कला का आलोक : ५ : प्रत्यक्षा
9:42 am![]() |
| ‘द ट्यूरीन हॉर्स’ का एक दृश्य |
बेला तार की ‘द ट्यूरीन हॉर्स’ में पहले दिन किसान और उसकी बेटी का गर्म भपाये
आलूओं को छीलना और खाना। इतना गर्म
कि हाथ फूँकना पड़े और इतनी भूख कि बावज़ूद मुँह में ऐसे हबड़-तबड़ डाला जाये। फिर
निस्पृह खिड़की से बाहर देखना, जैसे इस भूख से वास्ता किसी और का था, कि उसके भीतर कोई और था जो भोगता-देखता
था।
***
शोएब
मंसूर की पाकिस्तानी फिल्म 'बोल' और बहमन घोबदी की 'टर्टल्स कैन फ्लाई' और 'अ टाईम फॉर
ड्रंकेन हॉर्सेस'...तीन अलग फिल्में...तकलीफ और यंत्रणा का सर्रियल लैंडस्केप...आप भाग निकलना चाहते हैं फिर किसी अबूझ डोर से बँधे भी रहते हैं। इसके बरक्स कल
देव साहब पर बात करते एक दोस्त ने कहा 'ही वाज़ द टिनटिन ऑफ आर हार्ट्स'...एक भोले
समय की भोली मीठी याद...जैसे जीवन में एक से दूसरे और फिर पहले पर लौटने की
यात्रा हो, सुख
और दुख के बीच की निरंतर आवाजाही।
***![]() |
| 'थ्री कलर्स : व्हाईट' का एक दृश्य |

'लूऑमो के वेर्रा' की मार्टिना को देखते 'पाथेर पँचाली' की दुर्गा बेतरह याद आती रही। राय की यह फिल्म कितनी मार्मिक और खूबसूरत है। दिरित्ती के लैंडस्केप बेहद सुन्दर, सिपिया रंगों वाले, उदास और धूमिल। विश्वयुद्ध के समय नात्सियों द्वारा लोगों का बड़ी संख्या में मारा जाना, औरतें, बूढ़े, बच्चे। लेकिन लूऑमो देखते मैं दर्शक बनी रही। दुर्गा के साथ उसके भीतर मैं थी। सत्यजित राय ने 'पाथेर पाँचाली' कितने कम पैसों में कितने पुराने तकनीक से बनाई थी। लेकिन अपने रौ नेस में फिल्म कितनी खूबसूरत, महीन और इंटेंस है। 'अपराजितो' का बनारस वाला हिस्सा भी हौंट करता है, 'जलसाघर' भी। उस लिहाज से 'अपूर संसार' नहीं। अँधेरे और उजाले का मार्मिक गीत है। फ्रेम के बाहर का गाढ़ा उदास तरल संसार।
***
'सेक़ ज़तैम'...मैं तुमसे प्यार करता हूँ। मिशेल फूगैं की आवाज़ सुबह के कोहरे में
सफेद फूलों के गुच्छे लिये पास और पास आती है। टुकड़ों में जॉर्ज दिरित्ती की
'लूऔमो के वेर्रा' देखती हूँ। 'इल वेंतो' के बाद लूऔमो देखना। संगीत है सिर्फ संगीत, जबकि बाहर की दुनिया में सब रुखड़ा है। दिल भर आने की हद तक। कल दोस्त को रात
में गले लगाया। उसके साथ बुरा हादसा हुआ है। वो मज़बूत है। पर मुझे गले लगाते
उसका चेहरा काँप रहा था। मैंने उसके बाल सहलाते कहा, यू आर फैमिली। उसने मुझे
छोड़ने के पहले कस कर भींच लिया। मेरे भीतर कुछ दरक गया था । भीतर कोई पंछी
छटपटाता है, उड़ान का अर्थ कोई समझा दे?
'इल वेंतो' ...हवा चारों तरफ बहती है... अपने हिसाब वसूलती। बर्फीले लैंडस्केप
में तरल ऊष्मा के भावलोक का संसार, कैमरा पैन करता, विस्तार से अंतरंग की यात्रा करता है, वादियों
और पहाड़ी ढलानों में, घरों के अंतरों में, लोगों के दिलों में, चर्च के स्टीपल और छतों के सलेटी खपड़ों पर कोई मरता जाता
है... कितना
प्यार ज़रूरी है किसी को जिला देने के लिये?
