Thursday, January 19, 2012

मृत्यु ओर : काफ़्का



[ काफ़्का ने ये वाक्य मृत्यु ओर जाते हुए लिखे थे. बोलने की मनाहट के बीच. उन छोटे-छोटे स्लिप्स पर जो उनके और बाकी दुनिया के बीच एक पुल का काम करते थे. उन पुलों से होकर कोई मित्र आवाज़, स्पर्श या भूली-बिसरी बात भले उन तक आती रही, जीवन दूर भागता रहा. अपनी यातना और मरण में काफ़्का का अकेलापन, अवसाद और भय इन वाक्यों से झांकता है. उनके अभिन्न मैक्स ब्रॉड ने ऐसे अनेक स्याह-स्लिप्स को काफ़्का की डेथ-बेड से बटोर-नबेर कर उनकी मृत्यु के बाद इन्हें उनकी तमाम रचनाओं जितना महत्वपूर्ण मानकर ही छपवाया था. 'लेटर्स टू फ्रेंड्स, फैमिली एंड एडिटर्स' के अंतिम हिस्से में दिए गए इस चयन से क्रम-भंग कर कुछ वाक्य यहां अनूदित किए गए हैं. साथ में दी गई तस्वीर गूगल से.]

एक लम्हा अपना हाथ ही मेरे माथे पर रख दो


एक चिड़िया कमरे में आई.

क्या तकलीफ़ से कुछ वक्फे के लिए निजात मिल सकती है, मेरा मतलब है कुछ लम्बे वक़्त के लिए ?

कितना कष्टकर हूँ मैं आपके लिए... मेरी तकलीफ़ इससे और बढ़ जाती है कि मेरी वजह से परेशान होने के बावजूद आप सब मेरे प्रति कितने सदय हैं ! इन मायनों में हॉस्पिटल कितनी अच्छी जगह है.

आप कितने बरस मेरे साथ यों रहेंगे ? कितने बरस आपके इस तरह होने के साथ मैं रह पाउँगा ?

आप तो जानते हैं, एक तालाब कहीं बह नहीं सकता.

डाल से हिलग गए फूलों से बिलकुल फ़र्क बर्ताव करना चाहिए.

नित्य वसंत कहां है ?

क्या अमलतास दिखेगा ?

भय और भय.

बहुत सारा बलगम आया, फिर भी सुबह तकलीफ़ रही. सदमे में यह तकलीफ़ इस आसानी से मेरे दिमाग में घर कर गई मानो मुझे नोबेल से नवाज़ा गया हो.

एहतियात बरतो, मेरा कफ़ कहीं तुम्हारे चेहरे पर न पड़ जाए.

अगर इतना ही दर्द और कफ़ रहा तो मैं जो थोड़ा-बहुत खा पा रहा हूँ, वह भी छूट जाएगा.

यह ( कमरे में आई मक्खी ) हमारी तरह खा नहीं सकती, सो इसे कोई तकलीफ़ भी नहीं. क्या यह कमरे में लौट कर आना चाहती है ?

दिक्कत यह है कि मैं एक ग्लास पानी तक नहीं पी सकता, हालाँकि एक ग्लास पानी पी सकूँगा, ऐसी लालसा ही मुझे तृप्त कर देती है.

मेरी देह अब इतनी विषाक्त हो चुकी है कि फलों का स्वाद कैसा होता है, इसे नहीं मालूम.

बद को बद रहने दो नहीं तो वह बदतर हो जाएगा.

मेरी हौसला अफजाई के लिए एक लम्हा अपना हाथ ही मेरे माथे पर रख दो.

एक दफ़ा मुझे उसके ( प्रेमिका के ) संग बाल्टिक जाना था, लेकिन तब तक मैं अपने दुबले होने और दूसरी चिंताओं से उबर नहीं पाया था.

अपनी मृत्यु में लायलक कितना सुन्दर है, पीता-घूमता.

यह नहीं हो सकता न कि एक मरता हुआ आदमी पिये !

शायद एक हफ्ते और टिकूं...मुझे तो उम्मीद बंधती है.

कुछ वक्फ़े की ख़ामोशी मुझे ख़ुश बना देती है.

अगर कोई खास मुद्दा न हो तो बातचीत के कई लिए कई विषय सूझते हैं.

अब मैं इसे ( अपनी पाण्डुलिपि ) पढ़ना चाहता हूँ. बहुत संभव है यह मुझे खीज से से भर दे, तब भी मुझे अपने लिखे हुए से एक दफा और गुजरना चाहिए.

