सबद
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प्रभात की तीन नई कविताएं

3:40 pm


David Croitor
कस्बे का कवि

वह कोई अधिकारी नहीं है कि लोग
जी सर, हां सर कहते हुए कांपें उसके सामने
नेता नहीं है कि इंसानों का समूह
पालतू कुत्तों के झुण्ड में बदल जाए उसे देखते ही

ब्याज पर धन देकर
ज़िन्दगी नहीं बख्श सकता वह लोगों को
कि लोगों के हाथ गिड़गिड़ाते हुए मुड़ें

वह तो एक छोटा-सा कवि है इस कस्बे का
रहता है बस स्टॉप की कुर्सियों
बिजली के खम्भे-सा
टीन का बोर्ड अजनबियों को
पते बताता हुआ
अपने होने को कस्बे से साझा करते हुए
सुबह-शाम सड़क किनारे के पेड़ों-सा दिखता

साइकिल पर दौड़ता प्लम्बर
ठहर जाता है उसे देखकर
अरे यार नहीं आ सका
नल की टोंटी ठीक करने
दरअसल क्या है न
कि मोटे कामों से ही फुर्सत नहीं मिलती
पर आऊंगा किसी रोज
अभी किसी तरह काम चला

प्रेमी जोड़े जिन्होंने कविताएं पढ़ी हैं उसकी
देखा है उसे डाकघर की तरफ आते-जाते
साल में एकाध जोड़े उनमें से
उसकी कविताओं की खिड़की से कूद कर
सुरक्षित निकल जाते हैं कस्बे से
***

 जैसे

जैसे पेड़ को नहीं बताना पड़ता
मैं क्यों बैठा हूं उसकी छांव में
जैसे राह को नहीं बताना पड़ता
मैं क्यों चल रहा हूं उस पर
जैसे नदी को नहीं बताना पड़ता
मैं क्यों जा रहा हूं दूसरे किनारे पर
जैसे बादलों को नहीं बताना पड़ता
कहां तक चलूंगा उन्हें देखता

जैसे तुम्हारे चेहरे को नहीं बताना पड़ता
क्यों पड़ा हूं उसमें, घास में नाव की तरह
जैसे तुम्हारी आंखों को नहीं बताना पड़ता
क्यों तोते की तरह लौटता हूं इन्हीं कोटरों में
जैसे तुम्हारे कानों को नहीं बताना पड़ता
क्यों सुनाई देता हूं फूलों के टपकने की तरह
जैसे तुम्हारे पांवों को नहीं बताना पड़ता
क्यों घर में घुसने से पहले फटकारी जाने वाली धूल हूं मैं
जैसे तुम्हारे बदन को नहीं बताना पड़ता 
क्यों तुम्हारे नहाने का पानी हूं मैं
***  


बिछुड़ने के बाद

बिछुड़ने के बाद तीस साल
कोई कम अंतराल नहीं
मिल भी जाएं तो पहचानना मुश्किल
पहचान भी जाएं तो बच निकलने से बढ़िया कुछ न लगे

याद करो तीस बरस पहले के जीवन को
जिसे अभी खिलना था
याद करो उसके तीस बरस बाद को
जब यह जीवन खिल भी चुका और झर भी गया
कुछ और झरना शेष है

तुम्हारा जीवन भी इतना तो झर ही गया
कौन जाने समूचा ही झर गया हो
हवा बुहार ले गई हो यादों के अवशेष भी
पर जैसे कि मैं किसी अनहोनी का शिकार नहीं हुआ
और जीवित हूं
तुम्हारे जीवित होने के कामना करता हूं

तुमने इस संसार में रुचि बनाए रखने के लिए
क्या-क्या जतन उठाए
जैसे कि मैंने उदासियों को
किताबों की उदासियों के साथ घुला मिला दिया

नहीं, कोई पीड़ा नहीं
मलाल जैसा कुछ भी नहीं
पर जीवन में यादों को उगाना भी कम मुश्किल नहीं
याद करके रो सकने की तो बात ही दूसरी है
***

                                



 { चर्चित कवि प्रभात की ताज़ा कविताएं सबद पर पहली दफ़ा . }
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जिसने हमेशा जाना चाहा, उसका इंतज़ार कैसा

