महेश वर्मा की नई कविताएं
5:05 pm
पुराना दिन
तुम वहाँ कैसे हो गुज़रे हुए दिन और साल?
यह पूछते हुए पुरानी एलबम के भुरभुरे पन्ने नहीं पलट रहा हूँ
तुम्हारी आवाज़ आज के नए घर में गूंजती है
और हमारी आज की भाषा को बदल देती है
एक समकालीन वाक्य उतना भी तो समकालीन नहीं है
वह पुरानी लय का विस्तार है
और इतिहास की शिराओं का हमारी ओर खुलता घाव
वह तुम्हारे विचारों का निष्कर्ष है हमारी आज की मौलिकता
पुराने आंसुओं का नमक आज की हंसी का सौंदर्य
मरा नहीं है वह कोई भी पुराना दिन
राख, धूल और कुहासे के नीचे वह प्रतीक्षा की धडकन है
गवाही के दिन वह उठ खड़ा होगा
और खिलाफ गवाही के दस्तावेज के नीचे दस्तखत करेगा.
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...फिर क्या होता है कि तुम प्रतीक्षा के भ्रामक विचार से धीरे धीरे दूर होते जाते हो . यह दूर जाना इतने धीमे तुम्हारे अवचेतन में घटित होता है कि दांतों के क्षरण और त्वचा के ह्रास की तरह इसका पता ही नहीं चलता. किसी एक रोज थोड़ा दूर हटकर तुम संदेह करते हो कि वाकई तुम्हें प्रतीक्षा थी भी या नहीं . फिर होता यह है कि तुम प्रेम की घटना और अंततः प्रेम के विचार से ही एक उपहासात्मक दूरी बनाना चाहते हो अपने वीतराग में इस तरह कि कोई प्रेम नहीं था, प्रतीक्षा भी नहीं .
यहाँ ज़रा रूककर इस सुन्दर संतुलन को देखें कि ये तुम्हारे विचार नहीं थे , एक पुकार थी तुम्हारी ओर से अपने आप को यातना देती हुई कि प्रेम तुम्हें पुकारता हूँ इस तरह कि आज कह रहा हूँ कि तुम नहीं थे. धूल भरे मैदानों की दूरियों में अस्त होती तुम्हारी इस पुकार की कोई उदास प्रतिध्वनि गूंजती भी हो तो तुम्हारी आत्मा के एकांत में ही सुनाई देगी वह प्रतिध्वनि.
तुम्हारी इच्छा से बाहर थी तुम्हारी प्रतीक्षा .
तुम्हारी प्रतीक्षा से बाहर तुम्हारा प्रेम.
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इतिवृत्त
घोड़े की पीठ पर सो लेते थे बाबा
एक बार ऐसे ही पार कर गए थे
पारिवारिक किम्वदंती की नदी
घोड़े की पीठ पर सोते-सोते
पुजारी पिता भोर में नहीं उठ पाते थे जिस रोज
देवी के स्वप्न से उठते थे हडबडाए
देवी ने लात मारकर जगाया कहते फिर
उस पदाघात को प्रणाम करते अमूर्त दिशा में
चाचा को बस में बैठते ही नींद आ जाती थी
चौंक-चौंक उठते थे सपने की दुर्घटना में
थोड़ी देर में पहचानते थे अपना आसपास
माँ गुडीमुडी होकर सो रही है रसोई के ही फर्श पर
कभी सोती है पूजाघर में
भाई सपने में अक्सर डांटता है किसी को
पहले कहाँ सोता था मेरे पेट पर घुटना दिए बगैर
कहानी या अपने रुदन के विस्तार में ही सोता है मेरा बेटा
अधूरे कामों के टुकड़ा वाक्यों में डूब रही है पत्नी
अपनी थकन में सोने से पहले
ऐसे में क्या कहा जा सकता है अपने सोने जागने के बारे में
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चेहरा
पता नहीं तुम कितने अंतिम संस्कारों में शामिल हुए
कितनी लाशें देखीं लेकिन फिर जोर देता हूँ इसपर
कि मृत्यु इंसान का चेहरा अप्रतिम रूप से बदल देती है
यह मुखमुद्रा तुमने इसके जीते जी कभी नहीं देखी थी
यह अपने मन का रहस्य लेकर जा रहा है और निश्चय ही नहीं लौटेगा
पता नहीं क्या करता इसका अगर कुछ और दिन रुकता कि
कौन-सा स्पर्श उसकी त्वचा में सिहरन भर देता था और उसकी सांसों में आग
कौन सी याद उसकी आत्मा को भर देती थी खालीपन से
किन कंदराओं से आता था उसका वीतराग मौन और उसकी धूल भरी आवाज़
यह उसका विनोद है, उसका असमंजस
उसकी पीड़ा है और उसका पापबोध
जो उस रहस्य से जुडा है निश्चय ही –जिसे लेकर जा रहा है
या उसका क्षमाभाव है
और बदला न ले पाने को ऐंठती उसकी आत्मा की प्रतिछवि है उसके चेहरे पर
जो उसे बनाती है अभेद्य और अनिर्वचनीय
एक प्रेमनिवेदन जो किया नहीं गया
एक हत्यारी इच्छा , हिंसात्मक वासना
मौक़ा, चूकी दयालुताएं और प्रतिउत्तर के वाक्य
ये उसकी आत्मा की बेचैन तहों में सोते थे फिलवक्त
अब इन्हें एक अँधेरे बक्से में रख दिया जाएगा
प्रार्थना का कोई भी सफ़ेद फूल,
करुणा का कोई भी वाक्य इन तक नहीं पहुँच पायेगा
और तुम्हें यह तो मानना ही होगा कि
तुम्हारी काव्यात्मक उदासी से बड़ी चीज़ थी
उसके मन का रहस्य
बाकी संसार आज उससे छोटा ही रहेगा.
