Thursday, November 15, 2012

जो उसे पढ़ सके, वह कवि जन्मे



कवि कह गया है : 8ओक्टावियो पाज़ 



एक कविता का अर्थ कवि क्या कहना चाहता था, उसमें नहीं, दरअसल कविता क्या कहती है, वहां मिलता है। 

रुदन और चुप्पी, अर्थ और निरर्थ के बीच कविता खड़ी होती है। शब्दों की यह दुबली धार क्या कहती है ? यह कहती है कि मैं कुछ भी ऐसा नहीं कह रही, जिसे पहले चुप्पी और हल्ले में नहीं कहा गया है। जब यह इतना कह देती है तो कोलाहल और ख़ामोशी ख़त्म हो जाती है। 

कविता अर्थ के खिलाफ एक अनवरत संघर्ष में शामिल रहती है। इसके दो छोर हैं : पहला, जहाँ वह हर मुमकिन अर्थ को घेरे रहती है, दूसरा, जहाँ वह भाषा को कोई अर्थ देने से ही मना कर देती है। मलार्मे पहले छोर पर हैं, दादा दूसरे। 

कविता अवर्णनीय होती है, अबोधगम्य नहीं। 

कविता को पढ़ना, आँखों से सुनना है। इसे सुनना, कानों से देखना।

हर पाठक एक अन्य कवि है। हर कविता एक इतर कविता। 

कविता पढ़ने वाले को उकसाए। उसे खुद को सुनने के लिए बाध्य करे। 

एक लेखक की नैतिकता, वह जिस विषय को लेकर चलता है या जिन तर्कों के सहारे अपनी बात कहता है,  उसमें न होकर, भाषा के साथ उसके बर्ताव में निहित होती है। 

कोई कवि नहीं हो सकता, यदि उसमें दी गई भाषा को नष्ट करने और एक नई भाषा गढ़ने का प्रलोभन न हो। 

कविता में निपुणता, नैतिकता का दूसरा नाम है। यह निरे शब्द-चातुर्य से नहीं, लालसा और तपश्चर्या से आती है। 

एक फ़र्ज़ी कवि अपने बारे में बात करता है। प्रायः दूसरों का नाम लेकर भी अपने बारे में ही बोलता है। एक सच्चा कवि खुद से बातें करते हुए दूसरों से मुखातिब रहता है। 

एक कोरा या विराम-चिह्नों से अटा सफ़ा बिन चिड़िया का पिंजरा है। एक सच्ची खुली रचना दरवाज़े बंद  करती है। पाठक इसे खोल कर, उस चिड़िया, यानी कविता को उसका आकाश देता है।

बंद या खुली, हर कविता की यह मनौती होती है कि उसे संपन्न करने वाला कवि न बचे। जो उसे पढ़ सके, वह कवि जन्मे।    

एक कविता की अमरता में यक़ीन, भाषा की अमरता में यक़ीन करने जैसा होगा। ऐसे यक़ीन से बेहतर यह होगा कि हम साक्ष्यों से सीख लें। साक्ष्य कहता है कि भाषाएँ बनती और बिला जाती हैं। हर अर्थ एक दिन निरर्थ हो जायेगा। 
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[ पाज़ के कविता-सम्बन्धी इन विचारों को उनकी पुस्तक '' अल्टरनेटिंग करंट '' से अनूदित किया गया है। ] 

12 comments:

sarita sharma said...

कविता और कवि के समक्ष आने वाली चुनौतियों के बारे में चिंतन करने वाले महत्वपूर्ण उद्धरण .अच्छा कवि होने के लिए बड़बोलेपन और घिसी पिटी अभिव्यक्ति से बचकर शांत समंदर सी गहराई होनी चाहिए.

neel said...

'कविता अर्थ के खिलाफ एक अनवरत संघर्ष में शामिल रहती है।
हर पाठक एक अन्य कवि है। हर कविता एक इतर कविता।
हर अर्थ एक दिन निरर्थ हो जायेगा।'
सुन्दर है. बहुत.

Shailendra singh Rathore said...

यहाँ हर एक पंक्ति एक कविता है। ....'हर पाठक एक अन्य कवि है। हर कविता एक इतर कविता।' .............ऐसा ही कुछ एक फिल्म में एक युवक पाब्लो नेरुदा से कहता है-कविता कवि की नही अपितु उस की होती है,जिसे उसकी जरूरत होती है।

प्रवीण पाण्डेय said...

मन की कह दे, वह कविता है,
सब की कह दे, वह कविता है,
निकसे कुछ कुछ अलसायी सी,
अपने में ही सकुचायी सी,
शब्द थाप बन आप खनकती,
रस सी ढलके, वह कविता है।

vipin choudhary said...


बंद या खुली, हर कविता की यह मनौती होती है कि उसे संपन्न करने वाला कवि न बचे। जो उसे पढ़ सके, वह कवि जन्मे।
इस पंक्ति को कोई सार्थक कवि ही कह सकता है

neelotpal said...

कविता के बारे में बेहद मानीखेज विचार.
शुक्रिया सबद, शुक्रिया अनुराग जी.

अंशुमाली रस्तोगी said...

शानदार...

आवेश said...

गजब

Padm Singh said...

कितनी गहरी बातें

rahul singh said...

बेहद अर्थपूर्ण अंश .कविता, कवि , कव्यालोचक और पाठक सबके लिए अर्थपूर्ण संकेतों से भरी पंक्तियाँ .उपलब्ध करने के लिए आभार शब्द छोटा है फिर भी .

Geet Chaturvedi said...

यह पास की बहुत सुंदर किताब है. इसकी हर पंक्ति एक काव्‍यसूत्र है. अनुवाद भी बहुत अच्‍छा किया है.

AK said...

it is reading so well Anurag that I'm sure Paz would be flattered with the translation. Well done.