Thursday, December 27, 2012

सबद पुस्तिका 9 - उदयन वाजपेयी






बाज़बहादुर की कविताएँ
( रानी रूपमती और बाज़बहादुर की प्रणयगाथा लोक में प्रसिद्ध है। रूपमती गायन और लेखन में प्रवीण थीं। बाज़बहादुर तालवाध वादन में निष्णात थे। उन्होंने कुछ लिखा हो, ऐसा ज्ञात नहीं है। ये कविताएँ बाज़बहादुर की वे कविताएँ हैं जो वे लिख सकते थे ) 
- उदयन वाजपेयी

हर चंद मैंने शौक को पिन्हा किया वले,
एक आध हर्फ़ प्यार का मुँह से निकल गया।
                                                        - मीर






1.

उसकी आवाज़ की गहरायी में
धड़कते मौन के स्पन्दन
सुन रहा हूँ
मैं सुन रहा हूँ वह
क्या बोलते हुए
क्या नहीं बोल रही !


2.

मुझे नहीं उतरना है
उसकी आवाज़ की कन्दरा में
मुझे नहीं आता
कैसे मौन की लपटों में
झुलसने से बचा जाता है

मुझे नहीं आता
मुझे नहीं उतरना


3.

उसकी आवाज़ की गहरायी में
सिहरते संकोच को
छू रहा हूँ
मैं सुन रहा हूँ वह
क्या बोलते हुए
क्या नहीं बोल रही !


4.

कहाँ बनाऊँ तोरण-द्वार
उसके आने के लिए
यह ज़िंदगी इतनी जगहों से
टूट-फूट गयी है, इतनी जगहों से
खुल गयी है कि खिड़कियों तक के लिये
जगह बाकी नहीं है

कहाँ बनाऊँ तोरण-द्वार
उसके आने के लिए ?


5.

उसकी आवाज़ की गहरायी में
फड़फड़ाते पंख बार-बार मेरी
पीठ को घायल कर रहे हैं
ओह! वे पंख जो उड़ नहीं पाते
कैसे नश्तरों में बदल गये हैं
कैसे लहुलुहान होती जा रही है
उसकी यह काँपती-सी आवाज़
काग़ज़ पर लिखी !

मांडू स्थित बाज़बहादुर के महल की एक छतरी. 



6.

उसकी आवाज़ में स्तनों की खनक थी
त्वचा की सिहरन थी
उसकी आवाज़ में रह-रह कर
काँपते थे होंठ, कुण्डली मार कर
बैठी थी संकोच-दीप्त चाल

मैं उसकी आवाज़ में प्रवेश पाना चाहता था।
मैं उसकी आवाज़ में उसे खो देना चाहता था।


7.

लिखे हुए शब्दों के पीछे से उसे
मेरी फुसफुसाहट सुनायी देती है
अपने बोलने में
अचानक उसे महसूस होने लगते हैं
मेरी आवाज़ की रेशे
वह चौंक कर मुड़ती है
चारो ओर फैली हरियाली पर
बारिश की बूँदें गिर रही हैं

टप-टप टप-टप
टप-टप टप-टप


8.

अँधेरे में चमकते उसके चेहरे से
लगभग पारदर्शी मुस्कान झर रही है
मेरी नज़र उस तक पहुँचने के पहले
कहीं और उलझ जा रही है
वह स्वीकार में ठिठकी खड़ी है
उसके स्तनों पर कामना के स्पन्दन फैलते हैं
पृथ्वी पर उगे वृक्षों पर जैसे
हवा के झौंके !


9.

उसके लौटने से
सूनी हुर्इ गली में फैले
मेरे आँसुओं की ओस में
हज़ारों चन्द्रमा चमकते हैं
अनगिन टिमटिमाते हैं तारे
जलते बुझते हैं
जुगनू सारे के सारे


10.

