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कला का आलोक : ४ : वर्नर हरसोग पर सुशोभित सक्तावत

7:22 pm


मिथक, मरीचिका और अभिशप्‍त लैंडस्‍केप्‍स


“…Whatever is sublime does not lead the listeners to persuasion but to a state of ecstasy.”

- Longinus, On the Sublime

"...There is such a thing as poetic, ecstatic truth. It is mysterious and elusive, and can be reached only through fabrication, imagination and stylization."

- Werner Herzog, Minnesota Declaration

1)

जर्मन फिल्‍मकार वर्नर हरसोग की वर्ष 1976 में प्रदर्शित एक फिल्‍म है हार्ट ऑफ़ ग्‍लास फिल्‍म 18वीं सदी के एक बवेरियन क़स्‍बे के बारे में है, जहां रुबी ग्‍लास का निर्माण होता है। लेकिन फ़ैक्‍टरी के मास्‍टर फ़ोरमैन की मौत होने के साथ ही रुबी ग्‍लास बनाने की तरक़ीब भी खो जाती है। यह एक अशुभ संकेत है। एक अनिवार्य सूत्र को गंवा देने की विपदा से त्रस्‍त क़स्‍बे के जन-गण धीरे-धीरे विक्षिप्‍तता की ओर अग्रसर होने लगते हैं (हरसोग ने इस फिल्‍म में सभी कलाकारों को हिप्‍नोटाइज़ कर उनसे अभिनय करवाया था)। लेकिन क़स्‍बे का युवा सामंत रुबी ग्‍लास की ट्रिक जानने की भरसक कोशिश कर रहा है। एक दिन सामंत के अनुचर एक बड़ा भारी सोफ़ा लेकर आते हैं और उसे बताते हैं कि यह एक पत्र है, जिसे मृत फ़ोरमैन के घर से लाया गया है। इसमें रुबी ग्‍लास का राज़ हो सकता है। सामंत कहता है पत्र को खोलकर पढ़ा जाए। अनुचर सोफ़े को चाक़ू से चीर देते हैं। उसमें से जूट के रेशों के सिवा कुछ नहीं निकलता। सामंत व्‍यग्रता से कहता है : ‘जिस पत्र के अक्षर उससे बाहर बिखरे हुए हों, उसे भला कैसे पढ़ा जाए।’

हरसोग का सिनेमा सामान्‍य तर्क को बेबूझ लगने वाले इस तरह के प्रसंगों से भरा पड़ा है। वास्‍तव में उनका सिनेमा एक उच्‍चतर काव्‍यात्‍मक तर्क का निर्वाह करता है और उनके रचनाकर्म में निहित इस काव्‍य-तर्कणा को समझे बिना उनके सिनेमा का विश्‍लेषण नहीं किया जा सकता। उनका सिनेमा इसलिए काव्‍यात्‍मक नहीं है कि उसमें बादलों और दरख्‍तों और सूर्योदयों-सूर्यास्‍तों का मनोहारी छायांकन है या वह रूढ़ अर्थों में महाकाव्‍यात्‍मक या प्रगीतात्‍मक है। उनका सिनेमा इसलिए काव्‍यात्‍मक है, क्‍योंकि वह काव्‍यात्‍मक यथार्थ का चाक्षुष पाठ तैयार करने का एक अभिनव रचनात्‍मक साहस करता है। वर्नर हरसोग ने अपनी फिल्‍में वस्‍तुगत यथार्थ को दरकिनार करते हुए मिथकों और दंतकथाओं और कविताओं की तरह रची हैं।

हरसोग अक्‍सर एक शब्‍द का प्रयोग करते हैं : एक्‍सटेटिक-ट्रुथ। यह उनके रचना-सत्‍य तक पहुंचने की सबसे महत्‍वपूर्ण कुंजी है और यह अकारण नहीं है कि यही वह कुंजी है, जो कविता-तत्‍व की निर्मिति को भी परिभाषित करती है। हरसोग ने बार-बार दोहराया है कि हमारी सभ्‍यता के समक्ष मुंह बाए खड़े विराट संकटों में से एक संकट यह भी है कि विज्ञापनवादी प्रचार तंत्र ने इमेजेस का जो स्‍टीरियोटाइप रचा है (इसे वे ‘एग्‍ज्‍़हॉशन ऑफ़ इमेजेस’ कहते हैं), उससे हम अपनी भाषा और कल्‍पनाशीलता गंवा रहे हैं। यदि हमने अपने लिए नई भाषा और नई छवियां नहीं रचीं, यदि हमने अपनी कल्‍पनाशीलता का पुनराविष्‍कार नहीं किया तो हम प्रागैतिहासिक भीमकाय जंतुओं की तरह विलुप्‍त हो जाएंगे।

