Wednesday, December 12, 2012

संजय कुंदन की पांच नई कविताएं




नाराज़ 
आदमी 

क्या कर सकता है अधिक से अधिक 
एक नाराज़ आदमी 
बहुत करेगा तो ओढ़ लेगा चुप्पी की चादर 
या बन जायेगा पत्थर 
दिखेगा एक बेडौल मूर्ति की तरह 

हालाँकि लाख कुरेदो वह नहीं बता पायेगा
कि वह किससे नाराज़ है
बहुत तंग करने पर कह देगा कि
वह ख़ुद से नाराज़ है
पर यह सही जवाब नहीं होगा
यही तो समस्या है कि
उसे कई चीज़ों का सही जवाब नहीं मिल पाता
वह हर चीज़ को उसकी सही जगह पर देखना चाहता है 

ख़ुद को भी
लेकिन सही जगह मिलना कहाँ
है आसान 

अपनी नाराज़गी के सूत्र खोजते हुए
अक्सर और उलझ जाता है नाराज़ आदमी 
फिर वह खुद को मनाना शुरू कर देता है
चेहरे पर पानी के छींटें मारता है
और मुस्कराने जैसा मुंह बनाता है 
वह तेज़ कदमों से लौटता है 
गौर से देखने पर पता चलता है कि 
उसकी मुट्ठी बंधी हुई है 

उसमें उसने बचाकर रख लिया होता है 
अपना थोड़ा गुस्सा।
***

डरते-डराते लोग 

जब उसने कहा कि उसका चश्मा बीस हजार का है 

तो उसका इरादा सामने वाले को डराने का था 
डराने के लिए ही एक आदमी ने यह सूचना दी कि 
अब उसका दूसरा बेटा भी विदेश जाने वाला है 
एक व्यक्ति ने अपने सूट के बारे में कहा कि 
यही कपड़ा अम्बानी भी इस्तेमाल करते हैं 

डरे हुए लोग एक-दूसरे को डराने में लगे थे

एक आदमी खतरनाक तरीके से 
हाथ मिलाये जा रहा था 
एक आदमी की विनम्रता थर्रा देने वाली थी 

जिनके पास डराने के लिए कुछ और नहीं था 
वह अफवाह से डराता था,
हालाँकि एक अफवाह फैलाने के बाद 
वह तेजी से घर भागता था 
और खिड़की-दरवाज़े बंद कर लेता था 
उसे लगता था कहीं सच न हो जाए उसका झूठ। 
***

महान न होने का सुख 

अच्छा हुआ महान नहीं हुए 

अगर होते तो ख़ुद को बड़ा 
दिखाने के लिए 
गर्दन ऊंची किये चलते 
पीड़ा सहते 

घर को ही मंच समझ बैठते 

दुत्कारे जाते 
अच्छा हुआ महान नहीं हुए 
होते तो चेले फंसाने में जुटे रहते 
प्रेमिकाओं की भीड़ जुटाने में हलकान होते 
पिटते  

दूसरे महानों से सींग लड़ाते 
घायल होते 
पर दर्द छिपाते 

आशीर्वाद लेने वालों की राह तकते रहते 
पालथी मारकर मूर्ति की तरह बैठ जाते 
आरती उतारे जाने की प्रतीक्षा करते रहते 

अच्छा हुआ महान नहीं हुए
***


होड़ में 

जब मैंने एक कविता लिखी 
तो एक कवि ने बताया कि 
वह काव्य-कला में मुझसे आगे है 
जब मैं बारिश में गुनगुना रहा था 
तो एक बगलगीर ने कहा कि 
उसका गला मुझसे ज़्यादा साफ़ है -

जो मिलता है वह यही साबित करने की कोशिश करता 
कि वह मुझसे आगे है 
यहाँ तक कि जब मैं अपने बरामदे की सफाई 
कर रहा था तो एक पड़ोसी ने कहा कि 
वह मुझसे ज़्यादा तेज़ झाडू चला सकता है- 

मैं समझ नहीं पाया कि कब 
कितनी कतारों में खड़ा कर दिया गया हूँ 

एक आदमी ने कहा कि वह खिलाड़ी है 
वह किसी की जेब में भी घुस सकता है,
एक शख्स ने दावा किया कि वह कलाकार है 
वह किसी को कबूतर की तरह 
सात समन्दर पार उड़ाकर भेज सकता है 

मैं तो अपने को साधारण इंसान मानता था 
और इसी में खुश था 
एक दिन मैंने अपने एक मित्र को 
यह बात बताई तो उसने झट कहा - 
मैं तुमसे ज़्यादा खुश हूँ 