किसने फ़ोन किया ? क्या मैक्स ( ब्रॉड ) था ?

आखिरकार मदद ( डॉक्टर ) भी बिना मदद चल दिए.

बिस्मार्क के भी डॉक्टर थे. उन्होंने भी बहुत कोशिश की.
****

                                                                                                                            अनुवाद : अनुराग वत्स 


Sunday, January 15, 2012

तुम्हारे बालों की सबसे उलझी लट हूं / जितना खिंचूंगा उतना दुखूंगा



[ हालांकि अपने पहले संग्रह 'आलाप में गिरह' की कविताओं में भी, लेकिन उसके बाद की अनेक कविताओं में गीत चतुर्वेदी ने प्रेम को बतौर थीम बरतने के साथ-साथ उसके भीतर ऐसी जिरहें और जगहें तलाश की हैं, जिनका हिंदी में निर्वाह मुख्यतः कथा-रूपों में हुआ है. यों भी हमारा 'सेंटीमेंटल एजुकेशन' प्रेम को सात्विक, समर्पण का पर्याय और किसी भी किस्म की जिरह के बाहर रखने की सीख देता रहा है और ज़्यादातर कवि ऐसी शिक्षा के कायल भी रहे हैं. इसीलिए उनकी कविताओं में 'बिट्रेयल' को हीनतर अनुषंग या बहुत हुआ तो एक करुण-प्रसंग के तौर पर याद किया गया है. 'प्रेम की राजनीति' ( प्रेम और राजनीति !!!) जैसे विषय-संबंध कवियों ने समाज-वैज्ञानिकों के लिए रख छोड़े हैं. गीत ने कविता में ख़ुश्‍की की बहुत परवाह किए बगैर इन प्रोज़ेक विषय-संबंधों को कविता की मुख्य-भूमि पर खड़ा कर दिया है. और देखिए ऐसा करते हुए वे कितना सजग, भिन्न और अभिनव हो चले हैं. जैसे जीवन, वैसे ही प्रेम और उसके मायने भी बदले हैं. आनंदघन का बतलाया गया 'सनेह-मारग' अब कहीं नहीं है. गीत की कविताएं इस 'पहली-सी मुहब्बत' के न होने का मर्सिया भी है. ]


  • गीत चतुर्वेदी

    सात नई कविताएं



मंथरता से थकान

मेरी त्वचा की पार्थिव दरारें तुम्हारी अनुपस्थिति का रेखांकन हैं
प्रेम तुम्हारी नीति थी मुझ पर राज करना तुम्हारी इच्छा
मैं तुम्हारी राजनीति से मारा गया

मेरे हृदय में हर पल मृत्यु का स्पंदन है
बांह के पास एक नस उसी लय पर फड़कती है जिस पर दिल धड़कता है

इतने बरसों में इतने शहरों में इतने मकानों में इतनी तरहों से रहता आया मैं
कि कई बार सुबह उठने पर यह अंदाज़ा नहीं होता कि
बाईं ओर को बाथरूम पड़ता है या बाल्कनी

इस महासागर में जितनी भी बूंदें हैं वे मेरे जिए हुए पल हैं
जितनी बूंदें छिपी हैं अनंत के मेघ और अमेघ में
दिखने पर वे भी ठीक ऐसी ही दिखती हैं

मैं बलता रहा दीप की बाती की तरह
जिसमें डूबा था वह तैल मुझे छलता रहा
भरी दोपहर बीच सड़क जलाया तुमने मुझे
मुझे कमतर जताने की तुम्हारी इस विनम्रता को चूमता हूं मैं

तुम आओ और मेरे पैरों में पहिया बन जाओ
इस मंथरता से थक चुका हूं मैं
थकने के लिए अब मुझे गति चाहिए

*

सारे सिकंदर घर लौटने से पहले ही मर जाते हैं

सारे सिकंदर घर लौटने से पहले ही मर जाते हैं
दुनिया का एक हिस्सा हमेशा अनजीता छूट जाता है
चाहे कितने भी होश में हों, मन का एक हिस्सा अनचित्ता रहता है
कितना भी प्रेम कर लें, एक शंका उसके समांतर चलती रहती है
जाते हुए का रिटर्न टिकट देख लेने के बाद भी मन में हूक मचती है कम से कम एक बार तो ज़रूर ही
कि जाने के बाद लौट के आने का पल आएगा भी या नहीं