***
नूरी बिल्जे चेलान की फिल्म 'थ्री मंकीज़' का अंतिम दृश्य... ओवरकास्ट ग्रे आसमान, बिजली तड़कने का अभास, मकान का ग्रे सिलुएट, छत पर खड़े आदमी की अँधेरी छाया, दूर बॉसफोरस में स्थिर कोई जहाज़ और कुछ देर बाद बगल से गुज़रती हुई रेल।
नूरी बिल्जे चेलान की फिल्म 'थ्री मंकीज़' का अंतिम दृश्य... ओवरकास्ट ग्रे आसमान, बिजली तड़कने का अभास, मकान का ग्रे सिलुएट, छत पर खड़े आदमी की अँधेरी छाया, दूर बॉसफोरस में स्थिर कोई जहाज़ और कुछ देर बाद बगल से गुज़रती हुई रेल।
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'नीना
सिमोन : लाईव एट मॉंत्रो 1976'... नीना को सुनना अपनी आत्मा के रेशे के साथ होना
होता है। उनको देखना आसमान में उड़ते एक गर्वीले पंछी को देखना होता है। उसके साथ
खुद को भी स्वाभिमान से भर लेना होता है, स्वीट क्लियर प्राईड।
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कार्तिये ब्रेसों की 'ल रीतू'...वापसी...होलोकॉस्ट पर कई फिल्में देखी है, बहुत किताबें पढ़ी हैं। इमरे कार्तेश की फेटलेस, सोफीज़ च्वायस, एस्केप फ्रॉम सॉबीबॉर, एक्सोडस, ओ जेरूसलम। कार्तिये ब्रेसों की डॉक्यूमेंटरी देखना इस सब को नई नज़र से एक बार फिर देखना था। इतनी अमानवीयता, इतनी क्रूरता। कैसा मास-हिप्नोटिज़्म? और क्यों सहते रहे लोग? कोई तर्क नहीं। इस पागलपन की क्रूरता का कोई तर्क नहीं। दिलदारियों का भी कहाँ होता है, तर्क?
कार्तिये ब्रेसों की 'ल रीतू'...वापसी...होलोकॉस्ट पर कई फिल्में देखी है, बहुत किताबें पढ़ी हैं। इमरे कार्तेश की फेटलेस, सोफीज़ च्वायस, एस्केप फ्रॉम सॉबीबॉर, एक्सोडस, ओ जेरूसलम। कार्तिये ब्रेसों की डॉक्यूमेंटरी देखना इस सब को नई नज़र से एक बार फिर देखना था। इतनी अमानवीयता, इतनी क्रूरता। कैसा मास-हिप्नोटिज़्म? और क्यों सहते रहे लोग? कोई तर्क नहीं। इस पागलपन की क्रूरता का कोई तर्क नहीं। दिलदारियों का भी कहाँ होता है, तर्क?
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मंगलेश डबराल की कविता 'स्त्रियाँ' जो उन्होंने फेल्लिनी की फिल्मों के असर में लिखा था, आज उसपर हम बात करते रहे । फिर 'सात दिन का सफर'। और ये कि ‘स्त्रियाँ’ क्यों इतना स्थूल है, उसमें फेल्लिनी का रस कहाँ है? कविता की एक पंक्ति है जिसका आशय है, स्त्री ने अपना स्तन इतनी देर तक दिखाया कि उसका रहस्य मिट गया। कविता में भी शब्दों का रहस्य मिट गया, जबकि 'सात दिन का सफर' एक पूरी दुनिया अपने भीतर समेटे है। फिल्मों पर बात करते हम हमेशा क्लिनिकल हो जाते हैं। सिनेमा जो कई स्तरों पर हमसे संवाद कायम करता है, औडियो, विज़ुअल, टेक्स्टुअल, हम उतने लेवेल्स पर जो ग्रहण करते हैं उसका रस लिखे में कायम क्यों नहीं कर पाते? जो दिखता है या दिखाया जाता उससे अनदिखा, अनकहा ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है। हमारी कल्पना को पूरी ज़मीन देता है। फेल्लिनी कितने अमूर्तन का रस बिखेरते हैं, जो हमारे भीतर किसी भाव सा अटका रहता है, उसे उसी अमूर्तन में पकड़ लेना, उसमें अपना 'मैं' खत्म करना यही है सिनेमा की मिठास।
मंगलेश डबराल की कविता 'स्त्रियाँ' जो उन्होंने फेल्लिनी की फिल्मों के असर में लिखा था, आज उसपर हम बात करते रहे । फिर 'सात दिन का सफर'। और ये कि ‘स्त्रियाँ’ क्यों इतना स्थूल है, उसमें फेल्लिनी का रस कहाँ है? कविता की एक पंक्ति है जिसका आशय है, स्त्री ने अपना स्तन इतनी देर तक दिखाया कि उसका रहस्य मिट गया। कविता में भी शब्दों का रहस्य मिट गया, जबकि 'सात दिन का सफर' एक पूरी दुनिया अपने भीतर समेटे है। फिल्मों पर बात करते हम हमेशा क्लिनिकल हो जाते हैं। सिनेमा जो कई स्तरों पर हमसे संवाद कायम करता है, औडियो, विज़ुअल, टेक्स्टुअल, हम उतने लेवेल्स पर जो ग्रहण करते हैं उसका रस लिखे में कायम क्यों नहीं कर पाते? जो दिखता है या दिखाया जाता उससे अनदिखा, अनकहा ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है। हमारी कल्पना को पूरी ज़मीन देता है। फेल्लिनी कितने अमूर्तन का रस बिखेरते हैं, जो हमारे भीतर किसी भाव सा अटका रहता है, उसे उसी अमूर्तन में पकड़ लेना, उसमें अपना 'मैं' खत्म करना यही है सिनेमा की मिठास।
