Friday, October 26, 2012

अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविताएं

 

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दोपहर


मंच पर इधर से उधर
खिलखिलाता
दौड़ता हैं किशोर अभिनेत्रियों का झुंड
दोपहर दो का टाइम, देर है छः वाले
शो में
रिक्त है रंगशाला
सूख रही हैं कुर्सियों पर हैंडलूम की साड़ियाँ
डोल रहे कानों में भारी-भारी कुंडल
अरुण हैं ऊपर तक कान

एक की तो आँखें तक भर गई
हाय वह सुन्दर कर्ण-स्पर्शी नयन
कितने अरुण हो गए हैं।

कोई उतार दो उसके कर्णफूल
खोंस दो उनके बजाय कोई शिरीष का फूल
या मोगरा या चमेली और कुच्छ नहीं तो
आम्रमंजरी ही सही
अच्छा ऐसा करो खोंस दो वह मोरपंख
जल में डोब कर
तब थोड़े बड़े हो जायेंगे कर्ण छेद

लो आ गए निर्देशक जी, मच गई
हड़बड़ी, पच्चीस-छब्बीस बरस के युवा हैं
पर बहुत समझ है उन्हें रंगकला की

देखो कैसा अरुणाभ हो गया
उस अभिनेत्री का मुख जैसे कामदेव
रगड़ गए कपोल पर कुंकुम

बार-बार मूँचती नयन, फिर
खोलती है आधे-आधे
आप ही आप नाचते हैं निर्लज्ज
इन नयन संदूकों में बंद दो खोटे सिक्के

निर्देशक जी तो मग्न हैं पढ़ने
वसंतसेना का संवाद
विचित्र रंगशाला है भई

कौन है वसंतसेना और कौन-कौन पढ़ रहा
है उसका संवाद
और किसके मुख पर फूल आये हैं
कचनार के कुसुम, सुन कर मेघों का
गहन, गंभीर गुरु गर्जन

आवरण, कुर्सियों के कवर, मुख, अधर, कान
औढ़नियाँ, कंगन सब अरुण ही अरुण हैं यहाँ
जैसे पूरी रंगशाला किसी ने
निकाली हो डोब कर आलते की कटोरी से

जैसे जीवन हो, सच्च
रंगशाला बंधु जीवन ही है
यह मैं नहीं, कह गए हैं बड़े-बड़े कवि भी

और सुनो तुम क्या कोई विदूषक
हो भगवान
अहर्निश चतुर्याम रचते
रहते हो एक से बढ़कर एक हास्य के
ड्रामे ।
****

अभय होकर निभाई प्रीति

धजी धरी अर्थी के ऊपर दिखा
उसका मुख
शताब्दियों प्राचीन चंद्रमा सा नूतन।

मुझे क्षमा करना
कि चूका नहीं आँख ल़ड़ाने से
शव के ऊपर भी।

किंतु मैं क्या करता
मैं हाड़-चामर का चीकट जीव
मुझे गिरते कितनी अबेर लगती महाराज।

जबकि मेरे कंधे छिल चुके है अरथी ढोते ढोते
मेरे फेफड़ों में भरी है चिंरायध।
मेरे दुःख आधे भसम शव से दीठ है।

तब भी मैं नहीं साध पाया संयम
डोल गया कूप में डुलते डोल सरीखा

काँटे कँाटे उठते हैं शरीर में
जब भी कहता हूँ अपनी यह कथा

शव का मैंने किया बिस्तरा
चिता बनाई खाट
श्मशान मेरी हुई गृहस्थी
हुआ कपाल जल का लोटा

और ऐसे दसों दिसों से
काल से घिरकर
मैंने किया प्रेम 

मैं डरा नहीं प्रभु
और मैंने अभय होकर निभाई प्रीति।
****

[ [ अम्बर की अन्य कविताओं के लिए यहाँ आयें.
साथ में दी गई चित-कृति
फ्रीदा कालो की  है . ]

5 comments:

MUKESH MISHRA said...

अम्बर रंजना पाण्डेय की यह कविताएँ अपने लहजे के कारण हमें अपनी नियति के सम्मुख खड़ा कर देती हैं | जब द्धैध, संशय, अनास्था और आधुनिक जीवन की अर्थहीनता से गुजर कर कविता अपनी आस्था अर्जित करती भी है तो वह किसी पूर्वप्रदत्त आस्था की तरह मासूम नहीं रह पाती - वह एक आधुनिक मनुष्य के संशय से ग्रस्त रहती ही है |

पारुल "पुखराज" said...

दूसरी तो अद्धभुत है ..

Ashutosh Dubey said...

बिल्कुल अलग रंगत की कविताएं. नज़र रखना चाहिए इन पर. हालांकि यह कवि कुछ नटखट किस्म का प्रतीत होता है, इसकी कविताएं कई बार सुखद विस्मय से भर देती हैं.

Vipin Choudhary said...

azab, gazab aur nirali kavitayen dhanya ho maharaz

Half-baked Pumpkin said...

Umber Ranjana Pandey,

I have no small/big words to lavish any praise upon your verse, just wanted to say that I am glad to read your poetry always.......