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कविताओं के साथ दी गई तस्वीर गूगल से। ]
सबद विशेष : १२ : उम्बेर्तो ईको
7:31 am
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अनुवादक गीत चतुर्वेदी हिंदी के महत्वपूर्ण कवि-लेखक हैं. उन्होंने सबद के लिए इससे पूर्व भी कई लेखकों को अनूदित किया है. उनका श्रम, समर्पण और सहयोग सबद की निधि है. ]
बही-खाता : १४ : निर्मल वर्मा
4:17 pmअसली क्या है, यह भी तो एक खोज हो सकती है, जो है, उसके भीतर से 'जो नहीं है', ( पर जो हर बन्द खिड़की से बाहर झाँकता है ) उसकी खोज ? कथ्य के कितने आवरण हैं, कितने परदे, कितनी खिड़कियाँ. लिखते हुए हम एक-एक के पास से गुजरते हुए छिपे को थोड़ा उघाड़ पाते हैं...पढ़ते हैं तो हँसी सुनाई देती है ; कहाँ, किस जगह, किसके साथ पहली बार सुनी थी ?
वह बार-बार समुद्र की लहरों की तरह हमसे टकराती है, मुड़ जाती है, फिर आती है, खाली, तट पर अपनी फेनिल झाग छोड़ जाती है, कुछ अपने साथ बहा ले जाती है, कुछ छोड़ पाती है.
बचे हुए अवशेष, जो हैं, उस पर जो बीत गया, उसके खुदे हुए 'हियरोक्लिफ'.. क्या हम उन्हें पढ़ सकते हैं ? कथ्य अनुवाद है, जो अबूझा है, उसे बूझे हुए में अनूदित करता हुआ. वह लिखे हुए को पढ़कर पढ़े हुए को लिखने का खेल है.
२
सृष्टि के बीहड़ में शिकारी कुत्ते इसी तरह इशारा पाकर भागते होंगे, सूंघते होंगे, इकठ्ठा कर रख पाते होंगे, खोई हुई गंध को भूले हुए रास्तों पर पाते होंगे, खून में लथपथ शिकार को लाते होंगे.
आखिर तक पता नहीं चलता, दांतों और नाखूनों से छलनी देह का कथ्य कहां से आता है ?
या शायद चोट कहीं बहुत गहरी थी और दर्द का कहीं पता नहीं था...वह सामने की बर्थ पर बैठी थी और उसका चेहरा मैं सीधा न देखकर रेल की खिड़की के शीशे में देख रहा था, जहां वह रोशनी की छाया में टिमटिमा रहा था और तब मुझे पता चला, यह वहां है, दर्द, अँधेरे में भागती हुई ट्रेन की खिड़की पर टिमटिमाता हुआ --जो अपने में कभी कथ्य नहीं बनता, पर कथ्य के साथ संगत देता है, तब सबसे ऊंचा, जब कहानी सबसे चुप, कराहता हुआ...जिसे कथ्य स्वयं कान पर हाथ रखकर हैरत में सुनने लगता है, जैसे उसे पता ही नहीं था, मेरे भीतर जो भरा था, उसे वह इस तरह उघाड़ सकता है.
