Saturday, July 14, 2012

कवि की संगत कविता के साथ : ११ : शिरीष कुमार मौर्य




वकतव्य : 


वाम वाम वाम दिशा/ समय साम्‍यवादी.....

मैं कविता के बारे में कुछ भी कहना चाहूं तो सबसे पहले मुझे बहुत देर तक शमशेर की इन पंक्तियों  की उमड़-घुमड़ में रहना होता है –  यह दिशा मैंने अपने लिए तय की हो – ऐसा नहीं है, यह तो अपने समाज में डूबते जाने के क्रम में ख़ुद-ब-ख़ुद तय होती गई...शोषण और अनाचार और अपने अकेलेपन के अंधेरे में आंखें मलते हुए मैंने अपने समय को पहचाना... वाम  और साम्‍य,  दो शब्‍दों में उजाला था मेरे लिए और मेरे जनों के लिए। निजी अनुभवों के सहारे कहूं तो मेरे अपने घरेलू जीवन में काफी सामन्‍तवाद था...उसके शिकार भी ....जिनमें ज्‍़यादातर औरतें और बच्‍चे थे ...जवान हुआ तो घर के बाहर के अंधेरों को जाना...देखा कि इन अंधेरों के बीच अपनी कई दुरभि:संधियां हैं...वे एक-दूसरे के विस्‍तार हैं। इधर बाबरी मस्जिद ढहाई गई...उसका भरपूर विरोध किया...उत्‍तराखंड आन्‍दोलन हुआ....मैं  शामिल रहा..चोटें खायीं...उन चोटों से कुछ मज़बूती आयी...वरना ढह गया होता....एक सही राजनीतिक समझ के बिना इंसान हो पाना मुश्किल है...यह समझ में आया....    

हे  अरे  अबे  ओ  भगवान .....

पारम्‍परिक भारतीय परिवारों की तरह मेरे हिस्‍से में भी ईश्‍वर नाम की अलामत बहुत थी। पिता ईश्‍वर को तो झुटलाते रहे पर अंधविश्‍वासों और जीवन में ईश्‍वरीय संकेतों की भूलभुलैया से कभी बाहर नहीं निकल पाए। मैंने सन् 88 के चैत महीने में उन्‍हें कुलदेवता की पूजा में निमग्‍न देखा...वे कांपे, उनकी देह अकड़ने लगी...वे चीखने और फफक-फफककर रोने लगे...मां ने कहा इन पर कुलदेवता उतरे हैं...रोते हुए आए हैं..इसका मतलब परिवार पर संकट आनेवाला है। पिता ने सहमति व्‍यक्‍त की.... और मैं, मैं भीतरी असहमति के बावज़ूद कुछ कहने की स्थिति में नहीं था...बाद में पिता के व्‍यक्तित्‍व को जानने-समझने की एक मुहीम चलाई मैंने...उनके जीवन और विचार के बारे में परिवार के और बाहर के उनके अंतरंग लोगों से जानकारियां जुटाई...उनकी एक पुरानी डायरी तलाश कर चुपचाप पढ़ने का जघन्‍यतम अपराध किया...पर मैंने उन्‍हें जाना.... उन पर देवता आना ईश्‍वरीय नहीं, साइकोलॉजिकल घटना थी। वे महान और स्‍थानीय के बीच एक टूटे  हुए आदमी या आख्‍यान हैं आज भी.....

उस जनपद कवि हूं

जी हां,  उसी हिंदी जनपद का कवि हूं जो अभी आधुनिकता ठीक से नहीं जानता....जो बकौल त्रिलोचन भूखा है... दूखा है...
 ****

कविताएं : 





बारिश के भीतर बारिश है

पानीदार लगभग कुछ नहीं है
न आंखें
न चेहरे
न हथियारों की धार
न किरदार
मेरे आसपास पानीदार लगभग कुछ नहीं है

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है

पपड़ाई मिट्टी के ढूहों से
बिलखती निकलती हैं चींटियां
दिमाग़ में रेंगती
अचानक पानी की उम्‍मीद में उग आए कोमल पंखों को
हिलातीं
थोड़ा उड़तीं इधर-उधर
फिर दिमाग़ के कोटर में ही
गिर जातीं

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है

पक्षियों की महान उड़ानों के झड़े हुए पंख
धूल में भटकते बच्‍चों को मिल जाते हैं
खेलने के काम आते हैं
पक्षी जो उड़ गए पानी की तलाश में
साधारण थे
महान थीं उड़ानें
आकाश के सूनेपन को सरापती
अब न जाने कहां होंगी