मैंने ट्रेनों से कभी नहीं पूछा कि तुम अपने सारे मुसाफि़रों को जानती हो क्या
पेड़ों से यह नहीं जाना कि वे सारी पत्तियों को उनके फ़र्स्‍ट-नेम से पुकारते हैं क्या
मैं जीवन में आए हर एक को ज्ञानना चाहता था
मैं हवा में पंछियों के परचिह्न खोजता
अपने पदचिह्नों को अपने से आगे चलता देखता

तुममें डूबूंगा तो पानी से गीला होऊंगा ना डूबूंगा तो बारिश से गीला होऊंगा
तुम एक गीले बहाने से अधिक कुछ नहीं
मैं आसमान जितना प्रेम करता था तुमसे तुम चुटकी-भर
तुम्हारी चुटकी में पूरा आसमान समा जाता

दुनिया दो थी तुम्हारे वक्षों जैसी दुनिया तीन भी थी तुम्हारी आंखों जैसी दुनिया अनगिनत थी तुम्हारे ख़्यालों जैसी
मैं अकेला था तुम्हारे आंसू के स्वाद जैसा मैं अकेला था तुम्हारे माथे पर तिल जैसा मैं अकेला ही था
दुनिया भले अनगिनत थी जिसमें जिया मैं
हर वह चीज़ नदी थी मेरे लिए जिसमें तुम्हारे होने का नाद था 
फिर भी स्वप्न की घोड़ी मुझसे कभी सधी नहीं

तुम जो सुख देती हो, उनसे जिंदा रहता हूं
तुम जो दुख देती हो, उनसे कविता करता हूं
इतना जिया जीवन, कविता कितनी कम कर पाया

*

परिभाषा

पेड़ एक निर्वाक प्रतीक्षालय है
मौन एक नाद है जिसके पीछे अनहद नदी बहती है

तुम्हारे कंठ का स्वर गांडीव से निकला वत्सदंत है
जो मृत्यु नहीं देता, जीवन के पार भी भटकन ही देता है
गोया जीवन कम है मेरे लिए जीवन की भटकन भी कम है

बाल दोमुंहे थे बातें भी दोमुंही
क्या देव क्या दानव मेरे इतिहास में एक मुंह से किसी का काम ही न चल पाया
सारे देव प्रेम करते थे प्रेम का एक भी देव नहीं
वासना का देव था जो अपनी देह ही न संभाल पाया
अगर मैं हवा से तुम्हारी देह बनाकर तुम्हें चूमता हूं बेतहाशा
तो यह मेरी परंपरा का सर्वश्रेष्ठ पालन है

मिथिहास एक अन्यमनस्क परिहास है
हर परिभाषा फिर भी एक नई आशा है

अल्प विराम अर्ध विराम और तमाम विराम चिह्न जोड़ लिए
सुंदर वाक्य शब्दों से बनता है संकेतों से नहीं
मेरी गठरी में बहुत सितारे हैं
लेकिन आसमान की मिल्कियत परिंदों को कभी मिली नहीं

मुझे मत दोषो शब्द बनकर तुम्हें ही आना था
मेरी गठरी को खोल आसमान बन तन जाना था

मन पर कौमार्य की कोई झिल्ली नहीं होती
मन भी देव है एक से ज़्यादा मुंह वाला

हद है प्रेम हमेशा मुसीबत की तरह आया
कोई मुसीबत कभी प्रेम की तरह नहीं आई
किसी ने कहा यह गूंगे का गुड़ है
दरअसल यह मुहावरा ही अभिव्यक्ति के खि़लाफ़ सबसे गहरी साजि़श है

हाथ की रेखाओं पर कभी रेल चला दी
तो तय है सब आपस में टकराकर नष्ट हो जाएंगी
ऐसा सर्वनाश जंक्शन किसी नक़्शे में भी नहीं मिलेगा

अंत के अनेक विकल्प हैं

*



देखी तेरी कासी

हमारे भीतर का अंधेरा हमारी कंखौरियों तले छुपा होता है
किसी-किसी रात हम जुगनू भी नहीं होते
हवा की परछाईं कांपती है मेरे रोमों पर
मन के मैदान पर बेतरतीब उगी घास छंटने को अनमनी है

पृथ्वी ने थाम रखा है चंचल शेष को
शेष मेरे बीते समय का अवशेष है

मुस्कान क्या है धीरे-धीरे फैलती एक सीमित दूरी के सिवाय
चुंबन धीरे-धीरे गोल होती एक दूरी है