2:13 pm

{ यह गद्य देवयानी भारद्वाज का है. देवयानी कविता लिखती रही हैं इसलिए इस गद्य का लबो-लहजा बहुत दूर तक काव्यात्मक है. इसे देवयानी ने अपनी डायरी के सफ़ों पर मुमकिन किया है. अमूमन ये सफ़े 'निज-बात' की जगह होते हैं. एक लेखिका से ज़्यादा एक स्त्री-मन यहाँ खुलता है. उस मन का उल्लास और उदासी दर्ज़ करती हुई देवयानी.
लेखिका की तस्वीर पद्मजा गुनगुन के कैमरे से.} 




वल्‍नरेबि‍लिटी

लिखना, कहना यह सब हमें एक्‍सपोज करता है. हम वल्‍नरेबल होते जाते हैं. तो क्‍या न लिखें? न कहें? लेकिन तब भी वल्‍नरेबिलिटी कुछ कम तो नहीं होती.


शाम

अक्टूबर की शाम की उदासी जैसी उदासी तारी है... कितनी अपनी-सी लगती है यह उदासी, जैसे बचपन की दोस्त कोई बड़े दिनों बाद मिलने आयी हो... शरद तुम ऐसे ही आना हर बार.


जिन्दगी आ रही हूँ मैं

मैंने कह दिया है....जिन्दगी आ रही हूँ मैं ...बस दो चार साल ठहर जाओ....इधर कोई भी विचार मन में आता है तो यही तो कहती हूँ खुद से...लेकिन यह क्या अब से कह रही हूँ?....जाने कब से यही तो कह रही हूँ...


क्‍या टूटता है कहां

बोलो तो मूर्तियाँ टूट जयेंगी, विध्वंस होगा... न बोलो तो जो टूटता है उसका विध्वंस किसी को दिखायी नही देता... आप कैसे तोड़ दो उन मूर्तियों को जिनसे बहुत प्यार है... तो फिर क्या खुद से प्यार नहीं, यह केसी दुविधा है?


असर

किसी भी बात को कह दिए जाने का असर कम से कम तीन तरह से हो सकता है. एक, जो आप चाहते हैं कि हो. दूसरा, जो आप चाहते हैं कि न हो और तीसरा, जिसकी आपने कल्‍पना भी न की हो. आप कितना भी खुद को तैयार करें, अंततः किसी भी असर के लिए खुद को कुछ कम ही तैयार पाते हैं.


मुहावरा

मेरे पास अपनी कविता का कोई मुहावरा नहीं है. या है भी तो मैंने उसे अभी तक जाना नहीं है. वैसे मुझे लगता है कि जिंदगी को जीने के लिए हर इंसान को अपना मुहावरा चाहिए होता है, जो उस मुहावरे को पा लेते हैं, उनके लिए चीजें आसान तो नहीं होतीं लेकिन वे अपनी कठिनाइयों से जूझना जानते हैं. या कहना चाहिए कि यह जानना ही उनका मुहावरा बन जाता है.


यह माजरा क्‍या है

कोई कैसे जान लेता है कि वह प्रेम में है --- और यह भी कि अमुक व्‍यक्ति के लिए जो भाव मन में उमड़ आता है, वह प्रेम ही है? कोई किसी के प्रेम में हो और खुद को भूल न जाए, यह कैसे हो सकता है? --- कोई किसी के प्रेम में खुद को पूरी तरह भुला दे, यह कैसी बेवकूफी है? – या इलाही यह माजरा क्‍या है ---

Gita Lenz


इंतजार, याद और वीतराग

इंतजार उसका किया जाता है, जिसने आने का पता दिया हो, जिसने हमेशा जाना चाहा हो उसका कैसा इंतजार. यह जाना एक खलिश तो पैदा करता है, पर यह भी अच्‍छा ही है. इस खलिश का होना हमें गढ़ रहा है, और सुंदर बना रहा है – मुझे और मेरे बच्‍चों को – क्‍योंकि हमारे मन प्‍यार में भीगे हैं --- हम उसे याद करते हैं.

पता नहीं कितना खालीपन, कैसा सन्‍नाटा होगा वहां, कैसा वीतराग, जिसे यह सब याद न आता हो --- जिसके अंदर यह उमगता नहीं कि वह इन सब को बांहों में भर ले --- जिसने याद के दरवाजों को इस तरह बंद कर लिया है कि उसे हिचकियां नहीं आतीं!


जीवन

पुरानी तस्‍वीरों में कितना जीवन छुपा होता है, धीरे-धीरे जो हाथों से फिसलता जाता है. समय हमारे चेहरों पर किस कदर उतर आता है. पुरानी तस्‍वीरें न दिखें तो उनका पता ही न चले शायद.


