Sunday, October 07, 2012

विष्णु खरे की नई कविता

      

 तीन पत्ती /पत्ते उर्फ़  फ्लश /फलास  खेलने  में  बरती  जानेवालीं  एहतियात

                                                                 
                                                                          विष्णु खरे


कमाई के लिए मत खेलो
दूसरे खेलें तो खेलने दो

अपनी पूरी छोटी-सी पूँजी के साथ मत जाओ
कुछ कमरे पर छोड़ जाओ कुछ ले जाओ

जिस जगह नाल कटती हो वहाँ मत खेलो
हाँ अगर आखीर में
स्टेशन पर बड़ी फ़जर गरम चाय-समोसे के लिए
कुछ पैसे जमा होते हों तो कोई हर्ज़ नहीं

न तो नशे में जाओ
न खेलते वक़्त नशा करो
खेल के फ़ौरन बाद भी नहीं

जहाँ तक मुमकिन हो दोस्तों के साथ खेलो
हालाँकि इस खेल में दोस्तों-अज़ीज़ों का भी कोई एतबार नहीं
ओछों हलकटों नीम-गुंडों को हँकाल दो
नाबालिगों बालिशों को न बैठने दो
निठल्लों तमाशबीनों को बाहर रखो
प्यारे लफंगों को ज़रूर बुलाओ
अजनबियों के साथ खेलने में कोई हर्ज़ नहीं
दो-तीन दौरों के बाद वे समझ में आने लगेंगे
बहुत चुप या बहुत बोलनेवालों से होशियार रहो
औरतों और बच्चों वाली जगह पर कभी न बैठो

तवज्जो दो कि पत्ते
बहुत रफ़्तार से बँट रहे हैं या सुस्ती से
उन्हें गिनो कि चार न आ गए हों
एक सलीक़े से पकड़ो उन्हें
और गौर से पूरे देखो
ख़ासकर चिड़ी और कालेपान को और उसकी बेगम को
खेलने के ड्रामाई ढर्रे से बचो
श्री चार सौ बीस से किसी को कुछ हासिल नहीं होता
संजीदगी से खेलने का
अपना तरीक़ा ख़ुद ईजाद करो

सुनो कि क्या कहा जा रहा है
देखो कि कौन सी हरकतें बार-बार हो रही हैं
बहुत बारीक़ मिलीभगतें भी चलती हैं इस खेल में
दोस्तियों-अदावतों के नाटक होते हैं

पहले से दर्याफ़्त कर  लो
कि सादा एक-दो-तीन बड़ा होता है या इक्का-बाश्शा-मेम
और कहीं दो-तीन-पाँच को भी रन तो नहीं मानते
ट्रेल के बाद की रस्में क्या होती हैं
तीन इक्कों पर भी शो करा सकते हैं या नहीं
क्या कभी जोकर भी शामिल कर लिए जाते हैं
जहाँ शक़ हो पहले से पूछ लो
पत्ते देखने के बाद सिर्फ चाल ही चलनी होती है
हर फड़ के अपने टोटके होते हैं

भूलो मत कि तीन इक्कों के सिवाय
किन्हीं भी पत्तों का
अपने-आप में कोई मतलब नहीं होता
वे दूसरों के हाथ के मुक़ाबले ही छोटे-बड़े साबित होते हैं
और तीन इक्के तो कभी-कभी बैठक-दर-बैठक किसी को नहीं आते

पत्ते फेंक देनेवालों से कहो कि वे बीच में
न तो बताएँ न दिखाएँ
कि उन्होंने क्या पैक किया है
बीच में बार-बार बाज़ी छोड़ कर जानेवालों से भी आगाह रहो

गड्डी को हर कुछ दौरों बाद बदलवाओ
नई आने दो
वह पिछली से मिलती-जुलती न हो
बीच-बीच में पूरे बावन गिनवाते रहो
पत्ते सिर्फ लगाए नहीं जाते छिपाए बदले और चुराए भी जाते हैं
हर चाल पर हर हाल में
एक लापरवाह चौकस निगाह रखनी पड़ती है

