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सबद पुस्तिका - 8 - ईमान मर्सल की कविताएं

4:37 am



30 नवंबर 1966 को जन्मी ईमान मर्सल अरबी की सर्वश्रेष्ठ युवा कवियों में से एक मानी जाती हैं। अरबी में उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और चुनी हुई कविताओं का एक संग्रह, ख़ालेद मत्तावा के अनुवाद में, 'दीज़ आर नॉट ऑरेंजेस, माय लव' शीर्षक से 2008 में शीप मेडो प्रेस से अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुआ। अरबी साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद ईमान ने बरसों काहिरा में साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं का संपादन किया। 1998 में वह अमेरिका चली गईं और फिर कनाडा। अंग्रेज़ी के अलावा फ्रेंच, जर्मन, इतालवी, हिब्रू, स्पैनिश और डच में उनकी कविताओं का अनुवाद हो चुका है। उन्होंने दुनिया-भर में साहित्यिक समारोहों में शिरकत की है और कविता-पाठ किया है। वह एडमॉन्टन, कनाडा में रहती हैं और अलबर्टा यूनिवर्सिटी में अरबी साहित्य पढ़ाती हैं।

ईमान बर्लिन-प्रवास पर हैं और इन दिनों अपने नए संग्रह पर काम कर रही हैं, जो पहले अरबी, फिर अंग्रेज़ी में प्रकाशित होगा।

यह सबद-पुस्तिका आज उनके जन्मदिन पर प्रकाशित हो रही है। हिंदी व भारतीय भाषाओं में यह ईमान की पहली पुस्तकाकार प्रस्तुति है। अंग्रेज़ी में उपलब्ध संग्रह की कविताओं के अलावा, इसमें उनकी वे कविताएं भी शामिल हैं, जिनका अभी तक अंग्रेज़ी या अरबी में भी प्रकाशन नहीं हुआ है। जिनके नीचे अंग्रेज़ी अनुवादकों का अलग से जि़क्र है, उनके अलावा शेष सारी कविताएं ख़ालेद मत्तावा के अंग्रेज़ी अनुवादों पर आधारित हैं।

सबद के लिए यह अनुवाद कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी ने किए हैं. इस, आठवीं सबद-पुस्तिका को नीचे एम्‍बेड चित्र पर क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं.




कुछ पुर्जियां, कुछ चिंदियां 
- ईमान मर्सल


'लिखे हुए' को 'सुनाना'

कोई कवि आखि़र श्रोताओं के सामने कविता पढ़ता ही क्यों है?

अरब श्रोताओं के सामने कविता पढऩे का आखि़री मौक़ा मुझे 1995 में मिला था। बेशक, हर कविता-पाठ के अपने ख़ास तनाव होते हैं और मैं कह सकती हूं कि वह कविता-पाठ मेरे जीवन का सबसे समृद्ध और गहन पाठ था। मैंने काहिरा के ऑपेरा हाउस में अल-हनागर हॉल में कविताएं पढ़ी थीं। उस सुबह मैं बहुत हिचकिचाई थी कि मुझे कविता पढऩे जाना चाहिए या नहीं, क्योंकि मैं बड़ी शिद्दत से महसूस करती हूं कि कविताएं - या जो भी कुछ मैं लिखती हूं- उन्हें श्रोताओं के सामने सस्वर नहीं पढऩा चाहिए क्योंकि वे उस मक़सद से लिखी भी नहीं जातीं।

यूरोप और अमेरिका के बाद के कविता-पाठ ज़रा जटिल रहे। पहला मुद्दा तो यही कि ऐसी कविताएं पढऩा, जो श्रोताओं को सुनाने के लिए न लिखी गई हों, दूसरा मुद्दा यह कि पश्चिमी श्रोता आखि़र अरब कविता से क्या सुनने की उम्मीद करते हैं। यह एक अपरिहार्य प्रश्न है और तब ज़्यादा महत्वपूर्ण, जब ख़ुद श्रोता ही यह सवाल पूछ लें। भले बीते बरसों के घटनाक्रम और राजनीतिक कारणों से लगभग हर अरब व्यक्ति पश्चिमी हवाई अड्डों पर पहुंचते ही आत्मचेतस और सजग हो जाया करे, कविता-पाठ के दौरान की गई उम्मीदों का सीधा संबंध उस अरबी कविता की उस छवि से है, जो पश्चिम ने अरबी साहित्य की नवीनताओं के बारे में जानकारी के अभाव के कारण बना रखी है।

साधारणतया, अनुवाद ने इस्लामिक काव्य-परंपरा की सहायता की है, उसमें भी ख़ासकर सूफ़ी काव्य की। और आधुनिक कविता को इसका नक़सान भी उठाना पड़ा है। अदूनिस, महमूद दरवेश, सादी यूसुफ़ जैसे कुछ जाने-माने कवि भी हैं, जिनकी कविताएं एक निर्वात से बाहर निकलती है, जैसा कि उन्हें प्रस्तुत भी इसी तरह किया जाता है, और कविता के साथ उनका संबंध प्रमुखतया राजनीतिक संबंध होता है, साहित्यिक व सांस्कृतिक परंपरा में उनके योगदान के बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं दी जाती। जबकि इधर हुए कई कविता आंदोलन इन कवियों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर चुके हैं।


मैं दहलीज़ पर बैठ लिखती हूं

कुछ कवियों को निर्वासन मिलता है, कई विस्थापित हो जाते हैं, लेकिन कई ऐसे कवि होते हैं, जो बिना घर-बार, देश-दुआर छोड़े ही एलियनेशन, विस्थापन या तमाम राजनीतिक संघर्ष झेल लेते हैं। इसीलिए मैं निर्वासन शब्द का इस्तेमाल करने से बचती हूं क्योंकि इस शब्द के सारे अर्थ समझे बिना इसका ग़लत इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जाता है। मेरे लिए 'रेक्वीअम' में अन्ना आख़्मातोवा का निर्वासन, चेस्वाव मिवोश द्वारा 'नेटिव रेल्म' में झेले निर्वासन से कहीं भी अलग नहीं है।

मैं अपने संदर्भ में निर्वासन की जगह विस्थापन शब्द का प्रयोग करती हूं, क्योंकि मुझ पर इजिप्त छोडऩे का कोई दबाव ही नहीं था। बोस्टन, और उसके बाद कनाडा के एडमॉन्टन के अपने शुरुआती दिनों में मैं भी उन्हीं सब चीज़ों से गुज़री, जिनसे विस्थापित लोग गुज़रते हैं- नॉस्टैल्जिया, घर की याद, क्रोध, दो स्थानों की तुलना। मुझे सर्रियल या अतियथार्थवादी कि़स्म के स्वप्न भी आते थे, जिनमें मैं शहरों, लोगों, भाषाओं सबको आपस में जोड़ दिया करती थी। इस पूरे दौर में कविता लिखने के प्रति कोई मोह भी नहीं था। पांच साल तक तो मैंने एक भी कविता नहीं लिखी।

आज जब मैं मुड़कर देखती हूं, तो पाती हूं कि शायद ये सारी अनुभूतियां मेरे लिए इतनी आकर्षक नहीं थीं कि मेरे भीतर लिखने की इच्छा का वांछित स्पेस बना दें। इजिप्त छोडऩे से पहले ही मेरी कविताओं के बारे में यह कहा जाता था कि ये भावुक होने को हर संभव टालने की कोशिश करती हैं।

मैं विस्थापित लेखकों की ढेरों किताबें पढ़ती थी (यह कोई मुश्किल काम न था क्योंकि उत्तरी अमेरिका की दुकानें ऐसे लेखकों की किताबों से भरी हुई हैं), लेकिन मैं उनमें से कइयों से कनेक्ट ही नहीं हो पाती थी। इन लेखकों से अक्सर दो संस्कृतियों के बीच पुल होने की उम्मीद की जाती है, या कम से कम वर्तमान और अतीत के बीच। उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन में इस तरह की चीज़ें काम की हो सकती हैं, लेकिन मुझे लगा कि अनुभवों की मेरी भूमि कहीं और है।

2003 में जब मैं इजिप्त में एक साल के लिए रहने गई, तब चीज़ें मेरे सामने खुलने लगीं। तब मुझे पहली बार यह अनुभूति हुई कि घर-वापसी नामुमकिन होती है। कनाडा लौटते ही मैंने 'ऑल्टरनटिव जिऑग्रफी की कविताएं लिखनी शुरू कर दीं।