उदासी

उदासी का रोमेंटिसिज्‍म अच्‍छा लगता है, लेकिन उसे ज्‍यादा देर तक झेला नहीं जा सकता.


अधिकार और मुआवजा

कानून सिर्फ अधिकारों को परिभाषित करता है, यह लोगों की जिम्‍मेदारी है कि वे दूसरों के अधिकारों का खयाल रखें, क्‍योंकि अधिकार महज इस बात की आचार संहिता हैं कि इंसान समाज में साथ कैसे रहें. जब अधिकारों का उल्‍लंघन होता है और उन्‍हें हासिल करने के लिए कानून का सहारा लिया जाता है. तब जो मिलता है, वह अधिकार नहीं मुआवजा भर होता है. इसलिए यह सोचना बहुत जरूरी है कि कहीं आप किसी के अधिकारों का हनन तो नहीं कर रहे? दूसरों के अधिकारों का हनन करने वाला खुद अपने प्रति ही अमानवीय होता है.


उसके बाद का सौंदर्य

मेरी पीठ के पीछे सूरज ने झांकना शुरू किया था. उसकी सिंदूरी आंच में सामने बादलों के टुकड़े दहक रहे थे. मैं सड़क के एक छोर गयी और झुरमुटों वाले मार्ग विभाजक के पास से घूम कर उलट दिशा में चलने लगी. अब नारंगी थाली-सा सूरज मेरे चेहरे को और पूरी मुझ को भी अपनी आंच से सेंक रहा था. आसमान मायावी बादलों के टुकड़ों से ढंका था, मानो किसी परिकथा से चुड़ैल का सारा कुनबा निकल कर चारों दिशाओं में फैल गया हो.

किसी भी सुन्दरतम क्षण को जीती हूँ तो ख़याल आता है, इस जीवन को कितना सुंदर बनाया जा सकता था ... लेकिन यह सौंदर्य उसके जाने के बाद पहुँचने लगा है मुझ तक ... यह क्यों भूल जाती हूँ? 


मिस करने में सेन्स ऑफ़ इन्सिक्युरिटी है

याद...
क्या?
बस याद.
आ रही है?
दैट इज द स्टेट ऑफ़ माइन्ड.
आय एम आल्वेज विद यू.
डू यू रिमेम्बर वी हेड अ कन्वर्सेशन अबाउट मेमोरी वेन यू वर हियर.
जिसके खोने का डर नही होता उसकी याद आती है.
यह तनहाई, बेचैनी, इन्तज़ार कब तलक.... मैंने कहा था, मुझे मिस करती हो, तुमने कहा, नहीं याद करती हूँ. मिस करने में सेन्स ऑफ़ इन्सिक्युरिटी है, याद बस याद है, जो आपके साथ रहती है.


'क्‍या तुमने चाँद को देखा?'

'क्या तुमने चाँद को देखा?'
'होल्ड करो, मैं बालकनी में जाकर देखती हूँ.'
'आज उसका रंग तुम्हारी पिंडलियों-सा चमक रहा है.'
'काश कि हम अपने अपने शहर से झुज्झा डालते
और डोर को थाम झूला झूलते और इस तरह कहीं बीच में एक दूसरे को छू जाते. '

'ओह काश!'


तुम्हारी आँखें, तुम्हारे चुम्बन

'तुमने क्या आँखों में काजल लगा रखा है'
'नहीं तो'
'जब प्यार करते हो तुम
तुम्हारी पलकों का रंग कितना गहरा काला हो जाता है
तुम्हारी पुतलियाँ इस तरह चमकती हैं जैसे
अँधेरी रात में
रेत समंदर के ऊपर चमक रहा हो दूधिया चाँद'
'पर अँधेरी रातों में तो चमकते सितारों से घिरा होता है चाँद'
'मेरी देह पर झिलमिलाते तुम्हारे चुम्बन वे सितारे ही तो हैं
जिनसे मिल कर चाँद इतना खिला-खिला नज़र आता है'


यदि तो

'कभी-कभी मुझे लगता है, अगर मैं लड़का होती और तुम लड़की होते, तो मैं अब तक तुम्हें दुनिया की सैर करा लाती.'
'तुम ऐसा ही करो, अगर हमारे बीच भी मैं लड़का ही रहा और तुम लड़की ही रही, तो हम में और दूसरों में फर्क ही क्या रह जायेगा.'


