सबद
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सबद विशेष १५ - नोबेल व्‍याख्‍यान - मो यान

1:11 am




[ मो यान का यह नोबेल व्याख्यान कुछ बुनियादी बातों की ओर हमारा ध्यान खींचता है। मनुष्य जीवन, उसके विकट संघर्ष, उसकी गरिमा, ग्लानि और हानि-बोध के बीच लेखक होने का अचरज और कभी न बिसारा जानेवाला लेखकीय दायित्व इसके केंद्र में है। इसका अनुवाद कवि-लेखक गीत चतुर्वेदी ने किया है। ]


नोबेल पुरस्‍कार ग्रहण करने के बाद चीनी उपन्‍यासकार मो यान. 



मुझे लगता है कि इंटरनेट और टीवी के इस युग में, यहां जितने भी लोग बैठे हैं, वे सभी सुदूर 'उत्तरपूर्व गाओमी क़स्बे’ से अच्छी तरह परिचित होंगे। आपने मेरे नब्बे साल के पिता को देखा होगा, मेरे भाइयों, बहनों, मेरी पत्नी और मेरी बेटी, और शायद मेरी पोती को भी देखा हो, जो अब एक साल चार महीने की है। लेकिन जो शख़्स इस समय मेरे दिलोदिमाग़ पर तारी है, उसे आप कभी नहीं देख पाएंगे। वह शख़्स है मेरी मां। इस पुरस्कार को जीतने के गौरव-भरे क्षण में कई-कई लोग शामिल हैं, सिवाय उसके।

मेरी मां का जन्म 1922 में हुआ था और 1994 में उसकी मृत्यु हो गई। गांव के पूर्वी छोर पर आड़ू के बाग़ान में हमने उसे दफ़नाया। पिछले साल सरकार ने हमें मजबूर कर दिया कि हम उसकी क़ब्र वहां से हटा लें और दूर ले जाएं, ताकि उस जगह रेल लाइन बिछ सके। जब हमने क़ब्र खोदी, तो पाया कि ताबूत पूरी तरह सड़ चुका है और उसकी देह आसपास की गीली मिट्टी में शामिल हो चुकी है। तो, निशानी के तौर पर हमने खोदकर वहां से कुछ मिट्टी निकाली, उसे ही हम नई जगह ले गए। इस तरह मुझे यह अनुभव हुआ कि मेरी मां अब पृथ्वी का एक हिस्सा बन चुकी है और जब भी मैं धरती माता से बात करता हूं, दरअसल, मैं अपनी मां से बात कर रहा होता हूं।

मैं अपनी मां का सबसे छोटा बच्चा था।

मेरी सबसे पुरानी स्मृतियों में से एक है कि मुझे प्यास लगी थी और पानी पीने के लिए मैं घर का एकमात्र थर्मस ले कैंटीन चला गया। भूख के कारण बहुत कमज़ोरी थी, सो, थर्मस मेरे हाथ से छूटा और टूट गया। बेतहाशा घबराहट में पूरा दिन मैं पुआल के अंबार के पीछे छिपा रहा। शाम होते-होते मां मुझे खोजने लगी। वह मेरे बचपन का नाम ले मुझे पुकार रही थी। मैं धीरे-धीरे रेंगता हुआ छिपने की उस जगह से बाहर निकला। मैं बहुत डरा हुआ था कि अब मेरी पिटाई होगी, डांट पड़ेगी। लेकिन मेरी मां ने मुझे नहीं मारा, उसने कुछ भी नहीं कहा। उसने मेरा सिर सहलाया और एक बहुत गहरी सांस छोड़ी।

मेरी सबसे दर्दनाक स्मृति भी उसी समय की है, जब मैं मां के साथ एक सरकारी खेत में गेहूं की बालियां तोड़ने गया था। और भी लोग तोड़ रहे थे, लेकिन जैसे ही चौकीदार आता, सब यहां-वहां भाग निकलते। लेकिन मेरी माँ पैरों से लाचार थी, भाग नहीं पाई, पकड़ी गई। ऊंचे-तगड़े चौकीदार ने उसे इतनी ज़ोर से थप्पड़ मारा कि वह ज़मीन पर गिर गई। हमने जो भी बालियां तोड़ी थीं, चौकीदार ने हमसे छीन ली और सीटी बजाते हुए चला गया। मेरी मां ज़मीन पर गिरी पड़ी थी, उसके होंठों से ख़ून की धार बह रही थी। उसके चेहरे पर जो नाउम्मीदी छाई हुई थी, उसे मैं कभी नहीं भूल सकता। बरसों बाद, बीच बाज़ार, उस चौकीदार से मेरा सामना हुआ। तब वह बूढ़ा हो चुका था। मैं उसे पीटकर अपना बदला लेना चाहता था, लेकिन मां ने मुझे रोक दिया,

'बेटा, जिस शख़्स ने मुझे मारा था और जो तुम्हारे सामने खड़ा है, दोनों पूरी तरह अलग हैं।‘

मेरी सबसे साफ़ स्मृति है चांद के जश्‍न की। दोपहर का समय था। त्योहार ऐसा दुर्लभ अवसर होता, जब हमें घर पर कटोरा भर जियोज़ी खाने को मिलता था। हम खाने की मेज़ पर उसका स्वाद ले रहे थे कि दरवाज़े पर एक बूढ़ा भिखारी आ गया। मैंने उसे एक शकरकंद से भरी एक कटोरी देकर विदा करना चाहा, लेकिन वह बुरी तरह भड़क गया, 'मैं बूढ़ा हो गया हूं। तुम लोग आराम से जियोज़ी खा रहे हो और मुझे सिर्फ़ शकरकंद देकर टरका रहे हो। कितने बेरहम हो तुम लोग?’ मैंने भी उतने ही क्रोध में जवाब दिया, 'साल में सिर्फ़ दो दफ़ा जियोजी खाने को मिलता है, वह भी छोटी-सी कटोरी है, देख लो। शुक्र करो कि तुम्हें शकरकंद भी दे रहे हैं। खाना है, तो खाओ, वरना भाड़ में जाओ।‘ मुझे जी-भर डांटने के बाद मां ने अपनी आधी जियोजी उस बूढ़े के कटोरे में डाल दी।

विकट प्रायश्चित से भरी हुई स्मृति भी उन्हीं दिनों की है। मां बाज़ार में पत्तागोभी बेच रही थी और मैं उसकी मदद कर रहा था। पता नहीं, जाने या अनजाने, मैंने एक महिला से एक जियाओ क़ीमत ज़्यादा वसूल कर ली। उसके बाद मैं स्कूल चला गया। दोपहर, जब घर लौटा, तो देखा, मां रो रही थी। वह शायद ही कभी रोती थी। मुझे डांटने के बजाय, रुंधी हुई मुलायम आवाज़ में उसने कहा, 'बेटा, आज तुमने अपनी मां को बहुत दुखी किया है।'

मेरा लड़कपन बीता भी नहीं था कि मां को फेफड़ों की गंभीर बीमारी हो गई। भूख, बीमारी और हाड़तोड़ काम ने मेरे परिवार की स्थितियां मुश्किल बना दी थीं। आगे का रास्ता बहुत धुंधला दिखता था, भविष्य से मैं ख़ौफ़ज़दा रहता था। लगता, मां ख़ुद ही किसी रोज़ अपनी जान न ले ले। दिन-भर कड़ी मज़दूरी करने के बाद शाम जब मैं घर में घुसता, तो सबसे पहले अपनी मां को पुकारता था। उसकी आवाज़ सुनकर लगता, मेरी जि़ंदगी के दिन और बढ़ गए हैं। जिस रोज़ उसकी आवाज़ न आती, मैं बुरी तरह घबरा जाता। मैं बग़ल की इमारतों या चक्की में उसे खोजता। एक रोज़ मैंने उसे हर जगह खोजा, लेकिन वह कहीं नहीं मिली। मैं वहीं अहाते मैं बैठ गया और बच्चों की तरह रोने लगा। अपनी पीठ पर ईंधन की लकडिय़ों का बोझा बांधे जब वह अहाते में घुसी, मैं वहां बिलख-बिलखकर रो रहा था। मेरी इस हरकत पर वह बहुत नाराज़ हुई, लेकिन मैं उसे बता नहीं सकता था कि मैं कितना डरा हुआ था। फिर भी वह सब जानती थी। उसने कहा, 'बेटा, हो सकता है कि मेरी जि़ंदगी में कोई ख़ुशी न हो, लेकिन चिंता मत करो, मैं तब तक तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगी, जब तक ख़ुद यमराज अपने हाथों से मुझे उठाकर न ले जाएं।'

