सबद
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मनोज कुमार झा की नई कविताएं



आत्मकथा

यह जो डायरी जिसकी पीठ पर आँखें हैं घूमती
मुझे इसका चेहरा मुकद्दर
कई कविताएं अधूरी या शायद सारी
कई तो मात्र अक्षर फूटी हूई
इसी में कर्ज की लिखा-पढ़ी काट-कूट
हाँ इसी में,
मैं क्या कहाँ से सुना रहा
मुझे कुछ पता  नहीं, मुझे कुछ नहीं...
***

मेरा बिस्तर

तकिए में रूई नहीं फटे हुए कपड़े, अंतर्वस्त्र तक
चादर पर एक बड़ी सुन्दर चिडि़या थी, जहाँ डैने थे वहीं फट गई
तख्त के चौथे पाए की जगह  ईंटें हैं
नीचे एक कनटूटी प्याली है माँज सकूँ तो चमकती है
हैमलेट की एक पुरानी कॉपी है जिसके नोट्स फट गए
अधसोई देह की फड़फड़ाहट के निशान हैं
यह किसका बिस्तर है
जिस पर मेरी रात की आँख से पिघला शीशा चूता है।
***

रात की फाँक

मैं हाँपता रहा
अपने क्रोध मे धुँआता
वो सो गई बच्चे को पँजिया
अब मेरी आग मेरी राख से दबी
मैनें ही फेंका था जल का पात्र
मेरा कोई शरण नहीं
रात का हाथ खाली
नींद मेरे रक्त में अम्ल हो नाचती
मैं यही सोचता देह को तबे पर पलटता
कि सुबह तक यह फाँक इसी स्त्री के
नींद में घुल जाए
धुल जाए इसके सपनों से।
***

लाभ

यह आपको बिलकुल ब्रोथेल की तरह नहीं लगेगा
कहीं पान का पीक नहीं
रोती बिसुरती लड़कियां नहीं
सब प्रसन्न।
जो यह है उसकी तरह नहीं दिखता है
फिर भी यह वही है
तकनीक का यही तो फायदा है
और इस राष्ट्र की तरक्की का।
***

 यहाँ ठीक हूँ

जितनी देर में एक शब्द ढूँढते हो
उतनी देर में तों कपड़े पर इस्तिरी हो जाएगी
मेहनती रहे तो एक शर्त खरीद हो सकते हो
बुद्धि भी रही तो कपड़े की दुकान
जिन्हें नसीब है वो तो दुनिया घूम सकते हैं

अब मैं क्या करूँ दुनिया घूमकर
शब्दों की एक बाड़ी है काँटो भरी,
फूल भी कुछ आज के कुछ पुराने
और है ही हवा, और जल, शहद, नमक
ज...ल...श...ह...द...न...म...क....।
***

[ मनोज हिंदी के अत्यंत चर्चित कवि-अनुवादक हैं।
उनकी अन्य कविताएं सबद पर ही यहाँ.
साथ में दी गयी तस्वीर वान गॉग की है। ]
13 comments:

मेरी रात की आँख से पिछला शीशा चूता है।

"नींद मेरे रक्त में अम्ल हो नाचती
मैं यही सोचता देह को तबे पर पलटता
कि सुबह तक यह फाँक इसी स्त्री के
नींद में घुल जाए"

मेरे पसंदीदा...

इनके बिम्ब बड़े सुन्दर होते हैं. वे कवितायें अनुनाद ब्लॉग पर मौजूद हैं.


पिघले शीशे के बिस्तर में तो पीड़ा हर ओर फैलती है..


शिरीष कुमार मौर्य

मनोज निश्चित रूप से हमारे समय का अनोखा-अद्भुत कवि है....सबद पर फिर उसे देख अच्‍छा लगा।
***
सभी कविताएं अच्‍छी हैं...ख़ासकर बिस्‍तर वाली। छोटी कविताओं का आकाश कितना बड़ा होता है और उनमें कितनी अनकही बातें भूगर्भीय हलचलों की तरह होती हैं....उस ख़ास शिल्‍प को मनोज ने हमारी पीढ़ी में सबसे अधिक साधा है। अब तक रहे सम्‍पर्क के आधार पर कहना चाहता हूं कि उसका व्‍यक्तित्‍व भी बिलकुल ऐसा ही है- ख़ूब खुला-खुला और ढेर सारी भीतरी हलचलों वाला।


daayri kee peethh par aankhen.. rashtr kee tarkki.. sabhi kavitaen bahut sundar hain.. manoj ji ke vishyon kee vividhta akrshit karti hai..