समुद्र का ज्वार उठता है और लहरें पछाड़ खाकर गिरती हैं...गिरती हैं, उठती हैं, वापस लौट आती हैं. समुद्र वहीं रहता है, किंतु हर लहर पर उन्मत्त ऊँचाई को छूकर नीचे गिरता है, निन्यानबे डिग्री से ऊपर. वह होरी के शव पर धनिया की पछाड़ है. सारे उपन्यास के कथ्यस्थल को भूचाल की तरह हिलाती हुई. मरते सब हैं, विधवाएं विलाप करती हैं, जो बच जाते हैं, उनकी अपनी बेचारगी है, पर धनिया की पछाड़, उसका कोई जोड़ है ? हमें आश्चर्य होता है, हम 'बचे' रह गए हैं. कला का 'कथ्य' हमारे बचे रहने का --सर्वाइवल का--साक्ष्य है, संदिग्ध साक्ष्य, क्योंकि हम सचमुच बच गए हैं, क्या इसका प्रमाणित सबूत कभी मिल सकता है ?
वह अपरिमेय है, अपरिमेय में अपने को रूपायित करता हुआ कथ्य, पास बुलाता हुआ नहीं, दूरी को पाटता हुआ भी. बल्कि उसी के परिदृश्य में अपने को रचाता हुआ...हम बीच के गड्ढों को पार करते हुए, गिरते-पड़ते उस 'सच' के पास पहुँचते हैं. तभी दिल के भीतर सिरसिराता साँप छाती पर लोटता दिखाई देता है, हाथ से छूते हैं, तो आश्वस्त होते हैं, यह साँप नहीं, पीड़ा है, जिसे हर दूरी अपने कथ्य के भीतर केंचुल की तरह छोड़ जाती है. यह धुकधुकी है, सफ़ेद पन्ने पर घड़ी की टिक-टिक करती हुई. कहानी समाप्त होने पर भी 'कथ्य' की साँस बराबर चलती रहती है.
कथा : ८ : सिद्धान्त मोहन तिवारी की कहानियाँ
3:18 pm
हम एक देश के बारे में बात करेंगे. एक लड़का था, नाम नहीं था या मालूम नहीं. ये जानना कितना विराट अनुभव है कि हर देश एक आदत है, और हर आदत पैसा है और पैसा समय नहीं है....लड़का एक लड़की का पर्याय भी है – लड़की धर्म भी है.
लड़का जब पैदा हुआ, तो उसके पैदा होने के एक घंटे बाद ही उसके घरवालों नें उसकी दोनों आँखों की पुतलियों के निचले आधे हिस्से में अर्ध-चंद्राकार काली अपारदर्शी चकती लगा दी. चकती किसी फाइबरनुमा चीज़ से बनी हुई थी, तो वह अपनी संरचना में काफ़ी कठोर थी.
चकती लगाते समय लड़का एकदम नहीं रोया, उसे पेट में ही इस बात का अंदाज़ लग गया था कि या तो चकती लगेगी, और अगर सफलता नहीं मिली, तब आँखों में गरम तेल उड़ेला जाएगा.
गर्भ में उसका शारीरिक विकास इस तरीके से हुआ कि चकती को वह अच्छे से जज़्ब कर सके. आँखों की पुतलियाँ और फैलीं, अपनी क्षमता से चार गुना ज़्यादा, आँखों के चमड़ीदार कोने अपनी हद से कुछ ज़्यादा फटे, कि फ़ैली हुई पुतली को कोई दिक्कत न हो और वे उसका पर्याय बन सकें.
कहते हैं कि लड़का हिंदू नहीं था, अब किसी के ‘हिंदू न होने’ का मानी मुसलमान ही हो सकता है. शायद यही दो कौमें ऐसी हैं, जो एक-दूसरे से ही डरती हैं और लड़ती हैं, और फिर डरती हैं. चकती इसलिए लगाई गई ताकि वह लड़का ‘किसी’ को उसके कन्धों से नीचे न देख सके. उसका चेहरा ही देख पाए, थोड़ा गला, और गले के आधे का आधा सीना. तमाम शारीरिक विकास इसलिए हुए थे क्योंकि उस लड़के को उस चकती को नकार देना था, उसके उपस्थित रहते हुए भी अपने सभी काम करने थे....जैसे कालीन बुनना, अच्छी शेरवानियों की सिलाई करना, अच्छी बिरयानी बनाना, अच्छी शहनाई बनाना और अच्छी शहनाई बजाना.... बहुत से काम थे उसके जिम्मे.