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है

पेड़ों पर बंधे हुए फलों में सूख गया रस
अब लगे रहें बेशर्मी से कि झड़ जाएं की उनकी कशमकश
पहाड़ी नदियों के तल में रेत ही रेत
गो हर देश और काल में अपने उद्गम से लगभग
पहाड़ी ही होतीं हैं वे
लाश की तरह नोचते उन्‍हें माफिया
पानी न होने का सुख सम्‍भालते
इधर लोग पुकारते व्‍याकुल कराहते
बोलते तो मुंह से झरती रेत

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है

जंगलों से भाप की जगह निकलता धुंआ
धूप के साथ आग
चांदनी के साथ राख
हर तरफ़ झुलसे हुए छोटे-छोटे जीवों और कीड़ों के
अदृश्‍य शव
इधर पिटती हुई झील के किनारे
समृद्ध पर्यटकों का कलरव
हाहाकार पहाड़ों के दिल का अनसुना ही रह जाता है
बेवक्‍़त की इस अजब-सी बादे-बहार के बीच 

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है

कहां है बारिश
बारिश कहां हैं
पुकारते हैं पहाड़
कराहता है भाबर
पानीदार कुछ भी नहीं अब तो बताओ
बीते जा रहे चौमासे के महीने रीते के रीते 
कहां है बारिश
बारिश कहां हैं

कैसे न कैसे एक दिन तो वह आएगी
तर-ब-तर हो जाएंगे पहाड़
पानी इतना आएगा
कि सरकार को दैवीय नज़र आने लग जाएगी हर आपदा

पर आंखें सूनी रह जाएंगी मेरे जनों की
चेहरे वैसे ही सूखे
बेपानी इठलाते रहेंगे जनप्रतिनिधियों के किरदार
क्‍या हमेशा कुंद ही बनेगी रहेगी विचारों के हथियारों की धार

बारिश कहां है
कहां है बारिश

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है

जानता हूं मैं यह बारिश जिसकी बरसों से तलाश है
क़ैद है दूसरी बारिश के भीतर
इस बारिश के भीतर दुबक गया है
एक बहुत बड़ा संसार
एक बारिश छुप गई है बारिश के भीतर
आपदा के भीतर उर्वरता
सरकार के भीतर जनता

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है 

किसी भी समय में कवि यदि कवि है तो
उम्‍मीद नहीं छोड़ता
जानता है
अपने हारते हुए दिल से भी मानता है
एक दिन बारिश को बारिश का डर न होगा
इतनी बढ़ जाएगी आपदा
कि दुबक जाने को कोई घर न होगा

आंख मलते जन सड़कों पर होंगे
बारिश होगी
जल होगा
भले ही एक विशाल आज में घुटकर रह गए हों हम
पर सरल बात है यह - कल होगा

एक ऐसे समय में जब कहना पड़ता है
सूखा है
अकाल है
बात का यूं उम्‍मीद के मोड़ पर ख़त्‍म हो जाना ही अच्‍छा 
यही एक शरण्‍य है
बाक़ी तो सब जीवन फ़िलहाल हताश धुकधुकियों का
एक सिलसिला है
भय है ।
***


कवि की मेज़
(दो प्‍यारे दोस्‍तों : गिरिराज किराड़ू और व्‍योमेश शुक्‍ल के लिए)

एक ज़िंदा पेड़ की महक सूखी-तराशी हुई लकड़ी से आ रही है
एक किताब के कवर पर लगभग अमूर्त हो चुकी
चिड़िया भी गा रही है

मसली हुई तम्‍बाकू के कण
कॉफ़ी के गहरे दाग़
कितना निकोटिन-कैफ़ीन है यहां

यह
छात्र-जीवन के पुराने रेस्‍टोरेंट की उस मेज़ की तरह
लगती है
जिस पर कितनी बहसें हुईं
सिगरेटें बुझाई गईं क्रोध से भरकर
कुछ झड़पें भी हुई
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे  वालों के साथ
जबकि ज़मीने-हिंदोस्‍तां प्‍यारी थी हमें उनसे भी ज्‍़यादा
हम उस पर अपने करोड़ों कुचले कराहते जनों की
बसासत देखते थे
धर्म-मज़हब के फ़रेब से दूर
इंसान की मुक्ति
मेहनत की क़द्र करने वाले विचारों में खोजते थे 

