ज्ञानी
वह जो ज्ञानी है
जो अपने को तीसमार खां समझता है
एक अदृश्य घोड़े पर सवार रहता है
उसके पास एक अदृश्य मुकुट भी है
जो अक्सर वह सिर पर डाले रहता है
वैसे उसके पास एक अदृश्य दुम भी है
जिसे वह खास मौके पर बाहर निकालता है
फिर दुम क्या करती होगी
यह तो समझा ही जा सकता है
कई बार अदृश्य घोड़े पर चढ़ते समय
उसका अदृश्य मुकुट हिलने लगता है
जिसे संभालने के चक्कर में
वह गिर जाता है
जमीन पर गिरा हुआ ज्ञानी
ज्ञानी नहीं लगता
तब वह गला दबाकर
शब्दों को चबा-चबाकर नहीं बोलता
एक मामूली आदमी की तरह
अनुरोध करता है-जरा उठा दो भाई!
***
तुम
एक मुश्किल रास्ता तुमने नहीं चुना
मुश्किल रास्ते ने तुम्हें चुना
तुम किसी सांचे के लिए नहीं बने
बेडौल पत्थरों ने तुम्हें प्यार किया
वे परित्यक्ता नदियां अंत-अंत तक तुम्हारा नाम लेती रहीं
जिन्हें मन के भूगोल में तुमने बार-बार बसाया
तुम किसी की पीठ पर सवार होकर नहीं चले
तुमने अपनी नाव खुद बनाई
यह क्या कम है कि सब जी रहे उधार का जीवन
और तुम्हारे पास है अपना आकाश,
अपनी लालसा में लिथड़े लोगों की भीड़ में
तुम अलग से दिख जाते हो
जब तुम इनकार करते हो किसी होड़ में उतरने से
तब अकेले विजेता नजर आते हो
इसे मामूली मत समझो कि तुम्हारी मुस्कराहट
तुम्हारी मुस्कराहट है
और तुम्हारी शाम तुम्हारी शाम
एक तुम्हीं तो हो जो शाम में फूंक मारकर उसका बुलबुला बना
घंटों उड़ा सकते हो
एक सफल आदमी देखता है
दूसरे सफल आदमी को ईष्र्या और घृणा से
जब भी कोई सफल आदमी लडख़ड़ाता है
जश्न मनाते हैं दूसरे सफल लोग
जब छिनता है किसी नियंता का ताज
वह दूध से निकाल फेंकी गई मक्खी की तरह दिखने लगता है
उसे देख नाक पर रुमाल रख लेते हैं उसके दरबारी
अच्छा है तुम सफल लोगों की चर्चा में नहीं हो
तुम्हारी चर्चा जरूर तितलियां करती होंगी
जिन्हें देखते ही तुम खिल जाते हो फूल की तरह।
***
त्योहारों की याद
इसे कोई चमत्कार न समझा जाए
नए बसते महानगर के किसी मोहल्ले से गुजरते हुए
अचानक दिख जाते हैं ताजा जुते खेत
उनमें उतरते हैं बगुले
खील बतासों की तरह
उन्हें देखते हुए
बज उठती है थाली
मन के किसी कोने में
कोई न कोई इसी तरह दिलाता रहता है
त्योहारों की याद
कभी किसी पुरानी कमीज की जेब से
निकलता है रेशमी धागा
किसी दिन ताखे पर मिलता है
सिंदूर से नहाया एक सिक्का
कोई नहीं छीन सकता
जिंदगी से उसका स्वभाव
तुम भले ही बन जाओ
किसी खंभे का बंधुआ
न देख पाओ धूप का बदलता रंग
पर एक दिन अपने आप गालों पर
चढ़ आती है लाली
मीठी हो जाती है जीभ।
***
इसी जनम में
वह जो मन की चहचहाहट पर गुनगुनाता था
मन की लहरों में डूबता-उतराता था
पकता रहता था मन की आंच में
वह जो चला गया एक दिन
मन के घोड़े की रास थामे
सांवले बादलों में न जाने कहां
वह मैं ही था
विश्वास नहीं होता
यह इसी जनम की बात है।
***
इस सृष्टि से बाहर
सब कुछ तय है
संचालक का आमंत्रण,
वक्ताओं का गर्जन-तर्जन
अध्यक्षीय भाषण
तय है विरोध और समर्थन
यहां सब कुछ निश्चित है
एक आदमी मिलेगा तो
पता है कि किस तरह झुककर
क्या कहेगा
तय है हद उसकी विनम्रता की
उसकी मुस्कराहट की
सब कुछ इतना तयशुदा है कि
डर लगता है
मेरी सुबह और शाम भी तय की जा चुकी है
तय है मेरी रफ्तार भी
मैं एक अव्यवस्थित आदमी
इतनी व्यवस्था से घबरा गया हूं
सोचता हूं किसी दिन ठीक आधी रात में ही
मुर्गे की तरह बांग देना शुरू कर दूं
तहस-नहस कर दूं सबकी दिनचर्या
भले ही बाहर कर दिया जाऊं
नव देवताओं की इस सृष्टि से।
***
[ हिंदी के चर्चित कवि-कहानीकार संजय कुंदन की सबद पर इससे पहले कविता सम्बन्धी एक टिप्पणी यहाँ छपी थी. उनका तीसरा कविता संग्रह 'योजनाओं का शहर' शीघ्र प्रकाश्य है. कविताओं के साथ दी गई चित्र-कृति सल्वाडोर डाली की है. ]


Friday, 13 April, 2012
विषय वस्तु और प्रस्तुति अत्यन्त प्रभावी है।
Friday, 13 April, 2012
मौलिक सोच की सशक्त अभिव्यक्ति वाली ये कवितायेँ सुखद आश्चर्य हैं.संजय कुंदन की कहानियां भी मुझे पसंद हैं. वर्तमान धाराओं के विरुद्ध जीवन पर लिखने वाले इस लेखक को पढवाने के लिए शुक्रिया.
Friday, 13 April, 2012
shukriya padhwaane le liye!
Friday, 13 April, 2012
sanjay kundan ki kavitaon mey spashtata hai. 'tumhare pas hai apna akash' aur 'koi nahi chin sakta zindgi say uska swabhav' jaisi baat kavita mey jo kavi kahna chahta hai, use spasht karti hai. sanjay ji ko meri taraf se subhkamnaye.
Friday, 13 April, 2012
बहोत ही सुंदर कविताए है ...'तुम 'और 'ज्ञानी' बहोत पसंद आयी......थैंक्स.
Friday, 13 April, 2012
बेहद सुन्दर कवितायेँ!
प्रस्तुति के लिए आभार!
Friday, 13 April, 2012
saari kavitayen behad acchi hain kundan ji kee... gyani aur srishti se bahar apne nayepan ke sankshipt roop ke karan adhik pasand aayeen..
swapnil
Post a Comment