मैं जन्म से ही बदसूरत था। गांववाले मेरा चेहरा देखकर हंसते थे। मेरे रूप का मख़ौल करते स्कूल में लड़के मुझे पीट देते थे। मैं रोता हुआ घर दौड़ता था, जहां मां होती थी, यह कहने के लिए, 'तुम बदसूरत नहीं हो, बेटे। तुम्हारी एक नाक है और दो आंखें हैं, तुम्हारे हाथ-पैर सही-सलामत हैं, फिर कैसे तुम बदसूरत हो गए? अगर तुम अपना दिल साफ़ रखोगे और हमेशा अच्छे काम करोगे, तो जिस चीज़ को बदसूरत कहा जा रहा है, उसी को एक दिन बहुत सुंदर कहा जाने लगेगा।' बाद के बरसों में, जब मैं शहर रहने लगा, मेरी मुलाक़ात बहुत पढ़े-लिखे लोगों से होती थी। वे पीठ पीछे मुझ पर हंसते थे, कुछ तो मेरे सामने ही मेरा मज़ाक़ उड़ाते थे। जब मुझे मां की ये बातें याद आतीं, मैं मुस्करा कर उनसे क्षमा मांगता और वहां से हट जाता था।

मेरी मां अनपढ़ थी और उन लोगों की बहुत इज़्ज़त करती थी, जिन्हें पढऩा आता हो। हमारी हालत इतनी पतली थी कि हमें यह नहीं पता होता था कि अगले पहर का खाना हमें किस ठौर से मिलेगा, उसके बाद भी मां ने किताब, कॉपी या पेंसिल ख़रीदने की मेरी जि़द से कभी इंकार न किया। वह स्वभाव से ही परिश्रमी थी और आलसी बच्चे उसके किसी काम के न थे, फिर भी जितनी देर तक मेरी नाक किताबों में गड़ी होती, मुझ तक कोई काम न पहुंचने दिया जाता।

उन दिनों बाज़ार में एक कि़स्सागो आया हुआ था। मैं चोरी-छिपे उसे सुनने चला गया। उसके चक्कर में मैंने अपने काम भुला दिए, जिससे मां मुझसे नाराज़ हुई। लेकिन उस रात जब एक ढिबरी की कमज़ोर रोशनी में वह हमारे लिए कपड़े सिल रही थी, मैं दिन में सुनी कहानियां उसे सुनाने से ख़ुद को रोक न पाया। उसका मानना था कि पेशेवर कि़स्सागो मीठा-मीठा बोलने वाले वाचाल लोग होते हैं, जो दरअसल एक ख़राब धंधे में लगे होते हैं और उनके मुंह से कभी कोई काम की बात नहीं निकलती, इसीलिए शुरू में उसने मेरी बातों को ध्यान से नहीं सुना। लेकिन जैसे-जैसे मैंने कहानी आगे बढ़ाई, वह उसकी ओर खिंचती चली गई। उसके बाद, जिस दिन हाट लगता था, मां मुझे कोई काम नहीं देती थी। एक तरह से यह एक अघोषित अनुमति थी कि मैं बाज़ार जाऊं और नई कहानियां सुनकर आऊं। मां की इस दयालुता की क़द्र करने और अपनी स्मृति का प्रदर्शन करने के लिए, मैं लौटकर हर तफ़्सील के साथ मां को वे सारी कहानियां सुनाया करता था।

आप बहुत लंबे समय तक दूसरों की कहानियां सुना-सुनाकर संतुष्ट नहीं हो सकते, इसलिए मैंने अपनी कहानियां बुननी शुरू कर दीं। मैं अपनी कहानी में वे बातें कहता, जिनसे मां ख़ुश हो सके, उसका चेहरे के भाव पढ़ते हुए मैं एक झटके में कहानियों के अंत बदल दिया करता था। वह मेरी इकलौती श्रोता नहीं थी, मेरी दीदियां, मौसियां और मेरी नानी भी अब वहीं बैठ मेरी कहानियां सुनने लगी थीं। किसी-किसी रोज़ मेरी कहानी ख़त्म होने के बाद मां थोड़ी देर चुप रहती, फिर बेहद फि़क्र में डूबी आवाज़ में बुदबुदाती, जैसे ख़ुद से ही बात कर रही हो, 'मैं सोचती हूं, बच्चे, तुम बड़े होकर क्या बनोगे? ऐसे ही गप मार-मारकर पैसे कमा लोगे?'

मुझे पता था, वह क्यों चिंता करती थी। बातूनी बच्चों को गांव में अच्छा नहीं माना जाता था, क्योंकि अपनी बड़-बड़ से वे अपने और परिवार के लिए मुसीबतें मोल लिया करते थे। मेरी एक कहानी है, 'बुल्स', उसमें जो बातूनी बच्चा है, उसमें आप मेरे इसी बचपन को देख सकते हैं। मां हमेशा मुझे चेताया करती कि इतना न बोलूं। वह चाहती थी कि मैं एक अल्पभाषी, मृदु और स्थिर नौजवान बनूं। जबकि एक ख़तरनाक युग्म मुझ पर क़ाबिज़ हो चुका था- विलक्षण वाक्पटुता और उसके साथ चलने वाली बलवान इच्छाओं का युग्म। कहानियां सुनाने की मेरी सलाहियत उसे ख़ुश भी करती थी, लेकिन इसी से उसकी दुविधा और बढ़ती जाती।

पुरानी कहावत है, नदी की धारा बदल सकते हो, इंसान का स्वभाव नहीं। मां की अथक नसीहतों के बाद भी बोलने की मेरी नैसर्गिक इच्छा कभी ख़त्म न हो पाई और इसी तरह मैंने अपना यह नाम रखा- मो यान यानी मौन यानी चुप रहो। ख़ुद का मज़ाक़ उड़ाती एक वक्र अभिव्यक्ति।

प्राइमरी स्कूल के दिनों में ही मेरी पढ़ाई छूट गई थी। ज़्यादा मेहनत के कामों के लिए मैं अभी छोटा था, सो मुझे पास ही एक जगह चरवाहे का काम मिल गया। जहां मैं मवेशियों को हांककर मैदान की ओर ले जाता था, वहां से मेरा स्कूल साफ़ दिखता था। मैदान में बच्चों को खेलता देख मैं हमेशा उदास हो जाता और बार-बार यह अहसास होता कि चाहे बच्चा ही क्यों न हो, झुंड से बिछुड़ना बहुत दुखदायी होता है।

नदी किनारे पहुंच मैं मवेशियों को खुला छोड़ देता था। समंदर जैसे नीले आसमान के नीचे, जहां तक नज़र जाए, वहां तक घास से ढंकी धरती पर वे चर रहे होते। दूर-दूर तक कोई मनुष्य न दिखता, कोई इंसानी आवाज़ नहीं, सिर्फ़ ऊपर से आती चिडिय़ों की चहचहाहटें। अपने बूते वहां बैठा मैं बुरी तरह अकेला होता, दिल में ख़ालीपन महसूस करता। कभी-कभी मैं घास पर लेट जाता और देखता, बादल बेतहाशा आलस में बहते हैं। उनका बहना तमाम कल्पनाओं को जन्म दे देता। उस इलाक़े में, युवतियों में बदल जाने वाली लोमडिय़ों की कहानी बहुत प्रचलित थी। मैं कल्पना करता कि एक लोमड़ी बहुत सुंदर लड़की का रूप धरकर आई है, वह मेरी और मेरे मवेशियों की रखवाली कर रही है। वह कभी नहीं आई। हालांकि, एक बार सचमुच की एक लोमड़ी झाडिय़ों के पीछे से कूदकर बाहर आई, जिसे देख मेरी टांगें भीतर तक कांप गई थीं। उसके नज़रों से ओझल हो जाने के बाद भी मैं घंटों, कांपता हुआ ही बैठा रहा।

कई बार मैं गायों के बहुत क़रीब चला जाता और उनकी गहरी नीली आंखों में झांककर देखता। आंखें, जो मेरा अक्स पकड़ लेती थीं। कई बार मैं आसमान में उड़ती चिडिय़ों से बातें करता, उनकी आवाज़ों की नक़ल उतारता। कभी-कभी एक पेड़ के सामने बैठकर उसे अपनी उम्मीदें और इच्छाएं बताता। चिडियां मुझे नज़रअंदाज़ कर देतीं। पेड़ भी मुझ पर कभी ध्यान न देते। बरसों बाद, जब मैं उपन्यासकार बन गया, मैंने उन दिनों की कुछ कल्पनाओं को अपने उपन्यासों और कहानियों में दर्ज किया। लोग मेरी अद्भुत कल्पनाओं की सराहना करते हुए मुझ पर बधाइयों की बौछार करने लगे, साहित्यप्रेमी मुझसे सवाल करने लगे कि इतनी उर्वर कल्पनाशक्ति का रहस्य क्या है। ऐसे सवालों के जवाब में मैं मुस्कान से ज़्यादा कुछ न दे पाया।