ज़ाहिर है, यहां हरसोग की पीड़ा केवल कलात्‍मक मानक स्‍थापित करने की ही नहीं है, वे होमोजेनाइज़ेशन के ख़तरों की ओर भी इशारा कर रहे हैं : उपभोक्‍तावादी दुरभिसंधियों द्वारा रचित एक ऐसा वस्‍तुगत यथार्थ, जिसमें सभी लोग धीरे-धीरे एक जैसे होते चले जाते हैं, एक जैसी भाषा बोलते, एक जैसा व्‍यवहार करते हैं और अपने वैशिष्‍ट्य को गंवा देते हैं, ठीक वैसे ही, जैसे हार्ट ऑफ़ ग्‍लास के हतप्रज्ञ, सम्‍मोहित और संज्ञाशून्‍य जन-गण हठात एक सामान्‍य विक्षिप्‍तता की ओर बढ़ते चले जाते हैं। इन अर्थों में हरसोग का सिनेमा सामान्‍य के प्रति विशिष्‍ट का विक्षोभ ही नहीं, बल्कि विद्रोह भी है। वे सिनेमा में निगमन रीति के अनन्‍य प्रस्‍तावक हैं।

2)

लेकिन सिनेमा में छवियों के पुनराविष्‍कार या ‘एक्‍सटेटिक ट्रुथ’ को अर्जित करने की प्रविधि क्‍या होगी? हरसोग कहते हैं कि सिनेमा में स्‍टाइलाइज़ेशन और फेब्रिकेशन (दूसरे शब्‍दों में यथार्थ के काव्‍यात्‍मक विरूपण या डिस्‍टॉर्शन) से ही एक्‍सटेटिक ट्रुथ को अर्जित किया जा सकता है और यह केवल कलागत अनुशासन ही नहीं, इसका नाता मनुष्‍यता के व्‍यापक जीवन-व्‍यापार से भी है। सिनेमा, कविता, चित्रकृतियां, संगीत सभी इसी विशिष्‍ट के लिए किया जाने वाला उद्यम हैं। इसके साथ ही हरसोग कला में स्‍वाभाविकता के मिथ को भी ध्‍वस्‍त करते हैं और कलात्‍मक परिश्रम के आग्रह की आत्‍मविश्‍वस्‍त स्‍थापना करते हैं। इन मायनों में वे फ्रांसीसी न्‍यू वेव सिनेमा की आत्‍योर थियॅरी के प्रच्‍छन्‍न पक्षधर हैं, जिसमें इस मंतव्‍य की बात कही गई है कि निर्देशक फिल्‍म का लेखक (ऑथर या आत्‍योर) है और फिल्‍म के सभी पहलुओं पर निर्देशक के रचनात्‍मक नियंत्रण से ही कोई महत्‍वपूर्ण सिनेकृति संभव है।