भीतर जो शोर उठता है
वह तुम्हारे न होने का डाकिया है अपनी साइकिल टिनटिनाता
मेघों को जल से भरने का दायित्व मुझ पर है
स्वीकार है मुझे अब सहर्ष सगर्व

कोई तुमसे इतना प्रेम करेगा
कि प्रेम कर-करके तुम्हारा नुक़सान कर देगा
तुम कुछ कह भी नहीं पाओगे
हर आघात के बाद वह पूछेगा
तुम प्रेम में भी नफ़ा-नुक़सान देखते हो

एक दिन तुम वह बादल बन जाओगे जो ज़रा-से आघात से रो देता है

एक मौन पेड़ मुझे देखता रहता है
चाहे कितना भी दूर क्यों न चला जाऊं
इतिहास गवाह है
ज़ालिमों को अत्यंत समर्पित प्रेमिकाएं मिलती हैं

जा रे ज़माना
देखी तेरी कासी
जहां मालिक भी खलासी

*


निविद

हमने साथ चलना शुरू किया था
हमने साथ रहना शुरू किया था
धीरे-धीरे मैं अलग होता चला गया
एक कमरा मैंने ऐसा बना लिया है
जहां अब किसी का भी प्रवेश निषिद्ध है
जो भी इसे पढ़े, कृपया इसे आरोप नमाने
यह महज़ एक आत्म-स्वीकृति है

उससे दूर रहो जिसमें हीनभावना होती है
तुम उसकी हीनता को दूर नहीं कर पाओगे
ख़ुद को श्रेष्ठ बताने के चक्कर में वह रोज़ तुम्हारी हत्या करेगा

मैं समंदर के भीतर से जन्मा हूं
लेकिन मुझे सी-फूड वाले शो-केस में मत रखना
बुरादे में बदले दूध की तरह रहूंगा तुम्हारी आलमारी में
जब जी चाहे घोलकर पी जाना

द्रव में बदला हुआ प्रकाश हूं
तुम्हारी नाभि मेरे होने के द्रव से भरी है
मैं सूखकर कस्तूरी बन गया

सांस की धुन पर गाती है मेरी आत्मा
मेरा हृदय घड़ी है स्पंदन तुम्हारे प्रेम की टिक-टॉक
तुम्हारे बालों की सबसे उलझी लट हूं
जितना खिंचूंगा उतना दुखूंगा

इस देश के भीतर वह देश हूं मैं जो हज़ारों साल पहले खो गया
इस देह के भीतर वह देह हूं मैं जो हर अस्थि-कास्थि को खा गया

तुम जागती हो निविद जागता है
तुम दोनों के साथ सारे देव जागते हैं

रात-भर चूमता रहता तुम्हारी पलकों को नींद के होंठों से
रात-भर तुम्हारी हथेली पर रेखता रहा
सिलवटों से भरा है तुम्हारी आंख का पानी
फेंके हुए सारे कंकड़ अब वापस लेता हूं

*


पंचतत्व

मेरी देह से मिट्टी निकाल लो और बंजरों में छिड़क दो
मेरी देह से जल निकाल लो और रेगिस्तान में नहरें बहाओ
मेरी देह से निकाल लो आसमान और बेघरों की छत बनाओ
मेरी देह से निकाल लो हवा और यहूदी कैम्पों की वायु शुद्ध कराओ
मेरी देह से आग निकाल लो, तुम्हारा दिल बहुत ठंडा है




(पर) लोक-कथा

एक समय की बात है। एक बीज था। उसके पास एक धरती थी। दोनों प्रेम करते थे। बीज, धरती की गोद में लोटपोट होता, हमेशा वहीं बने रहना चाहता। धरती उसे बांहों में बांधकर रखती थी और बार-बार उससे उग जाने को कहती। बीज अनमना था। धरती आवेग में थी। एक दिन बरसात हो गई और बीज अपने उगने को स्थगित नहीं कर पाया। अनमना उगा और एक दिन उगने में रम गया। अन्यमनस्कता भी रमणीय होती है। ख़ूब उगा और बहुत ऊंचा पहुंच गया। धरती उगती नहीं, फैलती है। पेड़ कितना भी फैल जाए, उसकी उगन उसकी पहचान होती है।

दोनों बहुत दूर हो गए। कहने को तो जड़ें धरती में रहीं, लेकिन जड़ को किसने पेड़ माना है आज तक? पेड़ तो वह है जो धरती से दूर हुआ। उससे चिपका रहता, तो घास होता।