न अपने पत्ते दिखाओ न दूसरों के देखो
तीन इक्कों की मजबूरी के सिवा उधार माँग कर मत खेलो
वैसे इस खेल में उधार मिलता भी कम है
या तो पत्ते डाल दो
या वक़्त रहते शो करा लो

चंद दौरों बाद कट फ़ॉर सीट करो
हर खेल में जगहें बदलती हैं

सही है कि असल लुत्फ़ ब्लाइंड खेलने में है
चाहो तो दो-तीन बार कवर भी करो
लेकिन सामने वाले ने अगर बीच में पत्ते उठा लिए हों
और चाल-पर-चाल दे रहा हो
तो एकतरफ़ा ज़िद बेमानी है तुम भी देख लो

लेकिन दो की लगातार चालों के बीच
वे ब्लाइंड हों या खुली
तीसरे तुम मत फँसो
वह अक़सर एक फंदा होता है
गिरीश और भैयालाल को याद रखो
वे तुम्हारे दोस्त ही तो थे

कोशिश करो कि बोट एक रुपए से ज़्यादा की न हो
तुम जुआरी नहीं हो यह तुम्हारा शग़ल है
खेल को लत मत बनाओ
लालच  टुच्चई बदी से बचो
खेलो और खेल और खिलाड़ियों से
लगाव-भरी दूरी भी बनाए रखो
कुछ को तुम्हारा खेल अच्छा लगेगा कुछ को रास नहीं आएगा
उससे क्या


पहले से नहीं कह दिया हो
कि कितनी देर खेलोगे
तो जीतते भी रहो लेकिन उठना ही पड़े
तो साफ़ कह दो कि ये आख़िरी बाज़ियाँ हैं
जिसे जीतना हो जीत ले
हारते हो तो बिना उधार लिए
बचे तो कुछ जेब में बचाकर निकल जाओ
न जीतते वक़्त पत्तों से ज़िद करो न हारते वक़्त

दो-तीन दफ़ा किसी वजह से न लौट सको
और किसी दर्दी का फोन आए
कि भाईजान कुछ गुस्ताख़ी हो गयी क्या
या कोई और दिक्क़त हो तो बताइए
आपके बिना खेल में वो जान ही नहीं आती
तो चले ही जाओ आख़िरकार
क्या तुम्हें भी अच्छा नहीं लगता
वह पत्तों का फिंटना बँटना उठना देखा जाना
ईंट लालपान चिड़ी कालेपान के मुख्तलिफ़ छापे
इक्का बाश्शा बेगम ग़ुलाम जोकरों के हर बार अलग चेहरे
जैसे किसी आश्चर्यलोक से
उनकी गंध उनकी छुअन
जो उँगलियों के पसीने और पकड़ से बासी होती जाती हैं
आसपास चेहरे पढ़ना चालें देखना
वह उम्मीद वह मायूसी वह दोस्ती वह तनातनी वह ख़ुशी वह पछतावा
वह जीतने का अफ़सोस वह हारने का लुत्फ़
जो मामूली-सी रक़म बीच में पड़ी है सब उससे कहीं ज़्यादा
***

11 comments:

naveen kumar naithani said...

पत्ते देखने के बाद सिर्फ चाल ही चलनी होती है
हर फड़ के अपने टोटके होते हैं

...और इस जिन्दगी का क्या करें जहां ब्लाइण्ड की गुंजाइश नहीं और अपने पत्ते भी कहां ठीक दिखायी पडते हैं?विष्णु खरे की कविताओं को सलाम...

vipin choudhary said...


"तुम जुआरी नहीं हो यह तुम्हारा शग़ल है
खेल को लत मत बनाओ"
शानदार कविता है और अनोखी भी

sarita sharma said...

खेल यहाँ जिंदगी को जीने के ढंग की तरफ इशारा करता है जिसमें लगातार आगे बढते हुए भी चौकन्ने और सतर्क रहना होता है कि कहीं कोई हमें धोखा तो नहीं दे रहा है.कविता में हर रिश्ते और पैंतरे की गहनता से पड़ताल की गयी है.

शिरीष कुमार मौर्य said...

