Wednesday, June 27, 2012

सबद विशेष : १३ : लम्बी कहानी : कुणाल सिंह




झूठ तथा अन्य कहानियाँ


मसलन हमने शिबू के पिता को कभी नहीं देखा। अपनी माँ से शिबू ने कई बार पूछा था, शुरू में तो वह टालती रही, एक दिन आजि़ज आकर कसके तमाचा जड़ दिया। उसने रोते हुए मुझसे कहा था, झूठ बोलती है साली। कहती है कि जिस साल मैं पैदा हुआ था, वह हैजे में मर गया। कभी कहती है ख़ूब दारू पीता था, जिगर की ख़राबी से मर गया। मैंने उसके कन्धे सहलाये थे— जाने दे यार! उसकी हिचकी बँध गयी थी। मैंने हिचकते हुए पूछा— जब तू पैदा हुआ था, तेरा बाप मर गया। फिर तेरी बहन कहाँ से टपक पड़ी? उसने आस्तीन से मुँह पोंछते हुए सहमति में सिर हिलाया— वही तो! लेकिन अगर मैं यह पूछने जाऊँ तो मुझे लात से मारेगी, पक्का।

उसकी बहन नैना के बारे में मैंने जो अभी ऊटपटांग बातें की, अगर तापस ने सुन लिया होता तो मुझे लात से मारता, पक्का। शिबू को नहीं बताया मैंने कि तापस नैना पर जान छिडक़ता था। खुलेआम नैना मेरी मैना, जगाये सारी रैना, छीने मेरा चैना वाला गीत गाता था। वैसे शिबू को इस सन्दर्भ में कुछ बताने की ज़रूरत भी नहीं थी, हम सभी जानते थे। तापस ख़ुद उसके बारे में गन्दी-गन्दी बातें करता था, लेकिन उसकी बातें सुनकर अगर हममें में से किसी ने एक सिसकारी तक भरी, तो पीट देता था। वह उम्र में हम दोनों से चार, नैना से साढ़े पाँच साल बड़ा था। एक दिन उसे मैंने शिबू के घर से कमर पर बँधे अँगोछे को ठीक करते हुए निकलते देखा था। नैना तो स्कूल में थी, फिर वह किसके साथ...? सुनकर शिबू ने फिर से अपनी माँ के लिए एक भद्दी-सी गाली निकाली थी। लेकिन मैंने तापस के अँगोछा ठीक करते निकलने वाली बात झूठ कही थी।

मैं अच्छे परिवार से था, मेरे पिताजी कुछ नहीं करते थे, लेकिन मेरे पिताजी के पिताजी ज़मींदार थे। मेरा घर बहुत बड़ा था, मेरी माँ हमेशा पूजा-पाठ करतीं और छुप-छुपकर रोती रहती थीं। मेरे सिर में तेल लगाकर मालिश करती थीं और कहती थीं कि झूठ बोलना पाप होता है। वह चोरी करने को भी पाप मानती थीं, मुझे चोरी करने में मज़ा आता था। घर में ही नहीं, स्कूल में भी चोरी किया करता था। जब कुछ करने को नहीं होता, मैं चोरी करता या झूठमूठ क़िस्से बनाता कि कल मैंने देखा कि तापस कमर में बँधे अँगोछे को ठीक करता हुआ...। शिबू अपनी माँ को गाली देते हुए कहता था कि एक दिन वह घर छोडक़र बम्बई भाग जाएगा। मैं किसी फ़िल्म का डायलॉग मारता— ऐसी जि़न्दगी से तो मौत बेहतर! मैंने उसे नहीं बताया कि मैं भी नैना को लेकर बम्बई भाग जाने के सपने देखा करता था। रात में सोने से पहले नैना के बारे में गन्दी-गन्दी बातें सोचता था। बीच में मेरी माँ देखने आतीं कि मैं ठीक से सोया हूँ कि नहीं, मेरी मसहरी ठीक करतीं, चादर ओढ़ा जातीं। कभी-कभी पलंग के पाये से लगकर देर तक मुझे सोते हुए देखतीं, मैं दम साधकर सोने का नाटक करता।

हमारे घर मांस-मछली नहीं बनती थी। पिताजी वैष्णव थे, तुलसी धारण किया हुआ था। माँ ने बताया था कि वह अपने मायके में खाती थीं, शादी के बाद उन्होंने भी छोड़ दिया। इसी प्रकार पिताजी को बैंगन पसन्द नहीं था तो हमारे घर बैंगन भी कभी नहीं बना और आज तक मुझे मौक़ा नहीं मिला यह तय करने का कि बैंगन मुझे भी पसन्द है या नहीं। पिताजी कढ़ी भी नहीं खाते थे, जबकि मुझे कढ़ी बहुत पसन्द थी। शिबू की माँ कभी-कभी मेरे लिए कढ़ी बनाया करती थीं। शिबू की माँ मछली क्या ही स्वादिष्ट बनाती थीं! एक दिन मैंने कहा— काकी, अब से जब भी बनाना, मेरे लिए भी बना देना। उन्होंने प्यार से मेरी ठोड़ी छूते हुए कहा था— ठीक है, लेकिन दीदी को या ठाकुर दा को मत बताना। वह मेरी माँ को दीदी और पिताजी को ठाकुर दा कहती थीं। अपने माता-पिता से सच न बोलना, झूठ बोलने का स्वाद लिये होता। जिन दिनों हम सर्वाधिक झूठ बोल रहे होते, हमारे चेहरे सच के अपूर्व प्रकाश में खिले हुए होते। दुनिया के जघन्य अपराधियों के चेहरे साधुओं की शान्ति-दीप्ति लिये हुए होते। पिताजी का चेहरा निर्लिप्त रहता था। वहाँ अमूमन कोई भाव नहीं होता। रेडियो पर क्रिकेट की उत्तेजक कमेंटरी सुन रहे होते और हमें भ्रम होता, वे सो गये हैं।

पिताजी दिन भर सहन में पड़ी आरामकुर्सी पर पैर फेंके हुक्का पीते रहते थे। मैं भी छिपकर हुक्का पीता था। मैं सोचता था कि जब मैं बड़ा हो जाऊँगा तो दिन भर खुलेआम हुक्का पियूँगा। माँ कहती थीं, छी छी, हुक्का पीना गन्दी बात है। मैं कहता, पिताजी तो पीते हैं। माँ कहतीं, वे तो बड़े हैं। मैं कहता, मैं भी बड़ा हो जाऊँगा तो गन्दी बातें करूँगा। इस बात पर माँ कभी हँसने लगतीं, कभी आँख निकालकर डराती थीं। माँ ने मुझे तीन-चार दफ़े पीटा था, पिताजी ने कभी छुआ भी नहीं था। मैं माँ से नहीं डरता, लेकिन पिताजी से ख़ूब डरता था।

पिताजी के अलावा मैं तापस से भी डरता था। वह जब भी जहाँ जाने को कहता, मैं और शिबू मन मारकर चल देते। कभी माठ में दूसरे बच्चों के साथ क्रिकेट या खो-खो खेल रहे होते, खेल क्या ही जम रहा होता, हमारा दल जीत रहा होता कि वह आता और पुकार लगाता। क्या है? मैं पूछता। वह कहता, काम है। फिर नदी किनारे ले जाता, चट्ïटान पर बैठकर इधर-उधर की बातें करता। आजि़ज आकर मैं पूछता, बोलो क्या काम है? वह रवि ठाकुर की कविता सुनाने लगता। नज़रूल गीत-सुगम संगीत, मोहन बागान-ईस्ट बेंगाल। उत्तम कुमार की तारीफ़ करता, जबकि हमें सौमित्र की फ़िल्में पसन्द थीं। मैं सिर धुनता रहता। सत्यजीत रे या ऋत्विक घटक का नाम हमने सबसे पहले उसी के मुख से सुना था। पहाड़ी सान्याल-छबि बिस्वास, मेघे ढाका तारा-मृगया। वह पूछता, शरत बाबू का ‘पथेर दाबी’ पढ़ रहा हूँ, उसका एक अंश सुनेगा? मेरी माँ भी दोपहर के खाने के बाद जब पिताजी भात-नींद लेते, उन्हें पंखा झलतीं और शरत बाबू को पढ़ती रहतीं। शरत बाबू उन्हें रोने का बहाना देते। पिताजी या मेरे पूछने पर वे आँचर से लोर पोंछते हुए कहतीं, आह बेचारी किरणमयी!

नदी किनारे जब मैं और शिबू होते, मैं कंकड़ी उठाकर पानी की सतह पर यों फेंकता कि कंकड़ी दो-तीन बार उछलते हुए सतह को छीलती चली जाती। मैं बहुत कोशिश करता, लेकिन दो-तीन से ज़्यादा उछाल नहीं दे पाता, शिबू कभी-कभी सात-आठ उछाल दे देता। वह मेरी ही कक्षा में पढ़ता, उसकी याद्ïदाश्त बहुत पक्की थी। जिस पाठ को मैं सुबह-सुबह रट्टा मारकर भी ठीक से याद नहीं कर पाता, वह दो-एक बार पढऩे के बाद ही कंठस्थ कर लेता। गुरुजी उसकी तारीफ़ करते नहीं थकते। मैं मन ही मन कुढ़ता और तरह-तरह के क़िस्से  बनाता। नैना के बारे में स्कूल के पेशाबघर की दीवारों पर गन्दी बातें लिखता और बाद में शिबू को पढ़वाता। एक बार मैंने नैना का नंगा चित्र भी बनाया था जो मुझे ख़ुद ही बहुत सुन्दर लगा। बाद में कॉपी पर मैंने कई बार कोशिश की, लेकिन उतना सुन्दर नहीं उतर पाया।

एक बार तापस ने मेरा कॉलर पकडक़र पूछा था, नैना के बारे में तू ही लिखता है न पेशाबघर की दीवारों पर? मैं मारे डर के काँप गया था, इंकार में सिर हिलाया, हकलाते हुए विद्या क़सम खायी। तापस मुझे ग़ौर से देखता रहा, बोला, दुबारे ये हरक़त की तो इसी नदी में तेरी लाश उतराती हुई मिलेगी। उस दिन लंच टाइम में कदम्ब की गाछ के नीचे मैंने शिबू को बताया कि यह तापस ही है जिसने पेशाबघर की दीवार पर नैना का नंगा चित्र उकेरा था। फिर मैंने देर तक नैना के अंगों के आकार-प्रकार पर बातें की थीं। शिबू ने कुछ नहीं कहा, चुपचाप मुझे देखता रहा। उस दिन मैं उसके घर भी गया, काकी ने मछली बनायी थी। उस दिन मैं एक नशे में था— वह उन्माद था कि जाने क्या, क्रूर से क्रूरतम होने के क्रम में खाते हुए मैं काकी के अस्त-व्यस्त कपड़ों में झाँकता रहा। शिबू ने मुझे ऐसा करते हुए देख लिया और जब उसकी माँ ने उससे पूछा, और लेगा? वह  ग़ुस्से से भरकर बोला, कोई ज़रूरत नहीं। खाना खाने के बाद मैं नैना के कमरे में गया, वह बिस्तर पर अधलेटी ‘अदरक के गुण’ नामक पुस्तक पढ़ रही थी। मैंने उसकी बाँह को सहलाते हुए पूछा, यह क्या पढ़ रही हो मेरी नैना? वह तुनक गयी, मेरा हाथ झिडक़ते हुए पूछा, तुमसे मतलब? मैंने कपड़ों के ऊपर से उसकी जाँघ पर चिकोटी काट ली। उसने मुझे देखा, मेरी हिम्मत की बलिहारी, मैंने आँख मारी। उसने मुझे गाली दी, कुत्ता कहीं का, बेशरम! मैं उससे बड़ा था, मेरी सामाजिक हैसियत उससे बड़ी थी। ऐसे में उसका मुझे गाली देना उस विशेषाधिकार के तहत आता था जहाँ बड़े-बड़े राजा-रजवाड़े शराब के नशे में धुत्त होकर दो टके की वेश्याओं के क़दमों में लोटते रहते हैं और वह उन्हें दुत्कारती-फटकारती रहती है। अपनी कलाई पर लिपटे अदृश्य गजरे को सूँघते हुए मैं ही-ही करता बाहर चला आया। शिबू सोने के लिए चला गया था, मैं बर्तन धोती उसकी माँ के आगे कुर्सी डालकर बैठ गया। वह उकड़ू हो बैठी बर्तन धो रही थीं, मैं उन्हें ग़ौर से देख रहा था। कभी-कभी वह मुझे देख लेतीं। मैंने निकर पहना हुआ था, थोड़ी देर में मेरा उनके सामने बैठना मुश्किल हो गया। उन्होंने भी $गौर किया, पल्लू ठीक कर लिया, हँसते हुए बोलीं, जा भाग यहाँ से बोदमाश!