लाओत्से कहता था, 'सौभाग्य, दुर्भाग्य पर निर्भर करता है। दुर्भाग्य, सौभाग्य के भीतर ही कहीं छिपा होता है।' बचपन में ही स्कूल छूट गया, मैं अक्सर भूखा रहता था, हर घड़ी अकेलापन होता और पढऩे के लिए कोई किताब भी न होती। पिछली पीढ़ी के लेखक शेन कोंगवेन की ही तरह, मैंने भी बहुत जल्द ही जि़ंदगी की किताब पढऩी शुरू कर दी। बाज़ार जाकर कि़स्सागो को सुनना इस किताब का महज़ एक पन्ना-भर है।

स्कूल छूटते ही बड़ी बेआरामी के साथ मुझे बड़े लोगों की दुनिया में धकेल दिया गया, जहां एक लंबी यात्रा की शुरुआत हुई- सुनो और सुनकर सीखो। जिस इलाक़े मैं मैं पला-बढ़ा था, उसी के पास, दो सौ साल पहले, इतिहास के महानतम कि़स्सागो में से एक, पू सोंगलिंग रहा करते थे। वहां मुझ समेत ऐसे अनेक लोग थे, जो उनकी परंपरा का भली-भांति निर्वाह कर रहे थे। मैं जहां कहीं होता- भले सरकारी खेतों में काम करता हुआ, तबेलों में सफ़ाई करता हुआ, नाना-नानी के गांव में या ऊबडख़ाबड़ सड़कों पर उछलती-दचके खाती बैलगाडिय़ों पर ही क्यों न बैठा होता, हर जगह मेरे कान अलौकिक, ऐतिहसिक प्रेमकथाओं से भरे होते, अजीब कि़स्म की कहानियों से, जो आपको तुरंत अपने क़ब्ज़े में ले लें। सारी कहानियां प्राकृतिक वातावरण और ख़ानदानी इतिहास के धागों से बंधी होतीं। और ये सब मिलकर मेरे भीतर एक शक्तिशाली यथार्थ की रचना करती चलतीं।



अपने सबसे बनैले सपनों में भी मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि एक रोज़ इन सारी चीज़ों का इस्तेमाल मैं अपनी किताबों में करूंगा। मैं तो महज़ छोटा-सा एक बच्चा था, जिसे कहानियां पसंद थीं, जो आसपास के लोगों द्वारा सुनाए गए कि़स्सों के इश्‍क़ में पड़ जाता था। निस्संदेह, उस ज़माने में मैं आस्तिक था, जिसका यक़ीन था कि सारे जीवों के भीतर एक आत्मा होती है। मैं एक ऊंचे, बूढ़े वृक्ष के आगे खड़ा हो उसे नमन करता। अगर मैं कोई चिडिय़ा देखता, तो मुझे यक़ीन होता कि यह जब चाहे, उस पल एक इंसान में तब्दील हो सकती है। मैं जितने भी अजनबियों से मिलता, लगता, वे सब राक्षस हैं, जो भेस बदलकर आए हैं। रातों को काम ख़त्म करने के बाद जब मैं घर लौटता, एक भीषण डर मेरे साथ-साथ चलता। उन रास्तों पर मैं गला फाड़-फाड़कर गाते हुए चलता ताकि मेरा कलेजा मज़बूत रह सके। मेरी आवाज़ उन दिनों बदल रही थी। मेरे गले से जो गीत निकलते, वे इतनी चरमराई हुई आवाज़ में होते, कि आसपास जिस गांववाले के कान में पड़ जाएं, वह बुरी तरह खिसिया जाता।

जीवन के शुरुआती 21 साल मैं उस गांव से बाहर नहीं निकला। बहुत हुआ, तो एक बार ट्रेन से किंगताओ गया था, जहां एक कारख़ाने में इमारती लकड़ी के बड़े-बड़े कुंदों के बीच लगभग खो गया था। जब मेरी मां ने पूछा कि किंगताओ में क्या-क्या देखा, तो मेरा जवाब था: सिर्फ़ इमारती लकडिय़ां। लेकिन किंगताओ की उस यात्रा ने मेरे भीतर गांव से बाहर निकलकर दुनिया देखने की बलवान इच्छा रोप दी थी।

फरवरी 1976 में मैं सेना में भर्ती हो गया और उत्तरपूर्वी गाओमी क़स्बे से निकल गया। वह क़स्बा, जिसे मैं प्रेम भी करता था और नफ़रत भी। वह मेरे जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत थी। मेरी पीठ पर जो सामान बंधा था, उसमें चार खंडों वाली किताब 'चीन का संक्षिप्त इतिहास' भी थी। मेरी मां ने अपने शादी के गहने बेचकर मेरे लिए वह किताब ख़रीदी थी। इस तरह मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दौर शुरू हुआ। मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि अगर चीनी समाज में तेज़ विकास और बदलाव के वे तीस साल न होते, उसके फलस्वरूप राष्ट्रीय सुधार और बाहर के लिए दरवाज़े न खुले होते, तो मैं आज लेखक न बन पाता।

दिमाग़ को झकझोर देने वाले सैन्य जीवन में मैंने 1980 के दशक की विचारधारात्मक स्वतंत्रताओं और साहित्यिक उत्साहों का स्वागत किया। दूसरों से सुनी कहानियों को याद कर, दूसरों के सामने सुना देने वाला वह लड़का, एक रोज़ उस शख़्स में बदल गया, जो उन कहानियों को प्रयोगधर्मिता के साथ लिख भी रहा था। जब तक मुझे यह अहसास न हुआ कि गांव में गुज़ारे दो दशक दरअसल मेरे साहित्यिक जीवन का सबसे समृद्ध स्रोत होंगे, तब तक मेरे लिए वह सारा रास्ता ऊबडख़ाबड़ ही रहा। मुझे लगता था कि साहित्य का अर्थ होता है, अच्छे लोग अच्छा काम करें, कहानियां नायकत्व और आदर्श नागरिकों से भरी हुई हों, इसीलिए उस समय तक मेरा जो भी काम प्रकाशित हुआ था, उसकी कोई साहित्यिक महत्ता नहीं थी।


1986 में मुझे पीएलए आर्ट अकादमी के साहित्य विभाग में दाखिला मिल गया। वहां प्रसिद्ध लेखक शू हुआइजोंग मेरे मार्गदर्शक बने। मैंने वहां कई कहानियां और नॉवेला लिखे, जैसे 'ऑटम फ्लड्स', 'ड्राय रिवर', 'द ट्रांसपैरेंट कैरट' और 'रेड सोर्गम'। उत्तरपूर्वी गाओमी क़स्बे ने पहली बार 'ऑटम फ्लड्स' में प्रवेश किया और जैसे भटकते हुए किसी किसान को अपने हिस्से की ज़मीन मिल जाए, उसी तरह इस साहित्यिक बंजारे को एक ऐसी ज़मीन मिल गई, जिसे वह ऐन अपनी जगह कह सकता था। मुझे यह कह देना चाहिए कि उत्तरपूर्वी गाओमी क़स्बे को अपनी साहित्यिक भूमि के रूप में स्थापित करने के लिए मैं अमेरिकी उपन्यासकार विलियम फॉकनर और कोलंबियाई लेखक गाबरीयल गार्सीया मारकेस से बहुत गहरे तक प्रभावित हुआ। मैंने दोनों को ज़्यादा नहीं पढ़ा था, लेकिन जिस साहस से उन्होंने लेखन के भीतर नए रचनात्मक क्षेत्रों की रचना की थी, उसने मुझे प्रोत्साहित किया। इन्हीं दोनों ने मुझे सिखाया कि लेखक के पास अवश्य ही एक ऐसी जगह होनी चाहिए, जिसे वह नितांत अपनी जगह मान सके। अपमान और समझौते तो असल जीवन में रोज़मर्रा ही मिलते रहते हैं, लेकिन साहित्यिक रचना के लिए जो सबसे ज़रूरी चीज़ है, वह है परम आत्म-विश्वास और अपनी सूझबूझ पर टिके रहने का माद्दा। दो साल तक मैं इन दोनों उस्तादों के नक़्शेक़दम पर चलता रहा और उसके बाद मैंने तय किया कि अब मुझे इनके प्रभाव से मुक्त हो जाना चाहिए। अपने इस फ़ैसले पर मैंने एक निबंध में इस तरह लिखा था: वे दोनों तपती हुई भट्ठी की तरह थे और मैं बर्फ़ की एक सिल्ली। अगर मैं इन दोनों के ज़्यादा क़रीब गया, तो पिघलकर मैं भाप का बादल बन जाऊंगा। मेरी समझ से, एक लेखक दूसरे को तभी प्रभावित कर सकता है, जब दोनों के बीच एक आध्यात्मिक बंधुत्व हो, जिसे आम भाषा में कहा जाता है- दोनों का दिल एक-सा धड़कता है। इसी से समझ सकते हैं कि भले मैंने उनकी किताबों के कुछ ही पन्ने पढ़े थे, पर मैंने यह जान लिया था कि वे क्या कर रहे हैं और किस तरह कर रहे हैं, और इसी से मेरी समझ में यह आया कि मुझे क्या करना है और किस तरह करना है।