लेकिन सिनेमा में स्‍टाइलाइज़ेशन या फेब्रिकेशन से हरसोग का क्‍या आशय है? उनके इस आग्रह को उनकी कला-दृष्टि के कुछेक उदाहरणों से समझना होगा। हरसोग कहते हैं कि फिल्‍मकार वृत्‍तांतकार, इतिहासकार या पत्रकार नहीं होता, इसलिए फ़ैक्‍चुअल प्रिसीज़न उसके लिए अपेक्षित भले ज़रूर हो, लेकिन अनिवार्य नहीं है। कलात्‍मक सत्‍य के निर्वाह के लिए तर्क के गुरुत्‍व को ध्‍वस्‍त करना न केवल कई बार रचनाकार की बाध्‍यता है, वरन कुछेक अवसरों पर यह उसका अनिवार्य और अपरिहार्य दायित्‍व भी है। इसीलिए जब हरसोग ऑस्‍ट्रेलिया के नेटिव एबोरि‍जिनल्‍स पर फिल्‍म बनाते हैं तो ‘हरी चींटियों के स्‍वप्‍न’ का मिथक वे अपनी कल्‍पना से रचते हैं, क्‍योंकि फिल्‍म की निर्मिति के लिए इस तरह का काव्‍यसंगत मिथक अनिवार्य था। जब वे इतालवी मध्‍यकालीन कंपोज़र कार्लो जेसुआल्‍डो पर फिल्‍म बनाते हैं तो उनके जीवन-प्रसंगों को फिक्‍शनलाइज़ कर देते हैं। साइबेरिया के धार्मिक विश्‍वासों पर फिल्‍म बनाते समय वे कई लोक आख्‍यान स्‍वयं रच देते हैं। यहां इतालवी फिल्‍मकार माइकेलेंजेलो अंतोनियोनी की याद आती है, जो एक विशिष्‍ट सिनेमाई वक्‍तव्‍य अर्जित करने के लिए अपने सेट और लैंडस्‍केप को पेंट करते थे। यह उनका स्‍टाइलाइज़ेशन था। दूसरी तरफ़ वर्नर हरसोग अपनी फिल्‍म की टैक्‍स्‍चुअल मिथालॉजी को स्‍टाइलाइज़ करते हैं। अंतोनियोनी का ज़ोर कला पर है, हरसोग का ज़ोर काव्‍यात्‍मक परिणति पर।

अपनी कथाफिल्‍म फिट्ज़काराल्‍डो को अपनी ‘सर्वश्रेष्‍ठ डॉक्‍यूमेंट्री’ बताने वाले हरसोग ने दर्जनों डॉक्‍यूमेंट्री बनाई हैं, लेकिन उन्‍हें ‘नॉन फिक्‍शन’ नहीं कहा जा सकता। हरसोग के रचना-संसार में कुछ भी ‘नॉन फिक्‍शन’ नहीं है। वे गल्‍प के आराधक हैं। वे इस धारणा के प्रस्‍तावक हैं कि रचनाकार यथार्थ नहीं, काव्‍यात्‍मक सत्‍य की अभ्‍यर्थना करता है और वस्‍तुगत यथार्थ के इतिवृत्‍तात्‍मक चित्रण नहीं, बल्कि उसके स्‍टाइलाइज़ेशन से ही उसके अंतर्भूत सत्‍य को अर्जित किया जा सकता है। वस्‍तुगत यथार्थ को भेदने के लिए उससे विचलन ज़रूरी है और यही कला का अभीष्‍ट है। सिमोन वेल ने जिस डिस्‍टेंस को सौंदर्य का मर्म बताया था, वह वस्‍तुगत यथार्थ से कलागत विचलन की यह कीमिया ही है।

3)