फिर उसकी आवाज़
फैली कागज़ पर
आँसुओं की लकीरों-सी

फिर उसकी आवाज़ के
दाने-दाने में
कँपकँपायी कामना
ओस-बूँदों में आकाश-सी

फिर उसकी आवाज़ के बीच
लहराया सँकोच
साँझ की हवा-सा

कभी दीखता, कभी लोप होता
आँखों में झिलमिलाती
चाँदरात-सा

मालवा के बाज़बहादुर द्वारा चलाया गया चांदी का सिक्‍का. साभार - नेशनल म्‍यूजि़यम, दिल्‍ली.

11.

उसने कामना के चिकने फर्श पर
सँभल-सँभल कर पाँव रखे हैं

यह उपाय उसे फिसलने से
ज़रूर बचा लेगा पर
गीले फर्श पर उसके पाँवों के
निशानों को आने से कौन रोक सकेगा

गुनगुनाने से, कौन रोक सकेगा
उसका हाल बताने से ?


12.

आज फिर उसने
मेरा देखना नहीं देखा

आज फिर उसने
मुझे देखने नहीं दिया
अपना देखना जहाँ
दूधिया चाँदनी में नहाते वृक्ष से
उतरकर उसका बचपन
उसे अलविदा कह रहा है
जहाँ शीतल सरोवर उसके
उजले स्तनों को
पानी के दुपट्टे से ढँक रहा है

आज फिर उसने...


13.

उसकी लिखी हुर्इ
आवाज़ पर
उसकी पलकें
झुक आयी हैं

मनो घूँघट के पीछे
छिप गया हो
सारा का सारा गाँव।


14.

रेवा न सही
मेरे स्पर्श की नीरव नदी में
नहा कर वह किले की सीढि़याँ चढ़ती है
उसके पाँव की हर थाप के साथ
उसके आँचल से सरक कर
धरती पर मेरा स्पर्श टपकता है

कहीं दूर घोड़ों की टापों में
उलझी मेरी नियति में
रह-रह कर टीस उठती है


15.

लकीरें छूट गयी हैं
मेरे हाथों की
उसके काँपते वक्ष पर

जाने-अनजाने
बदल ली है अपनी भूमि
मेरे अनागत के मानचित्र ने

हाथों में सँभाले इस थरथराते शून्य को
मैं गुज़र रहा हैं
चक्रव्यूहों के पार
उसकी प्रतीक्षा में !

साभार - नेशनल म्‍यूजि़यम, दिल्‍ली.


16.

कामना के नुकीले पंजे रह-रह कर
नौंच लेते हैं मेरे सीने का गोश्त
हवा में घुली उसकी मुस्कान
पैनी चोंच-सी
मेरी आँखों को जख़्मी कर रही है
बाज़ की तरह मुझे उठा कर
यहाँ-वहाँ पटक देती है उसकी अनुपस्थिति

इस रणभूमि में मुझे मारने
भाला कोर्इ क्यों उठाये ?
तलवार की ज़रूरत किसे है ??


17.

एक नया दुख पुराने सारे दु:खों को
अपने पास खींचता है

एक विछोह सारे विछोहों को
जीवन्त कर देता है एक बार फिर

दिल पर लगे घाव मानो
चादर ओढ़े पड़े रहते हैं
ज़रा-सी आहट हुर्इ नहीं कि
उठकर बैठ जाते हैं सारे के सारे

डरो, मेरे मन, डरो।


18.

पास आती जा रही हैं
घोड़ों की टापें
वृक्षों की ओट में अचानक
चमक उठती है किसी तलवार की धार
कोर्इ दोगला दुश्मन को बता चुका है
मेरे छिपने का यह स्थान

पर मैं जानता हूँ
मुझे पूरी तरह खत्म
नहीं किया जा सकेगा कभी
मेरे कण-कण में बसा है
उसका लावण्य !


19.

पता नहीं मैं क्यों आया
बन्द दरवाज़ा खटखटाया
मुझे सचमुच पता नहीं था कि
मैं इतना सूनापन ले आँऊगा
उसके जीवन में


20.

