लेखक काम पर : हेनरी मिलर





लेखन को तवज्जो दो,
............... ...........................................................पेंटिंग, संगीत, मित्र-मिलन, सिनेमा इसके बाद हैं

एक वक़्त में किसी एक ही मजमून पर काम करो.

काम के बीच कोई नई किताब का मंसूबा मत बांधो.

लिखते हुए घबराओ नहीं. जो काम हाथ में उठा रखा है, उस पर शांत और खुश मन से जुटो. इसकी बहुत परवाह न करो कि वह कैसा बनेगा.

तय वक़्त तक लिखो, उसके बाद नहीं. लेकिन इन वक्तों में अपनी योजना को अपने मिज़ाज के असर में आने से बचाओ.

ध्यान रहे, जिन वक्तों में तुम कुछ रच नहीं सकते, उन वक्तों में भी तुम काम तो कर ही सकते हो.

हर रोज़ लिखे हुए को और पुख्ता करो लेकिन इसके लिए ज़रूरी नहीं कि उसमें नई चीजें ही जोड़ी जाएँ.

लोगों से छिटको नहीं, उनके पास जाओ. जगहों में रमो. पीने की इच्छा हो तो पियो.

खूब खटने वाला घोड़ा न बनो, लेखन का लुत्फ़ लो.

एक दिए गए दिन में तुम्हें अपनी योजना में रद्दोबदल करना ठीक लगे, तो करो. लेकिन अगली सुबह उन बदलावों से गुजरो. उन्हें ध्यान से नबेरो. अलगाओ.

भूल जाओ कि तुम कौन-कौन सी किताबें लिखना चाहते हो. सिर्फ़ उस अकेले मजमून के बारे में सोचो जिस पर तुम इस वक़्त काम कर रहे हो.

सबसे पहले लिखो. लेखन को तवज्जो दो, पेंटिंग, संगीत, मित्र-मिलन, सिनेमा इसके बाद हैं.

सुबह में :

अगर मन अलसाए तो पढ़े हुए से टीपें लो, उन्हें सहेजो. ये उकसावे के लिए काफी हैं.

अगर साँसें सम पर हों तो तुरंत लिखने में जुट जाओ.

दोपहर में :

जो सामने है, उस काम को बढ़ाओ. इन वक्तों में बाद के काम पर शक या ऐतबार, कोई दख़ल, कोई भटकाव : कुछ नहीं होना चाहिए. एक वक़्त में, एक हिस्से को उसके उरुज तक लिखो, अच्छा और अंतिम लिखा हुआ मानकर.

शाम में :

दोस्तों से मिलो. चायखाने में बैठ पढ़ो.

अनजानी राहों पर निकलो. बारिश में पैदल, नहीं तो किसी सायकल पर.

अगर मन करे तो लिखो. छिटपुट चीज़ें इन्हीं वक्तों में निपटाओ.

अगर थकान या खाली-खाली-सा महसूस करो तो पेंट करो.
****

अनुवाद : अनुराग वत्स.

[ हेनरी मिलर ने लिखने की यह रूटीन १९३२-३३ के दरम्यान बनाया था। मिलर की तस्वीरें गूगल से।]

Comments

AK said…
It's a very good translation, as good as the content itself. And well presented on the page too, with nice pictures of HM.
sundar rachana , sundar chayan or sundar anuwad
बहुत ही काम की सलाहें हैं।
Dr.Verma said…
likhne k liye achhi salahen..:)
आवेश said…
दो सलाहें मिलर को मेरी ओर से १-जब तक कड़ी भूख न लगे कुछ न खाओ ,२- जबरदस्ती सोने की कोशिश मत करो ,नींद का रूटीन मत बनाओ
sarita sharma said…
इस लेख में लेखन प्रक्रिया पर बहुत उपयोगी सलाहें दी गयी हैं.एकाग्रता और लगन से काम करने और ऊब से बचने के लिए मिलर के सुझाव ध्यान देने योग्य हैं.अनुवाद भी बहुत सहज और प्रवाहमय भाषा में किया गया है.
AVINASH MISHRA said…
बहुत अच्छी नियमावली है...
Puja Upadhyay said…
मुझे अनुवाद पढ़ना खास पसंद नहीं है। अक्सर काफी staccato होता है...पर यहाँ लेखन में प्रवाह है...कहीं पर भी ये नहीं लगता की ये मूल लेखन की एक फीकी परछाई है, इस लेख का अपना प्रकाश है।

अनुवाद में अधिकतर नोकें उभर आती हैं जहां ध्यान अटक जाता है...कि यहाँ लेखक ने जो कहना चाहा था उसे अनुवादक खोल नहीं पाया. हेनरी मिलर का ये अनुवाद काफी खूबसूरत और बहता हुआ है...निर्बाध। तुम इसके लिए बधाई के पात्र हो।
कंटेन्ट और तुम्हारा कमिटमेंट...दोनों ध्यान खींचते हैं...इसके पीछे लगी मेहनत और एक एक वाक्य को फिर से गढ़ना समझ आता है...ऐसा कुछ अनुवादित होता है तो वो जितना लेखक का होता है उतना ही अनुवादक का भी...और सबसे बढ़कर, पढ़ने वाले का हो जाता है।

शुक्रिया और बधाई।
Anurag Tiwari said…
Wow Anurag bhai , amazing.
Mausam J said…
शुक्रिया..इतनी ख़ूबसूरत बातों के लिए।

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