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अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविताएं

12:15 pm
 

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दोपहर


मंच पर इधर से उधर
खिलखिलाता
दौड़ता हैं किशोर अभिनेत्रियों का झुंड
दोपहर दो का टाइम, देर है छः वाले
शो में
रिक्त है रंगशाला
सूख रही हैं कुर्सियों पर हैंडलूम की साड़ियाँ
डोल रहे कानों में भारी-भारी कुंडल
अरुण हैं ऊपर तक कान

एक की तो आँखें तक भर गई
हाय वह सुन्दर कर्ण-स्पर्शी नयन
कितने अरुण हो गए हैं।

कोई उतार दो उसके कर्णफूल
खोंस दो उनके बजाय कोई शिरीष का फूल
या मोगरा या चमेली और कुच्छ नहीं तो
आम्रमंजरी ही सही
अच्छा ऐसा करो खोंस दो वह मोरपंख
जल में डोब कर
तब थोड़े बड़े हो जायेंगे कर्ण छेद

लो आ गए निर्देशक जी, मच गई
हड़बड़ी, पच्चीस-छब्बीस बरस के युवा हैं
पर बहुत समझ है उन्हें रंगकला की

देखो कैसा अरुणाभ हो गया
उस अभिनेत्री का मुख जैसे कामदेव
रगड़ गए कपोल पर कुंकुम

बार-बार मूँचती नयन, फिर
खोलती है आधे-आधे
आप ही आप नाचते हैं निर्लज्ज
इन नयन संदूकों में बंद दो खोटे सिक्के

निर्देशक जी तो मग्न हैं पढ़ने
वसंतसेना का संवाद
विचित्र रंगशाला है भई

कौन है वसंतसेना और कौन-कौन पढ़ रहा
है उसका संवाद
और किसके मुख पर फूल आये हैं
कचनार के कुसुम, सुन कर मेघों का
गहन, गंभीर गुरु गर्जन

आवरण, कुर्सियों के कवर, मुख, अधर, कान
औढ़नियाँ, कंगन सब अरुण ही अरुण हैं यहाँ
जैसे पूरी रंगशाला किसी ने
निकाली हो डोब कर आलते की कटोरी से

जैसे जीवन हो, सच्च
रंगशाला बंधु जीवन ही है
यह मैं नहीं, कह गए हैं बड़े-बड़े कवि भी

और सुनो तुम क्या कोई विदूषक
हो भगवान
अहर्निश चतुर्याम रचते
रहते हो एक से बढ़कर एक हास्य के
ड्रामे ।
****

अभय होकर निभाई प्रीति

धजी धरी अर्थी के ऊपर दिखा
उसका मुख
शताब्दियों प्राचीन चंद्रमा सा नूतन।

मुझे क्षमा करना
कि चूका नहीं आँख ल़ड़ाने से
शव के ऊपर भी।

किंतु मैं क्या करता
मैं हाड़-चामर का चीकट जीव
मुझे गिरते कितनी अबेर लगती महाराज।

जबकि मेरे कंधे छिल चुके है अरथी ढोते ढोते
मेरे फेफड़ों में भरी है चिंरायध।
मेरे दुःख आधे भसम शव से दीठ है।

तब भी मैं नहीं साध पाया संयम
डोल गया कूप में डुलते डोल सरीखा

काँटे कँाटे उठते हैं शरीर में
जब भी कहता हूँ अपनी यह कथा

शव का मैंने किया बिस्तरा
चिता बनाई खाट
श्मशान मेरी हुई गृहस्थी
हुआ कपाल जल का लोटा

और ऐसे दसों दिसों से
काल से घिरकर
मैंने किया प्रेम 

मैं डरा नहीं प्रभु
और मैंने अभय होकर निभाई प्रीति।
****

[ [ अम्बर की अन्य कविताओं के लिए यहाँ आयें.
साथ में दी गई चित-कृति
फ्रीदा कालो की  है . ]
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विष्णु खरे की नई कविता

12:00 am

      

 तीन पत्ती /पत्ते उर्फ़  फ्लश /फलास  खेलने  में  बरती  जानेवालीं  एहतियात

                                                                 
                                                                          विष्णु खरे


कमाई के लिए मत खेलो
दूसरे खेलें तो खेलने दो

अपनी पूरी छोटी-सी पूँजी के साथ मत जाओ
कुछ कमरे पर छोड़ जाओ कुछ ले जाओ

जिस जगह नाल कटती हो वहाँ मत खेलो
हाँ अगर आखीर में
स्टेशन पर बड़ी फ़जर गरम चाय-समोसे के लिए
कुछ पैसे जमा होते हों तो कोई हर्ज़ नहीं

न तो नशे में जाओ
न खेलते वक़्त नशा करो
खेल के फ़ौरन बाद भी नहीं

जहाँ तक मुमकिन हो दोस्तों के साथ खेलो
हालाँकि इस खेल में दोस्तों-अज़ीज़ों का भी कोई एतबार नहीं
ओछों हलकटों नीम-गुंडों को हँकाल दो
नाबालिगों बालिशों को न बैठने दो
निठल्लों तमाशबीनों को बाहर रखो
प्यारे लफंगों को ज़रूर बुलाओ
अजनबियों के साथ खेलने में कोई हर्ज़ नहीं
दो-तीन दौरों के बाद वे समझ में आने लगेंगे
बहुत चुप या बहुत बोलनेवालों से होशियार रहो
औरतों और बच्चों वाली जगह पर कभी न बैठो