जब मैंने पहली इजिप्त छोड़ा था, तब मेरी एक वृद्ध रिश्तेदार ने मुझसे कहा था, 'एक ख़ुशनुमा दहलीज़ पर रहना।' यह पूरी तरह एक मिस्री अभिव्यक्ति है, जिसका अंग्रेज़ी या दूसरी भाषा में ठीक उतना ही असरदार अनुवाद नहीं हो सकता। मेरे सबसे अहम यह था कि मैं एक दहलीज़ तलाश सकूं, वह ख़ुशनुमा हो या उदास हो, यह अलग मुद्दा है, दहलीज़ चाहिए थी। यही वह जगह है, जहां से मैं लिख सकती हूं।

इजिप्त में वह एक साल गुज़ारने के पहले, मेरे अनुभवकोश में बहुत कुछ था, जिनके बरक्स मैं अपने ताज़ा अनुभवों को खड़ा कर सकती थी, लेकिन उस बरस वहां पूरा समय रहने के बाद मैंने पाया कि वे सारे अनुभव तो छिन्न-भिन्न हो चुके हैं, सबकुछ बदल गया है। ठीक उसी समय मैं उस रेखा पर जाकर फंस गई, जो दो जगहों के बीच होती है।


कवि जहां से देखता है, दरअसल, वह वहीं रहता है

आपके टिकने की जगह या 'पोजीशन' का सवाल, लेखन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। फ़र्ज़ कीजिए, हम पांच कवियों को एक गुलाब या एक लाश देते हैं और उस पर लिखने के लिए कहते हैं। जिस 'पोजीशन' से वे उस पर लिखेंगे, वही 'पोजीशन' उन्हें एक-दूसरे से अलग करेगी। कुछ लोग इसे 'एक लेखक द्वारा अपनी आवाज़ पा लेना' कहते हैं। अपनी पोजीशन पाने में बहुत समय लगता है और मेरा मानना है कि लेखन में यही बुनियादी चुनौती भी है। एक बार आपने अपनी पोजीशन पा ली, लेखन अपने आप खुलने लगता है, हालांकि उस समय नई चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। मेरी कविताओं के मामले में बेचैनी यही थी कि इस दहलीज़ वाली पोजीशन से अरबी भाषा में कविता कैसे लिखी जाए।

आज मैं इस पूरी यात्रा का वर्णन कर पा रही हूं, लेकिन उस समय तो मैं उस बेचैनी को साधारण तौर पर निराशा ही मान लेती थी।

कविता ख़ुद ही एक राजनीतिक धारा है, अप्रत्यक्ष

कुछ लोग कविता को विरोध की आवाज़ कहते हैं। यह ऐसी बात है, जिससे मैं अपने अब तक के जीवन में जुड़ाव नहीं महसूस कर पाती। शायद ऐसा उस संस्कृति के कारण है, जहां से मैं आती हूं। औपनिवेशिक युग की समाप्ति के बाद बहुत बड़े राजनीतिक सवाल खड़े हुए थे, उन पर हद बौद्धिक-विचारधारात्मक बहसें चलीं, और उसके बाद अरब साहित्यिक पटल पर फ़लीस्तीनी त्रासदी ने बहुत बड़ी जगह घेर ली। उस दौर से महान कवि निकलकर आए, जैसे कि महमूद दरवेश, फिर भी मेरा मानना है कि उनकी कविता में काव्यशास्त्र का जो सुंदर प्रयोग है, वह प्रतिवाद या विरोध के इस तत्व से पूर्णत: स्वतंत्र है।

प्रामाणिक कला, अपनी शैक्षणिक भूमिका अदा करती हुई एक अप्रत्यक्ष राजनीतिक धारा हो सकती है।

जैसा कि बादू ने कहा है, कला शैक्षणिक होती है, क्योंकि यह सत्य का संधान करती है और शिक्षा भी इससे अलग कुछ नहीं करती : यानी ज्ञान की विभिन्न विधाओं का संयोजन इस तरह करना कि सत्य उसमें एक छोटा-सा छेद कर सके।
 
सौंदर्यशास्त्रों को तोडऩा, ऐतिहासिक विचारधाराओं को नकार देना

मैं उस पीढ़ी की कवि हूं, जिसने अरब साहित्य में गद्य कविताओं को हाशिए से उठकर केंद्र में आते हुए देखा है। हालांकि वह वजूद में तो पहले से ही थी। शब्दबंध के रूप में गद्य कविता और उसके आसपास चलने वाली बहसों को 1960 के बैरूत के साहित्यिक परिदृश्य में भी देखा जा सकता है। उस समय उस परिदृश्य में यूसुफ़ अल ख़ाल, अदूनिस और ऊंसी अल-हज्ज जैसे कवि सक्रिय थे। लेकिन निजी तौर पर मैं इराक़ी गद्य कविता से ज़्यादा प्रभावित हुई, ख़ासतौर पर सारगोन बूलोस और सालाह फ़ाइक से। इन कवियों को कोई भी अरब कविता समारोह या प्रकाशन संस्थाएं मान्यता नहीं देती थीं। हम उनकी कविताओं और अनुवादों की फोटोकॉपी कराकर आपस में बांटा करते थे।

उन कवियों को पढऩे से पहले मैं गद्य कविताओं से अच्छी तरह वाकि़फ़ थी, लेकिन उन कवियों को पढ़ते हुए यह पहली बार महसूस हुआ कि भावनात्मकता व विचारधारात्मकता के इस अभाव को, भाषा की इस पारदर्शिता को अरबी में भी पकड़ा जा सकता है। मेरी पीढ़ी के कवियों के लिए, मोरोक्को से लेकर इराक़ तक के कवियों के लिए, गद्य कविता कोई शैलीगत चुनाव नहीं थी। मैं नहीं मानती कि कोई भी लेखक अपनी शैली चुन सकता है। बल्कि, जब वे अपनी बात कहने के लिए रास्तों की तलाश कर रहे होते हैं, तब शैली उनके पास ख़ुद आ जाती है।

1990 के उन शुरुआती बरसों में, शहरी काहिरा के उस उजाड़ में मैं नाउम्मीद हो चुके युवा कवियों की जमात में शामिल थी, जो अपनी आंखों से इराक़ द्वारा कुवैत पर हमला देख रहे थे, इराक़ को तबाह कर देने के लिए अरब राष्ट्रों को अमेरिका का पिछलग्गू बना देख रहे थे, फ़लीस्तीनी आज़ादी की जद्दोजहद देख रहे थे, अन्याय और ग़रीबी देख रहे थे, वह पाखंड जो समाजों के चरित्र की रचना करता है, उसे वैश्विक पूंजीवाद और स्थानीय रूढिय़ों-परंपराओं के बीच चिंदी-चिंदी होता देख रहे थे। हम अरब राष्ट्रवाद, पश्चिमी लोकतंत्र, यहां तक कि नवजागरण तक को संदेह से देख रहे थे।

मेरी पीढ़ी के युवा कवि, फिल्मकार और बुद्धिजीवी, हम सब इस एलियनेशन को बहुत शिद्दत से महसूस कर रहे थे और इसी ने हमें इस इच्छा से भर दिया कि हम अरब संस्कृति के सौंदर्यशास्त्र और ऐतिहासिक विचारधाराओं से परे हट जाएं, कविता में तो खासकर। इस तरह गद्य कविता हमारे लिए मुख्यधारा के महा-आख्यानों का निषेध थी।

शायद यह हमें दुनियावी अनुभवों से मुठभेड़ करने की ज़्यादा इजाज़त देती थी। हम भले अपनी शैली या फॉर्म बहुत चैतन्य होकर न चुनें, भले किसी एक ख़ास स्कूल के लेखन में शामिल हो जाने की इच्छा चेतन न रहे, फिर भी हमें जो दिया गया है, जिन सबसे हम पहले से परिचित हैं, उन सबसे अलग हो जाने में इन सारी चीज़ों का बड़ा दबाव होता है।

मसलन युवा कवि के रूप में मैंने अपने पिता और मेरे बीच के जटिल संबंधों को पकडऩे की असफल कोशिशें की थीं, किसी समय मैं उनके भीतर के पितृसत्तात्मक, पुरुष-प्रधान पक्ष की तरफ़ जाती, तो कभी उनके भीतर के प्रेम और त्याग की तरफ़ फिसल आती। जब मैंने इन दोनों ही संदर्भों को नकार दिया और फिर से कोशिश की, तो एक तरह से यह मेरे अपने अस्तित्व के साथ एक जुआ खेलने की तरह था, मेरी भाषा, मेरे ज्ञान, मेरे अंधकार के साथ जुआ।