मुझे एक सरल-सा काम करना था: अपनी कहानियों को अपनी तरह से लिखो। मेर तरीक़ा था, बाज़ार का वह कि़स्सागो, जिससे मैं भली-भांति परिचित था। मेरा तरीक़ा था मेरे नाना, नानी और गांव के बुज़ुर्ग जो अपनी तरह से कहानी से सुनाते थे। बहुत साफ़ कह दूं, अपनी कहानियां लिखते समय मैंने अपने पाठकों के बारे में कभी नहीं सोचा। शायद मेरे सारे पाठक मेरी मां जैसे थे, या शायद अपना पाठक ख़ुद मैं ही था। शुरुआती कहानियां बस मेरे निजी अनुभवों का आख्यान थे। मसलन 'ड्राय रिवर' में वह लड़का, जिसे ख़ूब मार पड़ती है या 'द ट्रांसपैरेंट कैरट' का वह लड़का जो कभी बोलता ही नहीं। दरअसल, एक बार मैंने एक बुरा काम किया था, जिसके कारण मेरे पिता ने मुझे कोड़ों से मारा था, सो, उस किताब का वह लड़का मैं ही हूं। और मैं ही हूं, जिसने एक पुल के किनारे एक लुहार के साथ काम किया था। बहुत स्वाभाविक सी बात है कि निजी अनुभवों को आप हूबहू कहानी में तब्दील नहीं कर सकते, भले वे कितने ही अनोखे अनुभव क्यों न हों। गल्प को गल्प होना ही होता है, उसे कल्पनाशील होना होता है। मेरे कई दोस्त 'द ट्रांसपैरेंट कैरट' को मेरी सर्वश्रेष्ठ कहानी मानते हैं। अपनी किसी रचना के बारे में ख़ुद की मेरी कोई धारणा नहीं है। मैं सिर्फ़ इतना कह सकता हूं कि जितनी भी कहानियां मैंने लिखी हैं, उनमें 'द ट्रांसपैरेंट कैरेट' सबसे ज़्यादा प्रतीकात्मक और सबसे ज़्यादा गहरे अर्थों वाली है। पीड़ा सहने की अलौकिक शक्तियों और अलौकिक संवेदनशीलता वाला वह सांवला लड़का मेरी पूरी गल्प-यात्रा की आत्मा है। उसके बाद से मैंने जितने भी काल्पनिक चरित्र बनाए, उनमें वही मेरे सबसे ज़्यादा क़रीब है। या इसे थोड़ा दूसरी तरह से कहें, लेखक जितने भी चरित्रों की रचना करता है, उनमें से कोर्ई एक सबसे ऊपर खड़ा होता है। मेरे लिए वह चरित्र उस चुप्पे लड़के का है। भले वह कुछ न कहता हो, लेकिन उत्तरपूर्वी गाओमी क़स्बे के मंच पर वह दूसरों के लिए रास्ता बनाता चलता है।

व्यक्ति के निजी अनुभव सीमित होते हैं और एक बार अगर आपके अपने अनुभव चुक गए, तब आप दूसरों की कहानियां कहना शुरू कर देते हैं। इस तरह मेरी स्मृति की गहराइयों से, जबरन भर्ती किए गए रंगरूटों की तरह, मेरे परिजनों की कहानियां निकल कर आईं, मेरे गांव वालों की, बहुत पहले मर चुके उन पुरखों की कहानियां, जिनके बारे में मैं बुज़ुर्गों के मुंह से सुना करता था। वे सब मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे कि मैं उनकी कथा कहूं। मेरे नाना-नानी, मां-पिता, भाई-बहन, मौसियां-मामा, मेरी पत्नी और मेरी बेटी- मेरी कहानियों में ये सब आते हैं। उत्तरपूर्वी गाओमी क़स्बे के वे लोग, जो मेरे रिश्तेदार नहीं, वे भी अपनी छोटी भूमिकाओं में इनमें शामिल हैं। ज़ाहिर है, ये सभी एक साहित्यिक परिशोधन से गुज़रकर ही आते हैं ताकि वे जीवन से बड़े, काल्पनिक चरित्र की तरह लग सकें।

मेरे ताज़ा उपन्यास 'फ्रॉग्स' में मेरी एक मौसी केंद्रीय किरदार की तरह है। जैसे ही नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई, साक्षात्कार लेने के लिए उनके घर पत्रकारों का तांता लग गया। पहले तो वह सब्र से सभी को जवाब देती रहीं, लेकिन जल्द ही वह इन सबसे असहज होकर दूसरे शहर में अपने बेटे के घर चली गईं। मैं इससे इंकार नहीं करता कि उपन्यास की नायिका के लिए वह मेरी मॉडल थी, लेकिन यह भी कहूंगा कि उपन्यास के चरित्र और उनके बीच बड़े अंतर भी हैं। उपन्यास की मौसी आक्रामक और दबंग है, मौक़ों पर शातिर भी, लेकिन मेरी असली मौसी बहुत प्यारी और दयालु है, जिम्मेदार पत्नी और प्रेम से भरी मां है। मेरी असली मौसी के सुनहरे साल बड़े सुखद रहे, लेकिन उपन्यास की मौसी, जीवन के आखि़री बरसों में आत्मिक पीड़ाओं से ग्रस्त होकर अनिद्रा का शिकार हो जाती है और सियाह लबादा पहनकर रात को भूतों की तरह भटकती है। मैं अपनी मौसी का बहुत शुक्रगुज़ार हूं कि उपन्यास में उनके चरित्र को इस तरह बदल देने के बाद भी वह मुझसे ग़ुस्सा नहीं हैं। मैं उनके इस विवेक का भी मुरीद हूं, जिसके ज़रिए वह काल्पनिक चरित्रों और असल लोगों के बीच के जटिल रिश्ते को समझ पाती हैं।


दुखों से अशक्त होकर जब मेरी मां मरीं, तब मैंने उसके जीवन पर उपन्यास लिखने का फ़ैसला किया। उस उपन्यास का शीर्षक है : 'बिग ब्रेस्ट्स एंड वाइड हिप्स'। जैसे ही मेरा यह विचार पका, मैं भावनाओं के उत्ताप से इतना सुलगने लगा था कि सिर्फ़ 83 दिनों में ही मैंने पांच लाख शब्दों की पांडुलिपि तैयार कर ली।

'बिग ब्रेस्ट्स एंड वाइड हिप्स' में मैंने पूरी निर्लज्जता से अपनी मां से जुड़े अनुभवों का प्रयोग किया है, लेकिन उपन्यास की मां के चरित्र की भावनात्मक दशा या तो पूरी तरह गढ़ी हुई है या फिर वह उत्तरपूर्वी गाओमी क़स्बे के अनेक मांओं की दशा का मिश्रण है। भले मैंने उपन्यास के समर्पण पृष्ठ पर लिखा, 'मेरी मां की आत्मा के लिए', सच तो यह है कि वह उपन्यास दुनिया की हर मां के लिए लिखा गया था। यह मेरी वैसी ही निरंकुश आकांक्षा थी, जिसमें मैं उत्तरपूर्वी गाओमी क़स्बे को पूरे चीन का लघु प्रतिरूप बना देना चाहता था। चीन क्या, पूरी दुनिया का लघु प्रतिरूप।

