Monday, June 11, 2012

समर्थ वाशिष्ठ की नई कविताएं




पुनर्पाठ

जितनी पढ़ी मैंने भौतिकी
पढ़ी जैसे
पढ़े जाते हैं तथ्य
परीक्षा के आखिरी दिन
किताबों पर उड़ेल दी दवात
अच्छे शगुन के लिए
पढ़ीं संभावनाएं
पर ये नहीं कि जो मैं हूं
वो वही है जिसकी संभावना
मैं जो नहीं हूं
उसकी संभावना से रही थोड़ी ज़्यादा।
हाय, काश आ जाता समझ
पहले ही ये समीकरण
कि किसी चीज़ को पाने की
थोड़ी ज़्यादा दिखती संभावना
ही है खुशी
तो कम ही रहती
दु:खी रहने की संभावना।
जितनी पढ़ी मैंने भौतिकी
पढ़ी जैसे पढ़े जाते हैं तथ्य
वैसे नहीं जैसे
होने न होने के बीच
दरअसल अटकी थी वो -
यूं भी
पढ़ डालने के बहुत साल बाद
समझ आते हैं मायने
उसके
जिसे पढ़ डाला गया यूं ही।
***

आकलन

जब पसंद आ रहे होते हैं
मुझे आप
तब पसंद आ रही होती हैं
मुझे
आपकी कुछ ख़ास बातें
आकलन के जोख़िम हैं
इस पसंद आने में
तमाम
जैसे सीमा रेखा पर
उछाल लेता क्षेत्ररक्षक
दे जाए छ: रन अचानक
कैच लेता-लेता।
***

परिचय

जुलाई की एक नम सुबह
जब हम हुए तिपहिए में एक साथ
तो संयोग था और जेब की मजबूरी
आधे उजाले में अपनी देह ढकती
कोने में सिमटी बैठी तुम
पहली नज़र में लगी सलोनी
उनींदी आंखों में गुज़रती जाती थी दिल्ली
कि राजघाट भी पीछे छूट गया हो शायद
जब हुई मुझे कंघी की हाजत महसूस
कनखियों से देखा मैंने कई बार
और तुम्हें बाहर ताकते देख अविराम
मन ही मन दोहराए भूरे रंग के कई प्रकार
बहुत वक़्त नहीं बीता होगा वैसे यूं
कि यकायक रेडियो की भारी-भरकम आवाज़ से
सकपका गए मेरे कानों में गाते मेहंदी हसन
और फिर मीलों चलती उदास सड़क के बाद
जैसे दिखा हो कुछ जाना-पहचाना
कि दांएं मुड़ने का किया तुमने इशारा
निकल आई थी हल्की धूप भी तब तक
संकरी गली में अपना पर्स टटोलते देख तुम्हें
जाने क्यूं मन किया कि कहूं धन्यवाद!
***

                                                                           [ समर्थ वाशिष्ठ की कविताएं इससे पहले  यहाँ.
                                                                          तस्वीर आन्द्रे कर्तेस की ओन रीडिंग सीरीज से. ] 

6 comments:

Vipin Choudhary said...

shandaar kaviteyn

vandana khanna said...

आकलन के जोख़िम......और किसी चीज़ को पाने की थोड़ी ज़्यादा दिखती संभावना ही है खुशी( ऐसी नज़र) बहुत अच्छी कवितायें है समर्थ भाई...

वंदना शुक्ला said...

और फिर मीलों चलती उदास सड़क के बाद
जैसे दिखा हो कुछ जाना-पहचाना
कि दांएं मुड़ने का किया तुमने इशारा......khubsurat :)

Ssiddhant said...

acchi kavitaaen hain bhai. doosri kavita sampoornataa ko praapt kar rhi hai.

neelam said...

antim kavita sabse behtreen.....

hridyanubhuti said...

Khoobsurat,gahanta se paripoorn rachnaaye'n........