मैं इच्छा से उकसती हूँ
मृत्यु के बाद तुम्हारा न तो कोई ईश्वर होता है न ही जीवन.
दुनिया में रहते हुए जो सबसे बड़ी चाहत हो सकती है, वह है अपने प्रति सच्चा बने रहने की आज़ादी यानी ईमानदारी.
दिमाग़ एक वेश्या है.
स्मृति परीक्षा है.
कमज़ोरी संक्रामक है.
हर आदमी के अपने भेद होते हैं.
भोले बने रहने से बेहतर है जानना.
औपचारिकता ( 'मेहरबानी करके', 'शुक्रिया', 'मुआफ़ करें' आदि ) ख़ुद को दूसरे शख्स के हवाले न करने का एक तरीका है.
निगाह एक हथियार है. मुझे अपने इन हथियारों के इस्तेमाल से भय ( शर्म ?) है.
किसी को प्यार करना उसे आला दर्जे का मानना, तरजीह देना है. लेकिन यह अपने आप में जीना/होना नहीं है.
अपना दिल वहां नहीं वारना चाहिए जहां बेकद्री हो.
पूछो : क्या यह शख्स मेरे भीतर कुछ भी अच्छा उगा रहा है ? यह नहीं कि क्या यह सुन्दर है, अच्छा है, काम आएगा ?
सेक्स को सेक्स मत कहो. इसे दूसरे शख्स की काया की छानबीन कहो ( एक अनुभव नहीं, न ही प्रेम का प्रदर्शन ). इस छानबीन में हर दफ़ा तुम एक नई चीज़ पाती हो.
बौद्धिक 'चाहत' कामुक चाहत जैसी है.
मैं पवित्र नहीं, प्रचुर हूँ.
लोगों को नैतिक शिक्षा देने की मंशा से लिखना लेखन को भ्रष्ट करना है.
मुझे लेखक ( एक अच्छा लेखक ) होने से सिवाय मेरे आलस्य के कोई नहीं रोकता.
कुछ करने के लिए बहुत से कारण हैं. लेकिन पता है क्या, कारण मुझे काम करने के लिए नहीं उकसाते, मैं इच्छा से उकसती हूँ.
प्रेरणा मुझे फ़िक्र के लिबास में मिलती है.
लिखना एक सुन्दर काम है. कुछ ऐसा सिरजने जैसा, जो बाद में दूसरों को सुख देगा.
एक लेखक में चार लोग : १. सनकी, २. मूर्ख ३. शैलीकार, ४. आलोचक.
१. माल मुहैया कराता है. २. उसे बाहर ले आता है. ३. उसका स्वाद बनाता है. ४. उसमें बुद्धि की जगहें भरता है.
एक महान लेखक में ये चारों रहते हैं. लेकिन एक अच्छा लेखक नम्बर १ और २ से भी काम चला सकता है क्योंकि ये दोनों ही सबसे अहम हैं.
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अनुवाद : अनुराग वत्स.
[ सुजान सौन्टैग क्या बला हैं यह यहाँ .
ऊपर की पंक्तियाँ उनकी डायरी '' रीबॉर्न ''और तस्वीर गूगल से है.]



Friday, 20 July, 2012
डायरी के इस अंश का एक एक वाक्य लेखिका के जीवन और लेखन का निचोड़ है.बहुत ही बेबाक और ईमानदार उक्तियाँ हमारे हाथ कई सूत्र थमा देती हैं.प्रेम,व्यव्हार,मन की रहस्यात्मकता और लेखक होने की शर्तों के बारे में दिलचस्प तथा गूढ़ बातें.
Friday, 20 July, 2012
Very honest ,carefree confession of her inner expression!!You brought a great strength to the readers!!!
Friday, 20 July, 2012
Hamesha ki tarha ek Behad Umdaa post
Aur Behtreen Anuwaad
Friday, 20 July, 2012
सोचने को विवश करते कई वाक्य..
Friday, 20 July, 2012
so succint and insightful.Susan Sontag remains a legend of our time
Friday, 20 July, 2012
very candid expressions..