दूसरे दिन मैंने शिबू को सारी बातें विस्तार से बताईं, जिनमें से कई झूठी थीं। मैं चाहता था कि शिबू रोये, अपनी माँ को गाली दे, लेकिन ऐसा कुछ भी न हुआ। वह उजबक की तरह मुझे टुकुर-टुकुर देखता रहा। पहली बार यह सब सुनकर भी उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं उभरा। अन्त में थककर मैं चुप हो गया। फिर थोड़ी देर बाद वहाँ से उठकर हम माठ में खेलने आ गये। खेलते हुए एक बार जान-बूझकर मैंने उसे धक्का दिया। वह गिर पड़ा, उसका बायाँ घुटना छिल गया। मैंने उससे पूछा, क्या मैं तुम्हें सहारा देकर तुम्हारे घर तक छोड़ दूँ? उसने कहा कि वह ठीक है और लँगड़ाते हुए घर लौट गया।

इस घटना के बाद दो दिनों तक शिबू मुझसे नहीं मिला, न स्कूल ही आया। तीसरे दिन मैं उसके घर पहुँचा तो पता चला, वह बीमार है। थोड़ी देर उससे इधर-उधर की बातें कीं, उसकी माँ से मिला। उसकी माँ ने नैना को चाय बनाने के लिए कहा। चीनी नहीं थी, सो वह गुड़ की चाय बना लायी। मैंने चाय की तारीफ़ की, वह आँगन में लगे लकड़ी के पाये से सटकर सुनती रही। मेरी देखा-देखी उसकी माँ भी उसकीतारीफ़ कर रही थीं। नैना की नज़रें नीचे की तरफ़ थीं और वह पैर के अँगूठे से फ़र्श को खुरच रही थी। शिबू चादर ताने सोने की कोशिश कर रहा था। थोड़ी देर बाद जब उसकी माँ चली गयीं, चाय ख़त्म कर मैं उठा।

कप कहाँ रखूँ? मैंने नैना से पूछा।
मुझे दे दो। वह पाये की आड़ से निकलकर मेरीतरफ़ ख़ुद कम बढ़ी, हाथ को ज़्यादा बढ़ाया।
मैंने एक नज़र शिबू को देखा, उसने करवट लेकर मुँह दीवार की तरफ़ कर लिया था। चादर सिर तक। मैंने नैना का हाथ पकड़ लिया। उसने चुप ही चुप हाथ उमेठकर छूटने की कोशिश की। मैं आगे बढ़ा और उसकी तर्जनी को मुँह में भरकर चूसने लगा। उसे गुदगुदी हुई, वह खिल-खिल हँसने लगी। चादर के भीतर शिबू की बेडौल आकृति खाँसने लगी। मैंने दूसरे हाथ से उसकी छातियाँ टटोलनी शुरू कर दीं। नैना ने एक नज़र उधर देखने के बाद मुझे आँखें तरेरीं। मैंने एक बार कसके उसकी छाती को भींचा, उसके मुँह से एक अजीब-सी सीत्कार निकली। शिबू की खाँसी बढ़ गयी। मैंने नैना को और पास खींचा। इस खींचातनी में कप फ़र्श पर गिर पड़ा। हड़बड़ाकर मैंने उसे छोड़ दिया। मुस्कराकर उसने मुझे गाली दी, कमीना! उसके जाने के बाद मैंने शिबू से कहा कि यार अब मैं चलता हूँ। उसने कोई जवाब नहीं दिया।

घर लौटा तो पड़ोस की दादी आई हुई थीं माँ के पास। मेरी ही बातें चल रही थीं किसी सन्दर्भ में और माँ मेरी तारीफ़ कर रही थीं। मैंने दादी के चरण छुए और माँ से कहा, भूख लगी है। दादी ने मेरे बालों में उँगली फेरीं, बोलीं, बड़ा प्यारा और संस्कारी बच्चा है। माँ ने उठते हुए हँसकर कहा, नज़र न लगे मेरे लाल को! और वह खाना निकालने चली गयीं। मैंने दादी से कहा, हाथ-मुँह धोकर आता हूँ।

माँ को मेरी सारी बातें पसन्द थीं, सिवाय इसके कि मैं शिबू-लोगों से मेलजोल रखता हूँ। पिताजी कुछ नहीं कहते, लेकिन माँ जब-तब बरजा करती थीं। दरअसल हमारे गाँव में शिबू-लोगों के बारे में कई बातें प्रचारित थीं। शिबू के पिता को, जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूँ, आज तक मैंने नहीं देखा। उनका घर कैसे चलता है, आमदनी का क्या स्रोत है, यह भी किसी से छुपा न था। कुल मिलाकर मैं भली-भाँति जानता था कि खुले तौर पर उनसे किसी प्रकार का सम्बन्ध मेरे जैसे घर के लोगों के लिए वर्जित था। इसके उलट शिबू की माँ कई बार मेरे दालान में आती-जाती दिख जातीं। पिताजी से घूँघट की आड़ करतीं, पिताजी हुक्का पीते रहते। एक बार आधी रात जब प्रकृति की पुकार से निबट कर मैं सहन से गुज़र रहा था, वह दालान से जल्दी-जल्दी निकलती दिखीं। हमारे खेतिहर जब धान या सब्ज़ी ले आते तो पिताजी थोड़ा-बहुत शिबू के घर भिजवा देते। माँ कुढ़ती रहतीं। बहुत दिनों पहले एक बार जब खेल में मैं हार रहा था तो शिबू की माँ ने उसे फटकारा था, उसके बाद अक्सर मैं जीत जाता और मेरी जीत पर शिबू की माँ बहुत ख़ुश होती। कक्षा पाँच में मैं प्रथम आया था, शिबू द्वितीय।


दो-चार दिनों में शिबू की तबीयत जब ठीक हुई, तो उसकी माँ ने उसे मेरे साथ खेलने को भेजा। इन दो-चार दिनों में मैं तापस के साथ नदी में तैरना सीख रहा था। तापस बड़ा तैराक था, अक्सर नदी हेल जाया करता था। मैं बस पानी में हाथ-पाँव पटकते हुए किनारे से कुछ दूर जाकर वापस लौट आता। शिबू जब आया, तो मैंने अपने इस नये शौक़ के बारे में उसे बताया। झूठ, चोरी, मांस-मछली और बैंगन-कढ़ी की तरह नदी में नहाना भी मेरे घर में वर्जित था। माँ कहतीं, मेरे सिर के पिछले हिस्से में बालों के बीच दो भँवरें पड़ा करते हैं। कहा जाता है कि ऐसे लोगों को पानी से दूर रहना चाहिए। मेरी तरह शिबू को भी नदी में नहाना बहुत पसन्द था, उसके घर में कोई ख़ास रोक-टोक भी नहीं थी। नैना शुरू से ही नदी में नहाती थी, उसकी माँ भी कभी-कभी उसके साथ हो लेतीं। इसलिए जब भी हम नहाते, शिबू अपने घर से अँगोछा ले आता। चूँकि उसकी माँ भी नहीं चाहती थीं कि मैं नदी में नहाऊँ, इसलिए वह सिर्फ़ अपने लिए ही अँगोछा लाता। उससे अँगोछा लेकर मैं अपने सारे कपड़े उतार देता और नदी में कूद पड़ता। वह किनारे बैठा मेरे कपड़ों की रखवाली करता रहता। कभी उसे नहाना होता तो मेरे बाद गीला अँगोछा लपेटकर वह भी उतर जाता। कभी-कभी मैं जि़द करता कि हम दोनों साथ नहाएँ। इसके लिए वह बमुश्किल ही तैयार होता, क्योंकि तब उसे नंगे ही उतरना होता। पानी के भीतर मैं अक्सर उसे चिढ़ाता। वह हँसकर टाल जाता।

एक बार ऐसे ही पानी के भीतर वह नंगा था, तो मैं उसे चिढ़ाने लगा। थोड़ी देर बाद मैं उत्तेजित हो गया और अनायास ही मेरे मुँह से नैना का नाम निकल गया। वह एक पल को ठिठका। मुझे चुपचाप देखने लगा। फ़ारिग
होने के बाद मैं देर तक चट्ïटान पर लेटा हाँफता रहा।

इस घटना के बाद मैं शिबू के सामने नैना के मामले में खुलकर बातें करने लगा। शुरू-शुरू में वह चुप ही रहा करता, जैसे उसने स्थिति को स्वीकार लिया हो। कभी मैं जब उसके घर पर होता, वह जान-बूझकर इधर-उधर हो लेता, ताकि मैं नैना के साथ ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त बिता सकूँ। एक समय ऐसा आया जब मैं उसकी माँ के समक्ष नैना के हाथ थाम लेता। नैना के मन में मेरे लिए क्या था, यह मुझे नहीं पता। वह बहुत सुन्दर थी और स्कूल भर के लडक़े उसकी नज़र में आने के लिए बेताब रहा करते थे। तापस से उसका ठीक किस स्तर तक सम्बन्ध था, मुझे या शिबू को यह नहीं पता, लेकिन इतना तय है कि उसकी तस्वीरें मैं ही पेशाबघर की दीवारों पर उकेरता था, यह ख़बर तापस तक किसी और ने नहीं, ख़ुद नैना ने पहुँचायी थी।

मुझे आज भी याद है, एक बार लगातार दो दिनों से मूसलाधार बारिश हो रही थी। बीच में आधे घंटे से बारिश रुकी थी, और लगातार दो दिनों तक बिना कुछ किये-धरे अपने कमरे में क़ैद रहने के बाद जैसे ही बारिश रुकी, मैं शिबू के पास चला गया। रास्तों में पानी भर आया था, खेतों में खड़ी फ़सलें बरबाद हो गयी थीं। घरों-खलिहानों में लग आये पानी को लोगबाग टम्बर-बाल्टियों से उलीच रहे थे। बच्चे छप्प-छप्प बारिश के चहबच्चों में उछल-कूद मचाये हुए थे। मैं जैसे-तैसे शिबू के यहाँ पहुँचा, द्वार पर ही नैना से भेंट हो गयी। वह एक हाथ में साफ़-धुली नाइटी, साबुन आदि तथा दूसरे हाथ में पीतल की एक लुटिया लिये नदी की तर$फ जा रही थी। अँगोछे को उसने पहनी हुई नाइटी के ऊपर से ही शॉल की तरह वक्षों पर लपेट लिया था। मैंने उसे टोका, ऐसे मौसम में नदी पर जा रही हो नहाने?
उसने कुछ नहीं कहा।
ज्वार आया होगा।
चलोगे? उसने बस इतना पूछा।
चलूँ? मैंने पूछा, हालाँकि इसकी क्या ज़रूरत थी!
वह बिना कोई उत्तर दिये आगे बढ़ गयी। असमंजस में मैं वहीं रुका रहा। दस क़दम बढक़र वह रुकी, मुडक़र देखा। मैं उसके पीछे बढ़ गया। वह फिर से आगे बढ़ गयी। गाँव के सीमाने को पार कर उसकी गति थोड़ी धीमी हुई, जिससे कुछ ही देर में मैं उसके साथ हो गया। उसने साबुनदानी और पीतल की लुटिया मुझे पकड़ा दिया। हाथ में लिये नाइटी के नीचे उसके अधोवस्त्र दिखे, जिसे उसने दिखने दिया।
नदी का जल-स्तर का$फी बढ़ गया था। लहरें ऊँची हुई आ रही थीं। घाट की अधिकांश सीढिय़ाँ जलमग्न थीं। चारों तरफ़ सुनसान, चरिन्द-परिन्द का नामोनिशान नहीं। बहती हुई हवा अपेक्षा से ज़्यादा ठंडी थी और उसकी गति तेज़। आसमान का रंग काला हो रहा था, बारिश कभी भी लौट सकती थी।
लौट चलो नैना। जब वह घाट की सीढिय़ाँ उतरने को हुई, मैंने कहा। मेरी आवाज़ जैसे लौकी की लता हो, नैना की गतिविधियों से लगी-बझी।
अकेले में मेरे साथ डर लगता है? ...भाई के सामने या माँ के सामने तो बड़े ढीठ बन जाते हो! उसने गर्दन मोडक़र मुझे देखा।
बात वो नहीं। नदी ख़तरनाक हो चुकी है।