जब मैं नहीं रहूंगी

कभी जब मैं नहीं रहूंगी, कैसा होगा यह संसार मेरे बिना? सबके हैं रोजाना कारोबार, लेकिन क्‍या मैं किसी की याद में अटकी रहूंगी? कितने सारे लोग होते हैं, जो हमारे सामने नहीं होते लेकिन यह भरोसा होता है कि वे हैं इस वक्‍त, इसी पृथ्‍वी पर किसी काने में. मसरूफ हैं किसी बहुत जरूरी काम में. या हो सकता है कुछ भी न कर रहे हों अभी, बैठे हों बस यूं ही, फूंक रहे हों सिगरेट, चाय पी रहे हों, शायद रोटी बना रहे हों, या खा रहे हों या कुछ भी ऐसा कर रहे हों. क्‍या जब वे मेरे सामने नहीं हैं और जब वे मर जाएंगे तब और अब के अहसास में कोई फर्क न होगा? जैसे इस वक्‍त मैं यहां घर की बालकनी में अकेली बैठी हूं, सुबह की ठंडी हवा को महसूस कर रही हूं, ऐसा लग रहा है कि दबे पांव जाड़ा आने वाला है, इस बार खूब बारिश हुई है, क्‍या ठीक इसी वक्‍त मैं कहीं किसी के खयाल में हूं? क्‍या इस वक्‍त किसी के खयाल में होना ठीक वैसा ही रहेगा, उसके खयाल में जब मैं नहीं रहूंगी?

****

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मनोज कुमार झा की दो नई कविताएं

9:48 pm


Himmat Shah

सूखा

जीवन ऐसे उठा
जैसे उठता है झाग का पहाड़
पूरा समेटूं तो भी एक पेड़ हरियाली का सामान नहीं
जिन वृक्षों ने भोर दिया, साँझ दिया, दुपहरी को ओट दिया
उसे भी नहीं दे सकूँ चार टहनी जल
तो बेहतर है मिट जाना
मगर मिटना भी हवाओं की संधियों के हवाले
मैं एक सरकार चुन नहीं पाता
तुम मृत्यु चुनने की बात करते हो !
****


बाँधना एक सुन्दर क्रिया थी

उठ के न जाए कहीं रात में माँ
मैं शर्ट के कोने को माँ के आचल से बाध लेता था
और जब वह उठती
तो जगाते थपथपाते  कहती कि मैं बन्धन खोल रही हूं
कई बार तो मुझे याद भी नहीं रहता था सुबह में
सोचता हूँ काँपता हूँ कि मझनींद में माँ बच्चे को उठा रही है
स्तुति करूँगा कि वह जानती थी भरोसे को खोलना
अभी सुबह के चार बजे दरभंगा स्टेशन पर भटकते सोचते संशय में हूँ
कि किसी गाड़ी पर बैठ हो जाऊँ अज्ञात
या इन्तजार करूँ उस प्यारी ट्रेन का जो मुझे सही जगह पहुंचा देगी।
****

{ सबद पर मनोज कुमार झा की अन्य कविताएं यहां पढ़ें। }
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विचारार्थ : जल-जीवन

9:52 pm



जब जल उपजाता है दारुण भय

मनोज कुमार झा
  

जल के बारे में धार्मिक ग्रंथों से लेकर सामान्य जीवन में प्रशस्तियाँ भरी पड़ी है। ‘आपो ज्योति रसोमृतम्’ कहा गया है। यजुर्वेद का ऋषि कहता है कि ‘जैसे माँ अपनी सन्तान को दूध पिलाती है, वैसे ही हे जल, जो तुम्हारा कल्याणतम रस है, उसे हमें प्रदान करें (यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयेतह नः । उशतीरिव मातर।।) मगर जल विप्लव भी लाता है, जो कि प्रायः हर धर्म  के ग्रंथों में वर्णित है। यह जलप्रलय तो भविष्य में कैद है, किन्तु यहाँ तो रोजमर्रा की जिन्दगी में जल आँखे दिखाते आता है। जिन क्षत्रों में बाढ़ मुसलसल आती है, वहाँ समुद्र में शेषनाग की शैय्या पर सोए विष्णु को बाढ़ के पानी में बह रहा फूले पेट बाले भैंस का बिम्ब कब का अपदस्त कर चुका है।
        
