Saturday, April 14, 2012

अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविताएं




भाषा
जब जब मैं इसका व्याकरण थोडा-बहुत सीख पाता हूँ, तुम किसी दूसरी भाषा का आविष्कार कर लेती हों. बिजली का बिल उस दिन आया और मैं पढ़ नहीं पाया. कविता लिखना बहुत दूर की बात हो गयी है. बीती रात जब चन्द्रमा निकल आया था अचानक जैसे कोई नेवला काट जाता है रास्ता भर दोपहर. मैं मस्तिष्क की सब शिराएँ खींच कर भी याद नहीं पाया कि चन्द्रमा को क्या कहते हैं. शब्दकोष में कैसे ढूंढता किन्तु ढूँढते ढूँढते पहुँच गया चन्द्रबिन्दु तक. मेरी भाषा तुमसे मिलने के बाद चन्द्रबिन्दु सी हो गयी है. यदि लिखूं कभी तुम्हें पत्र तो केवल चंद्रबिंदु ही चन्द्रबिन्दु बनाऊंगा. जान लेना तुम मेरी दशा केवल चन्द्रबिन्दु पढ़कर.
इससे अधिक मैं नहीं लिख पाउँगा-- श.
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शरीर-१  

तुम्हारा शरीर बलिष्ट और सुन्दर है. जब प्रारंभ में स्त्री-देह से पहला परिचय हुआ था, नयी-नयी चेतना जागी थी तब सोचा नहीं था कभी कि मैं स्त्री-देह के लिए 'बलिष्ट' शब्द का प्रयोग करूँगा. तुम्हारे स्तन-कठोर, स्थितप्रज्ञ किसी abstract installation art जैसे धँस गए हैं मेरी दृष्टि में किन्तु तुम्हारी भंगिमाएं पक्षियों जैसी हैं जो मेरी आँख में पड़ते-पड़ते छूट जाती हैं. लगता है, किसी दिन जैसे दर्पण में केश आ जाता है, पुतलियों में उतर आएगा रेशा और तुम मुझे दो या आधी दिखाई दोगी. श. तुम्हें न पूरा पा सकूँगा न देख पाऊंगा कभी पूरा.
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शरीर-२ 

तुम्हारी जिह्वा के अग्रभाग में मेरी समग्र चेतना स्थित है. नीचे के होंठ के भीतर का भाग जिसे ईश्वर से भी अधिक मेरे दाँत जानते हैं वहां पर जो अधिक उत्तेजना में काटने पर उस दोपहर रक्त निकल आया था, उस रक्त से मेरे भीतर कितना रंग हैं, तुम नहीं जानती श. 
किसी अन्तरिक्ष के यायावर की उत्सुकता से अधिक तीव्र और गहरी है मेरी जिह्वा की तुम्हारे तालु तक की यात्रा. मेरे दाँत और नाखून वन्यपशु से तुम्हारी फिराक में रहते हैं हमेशा. ''सुनने में बुरा लगता है'' मत कहो तुम. तुम्हारे पैर के अंगूठे का स्वाद तो मुझसे ज्यादा यह पृथ्वी भी नहीं जानती. पिंडलियों की मांसपेशियों की ऊष्मा बहुत है इच्छा के पक जाने के लिए.
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                                                                                      [ अम्बर की अन्य कविताएं यहाँ. तस्वीर फ्रैंक होवट की.]

10 comments:

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

समंदर के पानी की तरह नमकीन.

प्रवीण पाण्डेय said...

एक सर्वथा नया दृष्टिकोण..

gungun said...

bahut hi sunder..
na poora dekh paana aur n jaan paana..

sarita sharma said...

कुछ दिन पहले अशोक बाजपेयी ने कविता के बारे में कहा था-अच्छी कविता वही है जिसमें भाषा वहाँ तक जाये जहाँ पहले न गयी हो.अम्बर रंजना पाण्डेय की कविताएं कम से कम इस कसौटी पर तो खरी उतरती हैं.ये गद्यात्मक होते हुए भी काव्यात्मक प्रवाहयुक्त हैं.पहली कविता में भाषा को प्रेम की अभिव्यक्ति में असमर्थ बताया गया है.दूसरी और तीसरी कविता में बॉडी लेंग्वेज को शब्दों में बखूबी ढाला गया है.चौंकाने और ध्यान आकर्षित करने वाली अलग रंग ढंग की कवितायेँ पढवाने के लिए आभार.

बाबुषा said...

अहा !
तुम्हारे पैर के अंगूठे का स्वाद तो मुझसे ज्यादा यह पृथ्वी भी नहीं जानती.

ये तो झरना है. श.

Sushobhit Saktawat said...

सुंदर, ऐंद्रिक और उत्‍तप्‍त... और हमेशा की तरह, एक अपूर्व क्‍लैसिकल आभा से युक्‍त। अंबर, आपकी कविताओं की प्रतीक्षा सदैव रहती है।

'इससे अधिक नहीं लिख पाउँगा/जान लेना तुम मेरी दशा केवल चन्द्रबिन्दु पढ़कर.'

Pratyaksha said...

sensuous , the body becomes the ground where words are seeds that birth into creepers of desire, yet they are not abstract really , they are animate and concrete .. not ephemeral and thankfully not sentimental ..i like the photo too though it is too much fitting in into ..that could have been more elusive in its content

स्वाति said...

लाजवाब. तारीफ़ के लिए उपयुक्त शब्द की तलाश आगे भी जारी है.

व्योमेश शुक्ल said...

'कविता लिखना बहुत दूर की बात हो गयी है...

कविता लिखने से पहले और लिखने के बाद, हमेशा, कविता लिखने को बहुत दूर की बात होना चाहिए. काश, सबके साथ ऐसा हो पाता, साहित्य के लिये 'साहित्य से निर्वासन' आवश्यक नहीं, अपरिहार्य होता. कवि अगर ऐसे लोगों से मिलकर - जो किसी दूसरी भाषा का आविष्कार कर लिया करते हैं - कविता लिखने से दूर जाता है, तो यह उसका अपना मौलिक-विशेष है. ऐसा कहा भी जाना चाहिए, किया भी जाना चाहिए. कविता हमेशा उपलब्ध से असहमत है, वह उपलब्ध भाषा है तो हो. और यह भी तय है कि कविता का समझा जाना अंततः होगा, भले ही वह चंद्र्बिन्दुओं की भाषा में लिखी गयी हो.

कवि ने ऐसी दूसरी कविताओं का लिखा जाना अगर असंभव न कर दिया होता तो कुछ लोग इसी के आसपास ज़रूर कवितायें लिखते, जैसे मैं. इन्हें पढते हुए कविता के भीतर और बाहर की बहुत सी पंक्तियाँ गूंजने लगती हैं. यह एक अच्छी कविता की सबसे अच्छी बात है. वह अपनी-सी दूसरी कविताओं को जगाती है और उन्हें जगने भी नहीं देती.

अंगूठे के स्वाद के लिये हमेशा कृतज्ञ रहना होगा. एक अच्छा बिम्ब कवि के जीवन लिये पर्याप्त होता है, संभवतः एजरा पाउंड ने कहा था, कविता का क़र्ज़ अदा हो गया है. कवि को दूर भी रहना पड़े कविता से तो कोई गम नहीं.

ओम निश्‍चल said...

यह तो अशोक वाजपेयी के ‘कामातुर भोर’ जैसा आवाहन है। तथापि......