लेकिन इसमें आनंद भी है, उन चीज़ों को पकडऩे की कोशिश करना, जिनका कोई संदर्भ ही न हो। आपके चुने विषयों की गंभीरता का जैसा चित्रण दूसरों ने किया है, आप उसके खि़लाफ़ खड़े हो जाते हैं। आप न केवल कुछ रचने की क्रीड़ा और आनंद से भरे होते हैं, बल्कि चीज़ों और उनके इर्द-गिर्द फैले पूरे सौंदर्यशास्त्र के विखंडन, उन्हें तोड़-मरोड़ देने के, सुख को अनुभूत करते हैं।

* * *

30 कविताएं : ईमान मर्सल


मेरा नाम संगीतमय है

शायद जिस खिड़की के किनारे मैं बैठी थी
उसने पहले से ही कीर्तिकथा कह दी थी
मैंने अपनी नोटबुक पर लिखा :
ईमान...
स्कूल का नाम : ईमान मर्सल प्राथमिक विद्यालय
न तो टीचर की छड़ी और
न ही पिछली बेंचों से आने वाली हंसी ही रोक पाई मुझे
ऐसा करते रहने से

मैंने सोचा, अपनी गली का नाम मैं अपने नाम पर रख देती
अगर उस पर बने मकान थोड़ा चौड़े होते
और उनमें कुछ गुप्त कमरे बने होते
जहां मेरी सहेलियां अपने बिस्तर में लेट बिंदास सिगरेट फूंकतीं
और उनके बड़े भाई उन्हें कभी पकड़ भी न पाते

उनके दरवाज़े अगर नारंगी रंग से रंगे होते
आनंद के रंग की तरह
उनमें छोटे-छोटे छेद बने होते
ताकि कोर्ई भी अंदर रहने वाले बड़े परिवारों की ताक-झांक कर सकता
शायद तब हमारी गली में किसी को भी अकेलापन न महसूस होता

बड़े काम सिर्फ़
बड़े दिमाग़ के लोग सोचते हैं
मेरे नाम पर बनी गली के किनारे सफ़ेद पटरियों पर चलते रहगुज़र
इन शब्दों में जि़क्र करते मेरा
लेकिन सिर्फ़ छोटा-सा एक पुराना बैर था मेरा उस गली से -
उसके पत्थरों ने मेरे घुटनों पर गहरा निशान छोड़ा है-
बस इसी कारण मैंने तय किया कि गली इस लायक़ नहीं

मुझे ठीक-ठीक याद नहीं
कब मुझे यह पता चला कि
मेरा नाम इतना संगीतमय है कि एकदम उपयुक्त है
ऑटोग्राफ़ देने के लिए छंदबद्ध कविताओं के लिए
और उडऩे के लिए भी
उन दोस्तों के चेहरों के आगे जिनके नाम बहुत साधारण थे
जिन्हें यह नहीं पता कि एक संदिग्ध नाम होने के क्या फ़ायदे हैं
जो आपके चारों ओर संदेह का घेरा बना देता है
और जिसके कारण आपके भीतर कोई और बन जाने की इच्छा भर जाती है
ताकि जो कोई नया साथी मिले, वह पूछे :
क्या तुम ईसाई हो
या
कहीं तुम लेबनान से तो नहीं आई?

दुर्भाग्य से, इस बीच कुछ हो गया।
अब जब कोई मेरा नाम पुकारता है
मैं चकरा जाती हूं और चारों ओर देखने लगती हूं
एक स्त्री जिसका शरीर अब मेरे जैसा हो गया
और छाती ऐसी कि हर दिन हर सांस कर्कश-सी जान पड़े
उसका ऐसा नाम भी संभव है?

बेडरूम से बाथरूम जाते समय
अक्सर मैं ख़ुद को देखती हूं
सोचती हूं मेरा पेट व्हेल जितना बड़ा क्यों नहीं
ताकि जिन चीजों को मैं पचा नहीं पाती
उनसे अपना पिंड छुड़ा लूं

* * *


चीज़ें मेरे हाथ से छूट जाती हैं

एक दिन मैं उस घर के सामने से गुज़रूंगी
जो बरसों तक मेरा था
और यह नापने की कोशिश बिल्कुल नहीं करूंगी कि
वह मेरे दोस्तों के घर से कितना दूर है

वह मोटी विधवा अब मेरी पड़ोसन नहीं है
जिसका प्रेम से कातर रुदन जगा देता था मुझे आधी रात

मैं भ्रम में न पड़ूं इसलिए ख़ुद ही चीज़ों का आविष्कार कर लूंगी
अपने क़दम गिनूंगी
या अपना निचला होंठ चबाऊंगी उसके हल्के दर्द का स्वाद लेते हुए
या टिशू पेपर के एक पूरे पैकेट को फाड़ते हुए
अपनी उंगलियों को व्यस्त रखूंगी

पीड़ाओं से बचने के लिए
शॉर्टकट का सहारा न लूंगी
मैं मटरगश्तियों से ख़ुद को न रोकूंगी

मैं अपने दांतों को सिखा दूंगी
कि भीतर जो नफ़रत कूदती है
उसे कैसे चबा लिया जाए
और माफ़ कर दिया जाए उन ठंडे हाथों को
जिन्होंने मुझे उसकी तरफ़ धकेला,

मैं याद रखूंगी
कि बाथरूम की चमकीली सफ़ेदी को
अपने भीतर के अंधेरे से धुंधला न कर दूं

बेशक, चीज़ें मेरे हाथ से छूट जाती हैं
यह दीवार ही कौन-सा मेरे सपनों में प्रवेश पा लेती है
दृश्य के दुख-भरे प्रकाश से मैच करने के लिए
मैंने किसी रंग की कल्पना नहीं की

यह मकान बरसों तक मेरा घर था
यह कोई छात्रावास नहीं था
जिसके दरवाज़े के पीछे खूंटी पर मैं अपना लहंगा टांग दूं
या कामचलाऊ गोंद से पुरानी तस्वीरें चिपकाती रहूं

'लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा'  से
चुन-चुन कर निकाले रूमानी वाक्य
अब इतना गड्ड-मड्ड हो गए होंगे
कि उन्हें साथ रखने पर वे बहुत हास्यास्पद लगेंगे

* * *


थक्का
(पिता के लिए लिखी कविता सीरिज़ से नौ कविताएं)

1
सोते हुए

वे अपने होंठ कुतर रहे
उस क्रोध को दबाते हुए जिसे वह याद नहीं कर सकते
बहुत गहरे सो रहे हैं
जिन हाथों ने उनके सिर को थाम रखा है
उनके कारण वे किसी सैनिक-से दिख रहे
आधी रात ट्रकों में ऊंघते हुए
जैसे कि उन्होंने आंखें मूंद ली हो
दृश्यों की इतनी भीड़ से,
अपनी रूहों को भंवर की तरह घूमने देते
जब तक कि वे फ़रिश्तों में न बदल जाएं.

2
ईसीजी

मुझे डॉक्टर बनना चाहिए था
ताकि मैं अपनी आंख से पढ़ सकूं ईसीजी
और तय कर सकूं कि
थक्का महज़ बादल होता है
जिसे अगर पर्याप्त गर्मी दी जाए
तो वह साधारण आंसुओं की तरह बरस पड़ेगा .
लेकिन मैं किसी काम की नहीं
और मेरे पिता
जो अपने बिस्तर पर सो नहीं पाते थे
इस चौड़े हॉल में स्ट्रेचर पर कितना डूबकर सो रहे.

3
चीख़

तुम तक जाता है जो गलियारा
वह ख़ामोश औरतों से भरा हुआ है
वे कंठ पर जमा ज़ंग को खुरचने की रस्म निभा रहीं
जब वे समवेत चीखेंगी
देखेंगी, कितनी दूर तक गई उनकी चीख़.

4
यह अच्छा है

तुमसे अगले बेड पर जो था
लोगों के कंधे उसे क़ब्रस्तान तक ले गए हैं

यह अच्छा है तुम्हारे लिए

एक ही कमरे में
एक ही रात
मौत दुबारा नहीं आ सकती.

5
पोर्ट्रेट

हर डग जो भरा था मैंने, उसकी लय पर धड़कता था उनका दिल
उन्हें अब हम सिर्फ़ एक परिचित, बुझी हुई
सुगंध की तरह याद करेंगे.
गर्मियों में मेरा शॉर्ट्स पहनना शायद उन्हें पसंद नहीं था
और मेरी कविताएं भी
जिनमें कोई छंद नहीं, संगीत नहीं.
लेकिन एक से ज़्यादा बार देखा था मैंने उन्हें
भौचक
हुल्लड़ मचाते मेरे दोस्त अपने पीछे जो धुआं छोड़ जाते
उसके बीच ख़ुशी के मारे लगभग ग़श खाया हुआ.