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नदीन लबाकी की 'कैरामेल' की औरतें प्यार, संगत, खुशी तलाशती औरते हैं। उनके रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उनकी तकलीफ दिखती है, उनकी लड़ाई, और उनकी हँसी दिखती है। बेरूत की गलियाँ युद्ध ध्वस्त गलियाँ नहीं, बल्कि धूप नहाई, तरल लोक की सपनीली दुनिया है। कैमरा मोहब्बत से औरतों के खूबसूरत चेहरे को पैन करता है, उनके अंतरंग भावलोक को छूता, खोजता तलाशता दिखाता है उसी कोमलता नरमियत और दुलार से जैसे कि कोई आशिक। लायेल और रोज़ के चेहरे पर तरल उदासी का संसार है। लिली का विक्षिप्त संसार भी दिल तोड़ देने की कोमल चोटखाई दुनिया है। इन सब तकलीफों के बावज़ूद इन औरतों का एक-दूसरे की संगत की चहकती दुनिया, श्रृंगार के सेंसुअस विज़ुअल्स, बेरूत की संकरी तंग गलियाँ, घरों के भीतर का पारिवारिक सौहाद्र और ख़ालेद मुज़्ज़न्नर का संगीत...सब एक रिद्म एक ताल में बहता है।
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नदीन लबाकी की 'कैरामेल' की औरतें प्यार, संगत, खुशी तलाशती औरते हैं। उनके रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उनकी तकलीफ दिखती है, उनकी लड़ाई, और उनकी हँसी दिखती है। बेरूत की गलियाँ युद्ध ध्वस्त गलियाँ नहीं, बल्कि धूप नहाई, तरल लोक की सपनीली दुनिया है। कैमरा मोहब्बत से औरतों के खूबसूरत चेहरे को पैन करता है, उनके अंतरंग भावलोक को छूता, खोजता तलाशता दिखाता है उसी कोमलता नरमियत और दुलार से जैसे कि कोई आशिक। लायेल और रोज़ के चेहरे पर तरल उदासी का संसार है। लिली का विक्षिप्त संसार भी दिल तोड़ देने की कोमल चोटखाई दुनिया है। इन सब तकलीफों के बावज़ूद इन औरतों का एक-दूसरे की संगत की चहकती दुनिया, श्रृंगार के सेंसुअस विज़ुअल्स, बेरूत की संकरी तंग गलियाँ, घरों के भीतर का पारिवारिक सौहाद्र और ख़ालेद मुज़्ज़न्नर का संगीत...सब एक रिद्म एक ताल में बहता है।
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राई कूडर ने क्यूबा के उन संगीतकारों को,
जो फिदेल की
क्यूबा में गुमनामी के गर्त में खो गये थे, रिसरेक्ट किया है फिल्म 'बूयेना विस्ता सोशल क्लब' में... कॉम्पे सेगुंडो, इब्राहिम फेरर, रूबेन गोंज़ालेज़, एलियाडे ओचोबा, ओमारा पोर्तुओन्दो... लिस्ट लम्बी है और उनका संगीत अचंभित कर देने
वाला.. .कहते हैं हवाना में संगीत
मनोरंजन नहीं है, ये जीने का तरीका है।
बूयेना विस्ता हवाना का वो प्रसिद्ध लोकप्रिय क्लब था जहाँ चालीस के दशक में दिग्गज संगीतकारों का जमघट लगता था। लगभग पचास वर्ष बाद क्लब बंद हुआ। विम वेंडर्स और राई कूडर ने उस गुज़रे ज़माने को इस फिल्म में उसी उल्लास से कैद किया है। पारंपरिक क्यूबन और लातिन अमरीकी संगीत का जादू हवाना की सड़कों और मकानों से होता घरों के भीतर से गुज़रता इन संगीतकारों की ज़बानी अपनी सहज कहानी कहता, संगीत की धूप खिली रंगत की खुशी से नहाता सराबोर करता है।
अच्छे संगीत और बच्चे सी सहजता और भोलेपन वाली खुशी के साथ इन संगीतकारों को गाते बजाते देखना चाहे वो अम्स्टरडम हो या न्यूयॉर्क, हर बार ऐसा ही लगता है जैसे अपने मुहल्ले के आत्मीय संसार में अपने में लीन वो संगीत रच रहे हैं और इस सिलसिले में अगर कुछ लोग वहाँ जुट कर आपके संगीत को सराह दें, बस इससे ज़्यादा और खुशी क्या चाहिये?