Friday, 20 July, 2012
दुनिया में रहते हुए जो सबसे बड़ी चाहत हो सकती है, वह है अपने प्रति सच्चा बने रहने की आज़ादी यानी ईमानदारी.
badhia anuwad
Friday, 20 July, 2012
मुझे लेखक ( एक अच्छा लेखक ) होने से सिवाय मेरे आलस्य के कोई नहीं रोकता.
बहुत ऐसे लेखक याद आ रहे है जो केवल आलस्य के कारण बिखर गये....अनुवाद अच्छा है बंधु..
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Friday, 20 July, 2012
सुंदर और सधा हुआ अनुवाद, अनुराग।
Friday, 20 July, 2012
अच्छी छानबीन है लेखकों की. इसके पहले कभी नाम ही नहीं सुना था सुजान सोंतैग का. बेहतरीन लाइन्स और वो भी डायरी के रूप में.
निगाह एक हथियार है. मुझे अपने इन हथियारों के इस्तेमाल से भय ( शर्म ?) है.
सेक्स को सेक्स मत कहो. इसे दूसरे शख्स की काया की छानबीन कहो ( एक अनुभव नहीं, न ही प्रेम का प्रदर्शन ). इस छानबीन में हर दफ़ा तुम एक नई चीज़ पाती हो.--
N a v i n R a n g i y a l
Friday, 20 July, 2012
achha anuvad.......lekhika ke seedhe seedhe shabd unke vyaktitwa ko darshate hain....kitani seedhi sachi jaban me unhone apani bat rakhhi hai ...
Friday, 20 July, 2012
lagaa jaise ek achcha or aatma ko trapt karne vaalaa chitra dekha ho jaise kolte kaa yaa ambadas ji kaa.yakin hi nahi bharosa bhi he ki shabdon kaa yahi roop chitrakalaa (visual arts)ke bahut najadik hota hai.jaise haath me haath.mera anubhav hai ki kam shabdo ki chij hamesha jahan ke bhitar ghar kar hi leti hai or dimaag uski chokidaaru karne lagataa hai.jaise use sambhal raha ho.
Saturday, 21 July, 2012
एक औऱत की जिंदगी में शामिल ये उक्तियां अगर हर औरत की जिंदगी में शामिल हो जाएं तो फिर
जबरदस्ती हर बार एक औरत होकर ही सोचने का ख्याल नहीं आएगा मन में...ज्यादा समानता हो जाएगी...हर एक पंक्ति में एक जीवन दर्शन है
आपका संकलन काबिलेगौर है
Sunday, 22 July, 2012
ठिठक जाता हूँ ...
Sunday, 22 July, 2012
behtreen anuvaad anurag
anju
Sunday, 22 July, 2012
Monday, 23 July, 2012
Badhiya!
Monday, 23 July, 2012
बेहतरीन...अपने हथियारों के बारे में नहीं जानना भी एक तरह का गुनाह है ....मेरा भी मानना है कि बौद्धिक चाहत में कामुकता होती है ...लेखन को नैतिकता में बाँध देना हमेशा सही नहीं होता इससे संवेदनहीनता आती है...
Monday, 23 July, 2012
बेहतरीन! मैं इच्छा से उकसती हूँ। 'उकसती' शब्द की जगह किसी दूसरे शब्द को प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए। चाहे जितना सोचना पड़े। चाहे जितना वक्त लगे। ऐसा मुझे लगता है।
पूरी प्रस्तुति आरोही क्रम में है अंत में आते आते यह शिखर जैसा लगता है- "एक लेखक में चार लोग : १. सनकी, २. मूर्ख ३. शैलीकार, ४. आलोचक.
१. माल मुहैया कराता है. २. उसे बाहर ले आता है. ३. उसका स्वाद बनाता है. ४. उसमें बुद्धि की जगहें भरता है.
एक महान लेखक में ये चारों रहते हैं. लेकिन एक अच्छा लेखक नम्बर १ और २ से भी काम चला सकता है क्योंकि ये दोनों ही सबसे अहम हैं."
Tuesday, 24 July, 2012
"Bauddhik chahat, kamuk chahat jaisi hai"..............
Main Sushobhit ji ki tippani se sahmat hoon.....sundar, sadha anuvad.
Mujhe lagta hai, har post ke aakhir mein like ka option bhi hona chahiye.
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