6
समानता

मैं पोएट्री इन ट्रांसलेशन*  ख़रीद सकूं इसके लिए
चिरनिद्रा में लीन इस शख्स ने मुझे यक़ीन दिला दिया था
कि उसकी शादी की अंगूठी अब उसकी उंगलियों में बहुत ज़्यादा कसने लगी है
जब हम जौहरी की दुकान से बाहर निकले
वह लगातार मुस्करा रहा था
इस बात पर भी, जब मैंने कहा
तुम्हारी नाक मेरी नाक से बिल्कुल नहीं मिलती.

(* विश्व कविता के अनुवाद की चर्चित पत्रिका, जो कि काफ़ी महंगी भी है।)

7
तुम्हारी मौत की ख़बर

मैं तुम्हारी मौत की ख़बर इस तरह सुनूंगी
जैसे मेरे साथ किया गया तुम्हारा आखि़री अन्याय.
मुझे सुकून नहीं मिलेगा जैसा कि मैंने सोचा होगा
और मैं यह यक़ीन कर लूंगी कि
तुमने मुझे उस फोड़े के इलाज का मौक़ा नहीं दिया
जो हम दोनों के बीच पनप गया था.
सुबह
मैं अपनी सूजी हुई पलकों पर अचरज करूंगी
इस बात पर भी कि
मेरे कंधे अब और झुक गए हैं.

8
तुमने हवास खो दिए

मैं अपने बाल पीछे बांध लेती हूं
उस लड़की जैसा दिखने की कोशिश करती हूं
जिसे एक समय तुम बहुत लाड़ करते थे.
बरसों, घर लौटने से पहले
मैं बीयर से धोती थी अपना मुंह.
तुम्हारी मौजूदगी में मैंने कभी ख़ुदा का जि़क्र तक न किया.
ऐसा कुछ नहीं तो तुम्हारी माफ़ी के क़ाबिल हो.
तुम बहुत दयालु हो, लेकिन निश्चित ही उस समय तुमने अपने हवास खो दिए होंगे
जब तुमने मुझे यह यक़ीन दिला दिया था
कि ये दुनिया एक गर्ल्‍स स्कूल की तरह है
और टीचर की लाडली बनी रहने के लिए
मुझे अपनी इच्छाओं को एक किनारे रखना होगा.

9
उदासीनता

सुन्न कर देने वाले झूठों से मैं अपने हाथ धोऊंगी
और उनकी आंखों के सामने ही उस मिट्टी को तपाऊंगी,
जिससे मैंने उनके सपनों का आकार बनाया था.
वह
अपनी छाती के बाईं ओर इशारा करेंगे
और मैं
नर्सों जैसी उदासीनता के साथ अपना सिर हिलाऊंगी.

कोमा ख़त्म होने से पहले ही
उन्हें यह महसूस कर लेना चाहिए
कि मरने की उनकी इच्छा
परिवार की दरारों को ढांप नहीं सकती.

* * *


जान पड़ता है, मैं मुर्दों की वारिस हूं

मां को दफ़नाकर जब मैं लौट रही थी
मेरा डग भरना बालिग हो चुका था
मैं उसे एक 'रहस्यमय' जगह छोड़ आई थी
जहां अब वह अपनी मुर्गि़यां पालेगी.

मुझे अपने घर को पड़ोसियों की ताकझांक से बचाना था.
मुझे आदत पड़ गई दहलीज़ पर बैठकर रेडियो सुनने की
मैं धारावाहिक की उस अभिनेत्री की
प्रतीक्षा करती थी जिसे हर कोई सताता था.

और जिस दिन मेरी सहेली को अपने शरीर की जांच कराने के लिए
दूसरे महाद्वीप का वीज़ा मिल गया -
वह मेरी टेबल पर अपनी सिगरेट छोड़ जाना भूल गई -
उस दिन मुझे विश्वास हो गया कि सिगरेट निहायत ज़रूरी चीज़ है.

तब से मेरे पास एक निजी दराज़ ज़रूर होता है
और एक गुप्त पुरुष भी
जो कि दरअसल उसका प्रेमी था.

और जब,
डॉक्टर नाकाम रहे एक ऐसी किडनी खोज पाने में
ओसामा का शरीर जिसे नकार न सके -
ओसामा
जिसकी किडनियां इसलिए घिस गई थीं कि
वह अपने भीतर की सारी कडवाहटों को दबा देता था
ताकि हमेशा मीठा दिखता रहे -

अब उसकी थम्स अप की भंगिमा का प्रयोग करना
शायद मैं शुरू कर दूं
ताकि बात करते समय हमेशा दृढ़ दिखूं

जान पड़ता है, मैं मुर्दों की वारिस हूं.
जिन सबसे मैं प्रेम करती हूं, उनकी मौत के बाद
एक रोज़
मैं एक कैफ़े में अकेले बैठूंगी
मुझे कहीं से नहीं लगेगा कि मैंने कुछ खो दिया है
क्योंकि मेरी देह एक विशाल टोकरी है
जहां ये सारे लोग अपनी-अपनी चीज़ें गिरा जाते हैं
वे चीज़ें
जिनमें उनके होने के निशान होते हैं.

* * *

मेरी मित्रता के लायक़

अपनी नाक ऊंची रखने के लिए
अफ़वाह फैलाते लोग,
चरस-गांजा के शौक़ीन और मनोविश्लेषण करने वाले,
सरकार के खि़लाफ़ आंदोलन करने वाले,
बेवफ़ाई की सैद्धांतिकी गढऩे वाले,
अपने पुरखों के नामों मे से अपने लिए
एक यादगार नाम खोजते रहने वाले,
अपने ही भीतर लगातार सुधार करने वाले,
कचरा जितने ईमानदार,
दूर से ही थोड़े निराशावादी
और दयालु, इसलिए कि दयालु हुए बिना कोई चारा ही नहीं

ये सारे लोग जो दिखने में मुझ जैसे हैं
और मेरी मित्रता के लायक़ हैं
ये सब जिन्हें तुमने मेरे लिए बनाया है
बहुतायत में हैं इस साल
मेरे ख़ुदा
अपने सारे तोहफ़े वापस ले जाओ
और नए-नए दुश्मन भेजते रहने का अपना वादा
कभी मत तोडऩा.

* * *

मार्क्‍स का सम्मान

चमचमाती हुई दुकानें
जहां नई-नई चड्ढियों की बहार आई है
उनके सामने खड़ी हो
मैं ख़ुद को रोक नहीं पाती
मार्क्‍स के बारे में सोचने से

जितने भी लोगों ने मुझसे प्रेम किया
उनके बीच एक चीज़ साझा थी-
वे सब मार्क्‍स का सम्मान करते थे
और मैंने उन सबको इजाज़त दी, किसी को कम किसी को ज़्यादा,
कपास की उस गुडिय़ा को नोंचने की
जो मेरी देह में छिपी है

मार्क्‍स
कार्ल मार्क्‍स
मैं उसे कभी माफ़ नहीं करूंगी.

* * *

माइग्रेन

मैं इस गहरे पुराने माइग्रेन का बयान इस तरह करना चाहती हूं
कि यह एक सबूत की तरह दिखे
इस बात का
कि मेरे विशाल मस्तिष्क में सारी रासायनिक क्रियाएं
भली-भांति चल रही हैं

मैं ऐसे करना चाहती थी शुरुआत :
'मेरी हथेलियां इतनी बड़ी नहीं हो पाईं कि मैं अपना सिर थाम सकूं'

लेकिन मैंने लिखा :
'जाने किस पिस्तौल से सरसराती निकलती है गोली
शांत अंधेरे को चीरती
कैसी तो हड़बड़ी
कोई दरार है
आपस में टकरा गए हैं बम के बेशुमार बेतुके छर्रे

और एक आनंद भी है:
बस, याद-भर कर लेने से कुछ पीड़ादायी जगहें
कैसे ताव में आ जाती हैं.'