लेखन की प्रक्रिया हर लेखक के लिए अलग और अनूठी होती है। कथानक और प्रेरक शक्तियों के हिसाब से देखें, तो मेरा हर उपन्यास अलग है। जैसे कि 'द ट्रांसपैरेंट कैरट' एक सपने में जन्मा था, जबकि 'द गार्लिक बैलड्स' जैसे उपन्यासों का मूल असल घटनाओं मे है। यह ध्यान दिला दूं कि 'द गार्लिक बैलेड्स' में मैंने असल जीवन से एक गायक-कि़स्सागो को लिया और उसे उपन्यास में एक महत्वपूर्ण भूमिका दी। काश, मैंने उसका असली नाम इस्तेमाल न किया होता, हालांकि उसके शब्द और गतिविधियां काल्पनिक थे। ये चीज़ें बार-बार आती हैं। मैं किसी चरित्र के असली नाम का इस्तेमाल करता हूं, ताकि उसका वर्णन करते समय मैं उससे कुछ क़ुरबत महसूस कर सकूं, लेकिन जब तक उपन्यास पूरा होता है, तब तक इतनी देर हो चुकी है कि उसका नाम बदलना लगभग मुश्किल हो जाता है। कई लोग जो मेरे उपन्यासों में अपना नाम देखते थे, वे जाकर मेरे पिता से शिकायतें करते थे। मेरे पिता, मेरे बदले उनसे माफ़ी मांगा करते थे और उनसे गुज़ारिश करते थे कि वे ऐसी बातों को गंभीरता से न लें। वह कहते, 'उसने तो 'द रेड सोर्गम' में पहली लाइन ही मेरे बारे में लिखी है, 'मेरे पिता एक डकैत की औलाद थे'। जब मैंने इस बात की तरफ़ ध्यान नहीं दिया, तो फिर आप लोग क्यों दुखी होते हैं?'

जिन उपन्यासों में मैंने सामाजिक यथार्थ का चित्रण किया है, उन्हें लिखना मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। जैसे कि 'द गार्लिक बैलेड्स'। इसलिए नहीं कि समाज के सियाह पहलुओं की आलोचना करने से मुझे कोई डर लगता है, बल्कि इसलिए कि यदि उनसे भावनाएं व क्रोध भड़कते हैं, तो राजनीति को एक मौक़ा और मिल जाता है कि वह साहित्य का दमन कर सके। ऐसे में वह उपन्यास एक सामाजिक घटना का रिपोर्ताज-भर बनकर रह जाता है। समाज का एक सदस्य होने के नाते उपन्यासकार को पूरा हक़ है कि उसका अपना एक दृष्टिकोण और पक्ष हो, लेकिन जब वह लिख रहा है, तो उसे हमेशा मानवीय पक्ष की ओर खड़ा होना चाहिए, उसी के हिसाब से लिखना चाहिए। सिर्फ़ तभी यह संभव है कि साहित्य सिर्फ़ घटनाओं से पैदा न हो, बल्कि उनके पार चला जाए। वह सिर्फ़ राजनीतिक स्थितियों के लिए चिंतित न हो, बल्कि वह राजनीति से भी बड़ा बन जाए।

मुझे लगता है कि जीवन को लेकर मेरी समझ ज़्यादा गहरी है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि मैंने बहुत अलग-अलग परिस्थितियों में जीवन जिया है। मुझे पता है कि निख़ालिस साहस क्या होता है और यह भी पता है कि असली करुणा क्या होती है। मैं जानता हूं कि हर आदमी के दिलो-दिमाग़ में विशाल आकाशगंगाएं रहती हैं और इन जटिल आकाशगंगाओं को आप कभी भी सही या ग़लत, अच्छा या बुरा के ठीक-ठीक खांचों में नहीं बांट सकते। तारामंडलों से बना यही वह विशाल भूभाग है, जिसमें कोई लेखक अपनी पूरी प्रतिभा को एक स्वतंत्र नियंत्रण देता है। जब तक कोई रचना विरोधाभासों से भरे हुए इस भूभाग यानी इन तारामंडलों का सही और वैविध्यपूर्ण चित्रण करती रहेगी, तब तक वह अनिवार्यत: राजनीति से परे पहुंचती रहेगी, तब तक वह साहित्यिक उत्कृष्टता से गुंथी हुई रहेगी।

मैं अपनी ही रचनाओं के बारे में बकबक कर रहा हूं जिससे आपको खीझ भी हो सकती है, लेकिन मेरा जीवन और मेरी रचनाएं बहुत जटिल तरह से आपस में जुड़े हुए हैं। इसीलिए मैं अगर अपनी रचनाओं के बारे में बात न करूं, तो मेरी समझ में ही नहीं आता कि दूसरे किस विषय पर बोलूं। मुझे उम्मीद है कि आप सब क्षमाभाव से मुझे सुन रहे होंगे।

मैं एक आधुनिक कि़स्सागो था, जो अपनी शुरुआती रचनाओं की पृष्ठभूमि में छिप जाता था, लेकिन 'सैंडलवुड डेथ' के साथ मैं इस छाया से बाहर निकल आया। मेरी शुरुआती किताबों को आत्मालाप की एक शृंखला की तरह देखा जा सकता है, जिसमें मेरे सामने कोई पाठक ही नहीं था, लेकिन इस उपन्यास की शुरुआत करते समय मैंने एक कल्पना की कि मैं मार तमाम लोगों से भरे एक चौराहे पर खड़ा हूं और तल्लीन होकर उन्हें अपनी कहानी सुना रहा हूं। पूरी दुनिया के गल्प में इस तरह के आख्यान की परंपरा है, लेकिन चीन में यह ज़रा ख़ास है। एक ज़माने में मैं पश्चिमी आधुनिक कथा साहित्य का बहुत एकाग्रचित्त विद्यार्थी था और मैंने आख्यान की लगभग हर शैली के साथ प्रयोग किया। पर अंतत:, मैं अपनी पंरपराओं में लौट आया। जाहिर है, बिना परंपरा का शोधन किए इस तरह से लौटना संभव नहीं होता। 'सैंडलवुड डेथ' और उसके बाद लिखे उपन्यास दरअसल चीनी क्लासिकल औपन्यासिक परंपरा के ही वारिस हैं, लेकिन उनका परिमार्जन पश्चिमी साहित्य की तकनीकों से हुआ है। जिसे 'इनोवेटिव फिक्शन' या नवप्रवर्तनकारी कथा साहित्य कहा जाता है, वह बहुत हद तक, एक मिश्रण होता है, जो घरेलू परंपराओं में विदेशी तकनीकों के प्रयोग तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें कला की दूसरी विधाओं का प्रयोग भी, कथा कहने के लिए, किया जाता है। मिसाल के तौर पर 'सैंडलवुड डेथ' के फिक्शन में स्थानीय नाट्यकला का मिश्रण किया गया है, जबकि उसके पहले की रचनाओं मे मैंने ललित कलाओं, संगीत, यहां तक कि नट-नटिनियों की कलाबाजियों को भी तकनीक के तौर पर प्रयुक्त किया था।

अंतत: मैं आपका ध्यान अपने उपन्यास 'लाइफ़ एंड डेथ आर वीयरिंग मी आउट' की तरफ़ दिलाना चाहूंगा। किताब का चीनी शीर्षक बौद्ध धर्मग्रंथों से निकला था, और जैसा कि लोगों ने मुझे बताया है, इस उक्ति को दूसरी भाषाओं में उल्था करने में मेरे अनुवादकों का कलेजा बाहर आ गया था। मैं बौद्ध धर्मग्रंथों का प्रकांड ज्ञानी नहीं हूं, बल्कि इस धर्म की महज़ ऊपरी समझ ही रखता हूं। मैंने इस उक्ति को अपनी किताब के शीर्षक के रूप में चुना, क्योंकि मेरा मानना है कि बौद्ध धर्म सार्वभौमिक ज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है और मनुष्य की अनेक जटिल समस्याएं बौद्ध धर्म के इस छत्र के नीचे पूरी तरह से अर्थहीन दिखती हैं। ब्रह्मांड को इतनी ऊंचाई से देखा जाए, तो मनुष्य के संसार पर तरस आता है। मेरा उपन्यास कोई धर्म-प्रबंध नहीं है, उसमें मैंने मनुष्य के भाग्य और मानवीय भावनाओं के बारे में लिखा है, मनुष्य की सीमाओं और मानवीय उदारताओं के बारे में लिखा है, ख़ुशी की खोज के बारे में, इस खोज में वे कितनी दूर तक जा सकते हैं और अपनी आस्था बनाए रखने के लिए क्या-क्या बलिदान कर सकते हैं, इनके बारे में लिखा है। मेरी नज़र में लान लियान असली हीरो है, जो समसामयिक प्रथाओं के खि़लाफ़ खड़ा हो जाता है। मेरे पड़ोस के एक गांव के किसान को मैंने इस चरित्र का मॉडल बनाया था। बचपन में मैं उसे देखा करता, जब वह हमारे दरवाज़े के सामने से, लकड़ी के पहियों पर चलती चरमराती एक गांडी हांकता हुआ गुज़रता था। उस गाड़ी को एक मरियल-सा गधा खींचता था। पैरों से लाचार उसकी पत्नी उस गाड़ी के आगे-आगे चला करती थी। वह सामूहिक श्रम का युग था, जिसमें इस तरह मज़दूरी करते देखना ख़ासा हैरतअंगेज था। हम बच्चों के लिए वे उन जोकरों की तरह थे, जो ऐतिहासिक परंपराओं के खि़लाफ़ क़दमताल करते थे। उनका यह रूप हमारे भीतर के मख़ौल-उड़ाऊ रोष को इस तरह उकसा देता था कि हम उन्हें जब भी गली से गुज़रता देखते, उन्हें पत्थर मारते थे। बरसों बाद, जब मैंने लिखना शुरू किया, वह किसान और उसके आसपास का वह दृश्य, मेरे दिमाग़ में तैरने लगे। मुझे पता था कि एक दिन मैं उस पर पूरा एक उपन्यास लिखूंगा, आज नहीं तो कल, उसकी कहानी पूरी दुनिया को सुनाऊंगा। पर 2005 तक ऐसा संभव न हो सका। उस साल मैंने एक मंदिर में एक बौद्ध भित्तिचित्र देखा, उसमें बौद्ध सूत्र 'संसार के छह चरण' का दृश्य चित्रित था। तब जाकर मुझे समझ आया कि यह कहानी मुझे ठीक-ठीक किस तरह बयान करनी है।