बूयेना विस्ता हवाना का वो प्रसिद्ध लोकप्रिय क्लब था जहाँ चालीस के दशक में दिग्गज संगीतकारों का जमघट लगता था। लगभग पचास वर्ष बाद क्लब बंद हुआ। विम वेंडर्स और राई कूडर ने उस गुज़रे ज़माने को इस फिल्म में उसी उल्लास से कैद किया है। पारंपरिक क्यूबन और लातिन अमरीकी संगीत का जादू हवाना की सड़कों और मकानों से होता घरों के भीतर से गुज़रता इन संगीतकारों की ज़बानी अपनी सहज कहानी कहता, संगीत की धूप खिली रंगत की खुशी से नहाता सराबोर करता है।
अच्छे संगीत और बच्चे सी सहजता और भोलेपन वाली खुशी के साथ इन संगीतकारों को गाते बजाते देखना चाहे वो अम्स्टरडम हो या न्यूयॉर्क, हर बार ऐसा ही लगता है जैसे अपने मुहल्ले के आत्मीय संसार में अपने में लीन वो संगीत रच रहे हैं और इस सिलसिले में अगर कुछ लोग वहाँ जुट कर आपके संगीत को सराह दें, बस इससे ज़्यादा और खुशी क्या चाहिये?
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कुछ सिलसिलों में इधर चीन पर बहुत कुछ सामग्री पढ़ने देखने में गुज़री। यांगत्से नदी पर एक डॉक्यूमेंटरी, फिर चिया चाँगखे की 'स्टिल लाईफ'। 'थ्री गॉर्जेस डैम' पर बहुत सारे आलेख। नदी की कहानी, शहरों की कहानी, बाढ़ से विस्थापित लोगों की कहानी, चीनी सभ्यता की कहानी, उनका खानपान, इतिहास, संगीत...बहुत कुछ। उतना सब जो चीन घूम आने के बावज़ूद नहीं दिखा था, नहीं देखा था।
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| 'स्टिल लाईफ' का एक दृश्य |
अलग सभ्यताओं में गरीबी की परिभाषा भी अलग होती है ये समझना मुश्किल नहीं। फिर भी किसी भोलेपन में इस फर्क को देख लेना हैरान करता है। ऐसी और कितनी फिल्में होंगी जो जाने कितनी अलग दुनिया के वितान बुन रही होंगी। चिया चाँगखे की फिल्म अपने दिखने के बाद छाती में उस संगीत की तरह धँस जाती है जो आपकी ज़ुबान पर अटका रहता है, आप चाहे उसे लाख भूलें, कोई धुन आपके भीतर बजती है। हो सकता चीन पढ़ते-पढ़ते उसकी दुनिया भीतर फैल गई हो, पिछले दिनों किसी तिब्बती मार्केट में सुना संगीत भी कहीं अपना लगा था, हो सकता है किताबें और सिनेमा आपके साथ यही खेल करती हों कि जो दुनिया अपनी न हो वही खूब-खूब अपनी लगे, कि कोई बू सान या ली फेन किसी दिलीप हेम्बरम या राफेल तिग्गा जैसा अपना लगे, कि कोई चॉंगचिंग की गली में चाईबासा का रास्ता दिख जाये और यांग्त्से देखते ऋषिकेश के भी ऊपर चढ़ते गँगा की विशाल धारा की याद आये और यांगत्से में चलते नावों को देखते 'कोथाय पाबो तारे' के मुर्शेद गाज़ी की याद आ जाये। सिनेमा लगभग एक कविता की तरह चलती है, उम्मीद और निराशा के बीच सहज मानवीय उष्मा का जनमना और लाख मुसीबतों के बावज़ूद ज़िंदगी किसी भरोसे के बल पर गरिमा से जी लेना।
***
अम्बर रंजना पाण्डेय का गद्य
2:06 am
[ कवि अम्बर रंजना पाण्डेय का कविता से बाहर, गद्य का यह पहला मजमून है. सबद पर ही सबसे पहले अम्बर की कविताएं छपी थीं, यहीं से अब कविताओं पर एकाग्र उनके गद्य का भी सिलसिला शुरू हो रहा है. यह सहज लक्ष्य किया जा सकता है कि अम्बर
कविता में, और उससे इतर भी, अपनी कहन में न सिर्फ अलग ढंग के हैं, बल्कि
उनका यह अलग ढंग, उन मंझोले अलगावों से आगे विलक्षण है, जिसमें फ़िलहाल बात
करने से लेकर लिख-पढ़ कर कवि-लेखक बन जाने का चलन है. ]
[ कवि अम्बर रंजना पाण्डेय का कविता से बाहर, गद्य का यह पहला मजमून है. सबद पर ही सबसे पहले अम्बर की कविताएं छपी थीं, यहीं से अब कविताओं पर एकाग्र उनके गद्य का भी सिलसिला शुरू हो रहा है. यह सहज लक्ष्य किया जा सकता है कि अम्बर कविता में, और उससे इतर भी, अपनी कहन में न सिर्फ अलग ढंग के हैं, बल्कि उनका यह अलग ढंग, उन मंझोले अलगावों से आगे विलक्षण है, जिसमें फ़िलहाल बात करने से लेकर लिख-पढ़ कर कवि-लेखक बन जाने का चलन है. ]
कवि, कामकला और शुकध्वज की कथा
दसवीं
कक्षा में प्राचीनकाल में लिखे कामशास्त्र ( सेक्स मैनुअल ) पढ़ने का मुझे
चस्का लग गया. थोड़ी-बहुत संस्कृत आती थी और कोक शास्त्र की संकृत बहुत कठिन
भी नहीं होती. उस समय बनारस जाना हुआ और बिंदुमाधव के मंदिर के निकट हम लोग
पिताजी के पुराने मित्र राधाबेनी त्रिपाठी के यहाँ ठहरे. बिंदुमाधव की
हवेली से चौक कितना दूर है! चौक पर ही चौखम्भा प्रकाशन की पेढ़ी. तब
इन्टरनेट न था इसलिए पोर्नोग्राफी के लिए मैंने देवभाषा चुनी. घुमते-घुमते मैं चौखम्भा वालों की पेढ़ी पहुँच गया.
