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आइनों को देह की भूख होती है


{ महेश वर्मा की नई कविताएं }

[ महेश वर्मा की कविताओं में प्रेम, स्मृति, इच्छा, अवसाद, उम्मीद, प्रतीक्षा जैसे तत्वों को अलगाना कठिन नहीं है. और इन मायनों में वह कठिनाई के कवि हैं भी नहीं. ध्यान उस सादगी की तरफ जाता है, जिससे वह मनुष्य मन के इन आदिम अनुभवों को बिना किसी आचार्य-मुद्रा में गए व्यक्त कर पाते हैं. ऐसा प्रत्येक सम्भवन हमें उस कवि- श्रम की भी ठीक-ठीक सूचना नहीं देता जो अन्यथा कई कवियों की कवितायें पढ़ते हुए यों ही मिल जाती है.

सबद पर इससे पहले महेश वर्मा की कविताएं यहां.
चित्र-कृति : ज्यां डफे की. ]








पहले उसने...

...सब जानते हैं कि हवा ने परिंदों को जन्म दिया लेकिन
उससे पहले उसने उनकी आँखों में आकाश रख
दिया था कि (वे) उड़ सकें . ऐसे ही अँधेरे ने अपने
अनुराग से चाँद को गढा और ये सिफत दी कि
वो दूसरों की आँखों में सपने रख सके .

इसमें कोई छिपी हुई बात नहीं है कि आइनों को
देह की भूख होती है, लेकिन पहले ही हवा
ने (सब) हिला दिया था मेरे भीतर बन रही तु-
-म्हारी प्रतिच्छवि को: शाम थी तुम उदास थी शाम उदास
थी तुम ...लेकिन इससे भी पहले तुम्हारे होने ने ही मुझे गढ़ना
शुरू कर दिया था कि तुम गोया मूर्तिकार का चाकू थीं, लकीरें
काटतीं और शक्ल गढती मिट्टी में...

हम उस ओर नहीं जाएंगे जहां मिट्टी
और पृथ्वी की आंतरिक इच्छा वृक्षों से होती हुई
उनकी पत्तियों में बज रही है : हवा से.

-- ‘ हवा एक पुराना दर्पन है ’
    (उसका पारा उतर चुका है वसंतसेना !)    
-- “ क्या हम एक घेरा काटकर आरम्भ पर आ पाए (अन्धकार !!) ”
****
बुझे हुए सब तारे

अपने होने में जो सितारे
कब का बुझ चुके
उनकी रोशनी में जो टिमटिम है
वह रास्तों के मोड़ों की है

यहाँ प्रेमीजन जो सितारे
अपनी प्रेमिकाओं की नज़र कर रहे हैं
हो सकता है ये वही सितारे हों
जो हैं ही नहीं

प्रेमिकाओं की चमकती आँखों के
सितारा उपमान तभी बुझ चुके हों
जब पहले मनुष्य सीख रहे थे प्यार करना
मरते सितारों की चीख सुनने की उनको फुर्सत नहीं थी
तो यहाँ धरती पर मरना भी कोई चीज़ नहीं थी

धरती के भीतर और बाहर
जितना बाकी हैं
बहुत पहले मर चुके पूर्वजों की हड्डियां
उनके बनाए चित्र और पत्थर के हथियार

ये राह बताने के सितारे हैं
जो बुझे नहीं हैं
****
दरख़्त

यह रात है
और पतझर की नींद में भी
हवा में घूमकर नीचे गिरते पत्ते हैं

यह वृक्ष का सपना नहीं है
उसकी नींद के पत्ते भी गिर रहे हैं अँधेरे में
इस तरह अँधेरे में कि अँधेरे का हिस्सा हैं
पत्ते की शक्ल का एक अँधेरा
बाहर के अँधेरे के भीतर गिर रहा है

अँधेरा कोई वृक्ष है
तो उसके भी पत्ते गिर रहे हैं रात में

रात खुद एक दरख़्त है.
****
पुकार

सीढ़ियों के पास नीचे से कोई पुकार रहा है
जबकी कोई सीढ़ियां नहीं हैं
उपरली मंज़िल ही नहीं : खानाबदोश हम तम्बुओं में रहते हैं

पीछे से कारवां में किसी के पुकारने की
आ रही है आवाज़
कोई जानवर नहीं हैं, न बैलगाड़ियां न कोई
कारवां कहीं को जाता हुआ
खानाबदोश नहीं हैं : हम रुके हुए लोग हैं

एक जगह रुके हुए थे जहाँ पर कि जिसे ऊब कर
कभी कुनबा कहते थे कभी सराय कभी शहर अपना
यहां भी सुनाई दे रही है पुकार :

खानाबदोशों के नक़्शे में नहीं
न पहली मंज़िल पर रहने वाले
वाचक के के कमरे की दीवार पे लगे नक़्शे में
कहीं ऐसी कोई जगह ही नहीं थी किसी नक़्शे में

कोई पुकार कहाँ होती ?
****

Comments

इन कविताओं को दोबारा पढ़ूंगी. पसंद आयी हैं.
Vipin Choudhary said…
सीढ़ियों के पास नीचे से कोई पुकार रहा है
जबकी कोई सीढ़ियां नहीं हैं
उपरली मंज़िल ही नहीं : खानाबदोश हम तम्बुओं में रहते हैं
अनुराग ने ऊपर महेश जी की कवितओं के बारे में जो कहा है, मैं भी ठीक वैसा ही कहना चाहती हूं. महेश जी की कवितायेँ कोमलता की सबसे अंदरूनी परत के नज़दीक जा बैठती हैं और तभी समकालीन कवियों से अलग है
मन में बहुत गहरे उतरती पंक्तियाँ।
Udan Tashtari said…
गहन अभिव्यक्ति- बार बार पढ़ना और नये अर्थ पाना,,,,फिर आते हैं.
नीलोत्पल said…
महेशजी बधाई. विशेष 'दरख़्त' कविता आपके कलात्मक मंजाव को परिलक्षित करती है. लाजवाब. नीलोत्पल
Bharat Tiwari said…
दिल खुश
रूह खुश
... बहुत शुक्रिया
सादर
ज़बरदस्त ये कविताये हमे कहीँ दूर ले जाती हैँ जबकि ये बातेँ इसी दुनिया की हैँ...वाह...
leena malhotra said…
shandar.. bahut achhi.. gahre arth liye..

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