उसने अपना हाथ बढ़ाया, जैसे बुला रही हो। आज सचमुच उसके हाव-भाव साँप की तरह आकर्षित करने, किन्तु डराने वाले थे। एक अजीब-से सम्मोहन में घिसटता जब मैं उसके एकदम पास घिसट आया, उसने फुसफुसा कर कहा, ज़रा मेरी नाइटी का हुक तो खोल दो। उसके बुलाने से लगाकर मेरे यहाँ आने तक के फ़ासले में उसकी उजली आँखें मेरी आँखों की दीवार को छील रही थीं। जब उसने आगे की तरफ़ मुँह कर लिया, मैंने देखा, हुक से उलझे हुए मेरे हाथ काँप रहे थे। तब तक उसने जूड़े में लगे पिन को ढीला कर झटके से बालों को खोल दिया। मेरे चेहरे को बुहारते हुए उसके साँवले केश उसकी कमर पर फैल गये, और ठीक इसी व$क्त मैंने उसकी नाइटी ढीली कर दी। एक पल के लिए उसकी नंगी पीठ झलकी और फिर केशों की आड़ में छिप गयी, जैसे एक क्षण के लिए बिजली चमकी हो, फिर पूर्ववत अँधेरा। उसकी पीठ की धूप ने मुझे चौंधिया दिया। गिरती हुई नाइटी को उसने थामने का कोई यत्न न किया। उसके आलता लगे तलुवों को गोलाई में घेरती हुई नाइटी ने सीढिय़ों के फर्श पर जैसे एक सुरक्षा वृत्त बना दिया और जब उसने दायाँ पैर उठाकर उस वृत्त को लाँघा, तो मुझे ऐसा लगा वह एकदम नंगी, दुनिया के खुले $खतरनाक में दाख़िल हो गयी। पीछे उस मूरख नाइटी की लाश बिछी थी जिसने मरते दम तक उसे ढँके रखने की जि़द पाल रखी थी।

वह जैसे किसी नशे के प्रभाव में सीढिय़ाँ उतर रही थी, फ़ैसलाकुन पाँव से दम्भ भरे क़दमों को एक नियमित अन्तराल से नापती हुई। जब उसके तलुवों ने पानी की सतह को स्पर्श किया, उसके पैरों के रोंगटे खड़े हो गये। वह रुकी। मुड़ी। हम दोनों की नज़रें मिलीं। मैं आगे बढ़ा। उसने साथ लाये धुले कपड़ों को बढ़ाया। मैंने ले लिया। उसके हाथ पीठ की तरफ़ मुड़े और उसने बड़ी सौम्यता से अपनी अँगिया को खोला। एक पल के लिए जैसे मुझे काठ मार गया। पीतल की लुटिया मेरे हाथ से गिर कर देर तक टुनटुनाती रही, फिर जलमग्न सीढ़ी पर जाकर पानी में गुड़प हो गयी। क्या कोई इतनी सुन्दर हो सकती है? उसकी शंक्वाकार गोलाइयों ने मुझे और मेरी दृष्टि को जड़ कर दिया। उसने हाथ बढ़ाकर मेरे बायें हाथ को पकड़ा और हवा में एक निश्चित दूरी तक अपनी छाती की दिशा में बढ़ाकर फिर छोड़ दिया। बीच की रिक्तता को मैंने ख़ुद तय किया। जैसे ही मैंने उन्हें छुआ, अब तक करीने से बिछे उसकी बाँहों के रोंये खड़े हो गये। उसके उभारों में कई नीली-हरी शिराएँ झलक रही थीं, मानो इस जि़द में कि अगर सिर्फ़ छातियों पर ध्यान केन्द्रित किया जाए तो वे चुगली कर सकें, ये छातियाँ भी अन्तत: रक्त-मांस की बनी हैं, दैवीय नहीं। कत्थई दानों के गिर्द एकाध रोंये अपना आकार खोकर बड़े छल्ले बना रहे थे। रोंये से भरे तलपेट, थोड़ा उभरा पेडू, बादल का घिरना, मेरा हल्के-हल्के काँपना— वहाँ जो कुछ था, कमज़ोर और थोड़ा कुरूप था, इसलिए अपूर्ण था, मानवीय था, इसलिए उत्तेजक था। वहाँ मुझे पहली बार अपनी मर्दानगी पर पूरा विश्वास न हुआ, वहाँ वह पहली बार सम्पूर्ण सुन्दर न लगी। वहाँ सबकुछ खुला था, हर राज़ से परदा उठ गया लगता था। वहाँ जो था, दो टूक वही था, उससे लगे-बझे क़िस्से, फन्तासियाँ कहीं नहीं थे। आज के बाद मेरी रातें बेस्वाद होनी थीं।

आती हुई लहरों ने अबकी हमारे काँपते घुटनों को निशाना बनाया। एक तेज़ की छपाक हुई और वह पानी में कूद चुकी थी। मैंने महसूस किया कि सबसे पहले मेरे उस अब तक बढ़े हुए हाथ पर एक बूँद गिरी। जैसे ही मैंने अपना चेहरा ऊपर आसमान की तरफ़ किया, मेरे गाल के ठीक ऊपर आँखों के पास एक और बूँद। शुरू के कुछ बूँदों का हिसाब रखने के बाद मैं गड़बड़ा गया, और वहीं खड़ा-खड़ा बारिश में भीगने लगा। कहीं दूर से बादल के घरघराने की आवाज़ आई। एक किलकारी, फिर होश आया कि नैना कहाँ है! वह नदी में काफ़ी आगे बढ़ गयी थी। छींटों से आगे का दृश्य धुँधला दिख पड़ रहा था और नैना एक छोटे काले धब्बे की तरह दिख रही थी। एक नज़र ऊपर की सीढिय़ों को देखा, दो-चार सीढ़ी ऊपर गिरी पड़ी नाइटी पानी में सराबोर हो अब लोंदे की तरह दिख रही थी। मेरे दायें हाथ में नैना का धुला हुआ कपड़ा भी भीगकर कीचड़ हो रहा था। कपड़ों को वहीं दो सीढ़ी ऊपर सावधानी से रखकर मैं मय कपड़ों के पानी में उतर गया।

नैना की किलकारी रह-रहकर गूँज रही थी। मैंने तैरना नया-नया ही सीखा था, थोड़ी दूर तैरने के बाद ही थक गया। पानी की सतह पर पड़ती बारिश की बूँदें साँस लेना दुश्वार कर रही थीं। कभी-कभी थपेड़े सीधे चेहरे पर पड़ते और तमाचे की तरह झनझनाते। नैना जैसे वापस आ रही थी। मैंने उसे आवाज़ दी, पता नहीं उसने सुना या कि नहीं। मुझे ख़ुद अपनी आवाज़ ठीक-ठीक नहीं सुनाई पड़ रही थी। लौटने की सोचकर एक नज़र पीछे की ओर देखा तो अहसास हुआ कि मैं एक ऐसी ख़तरनाक दूरी तक आ गया हूँ कि वापस लौटना भी शायद ही सम्भव है। सहसा एक डर से मेरा कलेजा काँपने लगा। मैंने महसूस किया कि अब हाथ-पैर चलाने में भी काफ़ी
मशक्क़त करनी पड़ रही है। जाँघें बँध गयीं। सिवाय मेरी चेतना के सब सुन्न पडऩे लगा। अन्तत: मैं चीख़ने लगा। हलक़ में नदी का पानी घुसने लगा। मेरी आवाज़ एक कुरूप घों-घों में तब्दील हो गयी।

जब मुझे होश आया, पहला अहसास यह हुआ कि बारिश अब भी हो रही है। मेरी पीठ किसी सख्त चीज़ पर टिकी हुई है और मेरे ऐन चेहरे के ऊपर कुछ अँधियारा-सा है। ...नैना थी। अलफ नंगी। उसकी छातियाँ उसकी देह का आसरा खोकर अब मेरे सीने पर टिकी थीं। वह कुछ कह रही थी और उसी ताल में मेरा कन्धा झकझोर रही थी। मैंने फिर से आँखें मूँद लीं।

थोड़ी देर बाद जब मैंने आँखें खोलीं, चारों तरफ़ देखा तो पता चला कि मैं नदी के दूसरे किनारे हूँ। नैना का कहीं कोई पता न था। कराहते हुए उठा तो अहसास हुआ, मेरी पीठ में चोट आई है, सिर किसी डिब्बे की तरह भारी था। बारिश अभी भी हो रही थी और ठीक मेरे ऊपर एक पाइप जैसा कुछ लगा था जो दूर दिखती दीवार में जाकर बिला जाता था। यह वर्षों से बन्द पड़ी जूट मिल की दीवार थी जो नदी के उस पार से भी दिखती थी। लोहे के उस जंग खाये पाइप का सहारा लेकर मैं खड़ा हो गया। चप्पलें उसी किनारे छूट गयी थीं। पतलून लस्त-पस्त। चारों तरफ़ देखा, नैना कहीं भी नहीं थी। खड़ा रहना दुश्वार होने लगा, तो वहीं धम्म-से बैठ गया। जाने कितनी देर तक बैठा रहा।

नैना जब लौटी तो उसके शरीर पर सिवाये जाँघिये के और कुछ न था। उसे देखकर मेरी घबराहट थोड़ी कम हुई, लेकिन जब उसी दीवार की आड़ से एक युवक भी निकला, तो मेरी हैरानी का ओर-अन्त न रहा। नैना ने बताया कि मैं लगभग डूब ही चुका था कि उसके इस दोस्त ने अपनी जान पर खेलकर मुझे नदी से निकाला। वह विस्तार से वर्णन करती रही। मुझे चुप देखकर उसने अन्त में पूछा, जब तुम्हें तैरना नहीं आता तो फिर क्यों कूद पड़े थे मेरे पीछे? मैं आ ही जाती एकाध घंटे में, बच्ची थोड़े हूँ!

नैना के बारे में यह इस तरह की पहली घटना थी, जिसका जिक्र मैंने शिबू से तो क्या, अपने जानने वाले किसी भी व्यक्ति से न किया। चन्दन नाम था उस लडक़े का, उसी के बुलाने पर वह नदी पार कर उससे मिलने आई थी। यह अजीब बात है कि यह सब उसके मुँह से सुनने और उसे किसी और के साथ अधनंगी अवस्था में देखने के बाद मुझे उससे प्रेम की तीव्र अनुभूति हुई। इससे पहले कभी वह मेरी इतनी अपनी नहीं लगी थी। दो-एक दिन बाद मैंने उसे एक प्रेम-पत्र लिखा था, लिखा था कि मैं उससे शादी करना चाहता हूँ। उसे पत्र थमाते हुए मेरे हाथ काँप रहे थे। उसने पूछा, क्या है ये? मैंने कहा, ख़ुद ही देख लो। जानती हूँ क्या हो सकता है, कहते हुए उसने पत्र को अपनी अँगिया में दबा लिया था। कई दिन बीत गये, उसने कोई जवाब नहीं दिया। पता नहीं उसने उस पत्र का क्या किया! एक बार साहस कर मैंने पूछा। उसने कहा, कई लोगों ने ऐसी चिट्ठियाँ पकड़ाई हैं। तुम्हें तो फिर भी जवाब दे दिया, औरों की चिट्ठी तो फाड़ के फेंक देती हूँ वहीं के वहीं।
तुमने मुझे जवाब कब दिया?
पहले ही दे चुकी हूँ। याद करो।


नैना की माँ को अन्दाज़ा था कि मुहल्ले के सारे उसके हमउम्र लडक़े उस पर जान छिडक़ते हैं। उन्हें अपनी जवानी के दिन याद आ जाते। वह नैना को ग़ौर से देखतीं, क्या ख़ूब क़द-काठ पायी है उसने! कभी उन्हें उस पर लाड़ आता तो कभी वे डर जातीं। एक बार उन्होंने मुझसे खुले शब्दों में पूछा था कि क्या मैं नैना को पसन्द करता हूँ! मुझे तब नदी पार वाली घटना याद आई और जो मैंने कहा, उसका मुझे आज भी अफ़सोस है। मैंने कहा था कि नैना से मैं हँसी-मज़ाक कर लेता हूँ, लेकिन इसके अलावा उसके प्रति मेरे मन में और कुछ भी नहीं। शिबू वहीं था, उसे मेरा यह जवाब सुनकर आश्चर्य हुआ होगा। उसकी माँ ने मेरे सिर में दुलार वाली उँगलियाँ फेरीं। मैं बहक गया, बोला, लेकिन काकी, नैना अब बड़ी हो रही है। उसे अकेले नदी पर नहाने के लिए या सौदा-सुलुफ के लिए मत भेजा करो। गाँववालों कैसे हैं, मुझसे बेहतर तुम जानती हो।

हाँ रे! ठाकुर दा ने उसके लिए कोई लडक़ा देख रखा है। एकाध सालों में देवी माँ ने चाहा तो पार लगा दूँगी। फिर ये शिबू रह जाएगा तो उसके लिए तो कोई चिन्ता नहीं।

हालाँकि शादी की बात सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा था, लेकिन उनके रवैये से मुझे थोड़ा साहस मिला था। मैंने पूछा, काकी, तुमने क्यों पूछा कि नैना मुझे पसन्द है कि नहीं?