मेरे नाम नोबेल पुरस्कार की घोषणा होते ही विवाद हो गया। पहले तो मुझे यह लगा कि अब विवादों का निशाना मुझे बनाया जाएगा, लेकिन कुछ ही दिनों में मेरी समझ में यह आ गया कि असली निशाना तो वह शख़्स है, जिसका मुझसे कोई लेना-देना ही नहीं है। मैं नाट्यशाला में किसी दर्शक की तरह बैठ गया और उस नाटक को दूर से देखने लगा, जो मेरे ही आसपास मंचित किया जा रहा था। मैंने देखा कि पुरस्कार का विजेता कभी फूल-मालाओं से लदा हुआ है, तो कभी पत्थर फेंकने वालों, कीचड़ उछालने वालों से घिरा हुआ है। मैं डर गया कि वह इन हमलों में मारा जाएगा, लेकिन वह एक भरपूर मुस्कान के साथ फूल-मालाओं और पत्थरों, दोनों से ही बाहर निकल आया, उसने अपने ऊपर लगा कीचड़ और गंदगी साफ़ की, एकदम शांत होकर किनारे खड़ा हो गया और सामने खड़ी तमाम भीड़ से कहा :

किसी लेखक के लिए बोलने का सबसे अच्छा तरीक़ा, उसका लिखना है। मैं जो-जो कुछ कहना चाहता था, आप पाएंगे कि वह सब मेरी रचनाओं में है। बोले हुए शब्दों को हवा उड़ा ले जाती है, लेकिन लिखे हुए शब्दों को कोई घिस नहीं सकता। मैं चाहूंगा कि आप सब लोग धीरज से मेरी किताबें पढ़ें। ऐसा करने के लिए मैं आप पर कोई दबाव नहीं डाल सकता, और मान लीजिए कि मैंने दबाव डाल भी दिया, तो कम से कम मैं यह नहीं तय कर सकता कि मेरे बारे में आपकी राय क्या बनेगी। पूरी दुनिया के इतिहास में आज तक ऐसा कोई भी लेखक नहीं पैदा हुआ, जिसे उसके सारे पाठक पसंद करते हों। और इन दिनों जैसा समय चल रहा है, यह बात ज़्यादा सही जान पड़ती है।

इस मौक़े पर मैं कुछ और कहना भले पसंद न करूं, फिर भी कुछ न कुछ तो कहना ही होगा, तो मैं कहना चाहता हूं कि -

मैं एक कि़स्सागो हूं, तो मैं आपको कुछ कि़स्से सुनाने जा रहा हूं।

1960 के दशक में जब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता था, स्कूल से हम लोगों को दुख का दर्शन कराने ले जाया गया, जहां शिक्षकों के इशारे पर, हमने ज़ार-ज़ार आंसू बहाए। मैंने कुछ आंसू अपने गाल पर चिपके रहने दिए ताकि शिक्षक उन्हें देख सकें। उस समय दूसरे कुछ बच्चे अपने गाल व आंखें मल रहे थे, ताकि वे रोने का स्वांग निभा सकें। कुछ असली, कुछ नक़ली मातम में डूबे उन तमाम बच्चों के बीच मेरी नज़र एक ऐसे बच्चे पर पड़ी, जिसका चेहरा एकदम सूखा था, जिसने हथेलियों से अपना चेहरा नहीं ढांपा था, जो रोने की कोई कोशिश भी नहीं कर रहा था, उल्टे आंखें फाड़े हम सबको देख रहा था, चकराए हुए उसके चेहरे पर बेतहाशा हैरानगी थी। स्कूल लौटने के बाद मैंने शिक्षक से उसकी शिकायत कर दी। उसे ख़ूब डांट पड़ी। बरसों बाद, उसी शिक्षक के सामने मैं जब अपनी इस हरकत पर दुख जता रहा था, उन्होंने बताया कि उस रोज़ कम से कम दस लड़कों ने उसकी शिकायत की थी। उस घटना के दस साल बाद वह लड़का मर गया। जब भी मैं उसके बारे में सोचता, मेरा ज़मीर मुझे धिक्कारता। लेकिन उस घटना से मैंने एक बहुत महत्वपूर्ण बात सीखी और वह यह है: जब आपके आसपास सारे लोग रो रहे हों, तब आपको न रोने का पूरा-पूरा अधिकार है, और अगर रोते हुए उन लोगों के आंसू नक़ली हैं, तब तो न रोने का आपका अधिकार और भी बड़ा हो जाता है।

एक और कि़स्सा सुनिए: तीस से ज़्यादा साल हुए, तब मैं सेना में था। अपने दफ़्तर में बैठा एक शाम जब मैं कुछ पढ़ रहा था, एक बुज़ुर्ग अधिकारी ने दरवाज़ा खोला और अंदर आए। उन्होंने मेरे सामने पड़ी ख़ाली कुर्सी पर नज़र टिकाई और बुदबुदाए, 'हम्म। यहां कोई नहीं है क्या?' मैं खड़ा हो गया और जोशीली आवाज़ में कहा, 'मैं तो हूं। क्या आप मुझे भी कोई नहीं मानेंगे?' शर्मिंदगी से उन बुज़ुर्गवार के कान सुर्ख़ हो गए और वह वहां से चले गए। लंबे समय तक मैं इसे अपना एक दुस्साहसी कारनामा मानते हुए गर्वित रहा। आज बरसों बाद, वह गर्व मेरी आत्मा के भीतर एक गहरे शोक में बदल चुका है।

बस थोड़ा-सा सब्र और, यह आखि़री कि़स्सा है। इसे मेरे नाना ने बरसों पहले सुनाया था : मकान बनाने वाले आठ मिस्त्रियों के एक समूह ने तूफ़ान से बचने के लिए एक जर्जर मंदिर में शरण ली। बाहर बिजली कड़क रही थी, जैसे आग के गोले उठ रहे हों। उन्हें कोई आवाज़ भी सुनाई पड़ी, जैसे कोई ड्रैगन चिंघाड़ रहा हो। वे सब डर गए, उनके चेहरे राख़ जैसे रंग के हो गए। एक ने कहा, 'हममें से किसी ने बहुत बड़ा पाप किया है, जिससे ईश्वर हम पर कुपित है। जिस किसी ने भी पाप किया है, वह इसी समय मंदिर से बाहर निकल जाए, जाकर अपनी सज़ा ख़ुद झेले ताकि बाक़ी सारे निर्दोष बच जाएं।' ज़ाहिर है, कोई भी मंदिर से बाहर नहीं निकला। तो दूसरे ने सुझाव दिया, 'अब चूंकि कोई भी बाहर नहीं निकल रहा है, तो क्यों न ऐसा करें, हम सब तिनकों से बनी अपनी-अपनी टोपियों को दरवाज़े की तरफ़ फेंकते हैं। जिसकी टोपी मंदिर के दरवाज़े से बाहर निकल जाएगी, समझ लें कि उसी ने पाप किया होगा। तब हम सब उससे कहेंगे कि वह बाहर जाए और ईश्वर द्वारा दी जा रही सज़ा को क़बूल करे।' सात लोगों की टोपी अंदर ही रह गई, सिर्फ़ एक की टोपी बाहर गिरी। इन सातों ने उस आठवें से कहा कि वह बाहर चला जाए ताकि सज़ा सिर्फ़ उसे ही मिल सके। आठवां मिस्त्री ना-नुकुर करने लगा, वहीं अड़ गया, तो सातों ने उसे उठाया और दरवाज़े से बाहर फेंक दिया। मुझे पता है कि आप सब लोग जानते हैं कि इस कहानी का अंत कैसे होगा : जैसे ही उन सातों ने उसे उठाकर मंदिर से बाहर फेंका, पूरा मंदिर भहराकर धराशायी हो गया।