उसके हाथ की मेंहदी में
समूचा बाग लहलहा रहा है
आम के बौरों की महक फैली है, कोयलें
गा रही हैं, रंगबिरंगी चिडि़याँ
फूलों पर मँडरा रही हैं

वहीं शहद तैयार हो रहा है, मुझ दूर बैठे का
सूनापन हर ओर फैल रहा है

उसके हाथ की मेंहदी में !

साभार - अशमोलियन म्‍यूजि़यम.


21.

पोथी में उलझकर रणभूमि तक चला आया
उसका यह बाल
आखिर सीधा खड़ा क्यों नहीं हो जाता
बंगाल की जादुर्इ रस्सी-सा कि मैं
उस पर चढ़कर देख सकता
कि वह महल की छत पर कहाँ
वीणा पर सिर धरे बैठी है
कि वह अन्त:पुर के किस कोने में पड़ी
अपने चेहरे के उतार-चढ़ाव पर
आँसुओं को बहने दे रही है

मेरे न चाहते भी
यह दूसरी रेवा
कैसे तुम्हारे करीब आ गयी, रूपमती !


22.


भरता नहीं कोर्इ भी घाव,
शरीर में ही कहीं
छिप जाता है

नया घाव आया नहीं कि
वह जहाँ भी छिपा होता है
वहीं धड़कने लगता है


23.

उसके पोर-पोर पर
कामना का कमल
उगा है

ओस बूँद अब गिरी
कि तब गिरी

देखो !
शान्त सरोवर में
आकाश झुका
चला आ रहा है।


24.

कैसा आनन्द है
इन रक्तरंजित तलवारों की छाया में भी
प्रियतमा है
प्रियतमा की याद है

चोटी से खेलती
रह-रहकर काँपती
उसकी अँगुलियाँ हैं
दूर कहीं
यहीं कहीं !


25.

कैसा आनन्द है
मैं कूद सकता हूँ
अश्‍व से भूमि पर

कैसा आनन्द है
मैं देख सकता हूँ
अन्त के क्षणों में
उलझा
उसका चेहरा

कैसा आनन्द है
रणघोषों के बीच
मैं सुन सकता हूँ
उसकी रियाज़ के टुकड़े

* * *



इन कविताओं की पीडीएफ़ पुस्तिका को आप इस लिंक से भी डाउनलोड कर सकते हैं. 


[ 1960 में जन्मे उदयन वाजपेयी हिंदी के जाने-माने कवि व कथाकार हैं। उनके दो कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह व एक निबंध संग्रह प्रकाषित हैं। फिल्मकार मणि कौल के साथ उनके संवाद की पुस्तक ‘अभेद आकाश‘ अत्यंत चर्चित रही। उनकी कविताओं के अनुवाद कई देशी-विदेशी ज़बानों में हो चुके हैं। साथ ही, दुनिया के कई काव्य समारोहों में उन्होंने शिरकत की है। 'सबद' पर उनकी अन्‍य कविताएं यहां पढ़ सकते हैं। ]

8 comments:

Kanchan Lata Jaiswal said...

मुझे नहीं उतरना है
उसकी आवाज़ की कन्दरा में
मुझे नहीं आता
कैसे मौन की लपटों में
झुलसने से बचा जाता है

मुझे नहीं आता
मुझे नहीं उतरना.........बेहतरीन.रचना..

Sarita Sharma said...

प्रेम का अदान- प्रदान चुप्पी और शब्दों के बिम्बों माध्यम से व्यक्त करती कविता.

Sudha Singh said...

behtreen ...

Vipin Choudhary said...

shandaar hamesha kee tarah

Nisha Pravaah said...

udayan sir, lambe samay baad aapka kuch dekha. dheron shubhkaamnayen

पारुल "पुखराज" said...

शानदार कविताएँ ...शुक्रिया अनुराग

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

' लावण्य ' -> नाम का प्रयोग पढ़ कर अचंभित हूँ !
उदयन जी की कविता पसंद आयीं
- लावण्या

Gajendra Patidar said...

कल्पना, बिम्ब और प्रतीक तीनों का सटीक मिश्रण. सौन्दर्य की सुन्दर रचनाए.