वो तो वैसे ही पूछा था शोना! तुझे बचपन से देखती आ रही हूँ, लेकिन समझ नहीं पाई कभी। वह उठते हुए बोलीं। सहसा देहरी तक जाकर रुकीं और कहा, और सुन, शादी में अभी वक़्त है। तब तक तू भी यहीं है और नैना भी। हँस-बतिया लिया कर, मैंने उसे समझा दिया है, वह तुझे रोकेगी नहीं।

वह चली गयीं और मैं आश्चर्य से उन्हें देखता रह गया। शिबू भी थोड़ी देर बाद उठकर अपने कमरे में चला गया। एक नज़र मैंने नैना के कमरे की तरफ़ देखा, लेकिन फिर बाहर चला आया। उस दिन पहली बार मैं नदी के किनारे अकेले गया था। चट्टान पर बैठे-बैठे जाने कितना समय बीत गया! रह-रहकर उस दिन वाला दृश्य आँखों के आगे कौंध जाता जब नैना के साथ यहाँ आया था। उसकी उल्लंग छातियाँ, उसके घने बाल, बारिश, मौत, उसका प्रेमी। क्या नैना की माँ को उस युवक के बारे में पता है? क्या शिबू भी कुछ नहीं जानता? मुझे अपने-आप पर खीझ होती कि मैं ही क्यों न सबकुछ बता देता! बता दूँ, फिर नैना क्या सोचेगी मेरे बारे में? उसे मुझ पर यक़ीन न होता तो वह मुझे अपने साथ क्यों आने देती? लेकिन अगले ही पल मैं यह सोच कर शशोपंज में पड़ जाता कि क्या नैना ने यह सब इसलिए किया कि उसे मुझ पर यक़ीन था? या वह बताना चाहती थी कि वह मुझसे, तापस या उस पर मर-मिटने वाले दसियों लोग से नहीं, बल्कि उस चन्दन से प्रेम करती है!

निश्चित रूप से यह एक ऐसा सच था जो नैना के अलावा उसके घरवालों को पता नहीं था। मुझे पता भी था तो मैं उसकी माँ या शिबू से इस बाबत कुछ कहने वाला नहीं था, यह तय था। क्यों, यह ख़ुद मुझे भी नहीं मालूम। मेरे चारों तरफ़ ऐसे कई सच थे जिनके बारे में लोगबाग सब जानते थे, लेकिन उनकी चर्चा कोई नहीं करता था, क्यों यह नहीं मालूम। नैना की माँ और मेरे पिताजी के बारे में मेरी माँ अच्छी तरह वाकिफ़ थीं, उन्हें कई दफ़े छुपकर रोते मैंने देखा है। नैना का चेहरा-मोहरा मेरे पिताजी से मिलता था, फिर भी उसके लिए मेरे मन में कोई नेक ख़यालात नहीं थे, यह उसका सगा भाई शिबू या उसकी माँ भी जानती थीं। मेरी माँ नहीं जानती थीं कि मैंने कई बारी नैना की जाँघों को सहलाया है, उसकी छातियाँ मसली हैं। वह यह भी नहीं जानतीं कि मैं उनके दुख को समझने जितना बड़ा हो गया हूँ। या क्या पता जानती हों तो भी ज़ाहिर नहीं करतीं। रातों में मेरे गीले सपनों में कभी नैना होती तो कभी उसकी माँ, यह सच शिबू को मैंने बताया है, लेकिन क्या इस बारे में उसकी माँ जानती हैं? कई बार अनजान बनकर मैं शिबू की माँ की देह से सट गया हूँ, यह उन्हें अच्छी तरह पता होगा। तापस समझता है कि नैना औरों की अपेक्षा मुझे ज़्यादा छूट देती है, मेरे साथ अकेले नदी पर नहाने जाती है। मेरी माँ को नहीं पता कि मुझे तैरना आ गया है। शिबू की माँ समझती हैं कि मैं पानी से बहुत डरता हूँ, इसलिए वह भी कभी-कभी मुझे बरजा करती हैं कि नदी किनारे न जाया करूँ। शिबू मेरे साथ नहाना नहीं चाहता, अगर कभी मेरी जि़द पर नंगे पानी में उतरे भी तो मुझसे दूर-दूर ही रहा करता है। मेरे पिताजी ज़मींदार हैं, अमीर हैं, रसूख वाले, यह सच सब जानते हैं, मेरी माँ भी और मेरे स्कूल के हेड सर भी।

तापस को मैंने ही बताया था शेखी बघारते हुए कि उस दिन $खुद नैना ने मुझे अपने साथ नहाने चलने को कहा था। वह देर तक चुप रहा था, फिर पूछा था कि क्या नैना मुझसे प्रेम करने लगी है? 
कन्धे उचकाते हुए मैंने कहा था, शायद। 

तापस बुरी तरह मरोड़ खा चुका था। इससे पहले जाने कितनी बार उसने मुझे परेशान किया था, धमकाया था। आज वह ज़्यादातर चुप था। एक बार उसने मुझसे नैना के लिए लिखा प्रेमपत्र भी भिजवाया था जिसे मैंने रास्ते में ही फाडक़र फेंक दिया था। बाद में उसे पता चला, तो साथ-साथ यह भी पता चल गया कि हो न हो मैं भी नैना से प्रेम करता हूँ। क्या तू भी नैना से मोहब्बत करता है? तब उसने पूछा था। तब मैंने इंकार में सिर हिलाया था। फिर तुमने मेरी चिट्ठी क्यों नहीं दी उसे? मैंने बहाना बनाया था कि उसकी चिट्ठी मेरी पतलून की जेब में थी और ग़लती से माँ ने उसे धो दिया। उल्टे मैं ही उस पर चढ़ बैठा कि शुक्र करो कि माँ की नज़र में चिट्ठी नहीं पड़ी, वर्ना मेरी तो धुलाई होती ही, पिताजी तुम्हारी भी टाँगें तोड़ देते।

उस दिन मैंने नदी वाली बात सविस्तार बताई, सिर्फ़ चन्दन वाली बात छिपा गया। आगे वह सुन न सका। बोला, आटा निकालने को चक्की पर गेहूँ दे आया है। बातों ही बातों में देरी हो गयी। कि अब उसे निकलना होगा।

इसके बाद से तापस मुझसे कटा-कटा-सा रहने लगा, दूसरी तर$फ जब से मैंने शिबू की माँ से कहा कि नैना के लिए मेरे मन में कुछ ख़ास नहीं, शिबू ने पहले-सा निस्संकोच मेरे साथ उठना-बैठना शुरू कर दिया। अब मेरा भी प्रयास होता कि उसके सामने नैना या उसकी माँ के बारे में कोई ऐसी-वैसी बातें न करूँ। कभी खेल में उसके साथ कोई बेईमानी कर रहा होता, तो मैं उसके पक्ष में उतर जाता। एक बार जब पहले की तरह बीच खेल में तापस आया और उसने हमें आवाज़ दी, शिबू उसकी तरफ़ बढऩे ही लगा था कि मैंने उससे साफ़ शब्दों में कहा कि अभी हम दोनों नहीं आ सकते। शिबू ने इशारे में मना करना चाहा लेकिन मैं अड़ गया कि जब तक खेल पूरा नहीं होता, और उसके बाद भी जब तक हमारी इच्छा नहीं होती, हम यहाँ से नहीं जाएँगे। कुछ देर तक तापस वहीं खड़ा-खड़ा हमें खेलता हुआ देखता रहा, फिर चुपचाप लौट गया। उस दिन शिबू के चेहरे पर एक अरसे के बाद मैंने ख़ुशी की पनियल छाँह देखी। उस दिन मुझे उस पर बड़ा प्यार आया था।

इसके बाद मैं जब भी शिबू-लोगों के घर जाता, काकी से बातें करने के बाद, या शिबू के कमरे में कुछ व$क्त बिताने के बाद निकल आता। नैना की याद आती भी तो प्रकट नहीं करता। कभी नैना से दो-चार हो जाता, तो भी मेरी कोशिश रहती कि उससे आम बातचीत ही हो। मैंने कई बार साफ़-साफ़ महसूस किया कि उसकी माँ या शिबू ही, जान-बूझकर मुझे नैना के साथ अकेला छोडऩे की फ़िराक़ में हैं, लेकिन हर बार मैं बहाना करता कि अब देर हो गयी, मुझे घर लौटना चाहिए। दूसरी एक आदत मुझमें और आ गयी कि अब मैं अक्सरहाँ नदी के किनारे अकेले बैठ जाता। काफ़ी सुकून का अहसास होता बहते हुए पानी को देखकर। शाम बीत जाती, अँधियारा होने लगता तो ही मैं घर जाने का उपक्रम करता।

एक दिन माँ ने पूछा, क्या बात है आजकल चुप-चुप रहने लगा है! मेरी समझ में न आया कि क्या वा$कई मैं चुप-चुप रहने लगा हूँ! मैंने बस इतना ही कहा, नहीं तो माँ! फिर माँ मेरे साथ देर तक बैठी मेरे दोस्तों, मेरी पढ़ाई-लिखाई की बातें करती रहीं। मैंने उनकी गोदी में अपना सिर टिका दिया। वह मेरे बालों में कंघी की तरह उँगलियाँ करती रहीं। कुछ देर बाद हम दोनों चुप हो गये। मेरी आँखें मुँदने लगीं। मैं अपनी माँ की गोदी में था, लेकिन मुझे शिबू की माँ याद आती रहीं। मुझे जीवन में पहली बार शिबू की माँ के सन्दर्भ में ग्लानि का अहसास हुआ। वह कहीं से भी मेरी माँ से अलहदा नहीं थीं। थोड़ी देर ऐसे ही लेटे-लेटे मुझे नींद आ गयी। जब आँख खुली, मेरे सिर के नीचे तकिया लगा हुआ था। रात के आठ के आसपास का वक़्त होगा, माँ रसोई में होंगी। जाने कब वह वहाँ से चली गयी थीं।


सुबह-सुबह जब मेरी आँखें खुलीं और महरी की जगह नैना को अपने कमरे में झाड़ू लगाते देखा तो मेरे मुँह से चीख़ निकलते-निकलते रह गयी। माँ स्नान करने के बाद पूजा की तैयारी कर रही थीं। मैंने जब पूछा तो उन्होंने बताया कि महरी अपने बेटे के यहाँ कोलकाता लौट चुकी है।

अब मुझसे तो यह सब पार लगेगा नहीं। शिबू की माँ काम पर लगना चाहती थी, लेकिन तू जानता है उसकी शकल मुझे पसन्द नहीं। जब तक कोई और महरी नहीं मिल जाती, नैना ही कर दिया करेगी। माँ ने जब कहा तो पता नहीं क्यों मैं भीतर तक दहल गया।
किसी और को भी रख सकती थी।
क्या हुआ सुबह-सुबह तुझे? माँ ने उल्टी हथेली मेरे माथे पर लगाकर तापमान जाँचा। मुझे चिढ़ हुई। मैंने उनका हाथ झटक दिया।
तू ठीक तो है न?
मुझे क्या होगा! लेकिन तुम तो जानती हो, मेरे कमरे में मेरी घड़ी, बटुआ सब यों ही पड़े रहते हैं। पहले वाली महरी थी तो डर नहीं था। मैंने बात बनाई।
देख, भले मैं शिबू की माँ को पसन्द नहीं करती, लेकिन इतना जानती हूँ कि ये लोग और चाहे जो कर लें, चोरी-वोरी नहीं करेंगे। वर्ना शिबू की माँ की जगह कोई और होती, तो वो बहुत कुछ कर सकती थी। कड़वा-सा मुँह बनाकर माँ मुड़ चुकी थीं। मैं वहीं खड़ा रहा, जब तक नैना को अपने कमरे की सफ़ाई कर निकलते नहीं देख लिया।