पेड़ वापस एक बीज बनना चाहता है। धरती अपना आशीष वापस लेना चाहती है। पेड़ को दुख है कि अब वह वापस कभी वही एक बीज नहीं बन पाएगा। हां, हज़ारों बीजों में बदल जाएगा। धरती ठीक उसी बीज का स्पर्श कभी नहीं पा सकेगी। पेड़ उसके लिए महज़ एक परछाईं होगा।

जीवन में हर चीज़ का विलोम नहीं होता। रात एक अंधेरा दिन नहीं होतीऔर दिन एक उजली रात नहीं होता। चांद एक ठंडा सूरज नहीं, और सूरज एक गरम चांद नहीं है। धरती और आसमान कहीं नहीं मिलते, कहीं भी नहीं।

मैं पेड़ के बहुत क़रीब जाता हूं और उससे कहता हूं, सुनो, तुम अब भी एक बीज हो। वही वाला बीज। क़द के मद में मत आना। तुम अभी भी उगे नहीं हो। तुम सिर्फ़ धरती की कल्पना हो।

सारे पेड़ कल्पना में उगते हैं। स्मृति में वे हमेशा बीज होते हैं।

* * * *


(तस्‍वीरें युवा जर्मन फ़ोटोग्राफ़र नताली बोटर के कैमरे से. कवि की तस्‍वीर- भावना पंत.)

Thursday, January 12, 2012

लेखक काम पर : हेनरी मिलर





लेखन को तवज्जो दो,
............... ...........................................................पेंटिंग, संगीत, मित्र-मिलन, सिनेमा इसके बाद हैं

एक वक़्त में किसी एक ही मजमून पर काम करो.

काम के बीच कोई नई किताब का मंसूबा मत बांधो.

लिखते हुए घबराओ नहीं. जो काम हाथ में उठा रखा है, उस पर शांत और खुश मन से जुटो. इसकी बहुत परवाह न करो कि वह कैसा बनेगा.

तय वक़्त तक लिखो, उसके बाद नहीं. लेकिन इन वक्तों में अपनी योजना को अपने मिज़ाज के असर में आने से बचाओ.

ध्यान रहे, जिन वक्तों में तुम कुछ रच नहीं सकते, उन वक्तों में भी तुम काम तो कर ही सकते हो.

हर रोज़ लिखे हुए को और पुख्ता करो लेकिन इसके लिए ज़रूरी नहीं कि उसमें नई चीजें ही जोड़ी जाएँ.

लोगों से छिटको नहीं, उनके पास जाओ. जगहों में रमो. पीने की इच्छा हो तो पियो.

खूब खटने वाला घोड़ा न बनो, लेखन का लुत्फ़ लो.

एक दिए गए दिन में तुम्हें अपनी योजना में रद्दोबदल करना ठीक लगे, तो करो. लेकिन अगली सुबह उन बदलावों से गुजरो. उन्हें ध्यान से नबेरो. अलगाओ.

भूल जाओ कि तुम कौन-कौन सी किताबें लिखना चाहते हो. सिर्फ़ उस अकेले मजमून के बारे में सोचो जिस पर तुम इस वक़्त काम कर रहे हो.

सबसे पहले लिखो. लेखन को तवज्जो दो, पेंटिंग, संगीत, मित्र-मिलन, सिनेमा इसके बाद हैं.

सुबह में :

अगर मन अलसाए तो पढ़े हुए से टीपें लो, उन्हें सहेजो. ये उकसावे के लिए काफी हैं.

अगर साँसें सम पर हों तो तुरंत लिखने में जुट जाओ.

दोपहर में :

जो सामने है, उस काम को बढ़ाओ. इन वक्तों में बाद के काम पर शक या ऐतबार, कोई दख़ल, कोई भटकाव : कुछ नहीं होना चाहिए. एक वक़्त में, एक हिस्से को उसके उरुज तक लिखो, अच्छा और अंतिम लिखा हुआ मानकर.

शाम में :

दोस्तों से मिलो. चायखाने में बैठ पढ़ो.

अनजानी राहों पर निकलो. बारिश में पैदल, नहीं तो किसी सायकल पर.

अगर मन करे तो लिखो. छिटपुट चीज़ें इन्हीं वक्तों में निपटाओ.

अगर थकान या खाली-खाली-सा महसूस करो तो पेंट करो.
****

अनुवाद : अनुराग वत्स.

[ हेनरी मिलर ने लिखने की यह रूटीन १९३२-३३ के दरम्यान बनाया था। मिलर की तस्वीरें गूगल से।]