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दो नई कविताएं : कुंवर नारायण




पवित्रता

कुछ शब्द हैं जो अपमानित होने पर
स्वयं ही जीवन और भाषा से
बाहर चले जाते हैं

'पवित्रता' ऐसा ही एक शब्द है
जो अब व्यवहार में नहीं,
उसकी जाति के शब्द
अब  ढूंढें नहीं मिलते
हवा, पानी, मिट्टी तक में

ऐसा कोई जीता जागता उदहारण
दिखाई नहीं देता आजकल
जो सिद्ध और प्रमाणित कर सके
उस शब्द की शत-प्रतिशत शुद्धता को !

ऐसा ही एक शब्द था 'शांति'.
अब विलिप्त हो चुका उसका वंश ;
कहीं नहीं दिखाई देती वह --
न आदमी के अन्दर न बाहर !
कहते हैं मृत्यु के बाद वह मिलती है
मुझे शक है --
हर ऐसी चीज़ पर
जो मृत्यु के बाद मिलती है...

शायद 'प्रेम' भी ऐसा ही एक शब्द है, जिसकी अब
यादें भर बची हैं कविता की भाषा में...

ज़िन्दगी से पलायन करते जा रहे हैं
ऐसे तमाम तिरस्कृत शब्द
जो कभी उसका गौरव थे.

वे कहाँ चले जाते हैं
हमारे जीवन को छोड़ने के बाद?

शायद वे एकांतवासी हो जाते हैं
और अपने को इतना अकेला कर लेते हैं
कि फिर उन तक कोई भाषा पहुँच नहीं पाती.
****


जंगली गुलाब

नहीं चाहिए मुझे
क़ीमती फूलदानों का जीवन

मुझे अपनी तरह
खिलने और मुरझाने दो
मुझे मेरे जंगल और वीराने दो

मत अलग करो मुझे
मेरे दरख़्त से
वह मेरा घर है
उसे मुझे अपनी तरह सजाने दो,
उसके नीचे मुझे
पंखुरियों की शैय्या बिछाने दो

नहीं चाहिए मुझे किसी की दया
न किसी की निर्दयता
मुझे काट छांट कर
सभ्य मत बनाओ

मुझे समझने की कोशिश मत करो
केवल सुरभि और रंगों से बना
मैं एक बहुत नाजुक ख्वाब हूँ
काँटों में पला
मैं एक जंगली गुलाब हूँ
****
[ कुंवर जी की अन्य रचनाएं  यहाँ ]

Comments

बेहतरीन कवितायेँ!
sarita sharma said…
पवित्रता,शांति और प्रेम जैसे शब्दों के लुप्त हो जाने को स्वीकार करने के बावजूद कवि अपनी पहचान नाजुक ख्वाब और जंगली गुलाब की तरह बनाये रखना चाहता है।मूल्यों के ह्रास की ओर ध्यान दिलाने वाली और संवेदनशीलता को जिन्दा रखने की जद्दोजहद को दर्शाने वाली नाजुक कवितायेँ।
MUKESH MISHRA said…
कुंवर नारायण जी की यह कविताएँ वास्तव में जीवन के प्रति अनुराग की अभिव्यक्ति हैं । वेदना का अहसास भी अंततः जीवन की ही अनुभूति है, इसलिए यह अस्वाभाविक नहीं लगता कि उसका प्रकटीकरण कुंवर नारायण जी की कविता में न केवल जिजीविषा का ही एक प्रकार है बल्कि उसे एक सार्थकता भी देता है ।
vandana said…
पहली कविता सवाल करती है। दूसरी में समाधान छुपा है एक साथ पढ़ने पर महसूस हुआ .... सुन्दर
AK said…
bahut khoobsoorat, khaas taur par pehli wali
neelotpal said…
"शायद 'प्रेम' भी ऐसा ही एक शब्द है, जिसकी अब
यादें भर बची हैं कविता की भाषा में..."