मैं एक कि़स्सागो हूं।

कि़स्से सुना-सुनाकर ही मैंने नोबेल प्राइज़ जीता है।

पुरस्कार को जीतने की इस यात्रा के दौरान मेरे साथ बहुत सारी दिलचस्प चीज़ें घटित हुई हैं, और उन सबने मुझे यह यक़ीन दिला दिया है कि दुनिया में सत्य और न्याय, न केवल जि़ंदा हैं, बल्कि स्वस्थ भी हैं।

तो, आने वाले दिनों में मैं अपने कि़स्से सुनाना जारी रखूंगा।



(यह अनुवाद हावर्ड गोल्‍डब्‍लैट के अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित है.)
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सबद पुस्तिका 9 - उदयन वाजपेयी

5:11 pm





बाज़बहादुर की कविताएँ
( रानी रूपमती और बाज़बहादुर की प्रणयगाथा लोक में प्रसिद्ध है। रूपमती गायन और लेखन में प्रवीण थीं। बाज़बहादुर तालवाध वादन में निष्णात थे। उन्होंने कुछ लिखा हो, ऐसा ज्ञात नहीं है। ये कविताएँ बाज़बहादुर की वे कविताएँ हैं जो वे लिख सकते थे ) 
- उदयन वाजपेयी

हर चंद मैंने शौक को पिन्हा किया वले,
एक आध हर्फ़ प्यार का मुँह से निकल गया।
                                                        - मीर






1.

उसकी आवाज़ की गहरायी में
धड़कते मौन के स्पन्दन
सुन रहा हूँ
मैं सुन रहा हूँ वह
क्या बोलते हुए
क्या नहीं बोल रही !


2.

मुझे नहीं उतरना है
उसकी आवाज़ की कन्दरा में
मुझे नहीं आता
कैसे मौन की लपटों में
झुलसने से बचा जाता है

मुझे नहीं आता
मुझे नहीं उतरना


3.

उसकी आवाज़ की गहरायी में
सिहरते संकोच को
छू रहा हूँ
मैं सुन रहा हूँ वह
क्या बोलते हुए
क्या नहीं बोल रही !


4.

कहाँ बनाऊँ तोरण-द्वार
उसके आने के लिए
यह ज़िंदगी इतनी जगहों से
टूट-फूट गयी है, इतनी जगहों से
खुल गयी है कि खिड़कियों तक के लिये
जगह बाकी नहीं है

कहाँ बनाऊँ तोरण-द्वार
उसके आने के लिए ?


5.

उसकी आवाज़ की गहरायी में
फड़फड़ाते पंख बार-बार मेरी
पीठ को घायल कर रहे हैं
ओह! वे पंख जो उड़ नहीं पाते
कैसे नश्तरों में बदल गये हैं
कैसे लहुलुहान होती जा रही है
उसकी यह काँपती-सी आवाज़
काग़ज़ पर लिखी !

मांडू स्थित बाज़बहादुर के महल की एक छतरी. 



6.

उसकी आवाज़ में स्तनों की खनक थी
त्वचा की सिहरन थी
उसकी आवाज़ में रह-रह कर
काँपते थे होंठ, कुण्डली मार कर
बैठी थी संकोच-दीप्त चाल

मैं उसकी आवाज़ में प्रवेश पाना चाहता था।
मैं उसकी आवाज़ में उसे खो देना चाहता था।


7.

लिखे हुए शब्दों के पीछे से उसे
मेरी फुसफुसाहट सुनायी देती है
अपने बोलने में
अचानक उसे महसूस होने लगते हैं
मेरी आवाज़ की रेशे
वह चौंक कर मुड़ती है
चारो ओर फैली हरियाली पर
बारिश की बूँदें गिर रही हैं

टप-टप टप-टप
टप-टप टप-टप


8.

अँधेरे में चमकते उसके चेहरे से
लगभग पारदर्शी मुस्कान झर रही है
मेरी नज़र उस तक पहुँचने के पहले
कहीं और उलझ जा रही है
वह स्वीकार में ठिठकी खड़ी है
उसके स्तनों पर कामना के स्पन्दन फैलते हैं
पृथ्वी पर उगे वृक्षों पर जैसे
हवा के झौंके !


9.

उसके लौटने से
सूनी हुर्इ गली में फैले
मेरे आँसुओं की ओस में
हज़ारों चन्द्रमा चमकते हैं
अनगिन टिमटिमाते हैं तारे
जलते बुझते हैं
जुगनू सारे के सारे


10.

फिर उसकी आवाज़
फैली कागज़ पर
आँसुओं की लकीरों-सी

फिर उसकी आवाज़ के
दाने-दाने में
कँपकँपायी कामना
ओस-बूँदों में आकाश-सी

फिर उसकी आवाज़ के बीच
लहराया सँकोच
साँझ की हवा-सा

कभी दीखता, कभी लोप होता
आँखों में झिलमिलाती
चाँदरात-सा

मालवा के बाज़बहादुर द्वारा चलाया गया चांदी का सिक्‍का. साभार - नेशनल म्‍यूजि़यम, दिल्‍ली.

11.

उसने कामना के चिकने फर्श पर
सँभल-सँभल कर पाँव रखे हैं

यह उपाय उसे फिसलने से
ज़रूर बचा लेगा पर
गीले फर्श पर उसके पाँवों के
निशानों को आने से कौन रोक सकेगा

गुनगुनाने से, कौन रोक सकेगा
उसका हाल बताने से ?


12.

आज फिर उसने
मेरा देखना नहीं देखा

आज फिर उसने
मुझे देखने नहीं दिया
अपना देखना जहाँ
दूधिया चाँदनी में नहाते वृक्ष से
उतरकर उसका बचपन
उसे अलविदा कह रहा है
जहाँ शीतल सरोवर उसके
उजले स्तनों को
पानी के दुपट्टे से ढँक रहा है

आज फिर उसने...


13.

उसकी लिखी हुर्इ
आवाज़ पर
उसकी पलकें
झुक आयी हैं

मनो घूँघट के पीछे
छिप गया हो
सारा का सारा गाँव।


14.

रेवा न सही
मेरे स्पर्श की नीरव नदी में
नहा कर वह किले की सीढि़याँ चढ़ती है
उसके पाँव की हर थाप के साथ
उसके आँचल से सरक कर
धरती पर मेरा स्पर्श टपकता है

कहीं दूर घोड़ों की टापों में
उलझी मेरी नियति में
रह-रह कर टीस उठती है


15.

लकीरें छूट गयी हैं
मेरे हाथों की
उसके काँपते वक्ष पर

जाने-अनजाने
बदल ली है अपनी भूमि
मेरे अनागत के मानचित्र ने

हाथों में सँभाले इस थरथराते शून्य को
मैं गुज़र रहा हैं
चक्रव्यूहों के पार
उसकी प्रतीक्षा में !

साभार - नेशनल म्‍यूजि़यम, दिल्‍ली.


16.

कामना के नुकीले पंजे रह-रह कर
नौंच लेते हैं मेरे सीने का गोश्त
हवा में घुली उसकी मुस्कान
पैनी चोंच-सी
मेरी आँखों को जख़्मी कर रही है
बाज़ की तरह मुझे उठा कर
यहाँ-वहाँ पटक देती है उसकी अनुपस्थिति

इस रणभूमि में मुझे मारने
भाला कोर्इ क्यों उठाये ?
तलवार की ज़रूरत किसे है ??


17.

एक नया दुख पुराने सारे दु:खों को
अपने पास खींचता है

एक विछोह सारे विछोहों को
जीवन्त कर देता है एक बार फिर

दिल पर लगे घाव मानो
चादर ओढ़े पड़े रहते हैं
ज़रा-सी आहट हुर्इ नहीं कि
उठकर बैठ जाते हैं सारे के सारे

डरो, मेरे मन, डरो।


18.