सिनेमा में स्‍टाइलाइज़ेशन कई स्‍तरों पर किया जाता रहा है। ज्‍यां लुक गोदार और एक दूसरे स्‍तर पर क्‍वेंटीन टैरेंटिनो ‘पाठ’ और ‘संरचना’ को स्‍टाइलाइज़ करते हैं। अंतोनियोनी अपने लैंडस्‍केप को स्‍टाइलाइज़ करते हैं। वोंग कार वाई के यहां सिने-तकनीक के दक्ष व्‍यवहार से रचा गया सौंदर्य है। सत्‍यजित राय के यहां कथासत्‍य और भावभूमि की प्रगीतात्‍मकता है और इसीलिए यह अकारण नहीं है कि उनके सिनेमा में संगीत की निर्णायक भूमिका है। फ़ेलिनी की प्रविधि अतिनाटकीय है तो बुनुएल की अतियथार्थवादी। ये फिल्‍मकार इन उपकरणों के ज़रिये अपने सिनेमा को अलंकृत करते रहे हैं। इन अर्थों में एक महत्‍वपूर्ण फिल्‍मकार के रूप में वर्नर हरसोग की विशिष्‍टता यही है कि वे सिनेमा की रूपकात्‍मकता और उसकी काव्‍यात्‍मक संभावनाओं का स्‍टाइलाइज़ेशन करते हैं। इसलिए उनका स्‍टाइलाइज़ेशन टेक्‍स्‍ट से लेकर लैंडस्‍केप तक व्‍यापता है। लेसन ऑफ़ डार्कनेस में हरसोग को अपनी फिल्‍म के अंतर्भूत सत्‍य को आलोकित करने वाले एक सटीक उद्धरण की ज़रूरत थी। उन्‍हें ऐसा कोई उद्धरण ढूंढ़े से न मिला तो उन्‍होंने उसे ख़ुद लिख डाला और फिल्‍म में उसे पास्‍कल के नाम से उद्धृत किया। इसी फिल्‍म में क़ुवैत के तेल के जलते कुंओं को वे उसके ऐतिहासिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्‍य से पूरी तरह अलगाते हुए विनाश की ओर अग्रसर हो रही एक सभ्‍यता के शापित लैंडस्‍केप की तरह निरूपित करते हैं। स्‍पष्‍ट है, हरसोग का अभीष्‍ट प्रामाणिकता और तथ्‍यगत प्रिसीज़न नहीं, बल्कि अपने रचना-सत्‍य का प्रभावी निरूपण है।

4)

1972 में जब हरसोग ने सहारा मरुथल की मरीचिकाओं को फिल्‍माते हुए फ़ाता मोर्गाना बनाई थी, तो उन्‍होंने कहा था कि वे हमारी धरती के अभिशप्‍त लैंडस्‍केप्‍स को विन्‍यस्‍त करना चाहते हैं। ये ‘एम्‍बैरेस्‍ड लैंडस्‍केप्‍स’ तभी से हरसोग के रचना-संसार का एक अनिवार्य घटक रहे हैं, फिर चाहे वे पेरू‍ के जंगल हों या क्रीट के पथरीले पठार, कॉन्‍गो की मरुभूमि हो या दक्षिणी ध्रुव के बर्फीले इलाक़े, क़ुवैत के जलते हुए तेल के कुंए हों या कैरेबियन का सुलगता हुआ ज्‍वालामुखी, अपने एम्‍बैरेस्‍ड लैंडस्‍केप्‍स की तलाश में उन्‍होंने दुनियाभर की ख़ाक़ छानी है और अब उनका बॉडी ऑफ़ वर्क देखकर लगता है कि उन्‍होंने लैंडस्‍केप्‍स की एक अपूर्व मेखला रची है। उन्‍होंने इन लैंडस्‍केप्‍स को विन्‍यस्‍त कर, एक इमेज में बदलकर उन्‍हें कीलित भी किया है। अपनी विषय-वस्‍तु को कीलित करना हर रचनाकार को मिला अभिशाप होता है, लेकिन क्‍या यह विषय-वस्‍तु और रचनाकार दोनों का ही मोक्ष भी नहीं है?

ख़ैर। सरल और सुविधापूर्ण निष्‍कर्षों तक पहुंचने को आतुर पर्यावरणविदों के उलट हरसोग इन शापित भूखंडों के लिए केवल मनुष्‍यता के अतिचारों को ही दोषी नहीं ठहराते, वे न केवल इन भूखंडों बल्कि हर वस्‍तु और प्रत्‍यय के क्षरण की नियति को भी रेखांकित करते हैं। हरसोग की विश्‍व दृष्टि को अराजकतावादी और नैराश्‍यपूर्ण इसीलिए कहा जाता रहा है, क्‍योंकि उन्‍होंने कभी अपनी फिल्‍मों को सुखद और सुक़ूनदेह निष्‍कर्षों तक पहुंचने के साधन के रूप में इस्‍तेमाल नहीं किया। इसीलिए ला ब्‍लांक की डॉक्‍यूमेंट्री बर्डन ऑफ़ ड्रीम्‍स (जिसका निर्माण पेरू में फिट्ज़काराल्‍डो की शूटिंग के दौरान किया गया था) में वे कहते हैं : ‘प्रकृति का मूल चरित्र संहार है। एक कलेक्टिव और ओवरव्‍हेलमिंग मर्डर। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि मैं उससे प्रेम नहीं करता। मैं उससे बहुत प्रेम करता हूं, लेकिन अपने श्रेष्‍ठतर विवेक के विपरीत (‘अगेंस्‍ट माय बेटर जजमेंट’)

