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Showing posts from July, 2012

पोथी पढ़ि पढ़ि : ४ : व्लादिमिर नबोकोव

सच्चे मीडीऑकर अपने अधलिखे की नुमाइश करते हैं
मेरा कभी किसी मंडली से ताल्लुक नहीं रहा. किसी स्वीकृत मत या समूह का मेरे ऊपर कभी कोई प्रभाव नहीं रहा. राजनीतिक उपन्यास और समाज कल्याण के मनोरथ से लिखे गए साहित्य से ज़्यादा ऊब मुझे किसी चीज़ से नहीं होती. 

एक
कलात्मक कृति का समाज के लिए कोई महत्व नहीं है. यह सिर्फ उस शख्स के लिए महत्व रखती है जो इसके संपर्क में आता है और मेरे लिए भी वही शख्स महत्वपूर्ण है. 

मुझे नहीं लगता कि एक कलाकार को अपने चाहनेवालों के लिए व्याकुल होना चाहिए. उसका सबसे बड़ा चहेता तो वह शख्स है जो हर सुबह उससे हजामत बनाते हुए आईने में मिलता है. 
मुझे मूर्खता, दमन, अपराध, क्रूरता और सुगम संगीत पसंद नहीं. लिखने और तितलियाँ पकड़ने से बड़ा मेरे लिए कोई सुख नहीं. 
तुम किसी चीज़ के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जान सकते हो लेकिन उसके बारे में सबकुछ नहीं जान सकते : सबकुछ जान लेने की इच्छा ही हताश करतीहै.

तुम जितना किसी 'याद' को प्यार करोगे, वह अपने तईं तुम्हें उतनी ही पुरसर और अजनबी मालूम पड़ेगी. 
मैं विज्ञानी जूनून और काव्यात्मक धैर्य का मुरीद हूँ.
एक कलात्मक…

डायरी : सुजान सौन्टैग

मैं इच्छा से उकसतीहूँ 
मृत्यु के बाद तुम्हारा न तो कोई ईश्वर होता है न ही जीवन. 
दुनिया में रहते हुए जो सबसे बड़ी चाहत हो सकती है, वह है अपने प्रति सच्चा बने रहने की आज़ादी यानी ईमानदारी. 
दिमाग़ एक वेश्या है. 
स्मृति परीक्षा है. 
कमज़ोरी संक्रामक है. 
हर आदमी के अपने भेद होते हैं. 

भोले बने रहने से बेहतर है जानना.  
औपचारिकता ( 'मेहरबानी करके', 'शुक्रिया', 'मुआफ़ करें' आदि ) ख़ुद को दूसरे शख्स के हवाले न करने का एक तरीका है. 
निगाह एक हथियार है. मुझे अपने इन हथियारों के इस्तेमाल से भय ( शर्म ?) है. 
किसी को प्यार करना उसे आला दर्जे का मानना, तरजीह देना है. लेकिन यह अपने आप में जीना/होना नहीं है. 
अपना दिलवहां नहीं वारना चाहिए जहां बेकद्री हो. 
पूछो : क्या यह शख्स मेरे भीतर कुछ भी अच्छा उगा रहा है ? यह नहीं कि क्या यह सुन्दर है, अच्छा है, काम आएगा ? 
सेक्स को सेक्स मत कहो. इसे दूसरे शख्स की काया की छानबीन कहो ( एक अनुभव नहीं, न ही प्रेम का प्रदर्शन ). इस छानबीन में हर दफ़ा तुम एक नई चीज़ पाती हो. 
बौद्धिक 'चाहत' कामुक चाहत जैसी है.  
मैं पवित्र नहीं, प्रचुर हूँ. 
लोगो…

कवि की संगत कविता के साथ : ११ : शिरीष कुमार मौर्य

वकतव्य : 
वाम वाम वाम दिशा/ समय साम्‍यवादी.....
मैं कविता के बारे में कुछ भी कहना चाहूं तो सबसे पहले मुझे बहुत देर तक शमशेर की इन पंक्तियों  की उमड़-घुमड़ में रहना होता है –  यह दिशा मैंने अपने लिए तय की हो – ऐसा नहीं है, यह तो अपने समाज में डूबते जाने के क्रम में ख़ुद-ब-ख़ुद तय होती गई...शोषण और अनाचार और अपने अकेलेपन के अंधेरे में आंखें मलते हुए मैंने अपने समय को पहचाना... वाम  और साम्‍य, दो शब्‍दों में उजाला था मेरे लिए और मेरे जनों के लिए। निजी अनुभवों के सहारे कहूं तो मेरे अपने घरेलू जीवन में काफी सामन्‍तवाद था...उसके शिकार भी ....जिनमें ज्‍़यादातर औरतें और बच्‍चे थे ...जवान हुआ तो घर के बाहर के अंधेरों को जाना...देखा कि इन अंधेरों के बीच अपनी कई दुरभि:संधियां हैं...वे एक-दूसरे के विस्‍तार हैं। इधर बाबरी मस्जिद ढहाई गई...उसका भरपूर विरोध किया...उत्‍तराखंड आन्‍दोलन हुआ....मैं  शामिल रहा..चोटें खायीं...उन चोटों से कुछ मज़बूती आयी...वरना ढह गया होता....एक सही राजनीतिक समझ के बिना इंसान हो पाना मुश्किल है...यह समझ में आया....
हे  अरे  अबे  ओ  भगवान .....
पारम्‍परिक भारतीय परिवारों की तर…