* * *

अचूक ख़ुशियां

सोने से पहले
मैं फ़ोन को बिस्तर के पास खींच लाऊंगी
और बहुत सारी चीज़ों के बारे में उन लोगों से बातें करूंगी
यह तय करने के लिए कि वे सच में मौजूद हैं,
कि वीकेंड के लिए उनके पास अभी से योजनाएं हैं
इतने सुरक्षित हैं वे
कि बुढ़ापे से डरते हैं
और झूठ बोल लेते हैं

मैं यह तय करूंगी कि वे सच में मौजूद हैं
अपनी अचूक ख़ुशियों के भीतर
और यह भी कि
मैं अकेली हूं
और जब तक होती रहेंगी नई-नई नाराजगियां
तब तक सुबह होती रहेगी

* * *


रियायत

तुम्हें हर महीने तनख़्वाह मिलती है क्योंकि राज्य अभी वजूद में है
और जब तक तुम्हारी अवसाद भरी आंखों में सूरज हलचल करता रहेगा
क़ुदरती कूड़ों की तफ़्सील बयान करने के बहाने तुम्हें मिलते रहेंगे
इस तरह तुम ऐतिहासिक क्षणों में प्रवेश करती हो, उनके ज़ुराबों के ज़रिए

रियायतों से ख़बरदार रहो
मसलन, कूड़े को ही देखो
वह सूअरों को खाना प्रदान करता है,
और सच में, पिछले राष्ट्रपति के शासनकाल के बाद से तो
हर चीज़ में सुधार हुआ है,
इतना कि मुर्दों के शहर तक में अब
अंतर्राष्ट्रीय फ़ोन एजेंसियां लग गई हैं

निजी तौर पर मुझे किसी की आवाज़ नहीं चाहिए

रियायतों से ख़बरदार रहो
और भविष्य के बारे में तो बिल्कुल चिंता मत करो
तुम्हारे पास वह आज़ादी नहीं है जो मरने के लिए ज़रूरी होती है

* * *

कभी-कभी अक़्ल मुझ पर क़ब्ज़ा कर लेती है

रोशनी कितनी आत्ममुग्ध है
छत पर, कोनों में, टेबल पर फैली हुई.
प्रसन्नताओं ने सबको नींद के मुहाने पर खड़ा कर दिया है.
निस्संदेह यह मेरी आवाज़ नहीं है
कोई और गा रहा है
उस काले परदे के नीचे से जिस पर मैं सहारे के लिए झुकी हूं

नीचे देखूंगी तो पाऊंगी
कई कीड़े हैं जो दरवाज़े की ओर भाग रहे
और मेरी निर्वस्त्र देह पर चढ़ रहे
मैं कैसी दिख रही, इस पर बिल्कुल ध्यान न दूंगी
ताकि कोई और भी ध्यान न दे इस पर

पुरुष देश के भविष्य की चर्चा कर रहे
उनकी पत्नियां घर की मालकिन की मदद कर रहीं
बिल्लियां ताक रहीं जूठन का जश्न
और छत पर टंगी मकडिय़ां भी
कोई झमेला नहीं कर रहीं

जान पड़ता है इस परिवार के बच्चों को मैं पसंद आई
का$गज़ की एक कश्ती उन्हें देने के बाद
मैं यह नहीं समझा पाई
कि पानी से भरा तांबे का यह टब
कोई समंदर नहीं

'तभी गहरा सन्नाटा पसर जाता है'
अरब के ये बद्दू बंजारे बहुत पहले से जानते हैं यह बात
कि शब्द उड़ सकते हैं
और उन्हें दबाया नहीं जा सकता किसी वज़न से

और जाने क्या बात है कि
नए ख़ामोश श्रोताओं के आगे
अपनी पुरानी क्रांतियों की सफ़ाई देने के अलावा
मैंने क्रांतिकारियों को कुछ और बोलते नहीं सुना

पैग़ंबर अपनी विवशताओं से चुप हो जाते हैं
जैसे-जैसे वे उसके और क़रीब पहुंचते हैं
जिसने उन्हें भेजा है

दिक़्क़त यह नहीं कि उनका मुंह कैसे बंद किया जाए
बल्कि यह है कि जब कहने को कुछ नहीं होगा
वे अपने हाथ रखेंगे कहां

एक दिन अक़्ल मुझ पर क़ब्ज़ा कर लेगी
और मैं दावतों में जाना बंद कर दूंगी
अपनी आज़ादी का हल्ला बोल शुरू करूंगी तब
मैं तुम्हारे कानों की क़र्ज़दार नहीं रही अब

* * *

ख़ुशी

मैं उस स्ट्रेचर पर भरोसा करती हूं
जिसे दो लोग खींच रहे
मरीज़ के कोमा में इससे कुछ तो रुकावट पड़ती होगी.
इस दृश्य को जो भी देख रहे उनकी आंखों की हमदर्दी पर मुझे संदेह है.

मैं मछुआरे का सम्मान करती हूं
क्योंकि एक अकेला वही है जो मछली को समझता है.
मारे चिढ़ के उसका तराज़ू मैं छीन लेती हूं फिर.

मुझमें इतना सब्र नहीं कि मैं समंदर के बारे में सोचती बैठूं
जबकि मेरी उंगलियां पैलेट पर लगे रंगों में डूबी हुई हैं

जिस क्षण मैं जागती हूं
मेरी आत्मा का रंग काला होता है

पिछली रात के सपनों में से मुझे कुछ भी याद नहीं सिवाय इसके
कि एक इच्छा है कि
उस कड़ी के वस्तुनिष्ठ इतिहास को जान सकूं
जो असीम आनंद और अंधकार को जोड़ती है
जो जोड़ती है अंधकार और आतंक को
जो जोड़ती है आतंक और जागने पर काली आत्मा का सामना होने को

देखा जाए तो ख़ुशी
भाप से चलने वाले बेलचों में रहती है
जो किसी क्रेन से जुड़े होते हैं.
प्यार के लायक़ तो सिर्फ़ वही हैं.
उनकी जीभ उनसे आगे-आगे चलती है
वे पृथ्वी की स्मृतियों को खोदते हैं पूरी तटस्थता से
उलट-पुलट करते हैं.

* * *

राष्ट्र

इन सारे हृदयों, अंगों, जननेंद्रियों को एक सिर आदेश भेजता है बे-सिर सैनिकों की एक राष्ट्रीय सेना बनाने के लिए, एक ऐसी पीढ़ी जिसकी किसी की ज़रूरत नहीं, वह जन्म लेती है सार्वजनिक पुस्तकालयों को जला देने के लिए, पीछा करते हुए इस बीच उस भद्दे संगीत का जो लोकल रेडियो से गरज रहा है, जबकि राष्ट्र यह सुनिश्चित कर रहा कि सारे लोग अपने टैक्स सही समय पर चुका दें और तुरंत ही गूंजने लगते हैं राष्ट्रवादी गीत सार्वजनिक शौचालयों से सार्वजनिक चौराहों तक जहां विपक्ष के सम्माननीय सदस्य उन बैनरों के नीचे खड़े हैं जिन पर सामाजिक जागरूकता की नई संस्थाओं के शुभारंभ की घोषणाएं हैं, और इन सबके दौरान तुम खिड़की पर झुकी हुई झांक रही होती हो अंधकारमय गलियां, अपने नाख़ून चबाती हुई.

* * *



पागलख़ाने की खिड़कियां
(कविता सीरिज़ से पांच कविताएं)

1
नींद की स्मृति

अधसोई दादी एक अंधे कमरे में गा रही है
एक चमगादड़ खिड़की से टकरा जाती है और यथार्थ के ख़ुन के छींटे किसी पर नहीं पड़ते
शायद इसलिए कि खिड़कियां महज़ एक विचार होती हैं
दादी मां गाती है
और किसी दूसरे शहर से सिंदबाद प्रगट हो जाता है
और सिंड्रेला अपने पंजों पर चलती घर लौट आती है
और एक आलसी मुर्ग़ा इंद्रधनुष को देख बांग देता है
कोने में प्रेतात्माओं का ढेर लग जाता है
रुई से बने गद्दे पर सुरक्षा के पंख दमकने लगते हैं
और हम सो जाते हैं.
* * *
2
महीन रेखा

अधेड़ उम्र की एक औरत पागलों की तरह अपने प्रेमी की क़मीज़ें फाड़ती है
वह उन पर अपने आंसुओं को ख़ारिज करती है कैंचियों के ज़रिए, फिर नाख़ूनों से
फिर नाख़ूनों और दांतों के ज़रिए
मेरी कुंआरी बुआ ऐसे दृश्य पर रोया करती थी पिछली सदी में, जबकि मैं
ऊबकर उसके ख़त्म हो जाने का इंतज़ार करती थी,
मुझे रुला देते हैं अब ऐसे दृश्य.
कैंचियों, नाख़ूनों और दांतों से एक स्त्री
एक अनुपस्थित देह का पीछा करती है
उसे चबाकर, उसे निगलकर.
कुछ भी नहीं बदला है. नायिकाएं हमेशा दुख पाती हैं परदे पर,
लेकिन उत्तरी अमेरिका में आर्द्रता का स्तर हमेशा कम रहता है
सो, आंसू बहुत जल्दी सूख जाते हैं.
* * *
3
सेक्स

जिसे वे 'सेक्स' कहते हैं
एक ट्रैजेडी है.
संभव है कि मैंने अपना सिर आसमान तक उठाया होता तो कोई चांद मुझे चौंका देता.
या मुझे लगता है, किसी जंगल में जानवरों की तरह भटक रहे हैं मेरे सवाल.

