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Showing posts from June, 2012

सबद विशेष : १३ : लम्बी कहानी : कुणाल सिंह

झूठ तथा अन्य कहानियाँ
मसलन हमने शिबू के पिता को कभी नहीं देखा। अपनी माँ से शिबू ने कई बार पूछा था, शुरू में तो वह टालती रही, एक दिन आजि़ज आकर कसके तमाचा जड़ दिया। उसने रोते हुए मुझसे कहा था, झूठ बोलती है साली। कहती है कि जिस साल मैं पैदा हुआ था, वह हैजे में मर गया। कभी कहती है ख़ूब दारू पीता था, जिगर की ख़राबी से मर गया। मैंने उसके कन्धे सहलाये थे— जाने दे यार! उसकी हिचकी बँध गयी थी। मैंने हिचकते हुए पूछा— जब तू पैदा हुआ था, तेरा बाप मर गया। फिर तेरी बहन कहाँ से टपक पड़ी? उसने आस्तीन से मुँह पोंछते हुए सहमति में सिर हिलाया— वही तो! लेकिन अगर मैं यह पूछने जाऊँ तो मुझे लात से मारेगी, पक्का।
उसकी बहन नैना के बारे में मैंने जो अभी ऊटपटांग बातें की, अगर तापस ने सुन लिया होता तो मुझे लात से मारता, पक्का। शिबू को नहीं बताया मैंने कि तापस नैना पर जान छिडक़ता था। खुलेआम नैना मेरी मैना, जगाये सारी रैना, छीने मेरा चैना वाला गीत गाता था। वैसे शिबू को इस सन्दर्भ में कुछ बताने की ज़रूरत भी नहीं थी, हम सभी जानते थे। तापस ख़ुद उसके बारे में गन्दी-गन्दी बातें करता था, लेकिन उसकी बातें सुनकर अगर हममें म…

चन्द्रमा की हेयर-पिन

[ अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविताएं ]
कलकत्ता 

दक्षिणेश्वर, हावड़ा में पुल के उस पार, भयभीत हो गए थे जन. हुगली-- ऐसी घटा घिरी हो जब, तब कोई मर्द-मानुष ही कर सकता है पार. कलाकंद खाकर चाय पीकर बैठे रहो घर में, पढ़ते रहो बाबा नागार्जुन की पोथी किन्तु जो कवि हो तो चलो हमारे संग. ले लो कोई डोंगी, भय क्या जो पड़े दौंगरा ललाट पर सीधे. कलकत्ते रहे बिना कवि होना कठिन है. कलकत्ते में मेघ और कामिनियाँ बहुत हैं. पहलवान हो तो भी भय लगता है न- ऐसे मेघों से ऐसी कामिनियों से! ****

छत्तीसगढ़

अद्भुत था भोरमदेव के उस सरोवर का भाग्य महेसबाबू;
आषाढ़-अंत तक इतने बड़े बड़े कमल खिले थे.
उन कमलों का लाल-रंग
बदलियों में स्पष्ट गोचर था.
उजागर रूप कीचड़ में करंजों में करान्कुलों में.
किसी गद्य-कवि जैसा था वह मेघ-
भोरमदेव के सरोवर के ऊपर.
ग्वालियर के किसी डोकरे का ज्यों मल्हार--
केवल कंठस्वर, न ताल न संगत.

आऊंगा, फिर आऊंगा छत्तीसगढ़, महेशजी. आऊंगा अंबिकापुर.
आऊंगा दंतेवाड़ा. दंतेश्वरी के मंदिर पर जो ध्वजा है-
उस से होड़ करती मेघमाला देखे बिना
प्राण नहीं छोडूंगा.
****

नौतनवा, महाराजगंज 
{कभी देखा नहीं, केवल सुना भर है…

मनोज कुमार झा की नई कविताएं

आत्मकथा

यह जो डायरी जिसकी पीठ पर आँखें हैं घूमती
मुझे इसका चेहरा मुकद्दर
कई कविताएं अधूरी या शायद सारी
कई तो मात्र अक्षर फूटी हूई
इसी में कर्ज की लिखा-पढ़ी काट-कूट
हाँ इसी में,
मैं क्या कहाँ से सुना रहा
मुझे कुछ पता  नहीं, मुझे कुछ नहीं...
***

मेरा बिस्तर

तकिए में रूई नहीं फटे हुए कपड़े, अंतर्वस्त्र तक
चादर पर एक बड़ी सुन्दर चिडि़या थी, जहाँ डैने थे वहीं फट गई
तख्त के चौथे पाए की जगह  ईंटें हैं
नीचे एक कनटूटी प्याली है माँज सकूँ तो चमकती है
हैमलेट की एक पुरानी कॉपी है जिसके नोट्स फट गए
अधसोई देह की फड़फड़ाहट के निशान हैं
यह किसका बिस्तर है
जिस पर मेरी रात की आँख से पिघला शीशा चूता है।
***

रात की फाँक

मैं हाँपता रहा
अपने क्रोध मे धुँआता
वो सो गई बच्चे को पँजिया
अब मेरी आग मेरी राख से दबी
मैनें ही फेंका था जल का पात्र
मेरा कोई शरण नहीं
रात का हाथ खाली
नींद मेरे रक्त में अम्ल हो नाचती
मैं यही सोचता देह को तबे पर पलटता
कि सुबह तक यह फाँक इसी स्त्री के
नींद में घुल जाए
धुल जाए इसके सपनों से।
***

लाभ

यह आपको बिलकुल ब्रोथेल की तरह नहीं लगेगा
कहीं पान का पीक नहीं
रोती बिसुरती लड़कियां नहीं
सब…

समर्थ वाशिष्ठ की नई कविताएं

पुनर्पाठ
जितनी पढ़ी मैंने भौतिकी पढ़ी जैसे पढ़े जाते हैं तथ्य परीक्षा के आखिरी दिन किताबों पर उड़ेल दी दवात अच्छे शगुन के लिए पढ़ीं संभावनाएं पर ये नहीं कि जो मैं हूं वो वही है जिसकी संभावना मैं जो नहीं हूं उसकी संभावना से रही थोड़ी ज़्यादा। हाय, काश आ जाता समझ पहले ही ये समीकरण कि किसी चीज़ को पाने की थोड़ी ज़्यादा दिखती संभावना ही है खुशी तो कम ही रहती दु:खी रहने की संभावना। जितनी पढ़ी मैंने भौतिकी पढ़ी जैसे पढ़े जाते हैं तथ्य वैसे नहीं जैसे