उस दिन स्कूल से लौटकर मैंने अपना बैग फेंका और तुरन्त बाहर निकल गया। नैना भी स्कूल से लौट आई होगी और थोड़ी देर में यहाँ पहुँच जाएगी। कई दिनों तक मेरी कोशिश थी कि मेरा सामना उससे न हो। वह सुबह सात बजे के आसपास आ जाती और नौ-साढ़े नौ तक रहती, शाम को पाँच बजे के आसपास आने के बाद लौटना रात के खाने के बाद ही होता। जाते हुए माँ कुछ खाना भी बाँध देती। कभी उसे जल्दी निकलना होता तो खाने का डब्बा पहुँचाने का काम मुझे करना पड़ जाता। शिबू-लोगों के लिए माँ की यह हमदर्दी मेरे पल्ले नहीं पड़ रही थी। कहाँ तो वह कभी उनके नाम से ही चिढ़ती थीं, मुझे वहाँ जाने से रोका करती थीं और कहाँ अब अपने हाथों से डब्बा तैयार करतीं, मुझे पहुँचाने के लिए चिरौरी पर उतर आतीं। इसका नतीजा यह हुआ कि शिबू के साथ उसके घर की मेरी तफ़रीह कम से कमतर होती गयी। कभी जाता और उसकी माँ मेरी आवभगत में घर की एकमात्र कुर्सी लाने के लिए शिबू को भेजतीं तो मुझे अटपटा लगता। वह पूछतीं, क्यों बेटा, नैना मन लगाकर काम तो कर रही है न? तो मैं कन्धे उचका देता। फिर उसकी माँ देर तक मेरी माँ की तारीफ़ करती रहतीं। कहतीं, साच्छात देवी हैं दीदी। भगवान मुझे कभी माफ़ नहीं करेंगे। उनकी आँखें झिलमिलाआतीं। सबसे नज़रें बचाकर पल्लू से पोंछ लेतीं।

काफ़ी वक़्त लगा मुझे नैना के इस नये अवतार को स्वीकार करने में। धीरे-धीरे मैं सहज हुआ। इस बीच की अवधि में उसने मुझे समझा, कभी भी उसने कोशिश नहीं की कि मुझसे अकेले में मिले, बातें करे। बल्कि जब से उसने मेरे घर काम करना शुरू किया, वह मेरे प्रति पहले-सी शो$ख नहीं रही। हमेशा एक तरह की रुक्षता उसके नक़ूश पर मली होती। वह माँ की फरमाँबरदार थी। माँ उसे बहुत मानने लगी थीं। शाम को सारे काम निबटाकर दोनों टीवी देखने बैठ जातीं, मुझे हँसी आती दोनों को साथ बैठे सास-बहू वाला धारावाहिक देखते देखकर। कई दफ़े माँ उसे लाड़ से भरकर डाँटतीं कि वह अपना ख़्याल नहीं रख रही, बाल अस्त-व्यस्त हो रहे हैं, कपड़े मैले हो गये हैं इत्यादि। हद तब हुई जब एक दिन माँ ने ख़ुद मेरी अलमारी से क्रीम निकालकर उसे दिया कि वह नहाने के बाद अपने चेहरे पर लगाया करे। न सिर्फ़ यह, बल्कि उसे इस बात की इज़ाजत मिल गयी कि वह यहीं का साबुन-शैम्पू इस्तेमाल करे। नैना ने संकोच से मेरी तरफ़ देखा था तो माँ ने कहा था, उसकी ओर क्या देख रही है, मैं कह रही हूँ न! दुर्गापूजा के अवसर पर पिताजी ने तो चाहे जो दिया हो, माँ ने अपनी तरफ़ से भी नैना के लिए दो जोड़ी सलवार-कमीज़ दिलवायी। नैना ने उसे मेरी ही अलमारी में रख दिया यह कहकर कि उसके घर में सीलन से ये महँगे कपड़े ख़राब हो जाएँगे। देखते-देखते मेरी अलमारी के एक आले पर उसका उपनिवेश स्थापित हो गया। उसकी बिन्दियाँ, चूड़े, पाउडर, आलते की शीशी, मेहँदी के पैकेट्ïस, कपड़े आदि वहाँ सलीके से जमाये रखे रहते। जब भी मैं अलमारी खोलता, उसका आला देखकर एक सुखद अनुभूति से भर जाता। कभी मेरी कंघी में नैना का कोई टूटा हुआ बाल फँसा मिल जाता, तो कभी मेरी मेज़ पर गृहशोभा गोल-मोल कर रखी होती।

जब उसे पहली तनख़्वाह मिली, वह सीधे मेरे कमरे में आई। मैं बिस्तर पर लेटा हुआ जीबनानन्द दास को पढ़ रहा था। उसने मुझे देखा, मुस्करा दिया। अँगिया में गुड़ीमुड़ी कर रखे नोटों को निकाला, थूक लगाकर उन्हें गिना। अलमारी खोली और उस डिबिया को निकाला, जिसमें मैं खुले पैसे जमा रखता था। मैं चुपचाप उसे देख रहा था। उसने कहा, पूरे साढ़े पाँच सौ हैं, रख रही हूँ। हिसाब रखना तुम्हीं।
और अगर मैंने खर्च कर दिये तो? मैंने शरारती हँसी हँसते हुए पूछा।
मत करना। वह जाने लगी। फिर रुकी। मुड़ी। पूछा, नहीं करोगे न खर्च?
नहीं करूँगा।
मुझे छूकर बोलो। उसने अपनी बाँह बढ़ा दी। कोहनी के आगे उसकी बाँह वक्र हो गयी थी। बाँह की रोंयेदार पीठ नीचे थी और पीठ की अपेक्षा पेट की चमड़ी मुलायम और उजली थी। इससे पहले जाने कितनी दफ़े मैं उसकी बाँहें पकड़ चुका था, लेकिन यह पहली बार था कि उसकी बाँहों को छूते हुए मैंने अपने भीतर एक सिहरन महसूस की।

वह जाने लगी, फिर पलंग के पैरहाने सटकर खड़ी हो गयी। चेहरा नीचे। एक हाथ से केश की सँवार से बाहर निकल आई लट को तर्जनी में घुमेटती। चुप। मैंने कहा, तुम्हें छूकर कहा न! नहीं करूँगा खर्च, निश्चिन्त रहो।
नहीं, वो बात नहीं है।
फिर?
वह किसी असमंजस में थोड़ी देर चुप बनी रही। फिर चेहरा उठाकर हठात्ï बोली, तुम बाज़ार जाओगे?
क्यों?
एक काम था।
क्या?
तुमसे कुछ मँगवाना था। ...अपने लिए।
हाँ भई अब तो तुम अमीर हो गयी हो, हाथ खोलकर खर्च कर सकती हो। मैंने हँसते हुए कहा। उसने बस एक फीकी हँसी हँस दी। हँसने की जुम्बिश में आँखों के कोर छोटे हो गये और उनमें मधु भर आई।
क्या मँगवाना है? रघु को बोल दूँ? रघु हमारा नौकर था, घर के लिए सौदा-बाज़ार या बाहर के अन्य काम वही किया करता था।
नहीं, तुम जाओगे तो बताना। वह जाने को उद्धत हुई तो मैंने उसे टोका, ठीक है शाम को जाऊँगा। अब तो बोलो क्या मँगवाना है?
जाने लगना तो बताना। कहकर वह चली गयी। मैंने पुस्तक एक तर$फ कर दी और करवट लेकर उसके बारे में सोचने लगा।

शाम को जब मैं तैयार हुआ तो वह चाय देने मेरे कमरे में आई। एक बार एहतियातन इधर-उधर देखा और हाथ में दबायी एक मुड़ी-तुड़ी पर्ची थमा दी। पसीने से भीगने को आई उस पर्ची को जब मैंने खोलना चाहा तो उसने फुसफुसाकर बरज दिया, अभी नहीं, बाज़ार में पहुँचकर खोलना। मैं कुछ समझा नहीं, इस भाव से उसे देखने लगा। मेरे हाथ से पर्ची छीनकर उसने मेरी कमीज़ की जेब में डाल दी। यह सब करते हुए उसका मेरे पास आना अनायास ही हो गया। मैंने दरवाज़े की तर$फ देखा कि किसी ने देखा तो नहीं। वह ढीठ वहीं खड़ी रही। निचले होठ को दबाये मुस्कराती हुई। मेरी जेब को अपनी हथेली से सहलाने-थपथपाने लगी।

क्या बात है, मुझसे तुम्हारा मन भर गया लगता है? उसने धीमे से पूछा। पूछने की इस सुनहली बेशरमी में उसका चेहरा कम आँखें ज़्यादा झुक गयीं।
मेरी साँसें तेज़ हो गयीं, हटो यहाँ से, कोई आ जाएगा।
माँ सन्ध्या-पूजन कर रही हैं। उसका चेहरा अभी भी नीचे था।
घर में और लोग भी हैं। कहते हुए मेरा चेहरा ख़ुद-ब-ख़ुद उसके चेहरे से सटने लगा। उसने अपना चेहरा ऊपर को तान दिया। नज़रें मिलीं। मैंने उसकी कमर अपनी बाँहों में बाँध ली। मेरी जेब पर रखी हुई उसकी बाँह अब तक कॉलर का घेरा बनाते हुए मेरे कन्धे पर आ चुकी थी। उसकी देह से पसीने और मसालों-घी की घरेलू गन्ध आ रही थी।
तुम्हें मैं सुन्दर लगती हूँ?
हूँ। बहुत।
कितनी? वह घुँघरुओं-सी खिलखिलाहटों के बीच बोली।
मेरा चेहरा और पास आ गया। मेरी संजीदगी को भाँपकर उसकी हँसी काफूर हो गयी। होठों पर पिछली मुस्कराहट के आधे-अधेले संस्मरण शेष रह गये। कुनमुनाती हुई बोली, कोई आ जाएगा। उसके इस कहे हुए वाक्य की दीवार दरकती हुई-सी थी।
माँ पूजा कर रही हैं।
घर में और लोग भी हैं। कहते हुए उसने अपना चेहरा मेरे चेहरे से साट दिया।

मैंने अपने होठ उसके होठों से लगा दिये। उसकी नासापुटों से भाँप का एक गर्म झोंका निकला। मेरी ज़ुबान ने पहली बार उसके तालू का स्वाद चखा। थोड़ी देर बाद उसने कहा, छोड़ो न! मैंने उसे छोड़ दिया। उसकी नज़र मेरे बिखर चुके बालों पर गयी। सबकुछ भूलकर सहसा वह हँसने लगी, देखो तो, एकदम भालू जैसे लग रहे हो!
वह कंघी ले आई और मेरे सामने आकर मेरे बालों को सँवारने लगी। पहली बार मुझे पता चला, वह क़द में मुझसे बित्ता भर नीची थी। मैंने सिर झुकाया हुआ था, वह अपनी एडिय़ों को ज़रा उठाकर खड़ी थी। थोड़ी देर में मैं एक अच्छा बच्चा बन गया। मेरी ठोड़ी पकडक़र उसने मेरा चेहरा दाएँ-बाएँ करके मुझे निरखा, फिर मेरी पेशानी को चूमते हुए कहा, देखने में तो तुमसे शरीफ़ कोई और नहीं!


