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चन्द्रमा की हेयर-पिन



[ अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविताएं ]

कलकत्ता 

दक्षिणेश्वर, हावड़ा में पुल के उस पार, भयभीत हो गए थे जन. हुगली-- ऐसी घटा घिरी हो जब,
तब कोई मर्द-मानुष ही कर सकता है पार. कलाकंद खाकर चाय पीकर बैठे रहो घर में, पढ़ते
रहो बाबा नागार्जुन की पोथी किन्तु जो कवि हो तो चलो हमारे संग. ले लो कोई डोंगी, भय क्या
जो पड़े दौंगरा ललाट पर सीधे. कलकत्ते रहे बिना कवि होना कठिन है. कलकत्ते में मेघ और
कामिनियाँ बहुत हैं. पहलवान हो तो भी भय लगता है न- ऐसे मेघों से ऐसी कामिनियों से!
****

छत्तीसगढ़

अद्भुत था भोरमदेव के उस सरोवर का भाग्य महेसबाबू;
आषाढ़-अंत तक इतने बड़े बड़े कमल खिले थे.
उन कमलों का लाल-रंग
बदलियों में स्पष्ट गोचर था.
उजागर रूप कीचड़ में करंजों में करान्कुलों में.
किसी गद्य-कवि जैसा था वह मेघ-
भोरमदेव के सरोवर के ऊपर.
ग्वालियर के किसी डोकरे का ज्यों मल्हार--
केवल कंठस्वर, न ताल न संगत.

आऊंगा, फिर आऊंगा छत्तीसगढ़, महेशजी. आऊंगा अंबिकापुर.
आऊंगा दंतेवाड़ा. दंतेश्वरी के मंदिर पर जो ध्वजा है-
उस से होड़ करती मेघमाला देखे बिना
प्राण नहीं छोडूंगा.
****

नौतनवा, महाराजगंज 
{कभी देखा नहीं, केवल सुना भर है.}

बता दो भोलेनाथ, कालिदास से छिपा गए,
कर गए कपट.
छोडूंगा नहीं मैं.
विजय घोंट जो तुम
यह ध्यान धरने का ढोंग कर रहे हो-
मैं नहीं आने वाला
तुम्हारे इस छंद में.
कवियों में मत्तगयन्द हूँ मैं.
भोलेनाथ, सीधे सीधे बता दो.

तुम्हारे गृह भी बिजली का
कोई ठिकाना न था. आती थी जाती थी.
जामुन के रस जैसा
सीताफल के बीज सा
उमा के केश-पाश के भीतर है
जो-वैसा
तिमिर था. इतना तिमिर था प्रभु!
कि देखने को जीभर जीवनभर 
एकटक, एकाग्र माता पार्वती का मुख
तुमने खोंस ली अपनी जटाओं में
चन्द्रमा की हेयर-पिन

क्यों क्यों व्योमकेश
उजाले में तो सब सुख है
अंधकार में ही तो है प्रेम का सुख
तब क्यों हेरने को अनिमेष मुख
तुमने अर्ध-चन्द्र
की लगा ली क्लिप

यू परवर्ट--माय गाड
क्या उन दिनों हिमालय में
धारासार बरसते थे धाराधर
क्या उन दिनों
आषाढ़ में इतना अंधकार था
जितना है
देवी के दो स्तनों के बीच
कि
वहां नहीं स्थान
धरने को एक कमलनाल,
एक सौदामिनी भी.
****


[ अम्बर की अन्य कविताएं यहाँ. ]

Comments

neelotpal said…
कलकत्ते रहे बिना कवि होना कठिन है.. कवियों में मत्तगयन्द हूँ मैं. तिमिर था. इतना तिमिर था प्रभु!
कि देखने को जीभर जीवनभर
एकटक, एकाग्र माता पार्वती का मुख
तुमने खोंस ली अपनी जटाओं में
चन्द्रमा की हेयर-पिन
.........................................................शब्दों की अलग स्वर रचना. कल्पना में अलग रस और अनुभूती. छूने पर भी अनछुआ रस. कुछ कविताएँ आपको अपनी तरह से यात्रा कराती है. कुछ ऐसी कविताएँ.
sarita sharma said…
कलकत्ते की खुशबु बिखेरती शुरुआत.'छत्तीसगढ़' कविता के मेघ मेभ्दूत और अषाढ़ का एक दिन की याद दिलाते है. नौतनवा, महाराजगंज में भोलेनाथ से लुका छिपी करके उनसे अटपटे सवाल पूछे गये हैं जो किंचित मर्यदाविहीन हो गये हैं.चाँद की हेयरपिन अनूठा बिम्ब है और तिमिर में प्रेम की कल्पना भी अद्भुत है.देवी देवता का मानवीयकरण करने वाली नए मुहावरे की कविता.
पहली बार आप तक पहुंचा हूँ और बहुत अफ़सोस है कि अब तक नहीं आ पाया/// पता नहीं कितना कुछ छूट गया पढ़ने से , जानने से..

अब आउंगा.

कविताओ में पता नहीं कितनी बातो की याद बसी हुई है ..मुझे भी जाने क्या क्या याद आ गया.


विजय
अंबर, सबद पर पहली बार जब कविताएं लगी थीं आपकी, जनवरी 2011 में, एक युग बीता, तब उसमें एक कविता 'लखुंदर' में आपने कहा था :

अगली बार/'नहाऊंगा नदी में'/करते हुए संकल्प/चढ़ता हूँ सीढियां.

यहां, इन नई कविताओं में आप कहते हैं :

आऊंगा, फिर आऊंगा/आऊंगा दंतेवाड़ा/दंतेश्वरी के मंदिर पर जो ध्वजा है/उस से होड़ करती मेघमाला देखे बिना/प्राण नहीं छोडूंगा.

यह आपके कवि का संकल्‍प और प्रतिज्ञा हैं अंबर। आप हमेशा लौटकर आने का वादा करते हैं और हमेशा लौटकर आते भी हैं। स्‍मृति में आपकी कविताओं की पंक्तियां गूंजती हैं, ज्‍यूं पिताजल पुकारता है, ज्‍वार बुलाते हैं।

छुटी हुई चीज़ों से कीजिए वायदा लौट आने का, करते रहिये, हम 'तेरे वादे पे जिये' के क़ायल होने के बावजूद आपके कवि के सत्‍व पर ऐतबार करते रहेंगे।
Vivek Human said…
bahut achha likha hain aapne,,,,,,,,,
kamlesh sharma said…
adbhut abhinav kavitaye

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