बाहर
कारों की चमकती रोशनियों के सहारे पुल पार कर रहा है शहर.
इस तरह साबित किया जा सकता है कि दुनिया वजूद में है.

पूरी दुनिया ऐसा नाइटगाउन पहनती है जो घुटनों के ऊपर से कटा हुआ है
और पूरी रात यह दुनिया कभी समय नहीं देखती जैसे कि
वह किसी की प्रतीक्षा ही नहीं करती.
यह पुरानी ट्रैजेडी यहां ख़त्म हो जाएगी
और अगली खिड़की के पीछे शुरू हो जाएगी.
* * *
4
संपादकीय कक्ष

एक बार मैंने एक साहित्यिक पत्रिका के संपादक के रूप में काम किया
और पूरी दुनिया धूल से ढंकी एक पांडुलिपि में तब्दील हो गई.
चिट्ठियों के ढेर थे जिन पर देश की डाक-व्यवस्था के प्रति अटूट विश्वास के टिकट लगे थे.
और जहां तक मैंने सोचा था कि यह काम बड़ा उबाऊ होगा,
डाक-टिकटों को उखाड़कर निकालना सबसे मज़ेदार काम बन गया
उन पर उन कमबख़्त लेखकों की थूक सूख चुकी थी.
उस संपादकीय कक्ष में रोज़-रोज़ आना यानी
अपने आप को एक कोने में 'पार्क' कर देना
जैसे नमकीन पानी में अपना कॉन्टैक्ट लेंस संभालकर रखना.
मेरे पास सिर्फ अवसाद था जिससे मैं दूसरे लोगों का अवसाद माप सकती थी.
ज़ाहिर है, यह उस पत्रिका के लिए अनुकूल नहीं था जो एक समाजवादी भविष्य का स्वप्न देखती थी.
संपादकीय कक्ष में कोई बाल्कनी नहीं थी
लेकिन दराज़ें कैंचियों से भरी हुई थीं.
* * *
5
पितृत्व

भले मैं एक अनाथ कि़स्म के लेखन का स्वप्न भी नहीं देखती
वे लोग मुझे हंसा देते हैं
जो अपनी रचनाओं को अपने बच्चों की तरह मानते हैं.
वे सब मुझे हंसा देते हैं.
उन्हें अपनी रचनाओं को खाना खिलाना पड़ता होगा
और जैसे गड़रिया करता है बकरियों के झुंड की रखवाली,
उन्हें भी करना पड़ता होगा
ताकि वे उनका दूध दुह सकें
जब तक कि वे उन्हें अच्छी सरकारी नौकरियां न दिला दें.
* * *



कुछ गद्य कविताएं, नई कविताएं

यथार्थ के ख़ून के छींटे किसी पर नहीं पड़े

जब मैं भीतर घुसी, मेरे दादाजी कोने में खड़े अपनी कॉफ़ी उंड़ेल रहे थे. सामने की दीवार पर नसीर के नाक-नक़्श धुंधले पड़ रहे थे क्योंकि पुरानी छत ऐसी नहीं थी कि बारिश की बूंदों को रिसने से रोक सके. वह प्रतिभाशाली कारीगर जिसने वह रेखांकन किया था (हालांकि उसे कभी भी कृषि-सुधारों का लाभ नहीं मिल पाया), पिछले हफ़्ते किसी सरकार अस्पताल में मर गया. मेरे दादाजी ने मुझे एक गठरी दी. उसे खोला तो भीतर एक शिशु था, जो अभी भी मां के गर्भ के द्रव से गीला था. मैंने कहा, यह तो मेरा ही बेटा होना चाहिए. मैंने उसका नाम मुराद रख दिया. जो नाल हम दोनों को जोड़े रखती थी, मैंने वह काट दी ताकि उसका ख़ुद का एक वजूद हो. उसके पेट पर नाभि के आकार में उदासी का एक बीज बन गया. मैंने उसे लैपटॉप के बैग में रखा और अपनी टोयोटा कोरोला चलाते हुए रॉकीज़ तक गई. रास्ते भर में क़ुरान से यूसुफ़ वाला अध्याय सुनती रही. मैं लंबी दूरी के उन टैक्सी ड्राइवरों के बारे में सोचने लगी, जो यूसुफ़ वाले अध्याय को बहुत चाव से सुनते हैं. आखि़र सुनें भी क्यों न, उसमें सेक्स का सीन जो है. मैंने तय किया कि मैं ख़ून से पुती क़मीज़ों और घृणा के सौंदर्यशास्त्र पर एक लेख लिखूंगी.

पहाड़ बर्फ़ से ढंके हुए थे, और कुछ क़दम चलते ही धरती बीच से फट गई और उसमें से एक कॉफ़ी हाउस प्रकट हो गया. मैं एक बार इस कॉफ़ी हाउस में जा चुकी हूं. मेरी एक सहेली (जिसने एक कीड़े से शादी की थी और वह कीड़ा उसे खा गया था) और मैं, हम दोनों ही भूखे थे. एक झुका हुआ बूढ़ा हमारे लिए डबलरोटी और नमक ले आया. वह बूढ़ा अब इस कॉफ़ी हाउस में नहीं है, लेकिन उसकी विधवा आती है और मेरे उन तीन दोस्तों के बीच से गुज़र जाती है, जिन्हें अभी कुछ बरस पहले ही बड़ी सरकारी नौकरी मिली है और जो अब भी, उसी तरह, वही, बातें करते हैं, जैसी बरसों पहले किया करते थे. मुझे पता चला कि हमारा चौथा दोस्त अपने पिता की क़ब्रगाह में है और हमारा पांचवां दोस्त रोटरडम में एक चर्च के सामने तूतनखामन का मुखौटा पहनकर बैठता है और राहगीर उसकी टोपी में छुट्टे पैसे डाल जाते हैं. मेरे दोस्तों का ध्यान मेरी गठरी की तरफ़ गया और उन्होंने पूछा, 'यह तुमने कहां से पा लिया?' और तभी नज़दीक की एक झील से हमें लोरी-सोहर की आवाज़ें सुनाई देने लगीं. हमने वहां बच्चे के जन्म के जश्न में सुब्बू मनाया. जश्न, दावत और नाच के उन्माद के बीच मैंने देखा, अचानक वहां दादाजी पहुंच गए हैं, अपनी शॉल, छड़ी और दीवार पर बने नसीर का चेहरा लेकर (बारिश तब तक उस चेहरे को पूरी तरह धो नहीं पाई थी). उन्होंने मुझसे गठरी ले ली और वापस चले गए.

* * *

घरों की अवधारणा

मैंने सोने की दुकान में अपने कान की बालियां बेच दीं ताकि चांदी के बाज़ार से एक अंगूठी ख़रीद सकूं, और फिर मैंने उस अंगूठी को पुरानी स्याही और एक ख़ाली नोटबुक के बदले बेच दिया। यह सब उस घटना से पहले हुआ जब मैं उस ट्रेन की सीट पर अपने काग़ज़ात भूल आई जो मुझे घर पहुंचाने वाली थी। जब भी मैं किसी शहर में पहुंचती हूं, मुझे लगता है, मेरा घर किसी और ही शहर में है।

ओल्गा, जिसे मैंने ऊपर की कोई बात नहीं बताई थी, कहती है, 'कोई मकान उसी क्षण घर बन पाता है, जिस क्षण वह बिक रहा होता है। बग़ीचा कितना सुंदर है या कमरे कितने बड़े, खुले-खुले हैं, यह आपको तभी पता चलता है, जब आप उसे रियल एस्टेट एजेंट की निगाह से देखते हैं। आप अपने दुस्वप्नों को, ख़ास अपने लिए, उन्हीं छतों के नीचे रखते हैं, और जब आप छोड़कर जा रहे होते हैं, तब उन्हें एक या बहुत हुआ तो दो सूटकेस में भर ले जाते हैं।' अचानक ओल्गा ख़ामोश हो जाती है, फिर ऐसे मुस्कराती है, जैसे कोई महारानी अपनी प्रजा से मिलते समय, किचन में रखी कॉफ़ी मशीन और खिड़की के बीच डोलते हुए। खिड़की, जो फूलों के दृश्य पर खुलती है।