मुझे नहीं पता था कि पर्ची में क्या लिखा था नैना ने। अगर इस बात का ज़रा भी अहसास होता तो मैं अपने साथ शिबू को ले जाने की $गलती कभी न करता। शिबू ने पूछा भी था कि ऐसा क्या ख़रीदना है जिसके लिए मुझे ख़ुद बाज़ार जाने की नौबत आन पड़ी। मैंने उससे कहा था कि ख़रीदना कुछ ख़ास नहीं, बस कई दिनों से इस तरफ़ आना नहीं हुआ तो सोचा घूम-फिर लिया जाए और जब नैना ने जाना कि मैं बाज़ार आ रहा हूँ तो घर की कुछ ज़रूरी चीज़ों की फ़ेहरिस्त पकड़ा दी। फिर मैंने बात बनाई, यार दरअसल मुझे कभी-कभी आते रहना चाहिए, पता तो चले कि जिस चीज़ का भाव रघु बीस रुपये बता रहा है उसका असल रेट क्या चल रहा है!
बात तो ठीक कहते हो! शिबू ने सहमति में सिर हिलाया, एक बात अच्छी लग रही है कि तुम घर के प्रति काफ़ी
जि़म्मेदार हो गये हो।

मैं हँस दिया। गाँव से कुछ दूर जहाँ हाइवे एक तीखा कोण लेकर बिछी है, एक छोटा-मोटा बाज़ार बस गया है। ज़रूरत के सामानात की दुकानें और फिर एक मछली बाज़ार। ज़ेरॉक्स-एसटीडी बूथ, जूते-चप्पलों, मिठाइयों, सैलून, विडियो पार्लर, कपड़ों और दवाइयों की दुकानें थोड़ा हटकर हैं और इससे सटा हुआ सब्ज़ी बाज़ार। पान-चाय की एक टिपरिया दुकान पर बैठकर मैंने दो सिगरेटें लीं और दोनों को शिबू की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, जा चूल्हे से सुलगा ला। उसने हैरत भरी नज़रों से मुझे देखा, बोला कुछ नहीं। सिगरेटें लेकर चूल्हे की तरफ़ बढ़ गया। साथ में हमने चाय भी ऑर्डर की। पैसे देने के लिए जब मैंने जेब टटोली, साथ में नैना की दी हुई पर्ची निकलकर गिर गयी। शिबू ने उठाया, पढ़ा। वह नैना की हस्तलिपि से वा$िक$फ था। चुपचाप पर्ची को मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

क्या मँगाया है नैना ने?
मेरे इस सवाल के जवाब के रूप में शिबू ने कहा, यार तुम ख़रीदारी करो, मेरा पेट ज़रा गड़बड़ है सुबह से। मैं पीछे की तालाब का चक्कर लगा आता हूँ।
ठीक है, फिर यहीं मिलना। आधे घंटे में। पर्ची को जेब में ठूँसकर मैं आगे बढ़ गया। थोड़ी देर बाद जब मैंने पर्ची को निकालकर पढ़ा तो सहसा साँप सूँघ गया। अनजाने ही आज फिर से शिबू पर मैंने अत्याचार कर दिया था। नैना ने अपने लिए कुछ सैनिटरी नैप्किन्स और एक ब्रेसरी मँगायी थी। सैनिटरी नैप्किन्स के आगे घसीटकर लिखा था, जैसा टीवी में दिखाया जाता है।
इन चीज़ों को ख़रीदने में मुझे कितनी परेशानी आई, बता नहीं सकता।

ख़रीदारी करके निकलते हुए मुझे महसूस हो रहा था कि मेरे हाथ में पॉलिथीन का बैग नहीं, बम की अटैची है। शिबू मुझे वहीं मिल गया। मैंने उससे कहा, यार मुझे नहीं पता था कि नैना ने यह सब लाने के लिए लिखा है। तेरी क़सम। वह मुस्करा दिया, कोई बात नहीं। मैं उसका भाई हूँ, इसलिए शायद मुझसे कहते शरमा रही होगी। फिर मेरे बाद बचा तो एक तू ही न जो यह सब उसे लाकर दे!

उसकी बात सुनकर मैं दंग रह गया। कितनी बड़ी बात उसने कितनी आसानी से कह दी थी! नैना के लिए मैं एक बाहरी पुरुष था और शिबू घर का। इसलिए वह शिबू से उतना नहीं खुल सकती जितना मुझसे। शिबू उसे बचपन से देखता आया था, उसके लिए वह वही बहन थी जिसे कभी-कभी उसने अपनी गोद में बहलाया था, अपने हाथों से निवाले खिलाये थे। धीरे-धीरे वह बड़ी होती गयी और उसके रूप-रंग,  क़द-काठ ने अपना एक ज़ुदा अस्तित्व धारण किया। लेकिन शिबू ने भाई होने के नाते हमेशा उसकी इस छवि को नज़रअन्दाज़ किया। मैं या तापस या अन्य लडक़े जब उससे नैना की सुन्दरता, मादकता के बारे में बातें करते तो वह एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देता। यह एक झूठ था कि उसकी बहन उसके लिए अब भी बच्ची थी, लेकिन भाई होने के नाते वह इस झूठ को पूरी शिद्ïदत से निभाये जा रहा था। मेरे हाथों में पॉलिथीन का जो बैग था, उसमें उसकी बहन की छातियों की नाप थी, लेकिन शिबू से पूछा जाए तो उसे पता नहीं था कि उसकी बहन की छातियाँ भी हैं।

शिबू भली-भाँति परिचित था कि जब से नैना हमारे घर पर काम करने लगी है, उससे मेरी निकटता बढ़ गयी है। धीरे-धीरे न सिर्फ़ शिबू को, तापस इत्यादि सबको इसका अहसास हो गया। कई लडक़े मुझे चिढ़ाते थे, हँसी-मज़ाक करते थे। शिबू इसे भी सहजतापूर्वक लेता, कम से कम मेरे सामने सहज ही दिखता। इसके उलट तापस मुझसे उखड़ा-उखड़ा रहने लगा। कभी आते-जाते उससे टक्कर हो जाती, वह मुस्कराता, पूछता कि क्या नया चल रहा है, लेकिन फिर तुरन्त किसी बहाने खिसक लेता। उसे जानने वाले उसका यह रूप देखकर आश्चर्य में थे। पहले भी वह घंटों बगियारी में घूमता-टहलता दिख जाता था, कभी कोई गीत गुनगुनाते हुए, कभी कोई पुस्तक पढ़ते हुए, लेकिन इस बीच वह लगभग पूरा का पूरा दिन पागलों की तरह भटकता रहता। और एक सुबह, जब अभी रात का धुँधलका शेष था, तारे ठीक से डूबे नहीं थे और आसमान के एक कोने में थका हुआ चाँद धीरे-धीरे रेंग रहा था, उसने पेड़ की एक मजबूत डाल से लटककर फाँसी लगा ली। उसके शरीर पर एक सूत न था, और आँखें बाहर निकलने-निकलने को थीं। नीचे मिट्टी पर उसकी कविताओं की कॉपी पड़ी थी, जिसके पहले पृष्ठ पर बड़े हरफों में ‘तुम्हारे लिए...’ लिखा था।

उसकी मृत्यु के बाद पता नहीं क्यों शिबू बुरी तरह खौफ़ज़दा हो गया था। कई बार अकेले में वह मेरा हाथ थाम लेता और जैसे उसकी साँसें रुकने लगतीं। किसी दिशा में एकटुक देखते हुए वह अपनी काँपती तर्जनी उठाता और कहता, वह देखो। मैं उसके बालों में हाथ फेरता और पूछता, क्या दिख रहा है? वह हकलाते हुए कहता, पता नहीं कौन है, पूरा नंगा। देखो, वह हमारी ओर ही नज़रें गड़ाये हुए है। मुझे याद आया, जब हमें एक पागल बुड्ढे ने यह सूचना दी थी कि आम की बगियारी में तापस की लाश लटक रही है, शिबू देखने जाना नहीं चाहता था। मेरी ही जि़द पर वह वहाँ गया था। तब तक पूरे गाँव में चर्चा फैल चुकी थी। काफ़ी भीड़ लगी थी वहाँ। पड़ोस के पुलिस थाने से दो हवलदार और चांडाल बुलाये जा चुके थे। लाश को उतारा जा चुका था। डाल में गाँठ पड़ जाने से फन्दे को खोला नहीं गया था, चाकू से काटकर एक तर$फ रखा गया था। रस्सी का कुछ हिस्सा अभी डाल से लटक रहा था। तापस की माँ छाती पीट-पीटकर रो रही थीं। कह रही थीं, आख़िर उस चुड़ैल ने मेरे बेटे को लील ही लिया। मिल गयी शान्ति अब उसे!

उसकी माँ का विलाप सुनकर शिबू ने फुसफुसाते हुए मुझे वहाँ से निकलने को कहा था। जब मैंने कोई तवज्जो न दी तो थोड़ी देर में वह स्वयं वहाँ से निकल गया। बाद में मैंने उसे चारों ओर खोजा, वह नदी के किनारे उसी चट्टान पर बैठा मिला जहाँ तापस अक्सरहाँ बैठा करता था। जब मैं वहाँ पहुँचा, एक पल के लिए उसकी पीठ देखकर लगा, वह नहीं तापस है। घुटनों में अपना सर दबाये बैठा शिबू धीमे-धीमे रो रहा है, इसका पता थोड़ी देर बाद उसकी पीठ को एक लय में हिलते देखकर हुआ। मैं दबे पाँव उसके पास पहुँचा और ज्यों ही उसकी पीठ को सहलाया, वह डर के मारे एकबारगी चीख़ पड़ा। मैं हूँ यार, मैंने कहा तो उसने आस्तीन से आँसुओं को पोंछा और एक भद्दी-सी गाली निकाली। यह गाली मेरे लिए नहीं थी, मैं जानता था। वह अक्सर अपनी माँ के लिए यही गाली निकालता था, लेकिन अबकी यह गाली उसकी माँ के लिए भी नहीं थी, यह भी मैं जानता था। तब मुझे उस पर ग़ुस्सा आया। ज़बान सँभाल के बात किया कर, इसमें उस बेचारी का क्या दोष है?

उसने मेरी दोनों बाँहों को पकडक़र झकझोरते हुए कहा, यार, मैं उसे तुझसे ज़्यादा जानता हूँ। तू उससे बचकर रहना, वर्ना तुझे भी खा जाएगी एक दिन। इतना कहकर वह दुबारे से रोने लगा। मैंने उसे चुप नहीं कराया। सचमुच तब मैं डर गया था।

इसके बाद शिबू बीमार पड़ गया। एक दिन मैं उसके घर पर था। सुबह का समय था। नैना भी वहीं थी। उसकी माँ शिबू की पट्टियाँ कर रही थीं। अचानक आँगन में बँधे तार से अँगोछा उतारते हुए नैना ने अपनी माँ से कहा, मैं नहाने जा रही हूँ। मैंने देखा, उसकी माँ थोड़ी असहज हुईं, फिर बोलीं, आज यहीं नहा ले। नैना ने मेरी तर$फ इशारा करते हुए कहा, दादा को साथ लिये जा रही हूँ। डरने की कोई बात नहीं, घंटे भर में आ जाएँगे। दादा को बहुत दिनों से टाल रही थी, आज जाने दो। वह  साफ़-साफ़ झूठ बोल रही थी, लेकिन मुझसे कुछ कहते न बना। उसकी माँ ने मेरी तरफ़ प्यार से देखा। कहा, ख़्याल रखना कोई देख न ले।

मैं न चाहते हुए भी उठा और नैना के साथ हो लिया। रास्ते में मैंने पूछा, तुमने झूठ क्यों कहा?
मेरी मर्ज़ी। तुम्हें वहीं के वहीं बता देना था कि मैं झूठ बोल रही हूँ।
मेरे बताने से भी क्या काकी मान लेतीं कि तू झूठ बोल रही है?
वही तो! वह इतराकर बोली। उसका यह इतराना मुझे बाज़ारू  क़िस्म का लगा। ताव में आकर मैंने कहा, आज तुझे नदी के उस पार नहीं जाने दूँगा।
अच्छा? उसने ललकारने के स्वर में मेरी तरफ़ तिरछी नजरों से देखते हुए कहा। उसकी बायीं आँख के सफ़ेद कोये में एक तिल था जो अभी साफ़-साफ़ दिख पड़ा।
आख़िर क्यों कर रही है ये सब? मैं लगभग गिड़गिड़ा रहा था। मुझे अपनी आवाज़ से घिन-सी हुई।
तुम करो तो ठीक और मैं करूँ तो ग़लत?
मैंने क्या किया आज तक तेरे साथ? मेरी आवाज़ तेज़ हो गयी। उसने उसी अनुपात में धीमे-से कहा, मैंने क्या रोक रक्खा है? बस तुम भी मुझे न रोका करना।

स्वीकार करता हूँ कि जब से नैना ने हमारे घर पर काम करना शुरू किया था, मेरे मन में उसके प्रति जो भावनाएँ पहले थीं, बदलने लगी थीं। उस दिन जब नैना ने नदी पार करने की जि़द की, मैंने मना कर दिया। वह अकेले ही गयी। मैं चट्टान पर बैठा उसे दूर तक देखता रहा। धीरे-धीरे तैरते हुए उसका आकार छोटा होता जाता था और जब वह थोड़ा-सा कुछ भी नहीं बची, मैंने आँखों का रुख़ मोड़ लिया। उसे लौटने में तक़रीबन एक-सवा घंटा लगा। इतनी देर तक मैं वहाँ क्यों बैठा रहा, और बैठे-बैठे क्या कुछ सोचता रहा, पता नहीं। लौटी तो वह थोड़ा चुप-चुप थी। मैंने जाने क्यों पूछा, क्या हुआ? सब ठीक है न!