खूबसूरत कवितायेँ


aj jb yuva kaviyon k andhadhundh bhid hamare samay se guzar rahi hai,aur achchhe pathak bar bar unhe padhkar bor ho rhe ho to aise vakt me MANOJ ji ek bahupratikshit kavi ki bhumika nibhate hai.samvedana aur naye bimbon k dhani jitana pathako ko naye aasvad se parichit karate hai vahi sikhne ko utsuk lekhako ke liye ek pratiman v rach jate h.unhe (sadhu) vad!


मनोजजी की हर नई कविता का बेसब्री से इंतजार रहता है और वो कभी ज़ाया नहीं जाता. उनकी कविताओं में हमारे ही संसार के कितने अनचिन्हे रूप उजागर होते हैं..छोटी-छोटी कविताएं ’गागर में सागर’ को चरितार्थ करतीं...इन शानदार कविताओं के लिये ’सबद’ और मनोजजी को बधाई.


गज़ब की कवितायेँ हैं भाई ये तो. यहाँ पे तो रात की आँख से पिघले शीशे के चूने की परम्परा का निर्वहन हो रहा है. बिस्तर का होना ही कितना उचाट और खाली है...

एक खर्रा लिखा था, उड़ गया वो... :(


अद्भुत कवितायेँ ....


adbhut kavitayen.....kathin bate bhi itni sahajta se kah jana sbse badi khoobi hai........


कम शब्दों में गहरी बात। बाबा तुलसी दास की पंक्तियां याद आ गईं...
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे,
अरथ अमित अति आखर थोरे।


हमेशा की तरह सुंदर और आश्वस्तिपरक कविताएं। मनोज धीरे-धीरे मेरे और पसंदीदा बनते जा रहे हैं।



कोई दिल्ली में बिराजकर कविता में टि(टि)हरी के टेसुए बहा रहा है तो कोई पटना में बैठकर रोहतास को कविता की सैर करा रहा है। मुग्धजन प्रशस्तिपत्र और थोक में राशि लेकर खड़े हैं उनके लिए। पिलियाए दांतों वाले गंधाते जन और लोक के साथ खड़े होने में जिनका दम घुटता हो और जो अपने बाल-बच्चे, परिवार, नौकरी बचाते गुजर-बसर करते हुए कविता कह (लिख नहीं रहे हैं) रहे हैं, वे बीवी के गुलदस्ते और बच्चों के खिलौनों की तरह ही तो अपनी पसंद का एक गुलदस्ता (किताबों-पत्रिकाओं के रूप में) नहीं बना रहे हैं क्या। जोखिमों से कतराते लोगों की जमात क्या धूमिल या मुक्तिबोध की तरह अभिव्यक्ति के खतरे उठा रही है। क्रमशः छीजता हुआ यह स्वर हमारे दौर में आकर लगभग लड़खड़ा गया है। एक औसत काव्यभाषा का जामा लेकर जो ठगी बाजार में ठौर तलाशती कविता है, वह किसका प्रतिनिधित्व करती है। क्या अस्सी करोड़ की आबादी की आवाज है वहां। क्या अरुण प्रकाश की तरह कहने की हिम्मत है कि भूख से मरते लोगों ने गोदामों पर कब्जा क्यों नहीं कर लिया। क्योंकि उनका मानना था कि शब्दफरोश, सुविधाभोगी वर्ग जो शब्दों से खेलता है, यही वर्ग है जो भूख से मरते लोगों को अन्न के भंडारों पर हल्ला बोल से रोकता है और लोकतंत्र को भारतीय साहित्य का सबसे पवित्र शब्द घोषित करता है। (– अरुण प्रकाश, रविवार डॉट कॉम में पत्रकार पुष्पराज से अपनी एक आखिरी बातचीत में।) इन्हीं के बीच नंद किशोर नवल जैसे तथाकथित आलोचक हैं जो अपनी बातों को ध्वस्त करते रहते हैं। उनके लिए विजेंद्र कवि नहीं हैं और राजेश जोशी, अरुण कमल, मंगलेश डबराल, आलोकधन्वा जैसे फलानां-फलानां ने अपना काव्य व्यक्तित्व ग्रहण नहीं किया है। जबकि तथ्य यह है कि इसी बिरादरी ने काव्यविमर्श के लिए अपनी रचनाशीलता से एक धुंध कायम किया है।
शिरीष कुमार मौर्य जब मनोज को आंचलिक पदावलियों से बचने की सलाह देते हैं तो वह भूल जाते हैं कि मनोज की कविता का स्थापत्य जो सौंदर्यशास्त्र रच रहा है, उसमें इस वैशिष्ट्य का अभिन्न हिस्सा है। विद्यापति को तो हिंदी में और हिंदी साहित्य गौरव भी करे, लेकिन मिथिला जनपद से दूरी रखते हुए। क्या बोलियों के बिना हिंदी की ताकत और सुंदरता टिकी रह सकती है। बाजार की गोद में हिंदी के अंग्रेजीकरण का आग्रह कितनी देर तक हिंदी को हिंदी बने रहने दे सकता है। यह खतरनाक सलाह है, जिस पर चला जाए तो कविता का टर्निंग प्वाइंट साबित होगा। काल-गणना करनेवाले को कहें कि फलानां राशि और फलानां नक्षत्र को बाहर करके गणना करें तो वह संभव है क्या। इसी तरह मनोज, अनुज, प्रमोद की काव्यगणना के साथ ऐसी छेड़छाड़ नुकसानदेह होगी।