जिन परिजनों नें चकती लगाई थी, कहा जाता है कि वे मुसलमान नहीं थे. अब किसी के ‘मुसलमान न होने’ का मानी हिन्दू ही हो सकता है. तो, वे यानी जिन्होनें चकती लगाई थी...उसके ‘पुकारे गए’ परिजन...उन्होंने सारी संभावनाओं को खत्म करते हुए उसकी आँख के निचले आधे हिस्से में चकती सिल दी थी.
वह अब नीचे नहीं देख सकता है, सारी स्त्रियाँ उससे बची हुई हैं – जैसा कि लोग कभी नहीं कहते हैं, फिर भी जताते हैं – वह शहनाई भी नहीं बजा रहा है कि शहनाई सो चुकी है, कालीन नहीं बना रहा है, शेरवानी भी बेताला हो जाती है, बिरयानी में भी मसाला कम है, नमक तो और भी कम है – लेकिन, नमक तो गुजरात से आता है न – बिरयानी में हमेशा मिलने वाला गोश्त भी नहीं है, कुछ छोटे हिसाब नहीं हो पातें हैं, बड़े तो एकदम नहीं.
सुना है, जिन लोगों नें चकती लगाई थी, वे उसके घरवाले नहीं थे. लेकिन ये भी सुना है कि वे ही उसके घरवाले होने के हक़दार भी थे, क्योंकि शायद उसके पूर्वजों की घरवालियाँ उनकी शायद कुछ लगती हों?
सुना है, जिन लोगों नें चकती लगाई थी, उन्हें भी चकती लगी हुई है – उनकी आँख के ऊपरी आधे हिस्से में – फिर भी वह सिली हुई नहीं होती है, वे उसे एडजस्टेबल चकती कहते हैं.
सुना है, बिरयानी के गोश्त में कुछ सिली हुई आधी चकतियाँ मिल जाती हैं.
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तमीज
यह एक तमीज़ के बारे में है, व्यवहार के बारे में और साथ में उस समय के बारे में, जिसमें हम जीते हुए भी अतीत को भविष्य में ढ़ालने की इच्छा रखते हैं. सब कुछ हमेशा चूल्हे-भाड़ में जाता रहा है, सृष्टि की सारी चीज़ें स्थानीयता के अर्थों में 'तेल लेने' चली गईं. अतीत का वर्तमान भी 'तेल लेने' क्यों नहीं चला गया? उसकी उपस्थिति हमेशा मानकों की रचना करती रहती है.
दो बच्चे सड़क पर थे, कन्धों पर बस्ते और गले में थर्मस लटकाए, वे अपने स्कूल की तरफ बढ़ रहे थे, जहां पानी की बोतल लाना मना था, क्योंकि बोतल लाना समय के साथ एक समझौता है, तो स्कूल के लोगों को बोतल-वोतल से कोई खास परेशानी नहीं होती थी.
जैसे दुनिया की हर सड़क अपने हर मोड़ पर असफल हो जाती रही है क्योंकि मोड़ के पहले वाली सड़क हमेशा मोड़ के बाद वाली सड़क से एकदम अलग होती है...दोनों बच्चे ऐसे ही दुनिया के किसी मोड़ के मध्यांतर पर पहुँच रहे थे. एक लड़का था और उसके साथ उसकी छोटी बहन लड़की थी. वे चल नहीं रहे थे, वे दौड़ भी नहीं रहे थे, उनकी गति चलने और दौड़ने की गति के बीच की गति थी. आठ बजे के स्कूल में वे सवा आठ बजे सही-सही पहुंचना चाह रहे थे.
मोड़ के कुछ पहले से एक कार आ रही थी, तेज़ – इतनी तेज़ कि बच्चों को आगाह हो जाना चाहिए. कार वाले ने अपनी का हॉर्न जोर से भनभनाया. किसी भी गाड़ी का हॉर्न, सृष्टि में बेसुरी न रहते हुए भी अप्रिय चीज़ होने का सबसे सफल उदाहरण है. बच्चों नें नहीं सुना. कार रुकी और कार चला रहे आदमी नें खिड़की से निकलकर चिल्लाकर कहा – अबे! किनारे हट जा.
छोटा लड़का घूमा और पूछा : कहाँ जाऊं हटके?
लड़की घूमी : अपने आप से किनारे कैसे हटें?
कारवाला कुछ देर तक सोच में पड़ा रहा और फिर उसने झुंझलाकर पूछा : किनारा नहीं पता तुम्हें?
लड़की बोली : किनारा कैसा होता है?