सांध्यकाल एक अधेड़ पुरुष महादेव जी की आरती कर रहे थे. मैं पोथियाँ
उलटने-पलटने लगा. अधेड़ पुरुष ने टोका, ''पोथियाँ जहाँ की तहाँ रखना रे
बटुक.'' फिर वह आरती गाने लगे. वाराणसी में इतना विस्वर दुर्लभ ही था.
मुझे एक पोथी मिली जो वात्स्यायन के कामसूत्र की पोथियों से भीत बनाकर
पीछे छुपायी गयी थी. पोथी मुनि शुकध्वज रचित 'कंदर्पसरस्वती' थी. कवि का
नाम-कुल-स्थान-काल अज्ञात था. दो-चार श्लोक हिंदी-अनुवाद की सहायता से पढ़े और प्रिय की मोटी-मोटी चोटियों से कामी की पीठ पर मार पड़ने पर कैसा
आनंद होता है, यह पढ़कर भीषण कामवेश हो गया. पोथी बंद कर कनपटियों पर
स्वेदबिन्दुओं को सुखाने के लिए मैं आदि शंकराचार्य की सौंदर्य-लहरी की
क्षीण प्रति से हवा करने लगा.
''मूरख, यह सौंदर्य-लहरी है, क्या करता है! धर दे जहाँ की तहाँ.'' अधेड़ पुरुष चिल्लाये और नैवेद्य में चढ़ाई पाव भर रबड़ी खाने लगे.
पंडित तीर्थमणि चौबे की टीका से पहले उनके अग्रज पंडित गंगामणि चौबे ने प्रस्तावना में मुनि शुकध्वज की कथा यों कही है :
'' अत्यंत प्राचीनकाल में महाकाल की नगरी अवंतिका में वनपंडित नामक
ब्राह्मण के दो पुत्र हुए. शुक्रवार के दिन जन्मे पुत्र का नाम शुकध्वज
हुआ और शनिवार के दिन जन्मे पुत्र का नाम काकध्वज हुआ. शुकध्वज दुबले,
काने, श्यामलवर्ण के अत्यंत आकर्षक नवयुवा कवि हुए. काकध्वज भीषण कृष्णवर्ण
ज्यों अंजन की पुतली, सदैव क्षुधित और सब अशुभ चिन्हों से युक्त युवक हुए, जिन्होंने अपभ्रंश का व्याकरण सर्वप्रथम स्थिर करने का सुन्दर प्रयास किया
किन्तु एक कौवा उनकी पांडुलिपि ले कर उड़ गया और किन्हीं ऋषियों की मंडली, जहाँ अग्निहोत्र कर रही थी, उस यज्ञकुंड में गिरा गया. अपभ्रंश के कृष्ण धूम
से संस्कृतपक्व कर्णोंवाले ऋषियों ने खांसते-खांसते कुपित होकर काकध्वज को अपने कुल सहित अज्ञात रह जाने का शाप दिया और इसलिए उनके भ्रात
शुकध्वज की इस सुन्दर कामशास्त्र और काव्यशास्त्र की पोथी पढ़नेवाले नहीं
मिलते.
'कंदर्पसरस्वती' अपने काल में लिखे जाने वाले काव्यशास्त्र के ग्रंथों
की शैली में लिखी गयी है और इसकी सबसे मुग्ध करने वाली प्रवृति इसकी
काव्यकला और कामकला की तुलना करने वाली है. शुकध्वज ने कहा है काव्यकला
में तकनीक और भाव का अनुपात कामकला में आवेश और अभ्यास के अनुपात में होना
चाहिए. कवि को भी कामी के सामान आवेशपूरित किन्तु फिर भी धीर होना चाहिए.
भाव में आकंठ डूबे रहकर भी, जब नासापुट और दोनों नेत्रों में जल भरा हो तब
भी तीसरे नेत्र से रति में लीला और कविता में लालित्य बनाये रखना चाहिए.
परकाया-प्रवेश कामी और कवि दोनों को सिद्ध होता है.