वह चुप रही। चुपचाप आकर चट्ïटान पर मेरे बगल में बैठ गयी। थोड़ी देर बाद मैंने उसके चेहरे से अपनी आँखें हटाकर नदी की पनैली सतह पर लगा दी। इस तरह काफ़ी देर बैठने के बाद मैंने कहा, देर हो रही है, अब हमें लौटना चाहिए।

उसने कहा, तुम्हीं बोलो, कल को कोई और भी फाँसी लगा ले, इस नदी में डूब मरे, ज़हर खा ले, तो इसमें मेरा क्या दोष!
मैं चुप रहा।
उसने कहा, तुम बहुत अच्छे हो। सब तुम्हारे जैसे नहीं होते।
धूप में अब तक उसकी देह से चिपके गीले कपड़े सूखने को थे। फिर भी वह आड़ में चली गयी। लौटी तो उसने कपड़े बदल रखे थे। हम बीमार क़दमों से घर को लौट पड़े।


शिबू से मेरे सम्बन्ध अब पहले से बेहतर थे। तापस की आत्महत्या को लेकर उसके मन में जो ग्रन्थि समा गयी थी, उससे वह काफ़ी हद तक उबर चुका था। नदी किनारे हम फिर से जाने लगे थे। अब तक हमने अच्छी तरह से तैरना सीख लिया था। कभी-कभी हम नदी के पार चले जाते। तैरना एक नशे की मानिन्द था और जब तक हम पूरी तरह से थक न जाते, घर लौटने का नाम नहीं लेते। ख़ासकर तैरते हुए जब हम नदी की देह के ऐन बीचोबीच होते, लगता हम किसी गोलाद्र्ध की सबसे ऊपरी नोक पर टिके हैं और हमारे चारों तरफ़ सिर्फ़ पानी ही पानी है। पृथ्वी कितनी गोल है, यह तैरते हुए ही जाना जा सकता है।

कभी-कभी ऐसा होता कि तैरते हुए हम दोनों में से कोई एक दस रस्सी भर आगे निकल जाता। तब पीछे छूटे हुए को एक बेचैनी-सी घेर लेती। लगता, यदि उसने तेज़ हाथ-पाँव न मारे तो बस डूब ही जाएगा। लगता, पूरी दुनिया आगे निकली जाती है और वह अकेला छूट गया। लगता, पीछे कोई तापस है जो हमारे पैरों को बाँधे दे रहा है, अपनी ओर, पीछे से और पीछे खींचे लिये जा रहा है। तब सचमुच डर लगता।

पता नहीं ऐसा कैसे होता कि ऐन तभी सामने वाला पीछे छूट गये की मानसिकता को भाँप लेता और जान-बूझकर उसकी गति धीमी पड़ जाती। ऐसे ही एक बार जब मैं आगे था तो एक हल्की-सी आवाज़ आई पीछे से। तैरते हुए नदी की आवाज़ से थोड़ा अलग इस आवाज़ को सुनकर मैंने पूछा, शिबू? आ जा, थोड़ा तेज़ चला हाथ। ...कोई प्रतिक्रिया नहीं। मैं थोड़ा धीमा हुआ। रुका। मेरे पैर नीचे हुए। मुड़ा। देखा। शिबू कहीं नहीं था।
हाँ, मैं डर गया।

मैंने डरते हुए आवाज़ लगाई, शिबू-शिबू! इधर-उधर देखा। नहीं, वह कहीं नहीं था।

मैंने अपनी सोच को तत्काल के लिए स्थगित किया और विपरीत दिशा में तैरने लगा। घाट के क़रीब जैसे ही मेरे पैर ज़मीन से छूने लगे, मैंने एक दौड़ लगाई और सीधा घाट पर। एक नज़र फिर से नदी की तरफ़ देखा, वह चुड़ैल ऐसे बह रही थी जैसे इन सबसे उसका कोई देना-पावना नहीं। दूर दृश्य के सुलझेपन में सबकुछ पूर्ववत था। शान्त, स्थिर। कहीं कोई हलचल नहीं। मैंने महसूस किया कि मेरे घुटने काँप रहे हैं। मैं वहीं सीढिय़ों पर उकडू होकर बैठ गया। मितली-सी आने लगी। फिर अचानक मैं रोने लगा और देर तक हिचकियाँ लेता रहा।

मुझे उम्मीद थी कि थोड़ी देर में शिबू लौट आयेगा। मैंने एक बार शुरू से सबकुछ सोचा, कैसे हम एक साथ पानी में उतरे थे, थोड़ी दूर तक साथ-साथ ही तैरना हुआ था। फिर मेरी गति बढ़ी और बढ़ती ही गयी थी। फिर पीछे से आने वाली आवाज़ पर मैंने $गौर किया, क्या वह शिबू था? मैंने दिमा$ग पर ज़ोर डाली कि उसने क्या कहा होगा! क्या उसने ये कहा था कि वह थक गया है और लौट रहा है! उसकी आवाज़ सुनने के बाद मैं $फौरन तो पीछे मुड़ा नहीं था, कोई दसेक मिनट तक तैरता रहा। जान-बूझकर अपनी गति धीमी कर ली थी कि वह कवर कर ले। उससे कहा था कि वह तेज़ी से अपने हाथ-पाँव चलाये। ...और तब कहीं मैं मुड़ा था। तो क्या इस बीच वह लौट चुका था? अभी वह घर पर तो नहीं? ...और मैंने तुरन्त अपने कपड़े पहने और तेज़ क़दमों से उसके घर की तरफ़ चल पड़ा।

जब मैं उसके घर के दरवाज़े पर खड़ा था, भीतर से घरेलू खटर-पटर सुनाई पड़ी थी। दरवाज़ा मुस्करा रहा था, उसकी कुंडी जीभ बिरा रही थी। जिस डर ने अब तक मेरा साथ छोड़ा हुआ था, वह लौट आया। मैंने काँपते हाथों से कपाट को धकेला। भीतर काकी थीं। पूछा, शिबू कहाँ है काकी?
कौन? काकी ने जैसे मेरा प्रश्न नहीं समझा।
मैंने हिचक को एक झटके में दूर धकेलकर पूछा, शिबू।
और तभी मैंने महसूस किया कि जैसे मेरे भीतर कुछ आकार ले रहा है, नाभि के पास एक हौल-सी उठ रही है, जिसके बाद मुझे राहत मिली। मैंने अपने आपको तनते हुए पाया। मेरी रीढ़ ने आसपास की हवा में सन्तुलन गाँठ ली थी।
वो तो तेरे साथ ही होगा न? काकी जैसे स्पष्ट नहीं थीं। उनकी इस उलझन ने मुझे बल दिया और जब जवाबदारी में मैंने जब अपना मुँह खोला तो अब तक मेरे भीतर पूरी तरह से आकार ले चुका वह झूठ अपनी पूरी भव्यता के साथ निकला, नहीं तो। मैंने तो उसे सुबह से ही नहीं देखा।
तो कहीं माठ में खेल तो नहीं रहा?
यहाँ आने से पहले मैं गया था माठ की तरफ़। वहाँ उसे न पाकर ही यहाँ आया हूँ।
होगा यहीं कहीं, कहाँ जाएगा भला! आओ, चाय बनाती हूँ।

मैं वहाँ कोई आधे घंटे के आसपास बैठा। चाय पी और नैना से हल्की-फुल्की बातें। मुझे अहसास हो रहा था कि नैना से बातचीत में इस बीच मेरे भीतर जो ठंडापन आ गया था, वह अब नहीं रहा। यह भी, कि नैना को मेरी यह ख़ुलूसी भा रही थी। काकी ने हमें थोड़ी देर के लिए अकेला छोड़ा तो मैंने उस दिन नैना को दुबारा चूमा। देर तक।

रात में जब मैं पढ़ रहा था, माँ आईं और प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, क्यों रे, तुझे सच्ची नहीं पता कि शिबू कहाँ गया?
मतलब? मुझे गुस्सा आया। अब तक जिस झूठ को मैं झूठ मानकर बोलता आया था कि शिबू के बारे में मुझे कुछ नहीं पता, इतनी देर में अब वह सच का स्थानापन्न बन गया था। अब सचमुच ही शिबू के बारे में मुझे कुछ नहीं पता था।
उसके घर में सब परेशान हैं। तेरे साथ ही तो लगा रहता था हमेशा। तुझे बताया तो होगा उसने कुछ?
हाल- फ़िलहाल तो कुछ नहीं बताया, लेकिन एकाध महीने पहले कह रहा था कि वह मुम्बई जाना चाहता है।
बम्बई? क्यों भला?
वहाँ सब किसलिए जाते हैं माँ? फ़िल्मों में काम करने, और क्या?
शिबू के घर रोना-पीटना मच गया। काकी छातियाँ कूट रही थीं और नैना भी दबे-दबे रो रही थी। पिताजी का बुलावा आया और उन्होंने मुझे खींचकर एक तमाचा रसीद किया। पूछा कुछ नहीं। मैंने अब तक जिस रुलाई को स्थगित कर रखा था, उसे बाहर आने का बहाना मिला और मैं देर तक रोता रहा। माँ मेरी पीठ सहलाती रहीं, बोलीं कुछ नहीं।

खाने के वक़्त जब नैना मेरे कमरे में आई, मैं चुपचाप खिडक़ी से बाहर देख रहा था। हम खाना साथ ही खाते थे, लेकिन उस दिन मैंने अपने कमरे में मँगवा लिया था। माँ ने नैना के ज़रिये काकी को भी बुलवा लिया था। काकी अब भी बीच-बीच में रोती जा रही थीं। नैना न सिर्फ़ मेरा, बल्कि अपना खाना भी लाई थी। उसने बताया कि माँ ने कहा था कि मुझे अकेला न छोड़े। मैंने कहा था कि ढँक कर रख दो, अभी खाने की इच्छा नहीं है। नैना ने कहा था, उसे भूख लगी है। मैंने उसे अपने पास खींच लिया और हम एक-दूसरे को बेतहाशा चूमने लगे। जब मैंने नैना की कमीज़ में हाथ डालना चाहा, तो उसने बरजते हुए कहा, फट जाएगी। फट जाने दे, मैंने कहा था। अभी नहीं, रात में आऊँगी। मैंने कहा, मुझे छूकर क़सम खाओ। वह हँसने लगी। उसने अपने होठों से मुझे छू लिया।

और वो आई। रात के कोई दो बज रहे थे। मैं उसके आने का वायदा भूलकर सो गया था। जगा तब जब लगा कि बिस्तरे में मैं अकेला नहीं हूँ। मैंने उसे दबोच लिया। उसकी हँसी घुँघरुओं-सी थी। उसने भीतर वही अधोवस्त्र डाल रखे थे, जिन्हें मैंने $खरीदा था। जल्द ही हमारी साँसें तेज़ हो गयीं। यह सचमुच का मेरा पहला अनुभव था।



दो दिन और तेरह घंटे बाद रात के समय मुहल्ले में इधर-उधर घूमते रहने वाले उसी बौड़म ने आकर ख़बर दी कि यहाँ से दो-ढाई किलोमीटर दूर पंछेड़ गाँव में शिबू की लाश किनारे लगी दिखी है। कहीं फिर से बह न जाए, इसलिए वह किनारे एक तेंतुल गाछ के तने से उसे बाँध आया है। पिताजी को जगाया गया, गाँव के कुछ लोगों और चांडाल को लेकर वे पंछेड़ गये। काकी और नैना भी जाना चाहती थीं, लेकिन माँ और गाँव की कुछ अन्य बुज़ुर्ग महिलाओं ने उन्हें जाने से बरज दिया। काकी रो नहीं पा रही थीं। नैना मेरी तरफ़  देखे जा रही थी, लगातार।

शिबू की लाश बेतरह फूल गयी थी। कौव्वों ने चेहरे में कई जगह चोंच मारे थे और बायीं आँख की कौड़ी फूट गयी थी। चांडाल ने पिताजी से दारू के पैसे लिये, पिया, फिर इस स्थिति में आया कि लाश को ढोकर ले आ सके। तय हुआ कि वहाँ से सीधे श्मशान ले जाया जाए। जब हम लौटें तो संस्कार कर के ही लौटें। उसी हत्यारी नदी में उसके फूल सिराये गये।फ़िलहाल काकी को बताया गया कि लाश शिबू की नहीं, किसी और की थी। पगले ने  ग़लत सूचना दी थी। घर लौटने के बाद काकी ने मुझसे रोते हुए पूछा था कि क्या यह ख़बर सच है कि वह शिबू न था! मैंने कहा था, हाँ। और अपने कमरे में चला आया।

उस दिन पहली बार माँ को झूठ बोलते हुए देखा जब वे काकी को कह रही थीं कि शिबू ने जाने से पहले उनसे कुछ रुपये लिये थे। मैं कहाँ जानती थी कि मुआ बम्बई जाने के लिए ले रहा है। मैंने सोचा, दोनों बच्चे साथ रहते हैं, सिनेमा-विनेमा देखने के लिए मेरे बेटे ने ही उसे भेजा होगा कि जा माँ से माँग ला। धीरज रखो, एक-दो दिन में लौट आयेगा।

देखा था, काकी बहुत आश्वस्त लग रही थीं। सेहन के पाये से लगी नैना अब भी मुझे देखे जा रही थी।
दोपहर में खाना खाते हुए मैंने माँ से कहा, मुझे नहीं पता वो नदी के पास क्यों गया था।
सच-सच बता। माँ ने उठी हुईं भौंहों से देखा। एक पल को मैं ठहरा, कौर निगलते हुए बोला, तुम्हारी क़सम माँ। वह कहता था कि उसे तैरना सीखना है। लेकिन मुझे तैरना आता नहीं, इसलिए मैं मना कर देता था। कभी जाता भी था तो घाट की सीढिय़ों से ही लौट आता था।
उस रात भी नैना आई थी मेरे कमरे में। पूछा था, तुमने ही डुबोया न?

