Friday, November 02, 2012

महेश वर्मा की नई कविताएं



Marc Chagall
प्रेमी ज़मीन से

प्रेमी ज़मीन से कुछ भी उठा सकते हैं, एक बटन,
कंघी का टुकड़ा या चमकीली पन्नी. अचेतन में
वे इन सबके गैर पारंपरिक उपयोगों के बारे में सोचते हों.

वे उठा सकते हैं एक टूटी हुई सीप का टुकड़ा और समुद्र
एक टुकड़ा उनकी उँगलियों के बीच आ जाता है उनकी उदास
आँखों में हैरत से देखता.

चूड़ी का एक टुकड़ा उठाते वे वास्तव में इन्द्रधनुष
का लाल रंग ज़मीन से उठा रहे थे कि आज
दोपहर भी सर्वांग सुन्दर दिखाई पड़े आकाश का इन्द्रधनुष .

एक रंगीन कागज उनकी उँगलियों के बीच कभी जानवर कभी
बन्दूक कभी नाव बनता, फिर कागज हो जाता किसी को मालूम नहीं
यह खेल ही बना रहा आकाश , जल और भविष्य इस संसार का .

इसी धूल से उन्हें बनाना है भविष्य के पर्वतों का शिल्प
धूल जो उड़ा कर देख रहे हैं हवा का रुख इतनी देर से.

धातु का एक अमूर्त टुकड़ा ज़मीन से उठाएंगे एक रोज
और किसी के हाथ देकर थमा देंगे सम्राट होने का अभिशाप .
***

हमारे कवि

क्या कर रहे हैं
क्या उन्होंने लिख लिया यह अँधेरा
जो हमारे भी बीच फैला है .

उन्होंने आँखें ढांप तो नहीं ली थीं हाथ से
जब आया था प्रकाश .

वे लिख पाए क्या धूप से भी सुन्दर हंसी
जो फ़ैली हुई थी आकाश पर. उस समय वे
धरती की भीतरी तहों को तो नहीं सोचते थे .

क्या वे लिख पाए दुःख
जो अब भी आंतरिक से अधिक वाह्य बचे हुए हैं चारों ओर
ठोस शारीरिक दुःख जो छूकर
देखने की ज़द में हैं- जैसे अपने ही माथे का खुला घाव .

अभी इस वक्त जब
हौले-हौले हिल रही है रात

कवि क्या कर रहे हैं .
***

सम्पूर्ण जलमंडल को मथते हुए

नदी कोई नहीं हमारे शहर में
शायद इसीलिये नहीं कोई नाविक .

थोड़ी दूर पर जो नदियाँ हैं
इतनी वे चौड़ी नहीं कि चलाई जा सके नाव .
बच्चों की नाव के लिहाज़ से थोड़ा तेज
इनका बहना, ठुनकना.

यात्रा में कहीं जाते ट्रेन पर अचानक
कोई नदी आ जाए कि पुल की गडगडाहट से ही जागे थे,
यहीं दिखाई पड़ते हैं : नाविक और नाव.

दूर से नाव का चलना नहीं दीखता
नाविक की देह का आलोडन बस दिखाई देता है.
( कि अकेले
अपनी डान्ड चला रहा है )
***

प्रतिदिन

यातना उसके चेहरे से पुंछी नहीं है, सोती हुई
स्त्री के सपनों में आगामी यातनाओं के चलचित्र हैं
पीठ की ओर पुरुष पराजय
ओढकर लेटा है अपने सीने तक.

कहीं बाहर से आता है वह प्रकाश
जो एक दायरा बनाता है इसी स्त्री पीठ पर.

पुरुष हर रात यह जादू देखता है अपने स्पर्श में

दो उजले पंख,
कंधे और पीठ के बीच की सुन्दर जगह से बाहर आते इस प्रकट संसार में.
ठीक बगल में जो सो रही है स्त्री यह उसी के बारे में है .

पुरुष बाहर प्रकाश देखता है जो यह दायरा बनाता है . अब तो अभ्यास से
भी यह जानता है कि ऐसा करते ही गायब हो जायेंगे
हौले से छूता है सफ़ेद पंख .

करवट बदल कर
स्त्री अन्धकार की ओर अपनी पीठ कर लेती है.
***

[ महेश की अन्य कविताएं यहाँ.  ]  

7 comments:

Reenu Talwar said...

"दूर से नाव का चलना नहीं दीखता"
"करवट बदल कर
स्त्री अन्धकार की ओर अपनी पीठ कर लेती है."
"उन्होंने आँखें ढांप तो नहीं ली थीं हाथ से
जब आया था प्रकाश ."

बहुत सुन्दर समवेदन्शील कवितएं...

सुधांशु said...

Achhi lagi kavitayen...

शिरीष कुमार मौर्य said...

महेश के पास अपना बिलकुल अलग लहजा है जो हमेशा कारगर साबित हुआ है और आश्‍वस्‍त करता है... कहने की ज़रूरत नहीं कि वे जीवन और कलाओं के कई आयामों में सक्रिय कवि हैं। मुझे उनके संग्रह का इंतज़ार है। उन तक मेरी शुभकामना पहुंचे...

सबद का शुक्रिया।

Vipin Choudhary said...

mere sabse priy kaviyon me se ek
mahesh jee
shukaiya shabd
pahlee do kavitayen to bemisaaal hain

सिद्धान्त said...

ये एक विराट और लगभग दूर छिटकते कैनन की कविताएँ हैं. कविताओं के चप्पे-चप्पे पर क्षेत्रीयता और समय चिपके हुए हैं. मुझे बड़ा अच्छा लगा इन्हें पढ़कर.

Amrita Tanmay said...

एक लम्बी आह को आमन्त्रित करती कवितायें..

kumar anupam said...

महेश भाई का लबो-लहज़ा नितांत नया है, बहुत पुख्ता, सधी भाषा और कथन महेश वर्मा को महत्तवपूर्ण कवि बनाती है। उनसे हमें ऐसी ही रचनात्मकता की बेहद उम्मीद है।