ओल्गा के पति ने रानी का यह दृश्य नहीं देखा है, शायद इसलिए वह अब भी यह सोचता है कि जब वह अंधा हो जाएगा, तब यह मकान उसका सबसे भरोसेमंद दोस्त होगा। इसके कोने-अँतरे उसके क़दमों को पहचानेंगे और इसकी सीढिय़ां बेहद उदारता से उसे अंधेरे में गिरने से बचा लेंगी।

मैं एक चाभी खोज रही हूं, जो हमेशा मेरे हैंडबैग की तलहटी में खो जाती है, ओल्गा और उसका पति मुझे देख नहीं पाते, जबकि असल में मैं घरों की अवधारणा से ही मुक्त होने का अभ्यास कर रही हूं।

ज़माने-भर की धूल अपनी उंगलियों पर चिपकाए हर बार जब तुम यहां लौटती हो, अपने साथ लाई हुई चीज़ों को तुम इसकी दराज़ों में जमा करती हो। फिर भी तुम नकार देती हो कि यह मकान कोलाहल का भविष्य है, जहां मरी हुई चीज़ें एक पल को उम्मीद के साथ सौदेबाज़ी करती जान पड़ती हैं। मकान ऐसी जगह हो, जिसकी ख़राब रोशनी पर तुम्हारा कभी ध्यान तक न जाए, जिसके दीवारों की दरारें इतनी चौड़ी हो जाएं कि एक दिन तुम उन दरारों को दरवाज़ा मान लो।

* * *

उत्सव

कहानी का धागा ज़मीन पर गिरा और खो गया, सो मैं घुटनों के बल झुकी, हाथों पर चलती हुई उसे खोजने लगी। वह देशभक्ति के नाम पर हो रहा उत्सव था और उस तरह चलते हुए मुझे सिर्फ़ जूते ही जूते दिख रहे थे।

एक बार, एक ट्रेन में, एक अफ़ग़ान औरत, जिसने कभी अफ़ग़ानिस्तान देखा तक नहीं था, उसने मुझसे कहा, 'जीतना संभव है।' क्या वह कोई भविष्यवाणी थी? मैं पूछना चाहती थी। लेकिन मेरी फ़ारसी नौसिखियों की किताबों की तरह थी और मुझे सुनते हुए वह मेरी ओर ऐसे देख रही थी, जैसे उस आलमारी से अपने लिए कपड़ा चुन रही हो जिसका मालिक आगजनी में जल मरा।

फ़र्ज़ कीजिए कि चौराहे पर मार तमाम जनता इकट्ठा हुई। फ़र्ज़ कीजिए कि 'जनता' कोई फूहड़ शब्द नहीं है और यह भी कि 'मार तमाम' जैसे मुहावरे का अर्थ सब जानते हैं। फिर ये सारे पुलिस के कुत्ते यहां क्या रहे हैं? उनके चेहरों पर किसने ये रंगबिरंगे मास्क लगा दिए? सबसे अहम बात तो यह, कि वह रेखा कहां है जो झंडियों और चड्ढियों को अलग करे, जो भजन और अभिशाप को अलग करे, ईश्वर और उसकी कृतियों को अलग करे-- वे कृतियां जो टैक्स भरती हैं और पृथ्वी पर चलती हैं?

उत्सव।  ऐसे कह रही, जैसे दुबारा यह शब्द कभी न कहूंगी। जैसे किसी ग्रीक शब्दकोश से निकला हुआ शब्द है, जिसमें स्पार्टा के विजेता सैनिक घर लौट रहे हों और उनके भालों और ढालों पर फ़ारसियों का ख़ून अभी भी गीला हो।

शायद कोई दर्द ही नहीं था, कोई भविष्यवाणी भी नहीं, कोई अफ़ग़ान महिला मेरे सामने दो घंटे नहीं बैठी रही थी। कई बार, महज़ अपने मनोरंजन के लिए, ईश्वर हमारी स्मृतियों को बहका देता है। इस समय जहां हूं मैं, जूतों ही जूतों के बीच इस जगह, इस जगह से कभी ठीक-ठीक मैं यह जान नहीं पाऊंगी कि किसने, किस पर जीत हासिल की।

(यह कविता रॉबिन क्रेसवेल के अरबी द्वारा किए गए अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)

* * *


फ़ैमिली फ़ोटो

तस्वीर में एक औरत और एक बच्ची हैं, दोनों पीले-मरियल लग रहे, तस्वीर कोई बहुत स्पष्ट नहीं है। औरत मुस्करा नहीं रही बिल्कुल (उसे यह नहीं पता कि ठीक सैंतालीस दिन बाद वह मर जाएगी)। लड़की भी मुस्करा नहीं रही (हालांकि उसे नहीं पता कि मृत्यु होती क्या चीज़ है)। औरत के होंठ और भवें उस लड़की जैसी हैं (लड़की की नाक उस पुरुष जैसी है जो सदा-सदा के लिए इस फ्रेम से बाहर ही रहेगा)। औरत का हाथ बच्ची के कंधे पर है और बच्ची ने अपना हाथ मुट्ठियों में बांध रखा है (ना, किसी क्रोध में नहीं, बल्कि उसने आधी बची टॉफ़ी वहां छिपा रखी है)। औरत की घड़ी चलती नहीं है, वह चौड़ी पट्टी वाली है (1974 में फैशन से बाहर), और लड़की का कपड़ा इजिप्त के कपास से नहीं बना है (नसीर, जो सुई से रॉकेट तक हर चीज़ बना लेता था, बरसों पहले मर चुका है)। जूते गाज़ा से आयात किए हैं (और जैसा कि आप जानते ही हैं, गाज़ा इन दिनों कोई आज़ाद जगह तो है नहीं)।

(यूसुफ़ राखा द्वारा किए अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)

* * *

बुराई

मैं सोचती थी कि दुनिया में बहुत सारी बुराइयां हैं
जबकि मैं अपने दोस्तों के बीच सबसे ज़्यादा उदार हूं
मैं जब भी किसी फूल को गुलदान में सजा देखती
उसकी पंखुड़ी को अपने अंगूठे और तर्जनी में फंसा मसले बिना रह नहीं पाती
ताकि जान सकूं कि यह प्लास्टिक का फूल नहीं है

धीरे-धीरे मुझे बुराइयों के अस्तित्व पर ही संदेह होने लगा है
ऐसा लगता है, सारा नुक़सान हो चुका होगा जब तक कि हमें यह अहसास होगा
जिन जीवों को हमने ख़ूनमख़ून कर दिया, वे असली थे।

(यूसुफ़ राखा द्वारा किए अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)

* * *

ऊपर एम्‍बेड कोड विंडो में डायरेक्‍ट पढ़ने के अलावा आप इस पुस्तिका को डाउनलोड भी कर सकते हैं. नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें. 

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दो नई कविताएं : कुंवर नारायण

4:53 pm



पवित्रता

कुछ शब्द हैं जो अपमानित होने पर
स्वयं ही जीवन और भाषा से
बाहर चले जाते हैं

'पवित्रता' ऐसा ही एक शब्द है
जो अब व्यवहार में नहीं,
उसकी जाति के शब्द
अब  ढूंढें नहीं मिलते
हवा, पानी, मिट्टी तक में

ऐसा कोई जीता जागता उदहारण
दिखाई नहीं देता आजकल
जो सिद्ध और प्रमाणित कर सके
उस शब्द की शत-प्रतिशत शुद्धता को !

ऐसा ही एक शब्द था 'शांति'.
अब विलिप्त हो चुका उसका वंश ;
कहीं नहीं दिखाई देती वह --
न आदमी के अन्दर न बाहर !
कहते हैं मृत्यु के बाद वह मिलती है
मुझे शक है --
हर ऐसी चीज़ पर
जो मृत्यु के बाद मिलती है...

शायद 'प्रेम' भी ऐसा ही एक शब्द है, जिसकी अब
यादें भर बची हैं कविता की भाषा में...

ज़िन्दगी से पलायन करते जा रहे हैं
ऐसे तमाम तिरस्कृत शब्द
जो कभी उसका गौरव थे.

वे कहाँ चले जाते हैं
हमारे जीवन को छोड़ने के बाद?