जल जिसका स्पर्श मन की मिट्टी कोड़ देती है, उसी जल की ऑक्टोपसी भुजाएं हमारे जीवन का रस निचोड़ने के लिए भी बढ़ती है। उतर बिहार (मिथिलांचल) में बाढ़ लोकस्मृति का हिस्सा हो चुकी है। यहाँ कहा जाता है कि ‘जुनि वियाहू बेटी कोसिकनहा, होथि वर चाहे कान्हा (कृष्ण भी वर हों तो भी पुत्री को कोसी किनारे नहीं ब्याहिए।) एक सतत बेघरी का अहसास हमेशा घेरे रहता है - ‘माई हमर छथिन्ह कोसी बलान, हमर घर दुआरक कोन ठेकान (माई हमारी कोसी और बालान नदियाँ हैं, हमारे घर द्वार का क्या ठिकाना!) यहाँ नदी को माँ भी कहा गया है और उसकी क्रूरता पर भी उँगली रखी गई है- ‘उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफिर पर दम निकले’। बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में नदी के साथ लोगों का ऐसा ही दो रूखी युक्त रिश्ता रहता है। और तो और, बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों के दूल्हों को दहेज भी कम मिलता है।
        
प्रसिद्ध काव्य पंक्ति है ‘ बाटर वाटर एवरीइवेयर नॉट ए सिंगल ड्रॉप टू ड्रिंक (पानी पानी हरसू पानी पीने को ना एक भी बूँद)। यही स्थिति हर साल हो जाती है। जल अपना प्यास बुझाने वाला रूप तज देता है। यहाँ पीने के पानी की समस्या नहीं है वहाँ के लोग एकाएक अजब स्थिति में फँस जाते हैं। लोगों के चेहरे का पानी उतर जाता है। अब रहीम चाचा से क्या कहें कि पानी आखिर कैसे रखूँ!
       
1987 की बाढ़ भी ऐसे ही आई थी। शाम साढ़े सात बजे रेडियो पर पटना से प्रसारित समाचार में कहा जा रहा था कि सब ठीक है। मगर गाँववालों को रत्ती भी भी विश्वास नहीं हो रहा था। इसी तरह चैरासी में भी हुआ था, सबकुछ ठीक का राग अलापा जा रहा था और दूसरी तरफ बाढ़ प्रभावित जिलों के नावें जमा की जा रही थी, कलेक्टरों को निर्देश दिये जा रहे थे।  लोग कन्फ्यूजड हो रहे थे। सरकार भी गजब की कन्फ्यूज करने वाली चीज है!
        
पानी अब सड़क तक आ गया था। बड़े-बुजुर्ग छाते लेकर सड़क तक आते ओर गड्ढ़ों में पानी को गौर से देखते। गेरूआ रंग का पानी अभी नहीं आया था मगर बारिश की यही रफ्तार रही तो हम नहीं बचेंगे। सावन भादों तो बारिश का मौसम है - मन को मथ देने वाली और तन को तृप्त कर देने वाली बारिश का मौसम। ना, ऋतुएं इतनी मासूम कहाँ होती! बारिश के नाखून भी बढ़ जाते हैं - पूरे शरीर को घावजदा कर देने वाले। बाढ़ वाली बारिश!
       
स्त्रियाँ चुप हैं, बच्चे कुछ समझ नहीं रहे और युवा भी नहीं समझ पा रहे कि वे क्या करें। विश्वम्भर चाचा कहते हैं यह पानी झगड़ालू जोरू की तरह है, बहुत परेशान करेगी ओर साथ भी रहेगी । जानवरों को क्या करें ? साथ लेकर एक- दो तो जा सकते हैं, मगर जिनके पास ज्यादा है ? बँधा छोड़ दें या खोल दें?, जहाँ जाना लिखा होगा तकदीर में वहाँ जाके अटक जाएंगे। अब ये जो कुछ जानवर बचे हैं, उसके लिए चारा कहाँ से मिलेगा! जो गाँव बाढ़ से बचे हुए हैं वहाँ से लोग खरीदने आ रहे हैं। बीस हजार की गाय का चार हजार देंगे। साले ऑपरचिनिस्ट ! सब नेता की ही तरह हो गया है। बिक्रम मल्लिक जाति के डोम हैं, इन्होंने बाढ़ आने की आशंका से महाजन से तीन हजार रूपये लिए थे। दस रूपये की सैकड़ा की दर पर। सूप-डगरा बुन रहे हैं, मगर बाढ़ गुजर जाए तब तो।
        