शुकध्वज ने छंद को कविता की व्यायामशाला और व्यायाम को कामी का छंद
कहा है. जैसे व्यायामशाला में जाने से देह का अतिरिक्त मेद छंट जाता है और काया की कृशता जाती रहती है, उसी प्रकार कविता में छंद होने से अतिरिक्त
शब्द और विस्तार के अभाव से मुक्ति होती है. व्यायाम से काया में लय और
लोच होता है, उसी प्रकार काव्य में अनुशासन से श्रुति-माधुर्य और स्मृति
उत्पन्न होती है.
कवि शुकध्वज ने कविता लिखने की तुलना कामी के अपनी प्रिया के नितम्बों
पर प्रहार करने के लिए लीलाकमल बनाने से की है. कामी की तरह कवि भी
उत्कंठित, कला से परिपूर्ण होकर लीलाकमल बनाता है, अंतर केवल यह है कि कामी
के लीलाकमल से प्रिया के नितम्ब अरुण हो उठते हैं और कवि के काव्यकमल से
उसकी प्रिया का ह्रदय. ''
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कवि, कामकला और शुकध्वज की कथा
अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविताएं
9:52 pm
भाषा
जब जब मैं इसका व्याकरण थोडा-बहुत सीख पाता हूँ, तुम किसी दूसरी भाषा का आविष्कार कर लेती हों. बिजली का बिल उस दिन आया और मैं पढ़ नहीं पाया. कविता लिखना बहुत दूर की बात हो गयी है. बीती रात जब चन्द्रमा निकल आया था अचानक जैसे कोई नेवला काट जाता है रास्ता भर दोपहर. मैं मस्तिष्क की सब शिराएँ खींच कर भी याद नहीं पाया कि चन्द्रमा को क्या कहते हैं. शब्दकोष में कैसे ढूंढता किन्तु ढूँढते ढूँढते पहुँच गया चन्द्रबिन्दु तक. मेरी भाषा तुमसे मिलने के बाद चन्द्रबिन्दु सी हो गयी है. यदि लिखूं कभी तुम्हें पत्र तो केवल चंद्रबिंदु ही चन्द्रबिन्दु बनाऊंगा. जान लेना तुम मेरी दशा केवल चन्द्रबिन्दु पढ़कर.
इससे अधिक मैं नहीं लिख पाउँगा-- श.
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शरीर-१
तुम्हारा शरीर बलिष्ट और सुन्दर है. जब प्रारंभ में स्त्री-देह से पहला परिचय हुआ था, नयी-नयी चेतना जागी थी तब सोचा नहीं था कभी कि मैं स्त्री-देह के लिए 'बलिष्ट' शब्द का प्रयोग करूँगा. तुम्हारे स्तन-कठोर, स्थितप्रज्ञ किसी abstract installation art जैसे धँस गए हैं मेरी दृष्टि में किन्तु तुम्हारी भंगिमाएं पक्षियों जैसी हैं जो मेरी आँख में पड़ते-पड़ते छूट जाती हैं. लगता है, किसी दिन जैसे दर्पण में केश आ जाता है, पुतलियों में उतर आएगा रेशा और तुम मुझे दो या आधी दिखाई दोगी. श. तुम्हें न पूरा पा सकूँगा न देख पाऊंगा कभी पूरा.
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शरीर-२
तुम्हारी जिह्वा के अग्रभाग में मेरी समग्र चेतना स्थित है. नीचे के होंठ के भीतर का भाग जिसे ईश्वर से भी अधिक मेरे दाँत जानते हैं वहां पर जो अधिक उत्तेजना में काटने पर उस दोपहर रक्त निकल आया था, उस रक्त से मेरे भीतर कितना रंग हैं, तुम नहीं जानती श.
किसी अन्तरिक्ष के यायावर की उत्सुकता से अधिक तीव्र और गहरी है मेरी जिह्वा की तुम्हारे तालु तक की यात्रा. मेरे दाँत और नाखून वन्यपशु से तुम्हारी फिराक में रहते हैं हमेशा. ''सुनने में बुरा लगता है'' मत कहो तुम. तुम्हारे पैर के अंगूठे का स्वाद तो मुझसे ज्यादा यह पृथ्वी भी नहीं जानती. पिंडलियों की मांसपेशियों की ऊष्मा बहुत है इच्छा के पक जाने के लिए.
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[ अम्बर की अन्य कविताएं यहाँ. तस्वीर फ्रैंक होवट की.]
संजय कुंदन की नई कविताएं
9:58 pmज्ञानी
वह जो ज्ञानी है
जो अपने को तीसमार खां समझता है
एक अदृश्य घोड़े पर सवार रहता है
उसके पास एक अदृश्य मुकुट भी है
जो अक्सर वह सिर पर डाले रहता है
वैसे उसके पास एक अदृश्य दुम भी है
जिसे वह खास मौके पर बाहर निकालता है
फिर दुम क्या करती होगी
यह तो समझा ही जा सकता है
कई बार अदृश्य घोड़े पर चढ़ते समय
उसका अदृश्य मुकुट हिलने लगता है
जिसे संभालने के चक्कर में
वह गिर जाता है
जमीन पर गिरा हुआ ज्ञानी
ज्ञानी नहीं लगता
तब वह गला दबाकर
शब्दों को चबा-चबाकर नहीं बोलता
एक मामूली आदमी की तरह
अनुरोध करता है-जरा उठा दो भाई!