पास आती जा रही हैं
घोड़ों की टापें
वृक्षों की ओट में अचानक
चमक उठती है किसी तलवार की धार
कोर्इ दोगला दुश्मन को बता चुका है
मेरे छिपने का यह स्थान

पर मैं जानता हूँ
मुझे पूरी तरह खत्म
नहीं किया जा सकेगा कभी
मेरे कण-कण में बसा है
उसका लावण्य !


19.

पता नहीं मैं क्यों आया
बन्द दरवाज़ा खटखटाया
मुझे सचमुच पता नहीं था कि
मैं इतना सूनापन ले आँऊगा
उसके जीवन में


20.

उसके हाथ की मेंहदी में
समूचा बाग लहलहा रहा है
आम के बौरों की महक फैली है, कोयलें
गा रही हैं, रंगबिरंगी चिडि़याँ
फूलों पर मँडरा रही हैं

वहीं शहद तैयार हो रहा है, मुझ दूर बैठे का
सूनापन हर ओर फैल रहा है

उसके हाथ की मेंहदी में !

साभार - अशमोलियन म्‍यूजि़यम.


21.

पोथी में उलझकर रणभूमि तक चला आया
उसका यह बाल
आखिर सीधा खड़ा क्यों नहीं हो जाता
बंगाल की जादुर्इ रस्सी-सा कि मैं
उस पर चढ़कर देख सकता
कि वह महल की छत पर कहाँ
वीणा पर सिर धरे बैठी है
कि वह अन्त:पुर के किस कोने में पड़ी
अपने चेहरे के उतार-चढ़ाव पर
आँसुओं को बहने दे रही है

मेरे न चाहते भी
यह दूसरी रेवा
कैसे तुम्हारे करीब आ गयी, रूपमती !


22.


भरता नहीं कोर्इ भी घाव,
शरीर में ही कहीं
छिप जाता है

नया घाव आया नहीं कि
वह जहाँ भी छिपा होता है
वहीं धड़कने लगता है


23.

उसके पोर-पोर पर
कामना का कमल
उगा है

ओस बूँद अब गिरी
कि तब गिरी

देखो !
शान्त सरोवर में
आकाश झुका
चला आ रहा है।


24.

कैसा आनन्द है
इन रक्तरंजित तलवारों की छाया में भी
प्रियतमा है
प्रियतमा की याद है

चोटी से खेलती
रह-रहकर काँपती
उसकी अँगुलियाँ हैं
दूर कहीं
यहीं कहीं !


25.

कैसा आनन्द है
मैं कूद सकता हूँ
अश्‍व से भूमि पर

कैसा आनन्द है
मैं देख सकता हूँ
अन्त के क्षणों में
उलझा
उसका चेहरा

कैसा आनन्द है
रणघोषों के बीच
मैं सुन सकता हूँ
उसकी रियाज़ के टुकड़े

* * *



इन कविताओं की पीडीएफ़ पुस्तिका को आप इस लिंक से भी डाउनलोड कर सकते हैं. 


[ 1960 में जन्मे उदयन वाजपेयी हिंदी के जाने-माने कवि व कथाकार हैं। उनके दो कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह व एक निबंध संग्रह प्रकाषित हैं। फिल्मकार मणि कौल के साथ उनके संवाद की पुस्तक ‘अभेद आकाश‘ अत्यंत चर्चित रही। उनकी कविताओं के अनुवाद कई देशी-विदेशी ज़बानों में हो चुके हैं। साथ ही, दुनिया के कई काव्य समारोहों में उन्होंने शिरकत की है। 'सबद' पर उनकी अन्‍य कविताएं यहां पढ़ सकते हैं। ]

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नई कवयित्री मोनिका कुमार की दो कविताएं

9:50 pm



 जिन्होंने लाड़ से पुकारा
    
    उन्होंने मेरे नाम को छोटा किया
जिन्होंने लाड़ से पुकारा
अधिकार का पहला संकेत
मुझे मिलता है ऐसे ही एक घरु नाम से

पैंतीस की उम्र में
अपने नाम में घुले व्यंजनों और स्वरों के
मेरे पास कई युग्म है
जो मेरी माँ के लिए अकल्पनीय हैं
जिसने यह नाम सोचा
मेरे पैदा होने से पहले
अपनी एक विद्यार्थी के नाम पर
जो उसे कक्षा में सबसे प्यारी थी
पहनती थी सलीके से यूनिफार्म
और अंग्रेजी में होशियार थी

मैंने कभी नहीं देखा वह कौन लड़की है
वह खो गई दुनिया में
वह कोई भी हो सकती है
किसी भी शहर में
उन चेहरों में कोई भी
जिन्हें देखा और भूल गई 

माँ चौकन्नी हो जाती
जब किसी ने मेरा नया नाम रखा
उसे डर लगता
शायद मैं प्रेम में पड़ने वाली हूँ
या ऐसी दोस्ती में
जहाँ मेरे दिल को पीड़ा हो सकती है
वह सुबह मुझे जगाती
पूरे नाम के उच्चारण पर बल देते हुए
ऐसी चेतावनी को मैं हंस कर सुनती
और खनखनाते रहते दूसरे नाम

प्रेम के न रहने का
दोस्ती के छूट जाने का
पहला संकेत वही रहता
दिए  हुए छोटे नाम का बेदावा
और मुझे लौटना होता
नाम के ऐसे उच्चारण पर
जैसे कोई पढ़ रहा हो
टेलिविज़न पर
भूकम्प के उत्तरजीवियों की सूची
जिन्हें अब तक कोई लेने नहीं आया है
***

      कोई मतभेद नहीं

लंग पर बिछी है चादर
जिस पर ट्यूलिप छपे हुए हैं

असली आकार से विराट
छूने में फूल नहीं
और सुगंध जरा-जरा साबुन की
फिर भी ये ट्यूलिप हैं
दूसरी किस्म के ट्यूलिप
दो किस्मों का आपसी कोई मतभेद नहीं

पर्दों पर फूल हैं
गलीचे पर फूल
खाने की प्लेट पर फूल हैं
पहनती हूँ अक्सर वे कुर्ते
 
जिन पर बने रहते हैं कोई--कोई फूल 

क्या हमें फूलों की इतनी याद आती है ?
क्या हम फूलों की याद में रहते हैं ?
हमें चुभता है कुछ शायद
फूल जिसे सहलाते रहते हैं

मेरी दोस्त ने पहनी थी जो कमीज़
उस पर छपे थे अनाम फूल
मैंने पूछा जानती हो क्या नाम है इनका
उसे नहीं अच्छा लगा यह प्रश्न
कोई जरूरी नहीं है कि नाम हो फूलों का
और जरूरी नहीं कि हर पहनी हुई चीज़ का नाम मालूम हो
 
कुछ लोग मुझे बहुत आश्वस्त करते हैं
कि जिज्ञासा कोई विशेष गुण नहीं
इसीलिए मैंने रोक लिया खुद को
जब मैं पूछना चाहती थी दर्जी से
क्या वह ध्यान रखता है इस बात का
कि लड़कियों की कमीज़ की तुरपाई करते हुए 
फूलों की डंडियाँ ना कट जाएँ
उस दोस्त की मुझे अक्सर याद आती है
उसकी तरफ से बहुत बार खुद को डपट देती हूँ

जैसमीन के फूलों की चाय पीते हुए
रूमानी हो जाती हूँ
 
बालकनी से सड़क को झांकती हूँ
यह जो महक रहा है चाय के संग 
यह जरुर कुछ और होगा 

मेरे अधिकतर कवि मित्र
प्लास्टिक के फूल पसंद नहीं करते
मेरी एक फोटो के पीछे
घर में पड़े गुलदान में सजे
प्लास्टिक के ट्यूलिप भी नजर आ रहे थे
कवि मित्र को बुरा लगा
कि यूँ हमारे घर में प्लास्टिक के फूल सजाए जाते हैं
मैंने मन-ही-मन जवाब दिया उन्हें
ये भी ट्यूलिप हैं
 
तीसरी किस्म के ट्यूलिप 
और तीनों का आपसी कोई मतभेद नहीं
*** 

[ मोनिका कुमार हिंदी की युवा कवयित्री हैं। इनकी कविताएं अभी बिलकुल अभी नुमाया हो रही हैं। इस आरम्भ की एक बानगी सबद पर दो नई कविताओं के ज़रिये। कवयित्री की तस्वीर उनके सौजन्य से। कविता के साथ दी गई तस्वीर गूगल से। ]
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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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