गाय- भैंस बहे जा रहे हैं। किसानों का कलेजा फटा जा रहा है। बह रही है बेचारी, पता नहीं किस अभागे की है। मौत की कीमत और गरिमा तो यूँ भी कम हो गयी हैं, लोग माँ बाप के मरने पर भी दस पाँच दिन के लिए ही आते हैं और इस बाढ़ ने तो मौत को तो सड़े आम के गिरने की तरह बना दिया है मौत तो सबकी आनी है, मगर पका आम होकर डंठल से छूटें सड़ा आम होकर नहीं।
        
हेलीकॉप्टरों को लेकर गुस्सा है। यह नाचते ही रहता है कि कुछ दाना-पानी की गिराता है ! गिराते हैं भाई, मगर कहाँ पता नहीं। हेलिकॉप्टर बच्चों को अच्छा लगता है, उसे तब और अच्छा लगता है जब पता चलता है कि इसमें बिस्कुट है। मगर कब इनके हाथों में आएगा। अमरीका बम के साथ बिस्कुट गिराता है और सरकार ‘फ्लड’ के साथ फूड।
        
औरतें भी तैरने के लिए निकल जाती हैं! पर्दा वगैरह तो डायन बाढ़ ने खा ही लिया, अब इसकी इतनी हिम्मत बढ़ गई कि तैरने निकल जाए। तैरने दो भई, सब यहाँ बैठे-बैठे उब जाती हैं। सीली लकड़ी पर खाना बनाते बनाते वैसे भी थक जाती हैं। बच्चे भी तैर लेते हैं थोड़ा । और हमलोग भी तो तास खेलते ही हैं और तैरते तो बिना बाढ़ के भी हैं। पानी थोड़ा कम हुआ है। राजेश्वर राम कहते हैं कि यह कोढ़िया (कोढ़ी) बाढ़ है, धीरे धीरे ससरता है। पहले तो ‘आइल पानि, गेल पानि, बाटै बिलाइल पानि (आया पानी, गया पानी, रास्ते में ही लुप्त हुआ पानी) था। यह सब बाँध के चलते हुआ है। होने दो, हम - तुम क्या बूझते हो, माथा वाला लोग फैसला करते हैं। माथा वाला नहीं, पावर बाला। माथा हमको नहीं है तो कैसे पैंसठ साल गुजार लिए। पावर हमलोग ही तो देते हैं। नहीं भाई, मामला इतना सीधा नहीं है, पावर जलेबी की तरह है रसदार भी और घुमावदार भी। 
        
जीवन के सारे छल-छद्म है यहाँ। जल के भय के मध्य भी सबकुछ है। सर्वमेव बाढ़ मध्ये आहार निद्रा भय मैथुनं च। जीवन के गोतिया-देयाद पाखंड का भी साथ यहाँ भी नहीं छूटा है। मासूम पाखंड से लेकर हिंस्र पाखंड तक। धन्नो बाबू अछूत के हाथ का खैनी खा लिए हैं। सफाइ देते हैं चूना अपना ही था, खैनी थोड़े छुआता है। एक सिरा से देखो तो कितना मासूम पाखंड है- मात्र चूना ले लेने का झुठ । दूसरे सिरा से देखो तो कितना क्रूर, किसी को अछूत मानना और उसका चूना खाने तक को अस्वीकार करना। जितना मेरा जीवन गाँव में बीता है उसमें मैं पाखंड से ज्यादा मनुष्य का करीबी और कुछ नहंी पाया है सिवाय मौत और भूख के। मौत भी प्रकृति का पाखंड ही है, वरना जीवन रचने की क्या जरूरत थी ! पर बहुत से पाखंड बड़े मासम हुआ करते थे, जैसे कि पत्नी के द्वारा पति को खिलाने से पहले कोई अच्छी चीज चुरा के खा लेना। यह उलटी दिशा से बंधनों को तोड़ना भी है। जीवन से विकट शायद कुछ भी नहीं। जीवन के खोखल में क्या क्या नहीं रहता !
       