5)

फिर भी हरसोग के यहां लैंडस्‍केप्‍स से आशय महज़ बाहरी भू-दृश्‍य से नहीं लगाया जाना चाहिए। हरसोग का सिनेमा प्रकृति-पुरुष संबंधों की जटिल अंत:क्रिया पर एक महत्‍वपूर्ण विमर्श है। वास्‍तव में उनके लैंडस्‍केप्‍स भीतर के भूगोल का प्रतिफलन हैं, वे वस्‍तुत: इनरस्‍केप्‍स हैं। अगिरे द रैथ ऑफ़ गॉड के प्रारंभिक दृश्‍य में पेरूवियन पहाड़ों के भव्‍य और अविस्‍मरणीय लॉन्‍ग शॉट के बारे में उन्‍होंने कहा था कि मैं एक ऐसा लैंडस्‍केप दिखाना चाहता हूं, जो मानवीय गुणों से भरपूर हो। मनुष्‍यता के जितने भी गुण-दोष उन्‍होंने अपने लैंडस्‍केप्‍स पर आरोपित किए हैं, वे वस्‍तुत: हमारी संवेदनाओं और हमारे स्‍वप्‍नों की प्रतिछवियां हैं। इन अर्थों में फ़ाता मोर्गाना का मरुथल और मरीचिकाएं हमारी सभ्‍यता का वेस्‍टलैंड है और यह हरसोग की गहन आइरनी ही है कि वे उसे ‘पैराडाइज़’ कहकर संबोधित करते हैं। यूकायाली नदी का उत्‍ताप मनुष्‍यता के आदिम ज्‍वरों और दग्‍ध दु:साहसों का रूपक है। पेरू के जंगल मनुष्‍यता की अनागरिकता के सजीव प्रतीक हैं। और एल डोराडो का असंभव लैंडस्‍केप भी एक ऐसे अप्रस्‍तुत स्‍वर्ण-देश का रूपक है, जो सदियों से मनुष्‍यों की कामनाओं का धारक रहा है। जो अप्रस्‍तुत है, वही तो कामना का अभीष्‍ट होता है।

हरसोग की पहली कथाफिल्‍म साइन्‍स ऑफ़ लाइफ़ में ही हम भीतर के भूगोल और बाहर के भूगोल की उस अनिवार्य अंत:क्रिया को देख सकते हैं, जो आगे चलकर उनके समग्र रचनाकर्म का केंद्र बिंदु बनने वाली थी। साइन्‍स ऑफ़ लाइफ़ युद्ध के उपकरणों के नागरिकों के हाथ में चले जाने की त्रासदी को वर्णित करती है, लेकिन साथ ही हम यह भी देख सकते हैं क्रीट का तंद्रिल, स्‍वप्‍नवत और बेहलचल भूदृश्‍य अपने में किन भीषण संभावनाओं को छुपाए हुए है। हरसोग ने कहा है कि हमारी सभ्‍यता अराजकता और अंधकार के एक समुद्र पर बर्फ की पतली परत की तरह है। फिल्‍म में पवनचक्कियों के ‘एक्‍सटेटिक लैंडस्‍केप’ को देखने के बाद नायक स्‍त्रोज़ेक के भीतर का उत्‍ताप सतह पर आ जाता है। फिल्‍मकार ने यहां सामान्‍य तर्क को उलट दिया है। क्‍या सौंदर्य की निष्‍पत्ति संतप्‍तता भी हो सकती है? क्‍या सौंदर्य किन्‍हीं उत्‍तापों और क्रूरताओं को भी जन्‍म दे सकता है? पता नहीं। साइन्‍स ऑफ़ लाइफ़ की अंतिम इमेज हमें धूल के एक ग़ुबार में छोड़ जाती है। बाहर के भूगोल से हमारे भीतर के भूगोल का क्‍या नाता है, शायद हम कभी पूरी तरह नहीं जान सकते, लेकिन हरसोग का सिनेमा इसमें हमारी गहरी मदद ज़रूर करता है।