***
तुम
एक मुश्किल रास्ता तुमने नहीं चुना
मुश्किल रास्ते ने तुम्हें चुना
तुम किसी सांचे के लिए नहीं बने
बेडौल पत्थरों ने तुम्हें प्यार किया
वे परित्यक्ता नदियां अंत-अंत तक तुम्हारा नाम लेती रहीं
जिन्हें मन के भूगोल में तुमने बार-बार बसाया
तुम किसी की पीठ पर सवार होकर नहीं चले
तुमने अपनी नाव खुद बनाई
यह क्या कम है कि सब जी रहे उधार का जीवन
और तुम्हारे पास है अपना आकाश,
अपनी लालसा में लिथड़े लोगों की भीड़ में
तुम अलग से दिख जाते हो
जब तुम इनकार करते हो किसी होड़ में उतरने से
तब अकेले विजेता नजर आते हो
इसे मामूली मत समझो कि तुम्हारी मुस्कराहट
तुम्हारी मुस्कराहट है
और तुम्हारी शाम तुम्हारी शाम
एक तुम्हीं तो हो जो शाम में फूंक मारकर उसका बुलबुला बना
घंटों उड़ा सकते हो
एक सफल आदमी देखता है
दूसरे सफल आदमी को ईष्र्या और घृणा से
जब भी कोई सफल आदमी लडख़ड़ाता है
जश्न मनाते हैं दूसरे सफल लोग
जब छिनता है किसी नियंता का ताज
वह दूध से निकाल फेंकी गई मक्खी की तरह दिखने लगता है
उसे देख नाक पर रुमाल रख लेते हैं उसके दरबारी
अच्छा है तुम सफल लोगों की चर्चा में नहीं हो
तुम्हारी चर्चा जरूर तितलियां करती होंगी
जिन्हें देखते ही तुम खिल जाते हो फूल की तरह।
***
त्योहारों की याद
इसे कोई चमत्कार न समझा जाए
नए बसते महानगर के किसी मोहल्ले से गुजरते हुए
अचानक दिख जाते हैं ताजा जुते खेत
उनमें उतरते हैं बगुले
खील बतासों की तरह
उन्हें देखते हुए
बज उठती है थाली
मन के किसी कोने में
कोई न कोई इसी तरह दिलाता रहता है
त्योहारों की याद
कभी किसी पुरानी कमीज की जेब से
निकलता है रेशमी धागा
किसी दिन ताखे पर मिलता है
सिंदूर से नहाया एक सिक्का
कोई नहीं छीन सकता
जिंदगी से उसका स्वभाव
तुम भले ही बन जाओ
किसी खंभे का बंधुआ
न देख पाओ धूप का बदलता रंग
पर एक दिन अपने आप गालों पर
चढ़ आती है लाली
मीठी हो जाती है जीभ।
***
इसी जनम में
वह जो मन की चहचहाहट पर गुनगुनाता था
मन की लहरों में डूबता-उतराता था
पकता रहता था मन की आंच में
वह जो चला गया एक दिन
मन के घोड़े की रास थामे
सांवले बादलों में न जाने कहां
वह मैं ही था
विश्वास नहीं होता
यह इसी जनम की बात है।
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इस सृष्टि से बाहर
सब कुछ तय है
संचालक का आमंत्रण,
वक्ताओं का गर्जन-तर्जन
अध्यक्षीय भाषण
तय है विरोध और समर्थन
यहां सब कुछ निश्चित है
एक आदमी मिलेगा तो
पता है कि किस तरह झुककर
क्या कहेगा
तय है हद उसकी विनम्रता की
उसकी मुस्कराहट की
सब कुछ इतना तयशुदा है कि
डर लगता है
मेरी सुबह और शाम भी तय की जा चुकी है
तय है मेरी रफ्तार भी
मैं एक अव्यवस्थित आदमी
इतनी व्यवस्था से घबरा गया हूं
सोचता हूं किसी दिन ठीक आधी रात में ही
मुर्गे की तरह बांग देना शुरू कर दूं
तहस-नहस कर दूं सबकी दिनचर्या
भले ही बाहर कर दिया जाऊं
नव देवताओं की इस सृष्टि से।
***
[ हिंदी के चर्चित कवि-कहानीकार संजय कुंदन की सबद पर इससे पहले कविता सम्बन्धी एक टिप्पणी यहाँ छपी थी. उनका तीसरा कविता संग्रह 'योजनाओं का शहर' शीघ्र प्रकाश्य है. कविताओं के साथ दी गई चित्र-कृति सल्वाडोर डाली की है. ]
आइनों को देह की भूख होती है
1:55 am
{ महेश वर्मा की नई कविताएं }
[ महेश वर्मा की कविताओं में प्रेम, स्मृति, इच्छा, अवसाद, उम्मीद, प्रतीक्षा जैसे तत्वों को अलगाना कठिन नहीं है. और इन मायनों में वह कठिनाई के कवि हैं भी नहीं. ध्यान उस सादगी की तरफ जाता है, जिससे वह मनुष्य मन के इन आदिम अनुभवों को बिना किसी आचार्य-मुद्रा में गए व्यक्त कर पाते हैं. ऐसा प्रत्येक सम्भवन हमें उस कवि- श्रम की भी ठीक-ठीक सूचना नहीं देता जो अन्यथा कई कवियों की कवितायें पढ़ते हुए यों ही मिल जाती है.
