Wednesday, August 15, 2012

एक मेहनती दिन ध्यान का भूगोल बदल देता है




                                                                                                                                                                                   Henri Cartier-Bresson

हानि-बोध
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इंतज़ार हुसैन की एक कहानी है : ३१ मार्च. इसमें प्रेमियों के बीच मोहब्बत की मियाद जब पूरी हो जाती है तो लड़के को तमाम बातों के बीच यह बात भी बेतरह सालती रहती है कि उसने लड़की को जितने ख़त लिखे थे, उनमें कई मुहावरे और कोट्स ग़लत लिख गए थे. लड़का एक आखिरी ख़त और लिखता है, जिसमें मुहावरों के अलावा सार्त्र, कामू, लॉरेंस वगैरह के कोट्स कहां-कहां से ग़लत हैं, उसका हवाला होता है. मुझे एक प्रेम कहानी के बीच इस विरल हानि-बोध ने बहुत बांधा. हम प्रेम के अंत के बाद या तो तकलीफ़ के समंदर में गोते लगाते रहते हैं या एक असाध्य प्रति-हिंसा ( malignant vengeance ) को अपना मन सौंप देते हैं. कितना कम ख़याल और पछतावा होता है हमें ऐसी ग़लतियों का !
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Waiting is being.
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Love is a schoolboy word of four letters.
One who goes to life's school, loves everyday.
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Ignorance liberates.
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'' कितनी ही पीड़ाएं हैं / जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं ''

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गीत चतुर्वेदी की इस काव्य-पंक्ति को मैंने कई दफ़ा एक मन्त्र की तरह पढ़ा है. मन-ही-मन. सिर्फ़ अपने लिए. जैसे कोई उपचार के लिए दवा लेता हो. एक काव्य-पंक्ति, जब कविता से यों उठ कर मेरे मन में बस जाती है तो भरोसा होता है कि उसमें 'वह' है, जो मेरे 'अ-भाव' की भी पूर्ती कर रहा है. ऐसी जीवन-स्थितियां बनती हैं, जब आदमी अवाक रह जाता है. गीत की यह पंक्ति उन स्थितियों में बद्धमूल निर्वात की जगह लेती है. वाक् और अवाक के बीच तिरती यह पंक्ति हिंदी कविता की स्मरणीय पंक्ति इसलिए भी है क्योंकि इसे पढ़कर इसकी पाठ-स्मृति से उबरना नामुमकिन है.
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आदत
 
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मुझे नब्बे के बाद की फिल्मों के गाने बेहद पसन्द हैं. इन वर्षों में ही मैं बड़ा हो रहा था. तब फ़िल्में देखने की मनाही थी. गाने लगभग हर जगह मौजूद थे. इसलिए उनकी स्मृति है. उन्हें जब कहीं बजता हुआ सुनता हूँ तो बरबस उन दिनों, लोगों और जगहों की तरफ मन चला जाता है. वे बनने के बरस थे. सपने देखने और संजोने के. प्रेम क्या है यह तो ख़ैर बहुत बाद में ज़ाहिर होना शुरू हुआ, इन फ़िल्मी गीतों से मुहब्बत पहले हो गई.  मैं अब भी इनका निर्लज्ज प्रसंशक हूँ. रात-पाली में घर लौटते हुए मैं अक्सर इन्हें सुनता हूँ. यह सारा फ़साना 'फिर तेरी कहानी याद आई' सरीखा है. लेकिन जैसा कि निर्मल वर्मा ने अपनी एक कहानी में कहा है : 'किसी चीज़ का आदी न हो पाना, इससे बड़ा और कोई दुर्भाग्य नहीं', मेरे पास सौभाग्य से ऐसी कुछ आदतें हैं/ रह गईं.
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सब याद के नाम हैं.
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जीने और काम करने के लिए बहुत-सी बेशर्मी की दरकार होती है.
अगर यह कम है तो दिक्कतें भी रहेंगी.
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Despair doesn't wait for a noun.
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भगवत रावत 
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करीब तीन साल पहले जब मेरे पिता किडनी ख़राब होने के बाद डायलिसिस के लिए हफ्ते में दो बार हॉस्पिटल जाने लगे और परिवार के लिए सबसे कठिन वक़्त शुरू हुआ तो मुझे विष्णु ( खरे ) जी ने बताया था कि फ़िक्र न करो, भगवत रावत भी इसी तकलीफ़ से जूझ रहे हैं और वह तो घर में ही डायलिसिस (सेल्फ डायलिसिस ) कर लेते हैं. मुझे ऐसी जीवट भरी बातों से आश्वाशन मिलता था और लगने लगा था कि भगवत रावत की तरह मेरे पिता भी इस मर्ज के साथ जी लेंगे. मैंने भगवत जी की कविताएं पढ़ी थीं, लेकिन इस सूचना मात्र के बाद उनसे मन-ही-मन बहुत दूसरे किस्म का लगाव महसूस करने लगा था. उनके जीने में मुझे अपने पिता का जीना शामिल लगता था. उनसे सेल्फ डायलिसिस के कारगर होने और उसकी दिक्कतों के बारे में इसीलिए पता भी किया था. लेकिन मेरे पिता की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती गई. १२ जून, २०११ को वह हम सबको स्तब्ध छोड़ चले गए. मैं पिता की मृत्यु के बारे में भरसक ज़िक्र करने से भी बचता हूँ. मैं लगभग जिद्दी ढंग से उनके देहांत को मृत्यु नहीं मानता. ऐसे कुछ लोग और भी हैं, जैसे कि अब भगवत जी भी.
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One never loses in love.
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Fixations are clumsy.
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दिल्ली से बाहर हर दूसरे शहर में रहते हुए पता नहीं क्यों ग़ुलाम अली को ' हम तेरे शहर में...' गाते सुनने का मन करता है. जैसे कि पहली मोहब्बत की बर्बादी की ज़द में पड़ने से बहुत पहले ' चमकते चाँद को...' सुनता रहा था.
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Borges
 
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Reading Borges is like attending those classes of your university which you never wanted to miss. As a writer, I find him immensely evocative. He contributed in almost every genre except novel and after him those genres are not the same as they use to be. In me, the love for books, and for that matter literature and movies too, are vastly based on his line. That's why I owe him a lot. And if at all I have to name my Indian Borges, it has to be none other than Kunwar Narayan.
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किस्सा 
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वडाली बंधु के गायन की रवानगी के बीच जो किस्से कहे जाते हैं उनमें से एक में यह ज़िक्र है : कुछ बच्चे उस पेड़ पर पत्थर चला कर बेर पा रहे थे, जिसके नीचे एक फ़कीर नमाज़ अता कर रहे थे. एक पत्थर जब फ़कीर को लगा तो गुस्से में आकर उन्होंने बच्चों से पूछा कि बताओ किसने चलाई पत्थर हम उसे श्राप देंगे. बच्चों ने कहा, बाबा, आप क्यों गुस्सा होते हो. आपसे भला तो पेड़ है, जो पत्थर खाकर बेर देता है, और आप श्राप !
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एक मेहनती दिन ध्यान का भूगोल बदल देता है.
थकान के आगे बड़े से बड़ा दुःख बिछ जाता है.
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