6)

हरसोग की रुचि आत्‍यंतिक स्थितियों में रही है। वे कहते हैं कि जिस तरह भौतिक वस्‍तुएं चरम दाब, ताप और विकिरण की स्थिति में असामान्‍य व्‍यवहार करती हैं, उसी तरह चरम स्थितियों में मनुष्‍य के व्‍यवहार का भी अध्‍ययन किया जाना चाहिए, क्‍योंकि वहीं से हमें उसके भीतर के भूगोल के बारे में ज़रूरी सूचनाएं मिल सकती हैं। हरसोग के लिए चरम आह्लाद से लेकर उत्‍ताप तक सभी मनोवेग भीतर के भूगोल के उत्‍खनन के उपकरण हैं। और यही वजह है कि क्‍लॉउस किन्‍स्‍की जैसा दुर्दम्‍य अभिनेता हरसोग के सिनेमा का प्रतिनिधि नायक है। उनके चरित्रों के उद्वेगों और उत्‍तापों को अभिनीत करने के लिए किन्‍स्‍की से बेहतर व्‍यक्ति-रूपक कोई और नहीं हो सकता था। हरसोग और किन्‍स्‍की की रचनात्‍मक साझेदारी अनेक संघर्षों और टकरावों से भरी हुई थी, लेकिन इसके बावजूद उन दोनों ने एक-दूसरे के साथ पांच कथाफिल्‍में बनाईं। हरसोग ने कहा है : अपनी-अपनी नियति के प्रति हम दोनों के ही कुछ दायित्‍व थे और उन दायित्‍वों से मुंह मोड़ पाना हमारे लिए संभव नहीं था।

7)

उपभोक्‍तावादी बूर्ज्‍वा सभ्‍यता के प्रति अपनी हिक़ारत को छिपा पाना हरसोग के लिए हमेशा ही कठिन रहा और यही कारण है कि अपनी डॉक्‍यूमेंट्री फिल्‍मों में वे आदिम सभ्‍यताओं के जीवन व्‍यवहार में बारे में बार-बार रुचि लेते रहे हैं। अफ्रीका के वूडाबे समुदाय से लेकिन नेटिव ऑस्‍ट्रेलियाई एबोरिजिनल्‍स और लातिन अमेरिका के इंडियंस तक की सांस्‍कृतिक परंपराओं में उनकी दिलचस्‍पी रही है और उन्‍होंने उन पर फिल्‍में बनाई हैं। हालांकि इसके बावजूद वे ख़ुद को एंथ्रोपॉलोजिस्‍ट नहीं मानते। वे कहते हैं : ‘विभिन्‍न सांस्‍कृतिक समूहों में मनुष्‍य के सामान्‍य व्‍यवहार में मेरी रुचि उसी तरह है, जिस तरह विभिन्‍न आत्‍यंतिक स्थितियों में मनुष्‍य के सामान्‍य व्‍यवहार में, लेकिन मुझे एंथ्रोपॉलोजिस्‍ट कहना ठीक न होगा। मैं अकादमिशियन नहीं, फिल्‍मकार हूं।’ हरसोग आधुनिकता के कटु आलोचक हैं। वे उपभोक्‍तावादी सभ्‍यता के दोहन तंत्र का भी प्रतिवाद करते रहे हैं। अपनी फिल्‍म व्‍हेयर द ग्रीन एंट्स ड्रीम में उन्‍होंने एक ऐसे नेटिव ऑस्‍ट्रेलियाई को फिल्‍माया है, जो अपनी जातीय परंपरा का अंतिम जीवित व्‍यक्ति है और उसके साथ ही वह परंपरा, उसकी भाषा, रीति और लोकव्‍यवहार समाप्‍त हो जाएंगे। फिल्‍म में चक्रवात और बुलडोज़रों के बिम्‍बों का निरंतर प्रयोग हुआ है। इन प्रतीकों से झांकते मंतव्‍यों को नज़रअंदाज कर पाना लगभग असंभव है।

8)

