती
वैसी कोई दूसरी रात।

बदल गए हैं मौसम,
बदल गए हैं मल्हार के प्रकार --
न उनमें अमराइयों की महक
न बौरायी कोयल की बहक

एक अजनबी की तरह भटकता कवि-मन
अपनी ही जीवनी में
खोजता एक अनुपस्थिति को
कविता की मधुबनी में...
***

[ हाल ही में सबद पर छपी कुंवर नारायण की दो अन्य कविताएं : यहाँ। ]