जीवन भी ऐसी ही परतों में छिपा है. कविता का उत्खनन तमाम स्मृतियों को एक निहायत बारीक संवेदना में खंगालना हैं. इस तरह की कविता कुंवर जी के अनुभवों का सम्पुजन हैं.
''आज भी उसकी ऑंखें तुम्हे/एक नींद की तरह सोती /एक स्वप्न की तरह देखतीं /एक याद की तरह जीती हुई रातों का /वह अंतराल हैं /जो कभी नहीं भर पाता /(कुंवर नारायण)......बहुत अच्छी कवितायेँ ....शुक्रिया सबद
vipin choudhary said…
कवि भविष्य की पदचाप को सुन लेता है तभी लिखता है
'शायद 'प्रेम' भी ऐसा ही एक शब्द है, जिसकी अब
यादें भर बची हैं कविता की भाषा में...'
इस सूरत में दुनिया कैसी होगी यह अनुमान लगाना कठिन हैं
shridhar said…
अनुराग भाई शुक्रिया आपका .. घर कितना उदास होता है जब बेटी उसे छोडकर जाती है ...और शब्दो कि बात भी इस से अलग नही ...लेकीन छोड ना तो पडता है .. एक दुख भरी चुप्पी बचती है बस...!!..जैसा कुंवर जी देख रहे है .बहुत अच्छी कविता .....और दुसरी कविता ....जीवन का कोई मौलिक टुकडा बचाने कि उनकी आकांक्षा बहते पाणी मे डूबते आदमी के लिये लकडी जैसी लगती है .... हर आदमी कुंवर जी के गुलाब मे अपना अस्तित्व खोजता है...!!
Arti Varma said…
Dono hi kavitayein bahut achhi hai..khaas taur par mujhe dusri kavita behad pasand aayi..
Anurag shukriya..
Punj Prakash said…
सुन्दर कविताएँ .
वे कहाँ चले जाते हैं
हमारे जीवन को छोड़ने के बाद?

सर्वदा अनुतरित ,जो एक समय था,वो कहाँ चला जाता है,क्या संभव है होना हर समय अस्तित्ववान हुए बिना ....सब कुछ एक बार है -संपूर्ण,था और होगा-ये वे आँखें हैं जिनसे वो स्थिर रखता है 'स्पेस ' को।
Reenu Talwar said…
Behad sundar kavitayen. Kunwar ji ki adhiktar kavitayen pasand hai mujhe. Aur jangli gulab ne man moh liya.
Mita Das said…
kuvanr narayan ki kavitayen apane aap me classic garhati hain.....achhi kavitayen......thodi darshanik kavitayen hain....
Rukaiya said…
दोनों ही कविताएँ बेहतरीन और लाजवाब .... जो बहुत गहरे तक पढने वालों पे अपना असर छोड़ जाती है ..

जब भी इस ब्लॉग पर कुंवर नारायण जी की पोस्ट पढ़ी है उनकी लेखनी से लगाव और बढ़ता गया है


शुक्रिया अनुराग .. फिर से एक बेहतरीन पोस्ट से रूबरू करवाने का
आकांक्षा पाण्डेय said…
जंगली गुलाब
और पहली कविता
दोनों अच्छी है
पर पहली कविता के कंटेंट से मेरी सहमती नही है
कवि ने बहुत निराशा में रचा होगा .
निराशा
और निराशावादी होना
मै गलत नही मानती
लेकिन उस निराशा में जिसे उन्होंने यूनिवर्सल सच मान लिया है उससे मेरी असहमति है.
Ar Vind said…
ek bade kavi koi isliye hi hota h q k unka anubhav aur vichar virat phalak ka hota hai.shshwat naye kathan yahi se aate hai.jo manav sabhayat k ang bn jate h, chahe vah koi samay q na ho.hamar vakt k priy kavi kunwarnarayan ko padhate hue hamesha yahi lgata hai.
Ajit Harshe said…
अद्भुत कविता। मगर सिर्फ 'पवित्रता, शांति और प्रेम' ही नहीं, ऐसे हजारों शब्द हैं जिन्होंने अपना अर्थ खो दिया है या कम से कम, उनका अवमूल्यन हो गया है, जो बहुत भोथरा अर्थ देते हैं। शायद यह भी कि शब्दों ने अपने अर्थों का विस्तार कर लिया है।
vartman samajik aur manavik paristhitiyo par kiya gaya behtreen kataksh hai ye kavita.
कंजूसी से कविता छपाने वाले कुँवर नारायण की दोनों नई कविताऍं पढने को मिलीं: पवित्रता व जंगली गुलाब। जंगली गुलाब पर लिखते हुए यह कहना कि मुझे अपनी तरह खिलने और मुरझाने दो/मुझे मेरे जंगल और वीराने दो जैसे आदिवासियों की पीड़ा को कहने का नया सलीका हो।
Amar Singh Amar said…
शुक्रिया सर

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