न्‍यू जर्मन सिनेमा के प्रतिनिधि फिल्‍मकारों क्‍लुग, श्‍लोनडॉर्फ, वेंडर्स, फ़ासबाइंडर सहित हरसोग भी कहते रहे हैं कि ‘वी हैव नो फ़ादर्स, वी हैव ओनली ग्रैंडफ़ादर्स।’ इस कथन में एक दूरस्‍थ व्‍यंजना तो है ही, किंचित अभिधा भी है, क्‍योंकि न्‍यू जर्मन फिल्‍मकारों की पीढ़ी के पितागण युद्ध में या तो खेत रहे थे या वे अन्‍यत्र विस्‍थापित हो गए थे। 1920-30 के दशक में जर्मन अभिव्‍यंजनावादी आंदोलन के दौरान डब्‍ल्‍यूएच म्‍यूर्नऊ और फ्रिट्ज़ लैंग की अगुवाई में जर्मन सिनेमा अपने उत्‍कर्ष की ओर बढ़ रहा था, किंतु नात्‍सी सर्वसत्‍तावाद के उदय के कारण यह कला आंदोलन अधबीच में ही समाप्‍त हो गया। फ्रिट्ज़ लैंग और जर्मन समीक्षिका लोत्‍ते आइश्‍न1933 में अदोल्‍फ़ हिटलर द्वारा सत्‍ता के सूत्र अपने हाथ में लेने के बाद जर्मनी से पलायन कर गए। जोसेफ़ गोएबल्‍स ने जर्मनी के सूचना प्रसारण महक़मे की कमान संभाली और नात्‍सी प्रचारवादी सिनेमा रचा जाने लगा। 1960 के दशक के उत्‍तरार्ध में जब जर्मनी के युद्धोत्‍तर फिल्‍मकारों ने फिर से फिल्‍में बनानी शुरू कीं, तब उनके पास कोई पिता नहीं थे, केवल पितामह थे। बीच की एक पूरी पीढ़ी को युद्ध निगल चुका था।

लेकिन जब हरसोग यह बात कहते हैं तो इसका ऐतिहासिक के साथ ही एक निजी परिप्रेक्ष्‍य भी है। न्‍यू जर्मन सिनेमा से पहले जर्मनी में दो कला आंदोलन प्रसिद्ध रहे : एक अठारहवीं-उन्‍नीसवीं सदी का रोमांसवाद और दूसरा बीसवीं सदी की पहली चौथाई का अभिव्‍यंजनावाद। हरसोग अपनी कला संवेदना के विकास में अभिव्‍यंजनावद का देय ज़रूर स्‍वीकारते हैं (उन्‍होंने जर्मन अभिव्‍यंजनावादी फिल्‍मकार डब्‍ल्‍यूएच म्‍यूर्नऊ को आदरांजलि अर्पित करते उनकी फिल्‍म नोस्‍फ़ेरातु का रीमेक भी बनाया है), लेकिन हरसोग के भावबोध की निर्मिति जर्मन अभिव्‍यंजनावाद से अधिक जर्मन रोमांसवाद या वास्‍तव में उससे भी पूर्व के मध्‍ययुगीन प्रतीकों से हुई है। उनके पास क्‍लीश्‍ट, होल्‍डरिन और ब्‍यूख़नर का-सा तीक्ष्‍ण और उदास व्‍यंग्‍य है। उन्‍हें अभिव्‍यंजनावादी एडवर्ड मुंख़ की तुलना में रोमांसवादी चित्रकार कास्‍पर डेविड फ्रेडरिक अधिक लुभाते हैं, जिनकी चित्रकृति ‘वांडरर ओवर ए सी ऑफ़ फ़ॉग’ को उन्‍होंने अपनी फिल्‍म हार्ट ऑफ़ ग्‍लास में एक अविस्‍मरणीय बिम्‍ब के रूप में सजीव कर दिया था। उन्‍हें रिचर्ड वैगनर से भी अधिक कार्लो जेसुआल्‍डो का संगीत आकृष्‍ट करता है, जिनका रोमांचक जीवन उनकी फिल्‍म डेथ फ़ॉर फ़ाइव वॉइसेस का विषय है। उनके लिए किंग लुडविग द्वितीय की एक्‍सटेटिक फंतासियां किसी भी आधुनिक फिल्‍मकार या सिने सिद्धांतकार से अधिक गहन प्रेरणा का स्रोत हैं।