रात इतनी अंधेरी क्यों है ! दिल्ली में रहते रहते प्रकाश से उकता गया था। घुप्प अंधेरे में डूब जाने का मन करता था। पर यहाँ एक मोमबत्ती चाहिए। पेड़ भींग रहे हैं, मगर अच्छा नहीं लग रहा। पेड़ को अंधेरे में भींगता हुआ महसूस करना कितना अच्छा लगता है। मगर अभी तो डर है। अरे वह ‘चोर चोर’ को शोर हुआ। कितना अभागा होगा वो जो इस भयंकर दुःसमय में चोरी पर निकला होगा। असली चोर तो मजे कर रहे हैं।
        
जल से भय होने लगा हैं । वृक्षों से भय होने लगा है, वहाँ साँप होंगे। पड़ोसियों से भय लगने लगा है, वो रिलीफ का पैकेट लूट लेंगे। सहयोग के जो क्षण बीच बीच में दिखते हैं, वे गायब क्यों हो जाते हैं ! जमीन से डर होने लगा है, पता नहीं कहाँ फट गया होगा और चक्करदार पानी से भरा होगा। समय से डर लगने लगा है, क्या यह वैसे ही बाढ़ लाता रहेगा! क्या उपाय है !यगाना चंगेजी कह गये हैं ‘‘किस किस को पुकारता रहा डूबने वाला। खुदा थे कइ, मगर कोई आड़े आ न गया’’।
***

[ मनोज कुमार झा हिंदी के चर्चित कवी-अनुवादक हैं । साथ में दी गई चित्र-कृति स्टीव मैकरी की है। ] 
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कला का आलोक : ७ : छायालोक

7:46 pm



आलपिनों से बिंधी तितलियों का संग्रहालय

                                                            सुशोभित सक्‍तावत

एक अपराधी की वह तस्‍वीर थी, जो अपनी मृत्‍यु की प्रतीक्षा कर रहा था (हर अपराधी की तरह)। अंतिमताओं के प्रणेता रोलां बार्थ को, उनकी स्‍वयं की मृत्‍यु के साल में, उस तस्‍वीर ने बहुत तंग किया था। लगभग व्‍याकुल।
महज़ एक तस्‍वीर ही तो थी!

अलेक्‍सांद्र गार्दनर की एक अनिच्‍छुक क्लिक। वर्ष 1865 का किस्‍सा। लुई पेन नामक नौजवान ने तत्‍कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री डब्‍ल्‍यू. एच. सीवर्ड के क़त्‍ल की नाकाम कोशिश की थी। लुई को सज़ा-ए-मौत सुनाई गई। गार्दनर ने काल-कोठरी में मृत्‍यु की प्रतीक्षा कर रहे पेन की एक तस्‍वीर खींच ली थी। बस, इतना ही।

लेकिन इसके पूरे 115 वर्षों बाद जब फ्रांसीसी संरचनावादी दार्शनिक रोलां बार्थ तस्‍वीरों के बेबूझ तिलिस्‍म पर अपनी बेजोड़ किताब कैमेरा ल्‍यूसिडा लिख रहे थे, तो वे इस एक क्लिक पर ठिठक गए। उन्‍होंने लिखा : मैं समझ नहीं पाया इसे कैसे व्‍याख्‍यायित करूं : लुई पेन मर चुका है (यक़ीनन), किंतु ऐन इसी दौरान वह अपनी मृत्‍यु की प्रतीक्षा भी कर रहा है  (जैसा कि तस्‍वीर का वस्‍तुसत्‍य है)। और तब बार्थ ने कहा, गार्दनर की उस क्लिक के बारे में जो सच है, वह शायद सभी तस्‍वीरों के बारे में सच होता है : विगत और वर्तमान की हैरान कर देने वाली सहउपस्थिति, जिसमें आगत का भी एक निवेश है : एक आसन्‍न अवसान का, शाम की मरती हुई धूप का।

