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Showing posts from May, 2012

सबद सहचर : १ : अजित वडनेरकर

[ साहित्य और विचार को लेकर बहुत सारा काम सीधे इस माध्यम में हो रहा है। सबद उन सब से अपना स्वाभाविक जुड़ाव महसूस करता है और उनका सहचर बनने का आकांक्षी भी है। इसलिए 'सबद सहचर' नाम का यह स्तम्भ। इसमें वक़्त-वक़्त पर उन मजमूनों को पेश किया जायेगा जो इस माध्यम में अन्यत्र निरंतर प्रकाशित हो रहे है। अजित वडनेरकर पिछले कुछ वर्षों से अपने ब्लॉग शब्दावली पर शब्द, उसके उत्स, जीवन और लोक-व्यव्हार पर बहुत गंभीरता से लिख रहे हैं। उनकी यह शब्द-चर्चा न सिर्फ उनकी गहन शोध-वृत्ति  का परिचय कराती है, बल्कि शब्दों के जीवन बारे में ऐसा रोचक बखान दुर्लभ है। उनकी शब्द-चर्चा अब तक दो जिल्दों में पुस्तकाकार भी प्रकाशित हो चुकी है। अजित के  इसी ज़रूरी काम की एक कड़ी यहाँ । साथ में दी गई तस्वीर मशूहर भारतीय चित्रकार रामकुमार की है। ]
शब्दों का सफ़र : 
मंगोल नौकर, तुर्की चाकर

“नौकर-चाकर” या “नौकरी-चाकरी” हिन्दी के बहुप्रयुक्त शब्दयुग्म है । आमतौर पर इसे विदेशज और देशज शब्दों के मेल से बना संकर युग्म माना जाता है । कई शब्द विदेशी मूल के होते हुए भी दूसरी भाषाओं में इतने समरस हो जाते हैं कि रूप-संरचना के आ…

सबद पोएट्री फि़ल्‍म : गीत चतुर्वेदी

[ सबद के चार साल पूरे होने तक यह आकलन करना प्रीतकर था कि इस छोटी-सी नेट-पत्रिका के ज़रिये निरंतरता और गुणवत्ता का ध्यान कर हमने ऐसा बहुत-कुछ पेश किया जो लेखकों-पाठकों के बीच सराहा गया. सौभाग्य से नए माध्यम में साहित्य के प्रकाशन को लेकर पुराना संकोच अब छूट रहा है और अब सबद ही नहीं दूसरी कई आवाजें भी इसमें शामिल हो  गई  हैं. ये तमाम  आवाजें अपने विन्यास और नियोजन में हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योग कर रही हैं. सबद इस सिलसिले में एक नई शुरुआत 'पोएट्री फिल्म' के ज़रिये कर रहा है. यह बात किसी से अलक्षित नहीं कि नए माध्यमों में साहित्य को कुछ और कल्पनाशील ढंग से प्रकाशित किया जा सकता है. हम माध्यम की इस खूबी का अपने तईं बेहतर इस्तेमाल कर रहे ताकि साहित्य का और अनेक तरह से प्रसार संभव हो. इस पहली फिल्म में इधर की हिंदी कविता के अत्यंत महत्वपूर्ण किरदार गीत चतुर्वेदी हैं. उनकी कविताएं और कविता पर एक वकतव्य. पूरी फिल्म उनकी दिलचस्पियों की भी बानगी है क्योंकि संगीत, दृश्यांकन आदि भी उन्हीं का है. हम उनके सहयोग के लिए आभारी हैं. हमने अपनी तरफ से एक नई शुरुआत की है. इसे बहुत दूर तक ले ज…

शताब्दी स्मरण : भवानीप्रसाद मिश्र पर अनुपम मिश्र

[ कवि भवानीप्रसाद मिश्र का यह जन्म शताब्दी वर्ष है. सबद पर शताब्दी स्मरण श्रृंखला में भवानीप्रसाद मिश्र पर हिन्दी लेखक और पर्यावरणविद  अनुपम मिश्र  का यह आत्मीय स्मृतिरेख. अपने कवि पिता भवानीप्रसाद मिश्र  पर यह स्मृतिरेख अनुपम मिश्र ने पहलेपहल  महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका 'बहुवचन' के अंक ६ में  ''मन्ना : वे गीतफरोश भी थे'' शीर्षक से छपाया था. यहां हम उसका एक  हिस्सा साभार छाप रहे हैं. भवानीप्रसाद मिश्र की कविताओं का एक चयन भी सबद पर शीघ्र प्रकाश्य है. ]

स्नेह की उंगली  कविकर्म  जैसे शब्दों से हम  घर में कभी कहीं टकराए नहीं। मन्ना कब कहाँ बैठकर कविता लिख लेंगे-- यह तय नहीं था। अक्सर अपने बिस्तर पर, किसी भी कुर्सी पर एक तख्ती के सहारे उन्होंने साधारण से साधारण चिट्ठों पर, पीठ कोरे (एक  तरफ छपे) कागज़ पर कवितायेँ लिखी थीं। उनके मित्र और कुछ रिश्तेदार उन्हें हर वर्ष नए साल पर सुन्दर, महंगी डायरी भी भेंट करते थे। पर प्रायः उनके दो-चार पन्ने भर कर वे उन्हें कहीं रख बैठते थे। बाद में उनमें कविताओं के बदले दूध का, सब्जी का हिसाब भी दर्ज हो …