आज भी इस पर विचारों की भरमार है
दिशा वही है समय भी वही है

यहां वाल्‍टर बेंजामिन मार्टिन हाइडेगर  को घूरते हैं
देरिदा  कोने में पड़े रहते हैं उत्‍तरआधुनिकता की
भंगमुद्राओं का परीक्षण करते सोकल
उनका नाम तक नहीं लेते हैं
यहां आज भी
एक घमासान मचा रहता है
ऐसे में कविमन कहां बचा रहता है

पर यह कोई बौद्धिक चीज़ नहीं है
ज्ञानात्‍मक संवेदना और भावानात्‍मक संवेदना की
प्राध्‍यापकीय कारीगरी की ज़द से बाहर है
इसका शिल्‍प –
बहुत ठोस
चार खड़े डंडों पर एक पटरा
नीचे डंडों के बीच दो-एक आड़ी लकडि़यां
सहारे के वास्‍ते....
बस्‍स..इतना भर...बाक़ी तो सब कला है
अगर उसमें कुछ श्रम है तो मज़ा है

कई परिवर्तनशील युगों में इसके इतिहास के बारे में
मेरे पास दो सरल वाक्‍य हैं

1- इसने ख़ुद को कुछ ख़ास नहीं बदला है
2- हमने इसको कुछ ख़ास नहीं बदला है

पहला कवि का वक्‍तव्‍य है
और दूसरा बढ़ई का
जाहिर है बढ़ई वाले में विचार ज्‍़यादा है
और विचार सिर्फ़ मूल ढांचे के बारे में है

बाक़ी तो सब कला है ...
अगर इसमें कुछ श्रम है तो मज़ा है

कुछ कवि मेज़ नहीं तिपाई रखते हैं सिरहाने
उनकी कविता के बारे में
इतना तो कहना ही होगा 
कि एक पांव कम होने से सौन्‍दर्य और कला
कुछ बढ़ जाते हैं
पर तिपाई कमज़ोर होती है मेज़ से

मेज़ में
अपने सीमित आकार के बावज़ूद विस्‍तार बहुत है
इस पर हाथ रखकर सोचता बैठा
या लिख-पढ़ रहा आदमी
भटक सकता है रात-रातभर के लिए
खो भी सकता है
और कितनी कोमल बात है
कि लौटकर आए तो सो भी सकता है
उसी पर सिर टिकाए

समकालीन समय में
ज‍बकि टी.वी. स्‍टैंड से उठकर दीवार पर चिपक गए हैं
रेडियो खो गए हैं कहीं
अब उनकी आवाज़ भी नहीं आ रही है
तब भी
इस मेज़ से एक ज़िंदा पेड़ की महक आ रही है
एक अमूर्त चिड़िया इस पर गा रही है 

रागात्मिका वृत्ति है यह हमारी
जो हमें
मनुष्‍यों और दूसरे जीवों के अलावा
चीज़ों से भी जोड़े रखती है
और चीज़ें आख़िर चीज़ें ही हैं
अकसर इस्‍तेमाल भर का होता है
उनका मोल

पर किताबों के बोझ से सजी
कुछ अनदेखी सम्‍भावनाओं से दबी यह मेज़...
इसका मामूलीपन कुछ ख़ास ज़रूर है
इस मामूलीपन से ही जन्‍मती है दुनिया हमारी
लगातार फैलती हुई
चौतरफ़ा ख़ासुलख़ास होती हुई  

कुछ और पुरानी ख़स्‍ताहाल होने पर भी पड़ी रहेगी
घर के किसी कोने में
कवि भले कवि न रहे पर उसकी स्‍मृतियों में यह तब भी
कवि की मेज़ रहेगी

कभी बहुत क्रूर आया समय तो जाड़ों की किसी रात
अहाते में
बच्‍चों के हाथ सेंकने की ख़ातिर लहक कर जलेगी

यूं सर्द सफ़ेद चांदनी के बीच
इससे एक लाल गर्म दहकती हुई-सी कविता बनेगी

उफ़...कितनी तुकें मिलाने लगा हूं मैं
हर बार की तरह
मेरा कवि होना
असफल होने लगा है
इस बार तो लकड़ी की एक मामूली-सी मेज़ के सामने 
जिससे फिलहाल
एक ज़िंदा पेड़ की महक आ रही है
एक लगभग अमूर्त हो चुकी चिड़िया जिस पर
अभी अकेले ही गा रही है ..
घुप्‍प रात और राजनीतिक अचेतन के अंधेरे में
उजाले की अगवानी का कर रही है अभ्‍यास 
जिसकी उम्‍मीद धीरे-धीरे जाती रही
लोगों के मन से