फिर लड़का बोला : किनारे से जो चीज़ लगी होती है, वह भी तो अपने मूल का किनारा होती है... अब हम किनारे जैसी किसी जगह पर जायेंगे तो दूसरे किनारे के मूल में रहने वाले लोग हमें इस किनारे आने को कहेंगे, आप तो जानते ही हैं कि इस तरफ़ का किनारा मानी इस तरफ़ के मूल का बीच होता है, मतलब, आपके ठीक सामने.
कारवाला कमीनी हंसी के साथ बोला : मैं कहाँ हूँ? इस किनारे पर...
लड़की : आप तो अभी अंतरिक्ष में हैं, एक मोड़ एक अंतरिक्ष होता है...क्योंकि सड़क ही भारयुक्त है, मोड़ भारहीन है.
अब तक कारवाला कार की बोनट पर आ चुका था.
लड़का : क्यों क्या हुआ..
अब कारवाले ने कहा : तुम लोगों का नाम क्या है?
दोनों कुछ मेल के-से स्वर में बोले : हम आत्मा जैसी कोई चीज़ हैं, हमारा नाम ‘ये’ और ‘वे’ है...हम अपनी आत्मा को अपनें मुंह के अंदर रखते हैं. हमारी आत्मा के पास पूंछ है, वह पेट तक लटकी रहती है.
लड़के ने हवा में हाथ लहराते हुए पूछा : आपके पास कैसी आत्मा है...उसका शरीर कैसा है?
कारवाले ने हँसते हुए कहा : आज मैं घर से आत्मा लेकर निकला था, मेरी जेब में पर्स के अंदर रखकर...अभी कहीं मिल नहीं रही है, कुछ देर पहले उसनें मेरी जेब कटने से बचाया था...पता नहीं कहाँ खो गयी...पैसा, कागज़ और पर्स सभी मौजूद हैं, लेकिन आत्मा का हिसाब गड़बड़ाया हुआ लग रहा है.
दोनों बच्चों नें एक दूसरे की तरफ़ देखकर बहुत हल्की-सी मुस्कान दी.
कारवाले ने पूछा : तुम्हें पता है कि आत्मा अगर पर्स में न हो तो कहाँ हो सकती है?
बच्चों नें कहा : शायद वह आपको छोड़कर चली गई है...आप अपने शरीर के साथ लड़ रहे हैं, इसलिए इतने अनमने ढंग से बात कर रहे हैं.
अब कारवाले ने पूछा : खून कैसा होता है?
बच्चों नें कहा : अगर आत्मा का साथ हो तो खून लाल होता है.
कारवाले ने कहा : मेरा खून तब पीला होना चाहिए!!
लड़के ने उत्तर दिया : आपका खून किसी रंग का नहीं है, पारदर्शी या सफ़ेद भी नहीं..वह तरल भी नहीं है. आपके बताए के अनुसार आपका खून रेत और लेई जैसी किसी चीज़ के बीच का है. वह जमता भी नहीं है, और बहता भी नहीं है. इस तरह आपके अंदर बहुत सारा अखून-खून है.
कारवाले ने कार की स्टेयरिंग पर बैठ कर पूछा : तुम लोगों के अंदर कितना खून है? वह तो लाल होगा न!
बच्चों नें कहा : हाँ, वह लाल ही है, लेकिन बहुत थोड़ा-सा है.
कारवाले ने कहा : तो ठीक है.
कारवाला अब उन बच्चों के ऊपर से गुज़रकर जा चुका था, पीछे दुनिया के उस अन्तरिक्षीय मोड़ पर दो गिलास खून दो स्कूली कपड़ों से निकल रहा था, वहाँ किसी शरीर की कोई उपस्थिति नहीं थी.
आगे किसी ठेले पर रूककर कारवाले ने कुछ खाया. पैसे देने के लिए उसने पर्स निकाला. उसके पर्स में पैसे और कागज़ सब थे, लेकिन कोई चीज़ गायब थी...वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या गायब है, पर्स में सृष्टि की सबसे बड़ी जगह खाली थी.
अगले चौराहे पर उस कारवाले को कुछ रंगदारों नें गोली मार दी. चश्मदीदों नें बताया कि उसके शरीर से जो निकल रहा था, वह खून जैसा न महक रहा था न ही दिख रहा था और न ही उसका स्वाद खून जैसा था(उसका खून चखा गया था?)...वह न बह रहा था, न जम रहा था. सुना है, कारवाला मुस्कुराते हुए भी नहीं मर रहा था.
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