हमारे सामने आज जब मनोज कुमार झा, प्रमोद कुमार तिवारी, अनुज लुगन जैसे कवि हैं तो सहसा लगने लगा है कि यह धुंध इनके काव्यालोक से छंट जाएगा। यह न तो सिर्फ लोक संवेदना की बात है और न ही सिर्फ काव्यभाषा की बात। संवेदना तो कथ्य से पैदा कर सकते हैं और भाषा वहां की (जनजातीय जीवन तथा ग्राम्य जीवन की) पदावलियों का इस्तेमाल करके। अब तक अमूमन यही होता रहा है। लेकिन कविता का पूरा का पूरा एक स्थापत्य खड़ा करने के लिए आपको पहले से वहां मौजूद अतिक्रमणकारियों व अपहर्ताओं से वह जमीन खाली करानी होती है। जमींदार के कब्जे को तो हटाकर हासिल की गई जमीन पर आप फिर से खेती कर सकते हैं, पर जब आपकी जमीन हथियाकर वहां अवाम के खून-पसीने पर टिके राजस्वकोष से सब्सिडी देकर, कर्ज देकर सस्ते में कल-कारखाना स्थापित किए जाएं तो ऐसी जमीन पहले आपको हासिल करने की जंग छेड़नी होती है, फिर उस पर खड़ी संरचना तोड़नी होगी, तभी आप उस जमीन पर खेती कर पाएंगे। तो हदबंदियों की शिकार कविता की जमीन इसी तरह मुक्त करानी होगी। हिंदी कविता की काया, उसकी आत्मा पर कई लबादे, आवरण पड़े हुए हैं। हिंदी कविता को एक नए तरह के अनावरण से गुजरना होगा। शहरों में या महानगरों में बैठकर सिर्फ कविता की मिमिक्री हो रही है। जनपद का स्वांग रचा जाता है। यह एक नए यथार्थ बोध, जीवन दृष्टि व काव्य विवेक के बूते होगा। भाई मनोज जी यही दुस्साहसिक काम कर रहे हैं। मनोज की यह दुस्साहसिकता कविता का नया आख्यान रचती है।
आप चाहें तो मेरे ब्लॉग पर आ सकते हैं -
www.aatmahanta.blogspot.com


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अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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