वह 1980 का साल था, जब बार्थ ने सहसा छायाचित्रों के भीतर छिपे मृत्‍यु के इस तत्‍व को आविष्‍कृत कर लिया था, जो कि अनिवार्यत: समय और रागात्‍मकता का सहोदर है। हालांकि इससे पहले और बाद में भी तस्‍वीरों पर व्‍यापक विमर्श होता रहा था : सूज़ैन सोंटैग ने उन्‍हें यथार्थ को अपदस्‍थ कर देने वाली कला-नीति कहा था, जैफ़ डायर ने ‘एक अनवरत क्षण’ कहकर उन्‍हें अपूर्व आश्‍चर्यदृष्टि से देखा था तो ग्‍युंटर ग्रास को कैमरे का लेंस ईश्‍वर की आंख के समकक्ष जान पड़ा था : उतना ही बेधक, कीलित कर देने वाला एक आरंभ, जिससे उन्‍होंने अपनी स्‍मृति के अलबम को सजाया था, किंतु इन सबके बावजूद बार्थ की स्‍थापनाओं की कशिश और शिद्दत कुछ और ही रही।
वास्‍तव में तस्‍वीरों के साथ ही यह पहली बार हुआ था कि इतिहास ने कला में सबसे मज़बूती के साथ घुसपैठ करने में सफलता पाई थी। तस्‍वीरें दस्‍तावेज़ीकरण का एक अभिन्‍न आयाम बन गईं। शब्‍दों को झुठलाया जा सकता था, स्‍मृतिलेखा और आंखन देखी तो ख़ैर कभी भी प्रत्‍यक्ष का प्रमाण न थे, शिल्‍प और रूपांकन यथार्थ से विचलन (बकौल प्‍लेटो, दोहरे विचलन!) की शर्त पर ही आकार ग्रहण करते थे, लेकिन एक बार तस्‍वीरों में दर्ज हो जाने के बाद किसी वस्‍तुसत्‍य को नकारना संभव न था। तस्‍वीरें इतिहास की छाती में गड़ा हुआ एक असंदिग्‍ध इशारा साबित हुईं।

लेकिन, इसी के साथ ही इतिहास का अंत भी होता है और एक मिथ आकार ग्रहण करने लगता है, इस सवाल के साथ कि : तस्‍वीरों में दर्ज होने के बाद कोई नाम-रूप और उसका वस्‍तुसत्‍य क्‍या करता है? निश्चित ही वह प्रतीक्षा करता है, किंतु किसकी? कुछ नहीं की? अपने न हो जाने की? ग़ौर से देखें तो सभी छायाचित्र इस प्रश्‍न के समक्ष एक प्रलंबित प्रतीक्षा में ठिठके हुए जान पड़ते हैं  : समय, जिसके बाहर किसी चीथड़े की तरह धूप में सूखता रहता है यथा का अंतिम छोर धारण करता रहता है एक स्‍वप्‍नदेह।

कलाओं और उनमें भी विशेषत: दृश्‍य कलाओं के इतने अनेकानेक आयामों के बीच तस्‍वीरों का विशिष्‍ट इसी में निहित है कि वे नित्‍य और अनित्‍य की संधिरेखा पर ठिठकी हुई होती हैं। तस्‍वीरों में यह अद्भुत क्षमता होती है कि वे हमारे भीतर के अनित्‍य-तत्‍व को एक क्षण में भींचकर दर्ज कर लें, उसे उघाड़कर हमें दिखा दें, लेकिन इसके साथ ही उनमें नित्‍य–तत्‍व को हठात निर्दिष्‍ट कर देने का गुण भी होता है। यह करिश्‍मा वर्तमान और विगत, गति और स्‍थैर्य के एक विलक्षण द्वैत से संभव होता है, जो कि तस्‍वीरों का अनिवार्य क्षितिज है।

और तब यह संभव ही नहीं है कि तस्‍वीरों का यह ‘आदिम रंगमंच’ हमें किसी स्‍तर पर बेध न दे (पेनिट्रेशन की इसी प्रक्रिया को बार्थ ने ‘पंक्‍चम’ कहा है)। तस्‍वीरों में से झांकते उन सफ़ेद चेहरों का रंगमंच, जो एक अंतहीन अंत के कुहासे में थिगे हैं। तब इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि अवसान का क्षण अभी घटित हुआ है या नहीं (वस्‍तुत: वह पहले ही घटित हो चुका है)। यही कारण है कि तस्‍वीरों में दर्ज आकृतियां हमेशा सुदूर-पार की अफ़वाहें सुनाती जान पड़ती हैं : लैज़रस की तरह।

और तब, सोचता हूं कि कैसा हो अगर तस्‍वीरों को जोड़कर नए सिेरे से दुनिया को रचा जाए : आलपिनों से बिंधी तितलियों का एक संग्रहालय!
***






(आगामी १९ अगस्त को विश्‍व छायांकन दिवस पड़ता है. यह युवा कला-मर्मज्ञ सुशोभित सक्तावत का यह लेख उसी रौशनी में. साथ में दी गई तस्वीर रॉबर्ट फ्रैंक की एक यादगार क्लिक )




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संपादन : अनुराग वत्स.

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