शायद वे एकांतवासी हो जाते हैं
और अपने को इतना अकेला कर लेते हैं
कि फिर उन तक कोई भाषा पहुँच नहीं पाती.
****


जंगली गुलाब

नहीं चाहिए मुझे
क़ीमती फूलदानों का जीवन

मुझे अपनी तरह
खिलने और मुरझाने दो
मुझे मेरे जंगल और वीराने दो

मत अलग करो मुझे
मेरे दरख़्त से
वह मेरा घर है
उसे मुझे अपनी तरह सजाने दो,
उसके नीचे मुझे
पंखुरियों की शैय्या बिछाने दो

नहीं चाहिए मुझे किसी की दया
न किसी की निर्दयता
मुझे काट छांट कर
सभ्य मत बनाओ

मुझे समझने की कोशिश मत करो
केवल सुरभि और रंगों से बना
मैं एक बहुत नाजुक ख्वाब हूँ
काँटों में पला
मैं एक जंगली गुलाब हूँ
****
[ कुंवर जी की अन्य रचनाएं  यहाँ ]

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जो उसे पढ़ सके, वह कवि जन्मे

3:46 am


कवि कह गया है : 8ओक्टावियो पाज़ 



एक कविता का अर्थ कवि क्या कहना चाहता था, उसमें नहीं, दरअसल कविता क्या कहती है, वहां मिलता है। 

रुदन और चुप्पी, अर्थ और निरर्थ के बीच कविता खड़ी होती है। शब्दों की यह दुबली धार क्या कहती है ? यह कहती है कि मैं कुछ भी ऐसा नहीं कह रही, जिसे पहले चुप्पी और हल्ले में नहीं कहा गया है। जब यह इतना कह देती है तो कोलाहल और ख़ामोशी ख़त्म हो जाती है। 

कविता अर्थ के खिलाफ एक अनवरत संघर्ष में शामिल रहती है। इसके दो छोर हैं : पहला, जहाँ वह हर मुमकिन अर्थ को घेरे रहती है, दूसरा, जहाँ वह भाषा को कोई अर्थ देने से ही मना कर देती है। मलार्मे पहले छोर पर हैं, दादा दूसरे। 

कविता अवर्णनीय होती है, अबोधगम्य नहीं। 

कविता को पढ़ना, आँखों से सुनना है। इसे सुनना, कानों से देखना।

हर पाठक एक अन्य कवि है। हर कविता एक इतर कविता। 

कविता पढ़ने वाले को उकसाए। उसे खुद को सुनने के लिए बाध्य करे। 

एक लेखक की नैतिकता, वह जिस विषय को लेकर चलता है या जिन तर्कों के सहारे अपनी बात कहता है,  उसमें न होकर, भाषा के साथ उसके बर्ताव में निहित होती है। 

कोई कवि नहीं हो सकता, यदि उसमें दी गई भाषा को नष्ट करने और एक नई भाषा गढ़ने का प्रलोभन न हो। 

कविता में निपुणता, नैतिकता का दूसरा नाम है। यह निरे शब्द-चातुर्य से नहीं, लालसा और तपश्चर्या से आती है। 

एक फ़र्ज़ी कवि अपने बारे में बात करता है। प्रायः दूसरों का नाम लेकर भी अपने बारे में ही बोलता है। एक सच्चा कवि खुद से बातें करते हुए दूसरों से मुखातिब रहता है। 

एक कोरा या विराम-चिह्नों से अटा सफ़ा बिन चिड़िया का पिंजरा है। एक सच्ची खुली रचना दरवाज़े बंद  करती है। पाठक इसे खोल कर, उस चिड़िया, यानी कविता को उसका आकाश देता है।

बंद या खुली, हर कविता की यह मनौती होती है कि उसे संपन्न करने वाला कवि न बचे। जो उसे पढ़ सके, वह कवि जन्मे।    

एक कविता की अमरता में यक़ीन, भाषा की अमरता में यक़ीन करने जैसा होगा। ऐसे यक़ीन से बेहतर यह होगा कि हम साक्ष्यों से सीख लें। साक्ष्य कहता है कि भाषाएँ बनती और बिला जाती हैं। हर अर्थ एक दिन निरर्थ हो जायेगा। 
****


[ पाज़ के कविता-सम्बन्धी इन विचारों को उनकी पुस्तक '' अल्टरनेटिंग करंट '' से अनूदित किया गया है। ] 
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महेश वर्मा की नई कविताएं

11:41 am


Marc Chagall
प्रेमी ज़मीन से

प्रेमी ज़मीन से कुछ भी उठा सकते हैं, एक बटन,
कंघी का टुकड़ा या चमकीली पन्नी. अचेतन में
वे इन सबके गैर पारंपरिक उपयोगों के बारे में सोचते हों.

वे उठा सकते हैं एक टूटी हुई सीप का टुकड़ा और समुद्र
एक टुकड़ा उनकी उँगलियों के बीच आ जाता है उनकी उदास
आँखों में हैरत से देखता.

चूड़ी का एक टुकड़ा उठाते वे वास्तव में इन्द्रधनुष
का लाल रंग ज़मीन से उठा रहे थे कि आज
दोपहर भी सर्वांग सुन्दर दिखाई पड़े आकाश का इन्द्रधनुष .

एक रंगीन कागज उनकी उँगलियों के बीच कभी जानवर कभी
बन्दूक कभी नाव बनता, फिर कागज हो जाता किसी को मालूम नहीं
यह खेल ही बना रहा आकाश , जल और भविष्य इस संसार का .

इसी धूल से उन्हें बनाना है भविष्य के पर्वतों का शिल्प
धूल जो उड़ा कर देख रहे हैं हवा का रुख इतनी देर से.

धातु का एक अमूर्त टुकड़ा ज़मीन से उठाएंगे एक रोज
और किसी के हाथ देकर थमा देंगे सम्राट होने का अभिशाप .
***

हमारे कवि

क्या कर रहे हैं
क्या उन्होंने लिख लिया यह अँधेरा
जो हमारे भी बीच फैला है .

उन्होंने आँखें ढांप तो नहीं ली थीं हाथ से
जब आया था प्रकाश .

वे लिख पाए क्या धूप से भी सुन्दर हंसी
जो फ़ैली हुई थी आकाश पर. उस समय वे
धरती की भीतरी तहों को तो नहीं सोचते थे .

क्या वे लिख पाए दुःख
जो अब भी आंतरिक से अधिक वाह्य बचे हुए हैं चारों ओर
ठोस शारीरिक दुःख जो छूकर
देखने की ज़द में हैं- जैसे अपने ही माथे का खुला घाव .

अभी इस वक्त जब
हौले-हौले हिल रही है रात

कवि क्या कर रहे हैं .
***

सम्पूर्ण जलमंडल को मथते हुए

नदी कोई नहीं हमारे शहर में
शायद इसीलिये नहीं कोई नाविक .

थोड़ी दूर पर जो नदियाँ हैं
इतनी वे चौड़ी नहीं कि चलाई जा सके नाव .
बच्चों की नाव के लिहाज़ से थोड़ा तेज
इनका बहना, ठुनकना.

यात्रा में कहीं जाते ट्रेन पर अचानक
कोई नदी आ जाए कि पुल की गडगडाहट से ही जागे थे,
यहीं दिखाई पड़ते हैं : नाविक और नाव.

दूर से नाव का चलना नहीं दीखता
नाविक की देह का आलोडन बस दिखाई देता है.
( कि अकेले
अपनी डान्ड चला रहा है )
***

प्रतिदिन

यातना उसके चेहरे से पुंछी नहीं है, सोती हुई
स्त्री के सपनों में आगामी यातनाओं के चलचित्र हैं
पीठ की ओर पुरुष पराजय
ओढकर लेटा है अपने सीने तक.

कहीं बाहर से आता है वह प्रकाश
जो एक दायरा बनाता है इसी स्त्री पीठ पर.

पुरुष हर रात यह जादू देखता है अपने स्पर्श में

दो उजले पंख,
कंधे और पीठ के बीच की सुन्दर जगह से बाहर आते इस प्रकट संसार में.
ठीक बगल में जो सो रही है स्त्री यह उसी के बारे में है .

पुरुष बाहर प्रकाश देखता है जो यह दायरा बनाता है . अब तो अभ्यास से
भी यह जानता है कि ऐसा करते ही गायब हो जायेंगे
हौले से छूता है सफ़ेद पंख .

करवट बदल कर
स्त्री अन्धकार की ओर अपनी पीठ कर लेती है.
***

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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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