विचारों का ये घमासान बता रहा है
दूसरी चिड़ियें भी हैं अनगिनत घरों में क़ैद अमूर्त होती हुई
ख़तरे में आ पड़ेगी जब जान
मिलकर गाएंगी वे भी

एक दिन
सामूहिक होता जाएगा ये मुक्ति का गान
***


पन्‍द्रह की उमर में एक तुकान्‍त प्रेम 

बीच राह की बहुत देर की गपशप से थकी हुई-सी
वह जाती थी सिर पर आटे का थैला लादे
थोड़ी शर्मायी-सी
घर को
अम्‍मा देती आवाज़ दूर से उसको

उसी सांकरी प्रिय पगडंडी पर
किलमोड़े* के फल के गाढ़े गहरे लाल रंग से
अपने अंग्‍गूठे पर मैंने
झूटा  नकली घाव बनाया

लग जाने का अभिनय कर उसे बुलाया

वह पलटी
रक्‍ताक्‍त अंगूठा देख तुरत ही झपटी
अपने सर्दी से फटे होंट पर धर कर
छोटी-सी गरम जीभ से
जैसे ही अंगूठा चूसा
खट्टा-कड़वा स्‍वाद झूट का उसने पाया

झट से प्रेम समझ में आया
हाय, क्‍यों झूटा घाव बनाया
देखा कितनी-कितनी बार
मगर फिर अपने निकट न उसको पाया

इतने बरसों बाद
अब भी जीवन है भरपूर
और प्रेम भी है जीवन में
पर झूट धंसा है
गहरा कहीं रक्‍त–सा रिसता है मन में।
***
*एक पहाड़ी झरबेरी

[ इससे पहले सबद पर शिरीष की एक कविता और कवि-वक्तव्य .  
सबद पर इस स्तंभ की अन्य कड़ियाँ यहां. तस्वीरें गूगल से. ]

3 comments:

Vipin Choudhary said...

किसी भी समय में कवि यदि कवि है तो
उम्‍मीद नहीं छोड़ता
जानता है
अपने हारते हुए दिल से भी मानता है
एक दिन बारिश को बारिश का डर न होगा
इतनी बढ़ जाएगी आपदा
कि दुबक जाने को कोई घर न होगा

सिद्धान्त said...

शिरीष की ये कवितायेँ अपने समय की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं, कवितायेँ उनके स्व-कथ्य के समक्ष खड़ी हैं क्योंकि शमशेर से लेकर वीरेन डंगवाल तक के काव्यकर्म में शिरीष का जो सम्मलेन है, कहीं न कहीं वह इन कविताओं को एक साकार रूप दे रहा है. सिस्टम से एक खास चिढ़ मौसम से हुई एक खास चिढ़ का पर्याय बनकर आती है, जहाँ एक बारिश दूसरी बारिश के अंदर क़ैद है यानी क्या जनतंत्र एक सरकारी जनतंत्र के भीतर भी क़ैद है?
मेज़ की व्याख्या के लिए हिन्दी कविता की शमशेर धारा का इस्तेमाल है, जैसे:
"यहां वाल्‍टर बेंजामिन मार्टिन हाइडेगर को घूरते हैं
देरिदा कोने में पड़े रहते हैं उत्‍तरआधुनिकता की
भंगमुद्राओं का परीक्षण करते सोकल
उनका नाम तक नहीं लेते हैं"
तो, ये कवि की मेज़ की विराटता नहीं है, ये तो विचारों और चेतना की विराटता है, ये तो उस चौथे पाए के रिक्त स्थान की विराटता है या कह लें कि तीन उपस्थित पायों के बीच का स्पेस है यह. इसको समझाने के लिए शायद इससे बेहतर तरीका ईज़ाद नहीं किया जा सकता.

ये अनुभूति आपको कितना भिगो देती है, कि इतने पश्चिमी और सिनेमैटिक इन्क्रोच्मेंट के बाद भी हिन्दी में ऐसी कवितायेँ बची हुई हैं, जो एक अच्छी कविताओं की एक अभीष्ट क्लैसिक लिस्ट में शामिल की जा सकती हैं.

कवि को शुभकामनाएं..

अंशुमाली रस्तोगी said...

वास्तविक सुख का एहसास हैं शिरीष जी का कथ्य व कविताएं..बधाई..