मेरी समझ में नहीं आया मैं उसे क्या जवाब दूँ! वह पलंग पर बैठ गयी। मैंने उसे छूना चाहा तो तर्जनी उठाकर उसने बरजा। मैं जहाँ का तहाँ ठिठक गया। बहुत धीमे शब्दों में मैंने कहना शुरू किया। सब सच-सच बता दिया। वहाँ तक जब मैं उनके घर गया था और जहाँ से मेरे भीतर उस झूठ ने आकार लेना शुरू किया था। वह चुप थी। मैं जाने क्यों रोने लगा था। वह आगे बढ़ी और मुझे अपने कन्धे पर ले लिया। माँ की तरह ही उसने मेरी पीठ सहलायी थी। माँ की तरह ही वह कुछ न बोली थी।

मैंने अपने को सँभालते हुए उससे पूछा, क्या तुमने माँ को कुछ बताया है?
नहीं।
बताना भी मत। वे पूछ रही थीं तो मैंने कहा कि मुझे तैरना नहीं आता। अब मैं उसे सीधे-सीधे देख रहा था। अब मैं फिर से बदल रहा था।
लेकिन क्यों किया तुमने? पूछने की जुम्बिश में उसका चेहरा एक तर$फ को झुक गया। तेल लगे खुले बालों के लच्छे झूल गये। उसकी आवाज़ में पूछने का खुरदुरापन नहीं, एक कातर कौतूहल भर था।
मैंने कुछ नहीं किया। अभी सारी बातें बताईं तो तुम्हें!
वह चुप रही। उसे चुप देखकर मैं डर गया। मैंने हकलाते हुए पूछा, तुम मेरे कमरे में हो, माँ जानती हैं? यह एक शुरुआती प्रश्न था, और इसमें शुरू-शुरू का अनगढ़पना शेष था और क्रूरता अभी पूरी तरह से आकार में नहीं आई थी।
पागल हो क्या? उनको क्यों बताऊँगी?
उस दिन मेरे-तुम्हारे बीच जो हुआ, उसके बारे में किसी को पता है? अब मैं एक शैतानी रौ में आ चुका था। अब मुझे चाहकर भी वह नहीं रोक सकती थी। वह किसी शातिर बिल्ली की तरह तुरन्त इसे भाँप गयी।
तुम मुझे धमकी दे रहे हो?
और नदी पार तुम क्यों जाती हो, ये?
वह चुप।
चन्दन के बारे में मैंने किसी को नहीं बताया अभी तक।
तुमने ऐसा क्यों किया? उसने मुझे वापस उन्हीं गलियारों में घसीटने की कोशिश की। लेकिन मैं अपनी जगह से हिलने वाला न था। यह मेरा एकमात्र सहारा था, मेरे पाँव तले की ज़मीन। अब तक मैं अपनी जड़ें जमा चुका था।
तापस से तुम्हारा क्या सम्बन्ध था?
कुछ नहीं। मैंने आज तक उसे अपने को छूने भी नहीं दिया।
मैंने किसी वहशी उन्माद में उसे अपनी ओर खींचा। चूमने लगा। उसके होठों पर दाँत गड़ा दिये। $खून निकल आया। मेरी ज़ुबान को ख़ून का स्वाद लग गया।
तापस से...
कहा न कुछ नहीं किया उसके साथ। वह हाँफने लगी थी।
तुम्हें झूठ बोलते हुए शर्म नहीं आती? मेरी आँखें छोटी हो आईं।
तुम्हें आती है झूठ बोलने में शर्म? उसने मेरा कॉलर पकड़ लिया। झकझोरते हुए पूछने लगी, क्यों किया क्यों किया? उसकी रुलाई फूट पड़ी। जैसे वह ढह गयी हो, उसने अपने को मुझ पर छोड़ दिया।
जो भी किया, तुम्हारी वजह से किया। अबकी यह मैं था जो उसकी पीठ सहला रहा था। यह एक झूठ था जिसे अब मैं खोलना नहीं चाहता था।
उस रात मैंने उसे बुरी तरह रौंदा।

नैना ने, जैसा कि मुझे उम्मीद थी, किसी को कुछ नहीं बताया।
साल भर तक वह मेरे साथ वैसे ही पेश आती रही जैसे पहले आती थी। पहले की तरह ही कभी-कभी रात में मेरे साथ हो लेती। पिताजी ने उसके लिए जो लडक़ा देख रखा था, उससे उसकी शादी तय हो चुकी थी। मुझे लगता था, उस दिन के बाद वह चन्दन को पूरी तरह भूल चुकी है, लेकिन ऐन शादी से दो महीने पहले वह घर से भाग गयी। पिताजी और माँ ही नहीं, ख़ुद काकी भी स्तब्ध थीं। उन्हें चन्दन के बारे में कुछ भी नहीं पता था।
एक रात जब मैं सोने का यत्न कर रहा था, माँ मेरे कमरे में आईं। पूछा कि क्या इस बाबत मैं कुछ जानता था पहले से?

मैंने कहा, नहीं।
****


कुणाल सिंह हिंदी के अत्यंत चर्चित कहानीकार हैं. 
सीधे ब्लॉग पर छपने वाली यह उनकी पहली कहानी है. 
कहानी के साथ दी गई तस्वीरें गूगल के अलावा हुसेन और रामचंद्रन की हैं.  
सबद विशेष की अन्य प्रविष्टियाँ यहां.]

12 comments:

Puja Upadhyay said...

कहानी शुरू से अंत तक बाँध कर रखती है...इन्टरनेट पर लंबी कहानियां पढ़ना मुश्किल है...ध्यान भटक जाता है...आँखें थक जाती हैं.
इतने किरदारों के बीच किसी कुशल नट की तरह कथानक नृत्य करता बढ़ता रहता है.

इस अच्छी कहानी के लिए शुक्रिया अनुराग.

Nishpriha said...

झूठ की सच्चाई अच्छे से दर्शाई गयी है कहानी में. थोड़ी दर्दनाक लगी,पर अच्छी है.

Vipin Choudhary said...

bahut dino baad kunal kee nayee kahani padhne ko milli shuakriya anurag

Pranjal Dhar said...

kunal singh bilkul alag kism ke kahanikar hain...unki lekhani bheetar tak jhakjhorti hai... yeh kahaani lambi hone ke bawjud bullet kee tarah apna asar chhortee hai... kathaanak haule haule rengta hai, kahaani mein bhi, mann mein bhi aur bimbatmak trah se samaanaantar roop mein bhi...kuch sthalon par ye kahaani sirf utna hee nahi kahti, jitna kahanikar ne likkha hai balki usse kahin aage jaakar shablo aur shilp kee chamatkrit karne wali jaadoogari prastut karti hai... itni umda kahani padhwaane ke liye tahedil se shukriya...
Pranjal Dhar

Rukaiya said...

Behad dilchasp aur akhir tak bandh ke rakhti hui ek kahani ...jitna aap is kahani ke sath bahte hain utna hi ye zahen pe aser chhoti chali jati hai ....
Shukriya Anurag ..ek achhi post se phir Rubaru karwane ke liye

Bipin Sharma said...

पूरी कहानी पढ़ गया. पढ़कर लगा कि सायकिल कहानी इसका पूर्वाभ्यास थी. भाषा काफी रचनात्मक है इसलिए कहानी पढ़ते जाने में कोई बाधा नहीं आती. कहानी शुरुआत में काफी सम्भावना लिए हुए है, किन्तु विकास के साथ-साथ कहानी कमज़ोर पड़ती जाती है. एक स्त्री की उद्दाम लालसाओं को कहानी में भाषा की कारीगरी के साथ प्रस्तुत कर दिया गया है, किन्तु इसका साहित्यिक मूल्य कितना है,कह नहीं सकता. मनोवैज्ञानिक आग्रहों के बावजूद कथा नायक का माता और पुत्री, दोनों की ही देह के प्रति आकर्षित होना अरुचि पैदा करता है. और इससे भी ज्यादा अजीब लगता है माँ और भाई का नायक के आगे नैना को परोसना, जिसकी कोई ठोस मजबूरी कहानी में स्पष्ट नहीं होती है.
बहरहाल, कुणाल सिंह जी मेरे मित्र हैं, उनको ढेर सारी शुभकामनायें
विपिन

हरकीरत ' हीर' said...

कहानी दिमाग को की नसों को कुछ देर के लिए झकझोरकर रख देती है .....
स्तब्ध सी हूँ ....
जाहिर है लेखक की कलम में हुनर है जो उसे कुछ अलग और विशेष लिखवाता है ...
कुनाल जी की यही विशेषता उन्हें विशिष्ट स्थान दिलवाती है
शुभकामनाएं ....!!

प्रदीप जिलवाने said...

भाई कुणाल की कहानियों का जबरजस्त फेन हूं. बहुत ही महीनता से बुनी इस प्रेम कहानी में भी कुणाल की भाषा का जादू स्‍पष्ट नजर आता है. और यह भाषा कुणाल ने स्‍वयं अपनी मेहनत से अर्जित की है जो उनकी identity है.. भाई कुणाल को इस कहानी के लिए बहुत बहुत बधाई

Ar Vind said...

kahani kahane k shaily kunal k itani majedar hoti h k ve koi kahani padhava lete hai.pahali bar is tevar k kahani padhi."Dub" aur "cycle kahani" k smriti thodi dhundhli ho rahi thi,chatak ho aayi.dub manviy vibhishaka k kahani hai to cycle uddam avegon k naisargik kahani.aur in dono k samvet anubhutiyon k kahani hai "jhuth..."
nayak ya nayikavihin kahani hai yah.keval khalnayakon se bhari padi.naina aur shibu jaise charitr to kam padhane ko milate hai.naina k sakriyata hame jahan chaukati hai vahi shibu k thandi nishkriyata hame jad kar deti h.kuch bevajah k prasangon ko bagal me kar diya jaye to kahani k centre theme lajvab hai.khas taur pe shandar ant k liye ise yad kiya jayega.kunal singh se aur badhiya kahani k ummeed

Mita Das said...

achhi kahani .........anurag dhanyawad....kahani padhawane ke liye ......kunal ki kahaniyan ....yad rah jati hai .......kahani ka tatakapan mohta hai ....thoda sa ksa ja sakta tha kahani ko ....

Ashutosh Mishra said...

'' Kissago Ki Wapsi.........''

Maine Kaphi Dino Bad Kunal Singh Ki Kahani Padhi Hai.Jaisa Ki Hota Hai Kunal Singh Ki Kohi Kahani Aati Hai To Ek Ghatna Si Ghatati Hai,Waisa Is Bar Bhi Huaa.Kunal Ki Kahaniyan Mujhe Pasnd Hain , Iske Tatv Unki Kahaniyon Me Hi Maujood Rahte Hain. Yah Kahani Apni Bunavat Me Saghn Hai Aur Kthya Me Sahaj Hai . Isiliye Man Ko Choo Jati Hai. Is Kahani Ka Isliye Aur Bhi Mahatva Hai Ki Hamre Samay Ka Behtreen Kissago Ki Ek Bar Phir Apne Lai Me Wapsi Huyi Hai.Anurag Vats Jee Badhayi Ke Patra Hain Ki Unhone Wo Saz Uplabdh Kraya jis Par Hamare Samay Ka Rag Baj Ska Hai.
ASHUTOSH MISHRA

A B Gupta said...

वाह! कुणाल भाई बेहतरीन कहानी के लिए शुक्रिया...और ढेरों बधाई.

पहले यह कहानी नया ज्ञानोदय में पढ़ी और आज अंतर्जाल पर मिल गयी...फिर से पूरा पढ़ गया.

इतनी लम्बी कहानी के बावजूद कहीं भी आँखे रूकती नहीं....किस्सागोई में ऐसे डूबी रहती हैं मानो कहानी के पात्र आस पास जीवित हैं.