तवज्जो दो कि पत्ते
बहुत रफ़्तार से बँट रहे हैं या सुस्ती से
उन्हें गिनो कि चार न आ गए हों
एक सलीक़े से पकड़ो उन्हें
और गौर से पूरे देखो
ख़ासकर चिड़ी और कालेपान को और उसकी बेगम को
खेलने के ड्रामाई ढर्रे से बचो
श्री चार सौ बीस से किसी को कुछ हासिल नहीं होता
संजीदगी से खेलने का
अपना तरीक़ा ख़ुद ईजाद करो

सुनो कि क्या कहा जा रहा है
देखो कि कौन सी हरकतें बार-बार हो रही हैं
बहुत बारीक़ मिलीभगतें भी चलती हैं इस खेल में
दोस्तियों-अदावतों के नाटक होते हैं

पहले से दर्याफ़्त कर  लो
कि सादा एक-दो-तीन बड़ा होता है या इक्का-बाश्शा-मेम
और कहीं दो-तीन-पाँच को भी रन तो नहीं मानते
ट्रेल के बाद की रस्में क्या होती हैं
तीन इक्कों पर भी शो करा सकते हैं या नहीं
क्या कभी जोकर भी शामिल कर लिए जाते हैं
जहाँ शक़ हो पहले से पूछ लो
पत्ते देखने के बाद सिर्फ चाल ही चलनी होती है
हर फड़ के अपने टोटके होते हैं

भूलो मत कि तीन इक्कों के सिवाय
किन्हीं भी पत्तों का
अपने-आप में कोई मतलब नहीं होता
वे दूसरों के हाथ के मुक़ाबले ही छोटे-बड़े साबित होते हैं
और तीन इक्के तो कभी-कभी बैठक-दर-बैठक किसी को नहीं आते

पत्ते फेंक देनेवालों से कहो कि वे बीच में
न तो बताएँ न दिखाएँ
कि उन्होंने क्या पैक किया है
बीच में बार-बार बाज़ी छोड़ कर जानेवालों से भी आगाह रहो

गड्डी को हर कुछ दौरों बाद बदलवाओ
नई आने दो
वह पिछली से मिलती-जुलती न हो
बीच-बीच में पूरे बावन गिनवाते रहो
पत्ते सिर्फ लगाए नहीं जाते छिपाए बदले और चुराए भी जाते हैं
हर चाल पर हर हाल में
एक लापरवाह चौकस निगाह रखनी पड़ती है

न अपने पत्ते दिखाओ न दूसरों के देखो
तीन इक्कों की मजबूरी के सिवा उधार माँग कर मत खेलो
वैसे इस खेल में उधार मिलता भी कम है
या तो पत्ते डाल दो
या वक़्त रहते शो करा लो

चंद दौरों बाद कट फ़ॉर सीट करो
हर खेल में जगहें बदलती हैं

सही है कि असल लुत्फ़ ब्लाइंड खेलने में है
चाहो तो दो-तीन बार कवर भी करो
लेकिन सामने वाले ने अगर बीच में पत्ते उठा लिए हों
और चाल-पर-चाल दे रहा हो
तो एकतरफ़ा ज़िद बेमानी है तुम भी देख लो

लेकिन दो की लगातार चालों के बीच
वे ब्लाइंड हों या खुली
तीसरे तुम मत फँसो
वह अक़सर एक फंदा होता है
गिरीश और भैयालाल को याद रखो
वे तुम्हारे दोस्त ही तो थे

कोशिश करो कि बोट एक रुपए से ज़्यादा की न हो
तुम जुआरी नहीं हो यह तुम्हारा शग़ल है
खेल को लत मत बनाओ
लालच  टुच्चई बदी से बचो
खेलो और खेल और खिलाड़ियों से
लगाव-भरी दूरी भी बनाए रखो
कुछ को तुम्हारा खेल अच्छा लगेगा कुछ को रास नहीं आएगा
उससे क्या


पहले से नहीं कह दिया हो
कि कितनी देर खेलोगे
तो जीतते भी रहो लेकिन उठना ही पड़े
तो साफ़ कह दो कि ये आख़िरी बाज़ियाँ हैं
जिसे जीतना हो जीत ले
हारते हो तो बिना उधार लिए
बचे तो कुछ जेब में बचाकर निकल जाओ
न जीतते वक़्त पत्तों से ज़िद करो न हारते वक़्त

दो-तीन दफ़ा किसी वजह से न लौट सको
और किसी दर्दी का फोन आए
कि भाईजान कुछ गुस्ताख़ी हो गयी क्या
या कोई और दिक्क़त हो तो बताइए
आपके बिना खेल में वो जान ही नहीं आती
तो चले ही जाओ आख़िरकार
क्या तुम्हें भी अच्छा नहीं लगता
वह पत्तों का फिंटना बँटना उठना देखा जाना
ईंट लालपान चिड़ी कालेपान के मुख्तलिफ़ छापे
इक्का बाश्शा बेगम ग़ुलाम जोकरों के हर बार अलग चेहरे
जैसे किसी आश्चर्यलोक से
उनकी गंध उनकी छुअन
जो उँगलियों के पसीने और पकड़ से बासी होती जाती हैं
आसपास चेहरे पढ़ना चालें देखना
वह उम्मीद वह मायूसी वह दोस्ती वह तनातनी वह ख़ुशी वह पछतावा
वह जीतने का अफ़सोस वह हारने का लुत्फ़
जो मामूली-सी रक़म बीच में पड़ी है सब उससे कहीं ज़्यादा
***
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अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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