शुक्रिया अनुराग....कितने दिनों बाद वाकई एक कविता पढ़ी...जीवन की समझ देती हुई।

Anirudh Umat said...

vishnu ji mere priya or saman niya kavi h. unki ye kavita padh jyada achha laga...bajaye un baato ke jo unke naam se hoti h.
bahut vistar me padtaal karti kavita...apne anibhav ka kavita me sadhaav. bahut sare sanket apni mukhrta me ye kavita jahir krti h.
ek badaa kavi nirmam hota h...sub ka priya bhi nahi. aasha h unka vivadi vyaktitva unke kavi ko nuksan nahi pahunchayega.

Pratibha Katiyar said...

सुन्दर!

Ashutosh Dubey said...

खेलो और खेल और खिलाड़ियों से/ लगाव-भरी दूरी भी बनाए रखो/कुछ को तुम्हारा खेल अच्छा लगेगा कुछ को रास नहीं आएगा/ उससे क्या...

सही है- उससे क्या...

Vishnu Khare said...


मित्रो,

दुर्भाग्यवश मेरे पास आप सब के ईमेल पते नहीं हैं,वर्ना अलग-अलग पत्र लिख कर आपकी हौसलाअफ्ज़ा टिप्पणियों के लिए धन्यवाद देता.

फिर भी,बहुत आभार.

विष्णु खरे

Tushar Dhawal Singh said...

मेरी जानकारी में हिंदी कविता में ताश के पत्तों और उसके खेल का इतना बारीक और व्यापक ब्यौरा इससे पहले कहीं नहीं मिलता है. ये ब्यौरे ये तफसील सिर्फ पत्तों के खेल के नहीं हैं इनमें जीवन के खुरदुरे द्वंद्व की तफसील है , conflict of interest और उससे उपजे समीकरणों को साधने का एक दार्शनिक ब्यौरा भी है. आजकल चल रही फ्रेम बद्ध विमर्श जन्य कविताओं के बीच किसी वरिष्ठ की ऐसी कविता ना केवल आश्वस्त करती हैं वरन देखने सोचनेऔर लिखने के नये झरोखे भी खोलती है. ऐसी तफसीलें विष्णु जी की कई कविताओं में अलग अलग ढंग से आती रही हैं और मेरी नज़र में यह उनकी कवितायी की एक बड़ी ताक़त भी है.
तुषार धवल


Geet Chaturvedi said...

बहुत सुंदर कविता है. बहुत समय तक साथ रहेगी यह कविता.

विष्णु खरे said...

अपने कुछ बहुत प्रिय युवा कवियों की राय मेरे लिए हमेशा मूल्यवान और सांत्वनादायक होती है.आशुतोष दुबे की नई कविताएँ क्या मुझसे ही छूट गईं या इधर अर्से से नहीं आईं ? और नया संग्रह कोई ?

आप लोगों ने लक्ष्य किया होगा कि इस कविता में
तीन "हरकतें" की गयी हैं.

सत्ताईसवीं पंक्ति "खासकर चिड़ी और कालेपान को और उसकी बेगम को" में इशारा अलेक्सांद्र पूश्किन की लोमहर्षक रहस्य-कथा की ओर है जिसका अन्ग्रेज़ी अनुवाद में शीर्षक 'द क्वीन ऑफ़ स्पेड्स'है.

उन्तीसवीं पंक्ति "श्री चार सौ बीस से किसी को कुछ हासिल नहीं होता" में राज कपूर-ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म का हवाला है जिसमें नायक "राज" मुम्बई में सड़क पर पत्ते लगाने वाले मवालियों से ठगा जाता है और फिर खुद वह हुनर सीख कर तीन पत्ती के सहारे करोड़पतियों के गिरोह की धोखाधड़ी में दाखिल हो जाता है.

एक सौ पांचवीं पंक्ति में सन्दर्भ लेविस कैरोल की महान कृति "एलिस इन वंडरलैंड" का है जो शायद विश्व की पहली पुस्तक है जिसमें ताश के पत्तों का अद्भुत,आश्चर्यजनक,जीवंत इस्तेमाल किया गया है.

फ़क़त.

विष्णु खरे