पहले उसने...
...सब जानते हैं कि हवा ने परिंदों को जन्म दिया लेकिन
उससे पहले उसने उनकी
आँखों में आकाश रख
दिया था कि (वे) उड़
सकें . ऐसे ही अँधेरे ने अपने
अनुराग से चाँद को गढा
और ये सिफत दी कि
वो दूसरों की आँखों
में सपने रख सके .
इसमें कोई छिपी हुई
बात नहीं है कि आइनों को
देह की भूख होती है,
लेकिन पहले ही हवा
ने (सब) हिला दिया था
मेरे भीतर बन रही तु-
-म्हारी प्रतिच्छवि
को: शाम थी तुम उदास थी शाम उदास
थी तुम ...लेकिन इससे
भी पहले तुम्हारे होने ने ही मुझे गढ़ना
शुरू कर दिया था कि
तुम गोया मूर्तिकार का चाकू थीं, लकीरें
काटतीं और शक्ल गढती
मिट्टी में...
हम उस ओर नहीं जाएंगे
जहां मिट्टी
और पृथ्वी की आंतरिक
इच्छा वृक्षों से होती हुई
उनकी पत्तियों में बज
रही है : हवा से.
-- ‘
हवा एक पुराना दर्पन है ’
(उसका पारा उतर चुका है वसंतसेना !)
-- “
क्या हम एक घेरा काटकर आरम्भ पर आ पाए (अन्धकार !!) ”
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बुझे हुए सब तारे
अपने होने में जो
सितारे
कब का बुझ चुके
उनकी रोशनी में जो
टिमटिम है
वह रास्तों के मोड़ों
की है
यहाँ प्रेमीजन जो
सितारे
अपनी प्रेमिकाओं की
नज़र कर रहे हैं
हो सकता है ये वही
सितारे हों
जो हैं ही नहीं
प्रेमिकाओं की चमकती
आँखों के
सितारा उपमान तभी बुझ
चुके हों
जब पहले मनुष्य सीख
रहे थे प्यार करना
मरते सितारों की चीख
सुनने की उनको फुर्सत नहीं थी
तो यहाँ धरती पर मरना
भी कोई चीज़ नहीं थी
धरती के भीतर और बाहर
जितना बाकी हैं
बहुत पहले मर चुके
पूर्वजों की हड्डियां
उनके बनाए चित्र और
पत्थर के हथियार
ये राह बताने के
सितारे हैं
जो बुझे नहीं हैं
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दरख़्त
यह रात है
और पतझर की नींद में
भी
हवा में घूमकर नीचे
गिरते पत्ते हैं
यह वृक्ष का सपना
नहीं है
उसकी नींद के पत्ते
भी गिर रहे हैं अँधेरे में
इस तरह अँधेरे में कि
अँधेरे का हिस्सा हैं
पत्ते की शक्ल का एक अँधेरा
बाहर के अँधेरे के
भीतर गिर रहा है
अँधेरा कोई वृक्ष है
तो उसके भी पत्ते गिर
रहे हैं रात में
रात खुद एक दरख़्त है.
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पुकार
सीढ़ियों के पास नीचे से कोई पुकार रहा है
जबकी कोई सीढ़ियां
नहीं हैं
उपरली मंज़िल ही नहीं
: खानाबदोश हम तम्बुओं में रहते हैं
पीछे से कारवां में
किसी के पुकारने की
आ रही है आवाज़
कोई जानवर नहीं हैं,
न बैलगाड़ियां न कोई
कारवां कहीं को जाता
हुआ
खानाबदोश नहीं हैं :
हम रुके हुए लोग हैं
एक जगह रुके हुए थे जहाँ पर कि जिसे ऊब कर
कभी कुनबा कहते थे
कभी सराय कभी शहर अपना
यहां भी सुनाई दे रही
है पुकार :
खानाबदोशों के नक़्शे
में नहीं
न पहली मंज़िल पर रहने
वाले
वाचक के के कमरे की
दीवार पे लगे नक़्शे में
कहीं ऐसी कोई जगह ही
नहीं थी किसी नक़्शे में
कोई पुकार कहाँ होती
?
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