यह कहकर वह जोर-जोर से हंसने लगा 

हा-हा ही-ही हो-हो हू-हू होय-होय 
उसे इस तरह हंसते देख 
मैं डर गया कि कहीं उसे दिल का दौरा न पड़ जाए। 
***

अधूरी कविता

एक अधूरी कविता मिटाई न जा सकी 
वह चलती रही मेरे साथ-साथ 
मैंने एक आवेदन लिखना चाहा 
वह आ खड़ी हुई और बोली - बना लो मुझे एक प्रार्थना 
एक दिन सबके सामने उसने कहा - मुझे प्रेमपत्र बनाकर देखो
मैं झेंप गया 

कई बार धमकाया उसे 
कि वह न पड़े मेरे मामले में 
और हो सके तो मुझे छोड़ दे 

एक दिन गर्मागर्म बहस में 
जब मेरे तर्क गिर रहे थे ज़मीन पर 
वह उतर आई मेरे पक्ष में 
पलट गई बाजी 
बगलें झाँकने लगे मेरे विरोधी 
जो इस समय के दिग्गज वक्ता थे।
***




[ संजय कुंदन की अन्य कविताएं सबद पर :  यहाँ .
तस्वीर : गूगल से.
]

14 comments:

वंदना शुक्ला said...

अच्छी कवितायेँ ...''डरते डराते लोग'' और ''नाराज़ आदमी'' विशेष अच्छी लगीं मज़ा आया पढकर ..शुक्रिया अनुराग

sarita sharma said...

संजय कुंदन की ये कवितायेँ खुद से और समाज से सरोकार रखती हैं.कवि ने सीधी सहज भाषा में नाराज व्यक्ति और अपने को औरों से बेहतर साबित करने वाले डरे हुए लोगों की मनोदशा का सटीक चित्रण किया है.महान न होना द्वंद्व है जिसमें महान लोगों के आभामंडल के प्रभावों से बचे रहने पर संतोष है मगर कहीं न् कहीं कचोट छिपी है.आज का युग होड में औरों को पछाडकर आगे बढ़ने का है.उसके लिए चाहे कोई भी साधन अपनाया जाये,अंतिम कविता में अधूरी कविता प्रेम और रचनामकता का प्रतीक है.

Ar Vind said...

antim kavita bahut prabhavi.sanjay kundan samkalin yatharth k achuk kavi hai.ve koi bhumika nahi gadhate.balki abhidha me sidhi sachchi bat bina lag lapet rakhate h. pratirodh se bhari aisi sadagiyan thoda kam dekhane me aa rhi hai.shukriya

MUKESH MISHRA said...

संजय कुंदन की कविताएँ ऐसी जगह अवस्थित करती हैं जहाँ 'घटना' से अधिक महत्व घटना से जुड़ी मानसिक प्रतिक्रियाओं का है । यहाँ भाषा बहुत सीधी और सरल है और वह कहीं भी अन्योक्ति का शिकार बनती नहीं महसूस होती है । वह एक हद तक बाहर का बखान करती है और उसी के साथ-साथ अपनी अन्तःक्रियाओं को जानने-समझने का पाठ भी प्रस्तुत करती है ।

Saras said...

कवितायेँ वाकई बहुत सुन्दर हैं ....संजयजी इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए शत शत बधाई ....बस यूहीं लिखते रहिये ....:)

विकास कुमार said...

कुंदन जी की पांचो कविताएं अच्छी हैं लेकिन मुझे 'नाराज़ आदमी’ कविता बहुत अच्छी लगी. बहुत -बहुत धन्यवाद कुंदन जी और अनुराग बाबू को.

shweta singh said...

naraaz aadmi hum sabka sach hai .aur dartey daratey log samaaz ka chehra.

संतोष त्रिवेदी said...

...बहुत उम्दा !

पारुल "पुखराज" said...

नाराज़ आदमी..behtreen lagi

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही रोचक कवितायें

Pranava Priyadarshee said...

badi sahaj aur sashakt kavitaayen hain kundan ji kee... behad prabhaai

Nirmala singh said...

Ati sundar yatharthaprerak bhaavpurna kavitaaye.........

Rukaiya said...

saral sahj bhasha me likhi behad sunder aur parbhavi kavitayen

Kamal Choudhary said...

Yaad rah jaane vaalee kavitain. Sanjay kundan jee badhai! Dhanyavaad anuraag jee. - Kamal jeet Choudhary ( j and k )