सबद
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अम्बर रंजना पाण्डेय का गद्य


[ कवि 
अम्बर रंजना पाण्डेय का कविता से बाहर, गद्य का यह पहला मजमून है. सबद पर ही सबसे पहले अम्बर की कविताएं छपी थीं, यहीं से अब कविताओं पर एकाग्र उनके गद्य का भी सिलसिला शुरू हो रहा है. यह सहज लक्ष्य किया जा सकता है कि अम्बर कविता में, और उससे इतर भी, अपनी कहन में न सिर्फ अलग ढंग के हैं, बल्कि उनका यह अलग ढंग, उन मंझोले अलगावों से आगे विलक्षण है, जिसमें फ़िलहाल बात करने से लेकर लिख-पढ़ कर कवि-लेखक बन जाने का चलन है. ] 


(painting :  Butch Payawal) 

कवि, कामकला और शुकध्वज की कथा

दसवीं कक्षा में प्राचीनकाल में लिखे कामशास्त्र ( सेक्स मैनुअल ) पढ़ने का मुझे चस्का लग गया. थोड़ी-बहुत संस्कृत आती थी और कोक शास्त्र की संकृत बहुत कठिन भी नहीं होती. उस समय बनारस जाना हुआ और बिंदुमाधव के मंदिर के निकट हम लोग पिताजी के पुराने मित्र राधाबेनी त्रिपाठी के यहाँ ठहरे. बिंदुमाधव की हवेली से चौक कितना दूर है! चौक पर ही चौखम्भा प्रकाशन की पेढ़ी. तब इन्टरनेट न था इसलिए पोर्नोग्राफी के लिए मैंने देवभाषा चुनी. घुमते-घुमते मैं चौखम्भा वालों की पेढ़ी पहुँच गया. 

सांध्यकाल एक अधेड़ पुरुष महादेव जी की आरती कर रहे थे. मैं पोथियाँ उलटने-पलटने लगा. अधेड़ पुरुष ने टोका, ''पोथियाँ जहाँ की तहाँ रखना रे बटुक.'' फिर वह आरती गाने लगे. वाराणसी में इतना विस्वर दुर्लभ ही था. 

मुझे एक पोथी मिली जो वात्स्यायन के कामसूत्र की पोथियों से भीत बनाकर पीछे छुपायी गयी थी. पोथी मुनि शुकध्वज रचित 'कंदर्पसरस्वती' थी. कवि का नाम-कुल-स्थान-काल अज्ञात था. दो-चार श्लोक हिंदी-अनुवाद की सहायता से पढ़े और प्रिय की मोटी-मोटी चोटियों से कामी की पीठ पर मार पड़ने पर कैसा आनंद होता है, यह पढ़कर भीषण कामवेश हो गया. पोथी बंद कर कनपटियों पर स्वेदबिन्दुओं को सुखाने के लिए मैं आदि शंकराचार्य की सौंदर्य-लहरी की क्षीण प्रति से हवा करने लगा. 

''मूरख, यह सौंदर्य-लहरी है, क्या करता है! धर दे जहाँ की तहाँ.'' अधेड़ पुरुष चिल्लाये और नैवेद्य में चढ़ाई पाव भर रबड़ी खाने लगे. 
पंडित तीर्थमणि चौबे की टीका से पहले उनके अग्रज पंडित गंगामणि चौबे ने प्रस्तावना में मुनि शुकध्वज की कथा यों कही है : 

'' अत्यंत प्राचीनकाल में महाकाल की नगरी अवंतिका में वनपंडित नामक ब्राह्मण के दो पुत्र हुए. शुक्रवार के दिन जन्मे पुत्र का नाम शुकध्वज हुआ और शनिवार के दिन जन्मे पुत्र का नाम काकध्वज हुआ. शुकध्वज दुबले, काने, श्यामलवर्ण के अत्यंत आकर्षक नवयुवा कवि हुए. काकध्वज भीषण कृष्णवर्ण ज्यों अंजन की पुतली, सदैव क्षुधित और सब अशुभ चिन्हों से युक्त युवक हुए,  जिन्होंने अपभ्रंश का व्याकरण सर्वप्रथम स्थिर करने का सुन्दर प्रयास किया किन्तु एक कौवा उनकी पांडुलिपि ले कर उड़ गया और किन्हीं ऋषियों की मंडली, जहाँ अग्निहोत्र कर रही थी, उस यज्ञकुंड में गिरा गया. अपभ्रंश के कृष्ण धूम से संस्कृतपक्व कर्णोंवाले ऋषियों ने खांसते-खांसते कुपित होकर काकध्वज को अपने कुल सहित अज्ञात रह जाने का शाप दिया और इसलिए उनके भ्रात शुकध्वज की इस सुन्दर कामशास्त्र और काव्यशास्त्र की पोथी पढ़नेवाले नहीं मिलते.

'कंदर्पसरस्वती' अपने काल में लिखे जाने वाले काव्यशास्त्र के ग्रंथों की शैली में लिखी गयी है और इसकी सबसे मुग्ध करने वाली प्रवृति इसकी काव्यकला और कामकला की तुलना करने वाली है. शुकध्वज ने कहा है काव्यकला में तकनीक और भाव का अनुपात कामकला में आवेश और अभ्यास के अनुपात में होना चाहिए. कवि को भी कामी के सामान आवेशपूरित किन्तु फिर भी धीर होना चाहिए. भाव में आकंठ डूबे रहकर भी, जब नासापुट और दोनों नेत्रों में जल भरा हो तब भी तीसरे नेत्र से रति में लीला और कविता में लालित्य बनाये रखना चाहिए. परकाया-प्रवेश कामी और कवि दोनों को सिद्ध होता है. 

शुकध्वज ने छंद को कविता की व्यायामशाला और व्यायाम को कामी का छंद कहा है. जैसे व्यायामशाला में जाने से देह का अतिरिक्त मेद छंट जाता है और काया की कृशता जाती रहती है, उसी प्रकार कविता में छंद होने से अतिरिक्त शब्द और विस्तार के अभाव से मुक्ति होती है. व्यायाम से काया में लय और लोच होता है, उसी प्रकार काव्य में अनुशासन से श्रुति-माधुर्य और स्मृति उत्पन्न होती है.

कवि शुकध्वज ने कविता लिखने की तुलना कामी के अपनी प्रिया के नितम्बों पर प्रहार करने के लिए लीलाकमल बनाने से की है. कामी की तरह कवि भी उत्कंठित, कला से परिपूर्ण होकर लीलाकमल बनाता है, अंतर केवल यह है कि कामी के लीलाकमल से प्रिया के नितम्ब अरुण हो उठते हैं और कवि के काव्यकमल से उसकी प्रिया का ह्रदय. '' 
****

3 comments:

काव्य और कामकला में अद्भुत साम्य दर्शाने वाला दिलचस्प गद्य.संस्कृत में अनेक विषयों पर बहुत साल पहले बहुत गहन चिंतन करने के पश्चात लिखा जा चुका है.इस ग्रन्थ से परिचित कराने के लिए अम्बर रंजना पाण्डेय और अनुराग वत्स का आभार.


आवेशपूरित और धीर, बहुत ही कठिन संतुलन है।


दो बार इनकी कवितायें पढ़ने आयी थी यहाँ . और इस गद्य खंड के लिए भी दोबारा आना होगा.
इनके बारे में मेरी पहली प्रतिक्रिया से आप परिचित ही हैं अनुराग. दूसरी प्रतिक्रिया के लिए थोडा रुकना होगा.
इन्हें मैं पूरे धैर्य से पढ़ रही हूँ.


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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