9)

हरसोग ने ताउम्र ख़ुद को जर्मन के स्‍थान पर बवेरियन कहलाना पसंद किया है। हरसोग का भावबोध अनिवार्यत: प्रोविंशियल है। बवेरिया दक्षिण-पूर्व जर्मनी का प्रांत है, जहां आज भी मध्‍ययुगीन प्रतीक जीवंत हैं। यह जर्मनी का वह इलाक़ा भी है, जो दूसरे विश्‍व युद्ध की विभीषिका से पूरी तरह सुरक्षित बच गया था। वह जर्मनी का एक दुर्लभ इनटैक्‍ट लैंडस्‍केप है।

बवेरिया के बारे में बात करते हुए हरसोग शिद्दत से किंग लुडविग द्वितीय को याद करते हैं, जिन्‍होंने 1864 से 1886 तक बवेरिया पर राज किया था। लोकस्‍मृति में ‘फ़ेयरी टेल किंग’ के नाम से याद रखे जाने वाले लुडविग द्वितीय ने 1868 में एक अपूर्व प्रेरणा की झोंक में बवेरियन आल्‍प्‍स की फ़ुटहिल्‍स पर बारोक सौंदर्य से भरपूर किलों की एक शृंखला का निर्माण प्रारंभ करवाया और दिवालिया होने की नौबत तक इन्‍हें बनवाते रहे। बवेरिया के ये किले और बुर्ज लुडविग के भीतर के उद्वेगों के साथ ही शिल्‍प में उनकी व्‍याप्ति की गहन आकांक्षा का सजीव मूर्तन थे। लुडविग की मृत्‍यु अल्‍पायु में ही हो गई।

हरसोग ने कहा है कि अगर उनके सिवा कोई और व्‍यक्ति फिट्ज़काराल्‍डो सरीखी फिल्‍म बना सकता था, तो वे लुडविग द्वितीय ही थे। यह हरसोग के रचना-संसार का एक्‍सटेटिक ट्रुथ है। वास्‍तव में हरसोग के रचनाकर्म की तुलना अगर किसी चीज़ से की जा सकती है, तो वे लुडविग द्वितीय के ये किले और बुर्ज ही हैं : ठोस, अनगढ़, संतप्‍त और काव्‍यात्‍मक संभावनाओं से भरपूर। हरसोग ने कहा है सिनेमा सामूहिक स्‍वप्‍नों और दु:स्‍वप्‍नों का माध्‍यम है। लुडविग द्वितीय के पाषाण-प्रतीकों की ही तरह उनकी फिल्‍में भी हमारे स्‍वप्‍नों, उद्वेगों और एक्‍सटेसीज़ की अनन्‍य अभिव्‍यक्ति हैं। हरसोग के रचनात्‍मक उद्यम ने हमारी कल्‍पनाशीलता का परिष्‍कार और पुनराविष्‍कार किया है और हमारे लिए विशिष्‍ट छवियों का विधान रचा है। एक उच्‍चतर काव्‍यात्‍मक तर्क का निर्वाह इसी तरह संभव है।
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{ तस्‍वीर : वर्नर हरसोग की फिल्‍म फिट्ज़काराल्‍डो (1982) का एक अविस्‍मरणीय दृश्‍य। यह फिल्‍म 320 टन वज़नी जहाज़ को एक पहाड़ पर खींचकर ले जाने के कारण चर्चा में आई थी। जब फिल्‍म के नायक फिट्ज़काराल्‍डो से पूछा जाता है कि जहाज़ पहाड़ पर कैसे चढ़ेगा, तो वह जवाब देता है : 'वैसे ही, जैसे गाय एक ही छलांग में चांद को फांद गई थी।' वह पहाड़ पर जहाज़ इसलिए ले जाना चाहता था, ताकि रबर के जंगलों का दोहन कर ख़ूब पैसे बनाए और उनसे पेरू के जंगलों में एक ऑपेरा हाउस खुलवा सके। फिट्ज़काराल्‍डो कारूसे के संगीत का दीवाना था। }


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी