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गीत चतुर्वेदी की तीन नई कविताएं

5:12 pm




पथरीला पारितोषिक

इस दुनिया में जितनी भी पत्थरदिल औरतें हैं उनसे प्रेम करो
और उन्हें पवित्र मूर्तियों में तब्दील कर दो
जान लो वे निर्जन में छूट गई हैं अपनी कठोरता में उन्मत्त
जिनके आगे कोई दिया नहीं जलता
पथरीला पारितोषिक है यह प्रेम का कि
उनके स्वप्नों में हमेशा रुदन में लहराती अखंड ज्योति आती
आता जीवन में जो भी उनके आकार पर बेहद मस्ताता
वे अपने मुलायम रेशों को कुबेरकोष की तरह छिपातीं
कुछ सदियां ही एक पत्थर को मैं रुई कहता आया
एक सुबह उठा उसे रुई में बदला हुआ पाया
****

टूटकर भी तनी हुई

जीवन जैसा भी था वर्तुल था
सीधी रेखा बीच से टूटा हुआ वर्तुल थी
टूटकर भी तनी हुई
टूटने से भी तन सकता है कोई का आकार में अनुवाद वह
जो चौरस था वह भी वर्तुल
उसके चार केंद्र थे जो अपनी जगह से इतने अनमने
कि ग्रामदेवताओं की तरह केंद्रीयता का बहिष्कार कर सीमाओं पर जा बसे
हर आकार में वर्तुल होने का आभास था
और यह भी कि जीवन का अर्थ आकार में नहीं, आभास में बसा होता है
एक पत्थर थी भाषा के भीतर स्त्रीलिंगी होने की हैरत से भरी
उसका स्त्रीत्व पहुंचा मुझ तक पहले फिर उसका पत्थर होना
स्त्रीलिंगी पत्थरों का उद्धार पवित्र हृदयों से नहीं पवित्र पैरों से होता है
इस हैरत से भरा मैं इस सोग में ख़ाली हुआ
कि मेरे पैरों में हमेशा मैल रही
इतना प्रेमा मैं तुमसे कि तुम्हें उद्धार की ठोकर भी न मार पाया
कि पवित्र हृदयों की अहमियत पवित्र पैरों के मुक़ाबले कम ही रही हमेशा
हर पत्थर की कामना यह कि पानी से हवा से किनारों की रेत से घिसे उनका अनाकार
हर आभास में पाए वह वर्तुल होने का आकार
जैसे बांस-वृक्ष की संधियां वर्तुल अंगूठियों से जड़ी हुई
बीसियों केंद्रों के अनमनेपन का अचंभा जो वर्तुल, तुम वह जीवन थीं
जोबन जिस जीवन का जोगनें ले गईं
ज्यों यह जीवन-संध्या नहीं
पूरा जीवन ही संध्या है
****

मनमाना

मैं रात की बग़ल में लेटा हूं
मेरी पीठ पर तुम्हारी चूड़ी का सिकुड़ा हुआ निशान है
एक करवट लेता हूं तो दब-दब जाती है सदियों पुरानी कोई नींद
मेरी उबासी स्मृति है तुम्हारे सहस्त्राब्दियों ताज़े यौवन की
मैं क्लांत मनाधीश नींद को अपना मानने की भूल करता
तुम्हारी समस्त भावनाओं का सलाद है यह क्लांति
तुम्हारा ही चमत्कार है ओ प्रेम मेरे जीवन के और जीवन के पार के भी, ओ प्रेम
कि हर्ष के बीज से अवसाद का फल उगाते हो
हृदय के रक्त में थलगंगा की क़लम लगाते हो
स्वप्नों का कौमार्य अक्षुण्ण भला क्यों होता है?
नींद का सौंदर्यशास्त्र हैं स्वप्न
नींद आती उसी तरह जैसे मनमाना करने में प्रेम जितना आनंद पाने वाली प्रेमिका
मनमाना करके प्रेम जितनी ही पीड़ा देने वाला प्रेमिका
जिसे मन से माना
उससे असंभव प्रेम की उम्मीद करता
रात की बग़ल में लेट नींद को अपनी देह पर उसके होंठों की छुअन की तरह उतरता पाने की उम्मीद में
मन को मारता उसी के इंतज़ार में डूबता अपनी थिरता में तिरता
मनमाना करने वाली आती जब तब तक प्रेम की इच्छा बारिश के बाद सूख चुकी सड़क जैसी चितकोबरी हो जाती
अपनी-सी लगने वाली नींद उगती मन और देह के क्षितिज पर
उगती रात के ख़त्म हो जाने के नारंगी घोषणापत्र की तरह
तब तक करवटों की सिलवटों से उठकर काम पर जाने की हड़बड़ी मुझे अंकवारी भर चुकी होती
****

( चित्र - फ्रांस के मशहूर फोटोग्राफ़र ब्रास्‍साई की कृति- ग्रैफि़टी. 1933)

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कथा : ७ : चन्दन पाण्डेय

5:00 pm



ज़मीन अपनी तो थी

जून की कोई शाम थी जो चौतरफा घिर चुकी थी पर अगली सुबह अनिकेत को दिल्ली होना था. बठिंडा के होटल से निकलते हुए उसे बीते दिन की तपिश का एहसास हुआ. होटल का मीटिंग हॉल पाबन्द था इस वजह से वहाँ लू और समाचार पूरे दिन नहीं पहुंच सके थे. अब सूर्य इस तरह डूब रहे थे कि अनिकेत की परछाईं बहुत लम्बी होकर होटल की दीवाल के सहारे टँगी हुई थी. दंगे के सबब मर्द मानुष कहीं नहीं थे वरना शाम के इस वक़्त परछाईयाँ भरपूर कुचली जातीं हैं. ऑफिस से खुश खुश निकले तो अनिकेत यह खेल अक्सर खेलता है. किसी की परछाईं पर खड़ा हो जाता है. ख़ासपसन्द, शाम पर पड़ती रितु की परछाईयाँ.

पंजाब हरियाणा की सेल्स रिव्यू मीटिंग खत्म हुई ही हुई थी. हिन्दू होने की बिना पर होटल बिल जमा करते हुए भी वो दंगे की नहीं, दिन की गर्मी के बारे में सोचता रहा. दिखने सुनने में वह, सबकी तरह, दंगे के खिलाफ नजर आता था. जो सड़को पर घट रहा था उसका उसे रंज था पर दंगाई गतिविधियों से ज्यादा हैरान गर्मी कर रही थी. ऐसे मौसमों का आविष्कार अभी बाकी था जो आबादी देख और नारे सुन कर आया करें.

शाम का रंग कुछ ऐसा था कि रिक्शे कहीं नहीं थे. सड़क के मुहाने पर काँच के टुकड़े बिखरे हुए थे. सूरज जबकि छिप चुका था फिर भी हवा में बची हुई रौशनी और धरती से परावर्तित किरणें काँच के इन टुकड़ों से कई सारी रंगीनियाँ बिखेर रही थीं. रौशनी की तेज चौँध से आँखे चुराते हुए अनिकेत ने पश्चिम की ओर देखा; जली हुई बस खड़ी थी. बस देखने के बाद उसे चिरायँध महसूस हुई. जली हुई बस उसके लिए पुरानी पहेली सुलझा रही थी. हरदम से वह यह जानना चाहता था कि बसों का ढाँचा कैसे आखिर तैयार होता होगा? दो कुत्ते जली हुई बस के साए में आरामफरमा थे.

अनिकेत को सड़क तक छोड़ने सुखपाल आया था जिसकी औपचारिकताएँ भी सहज लगती थी. उसने आज रात रूकने की बात सुझाई. कहा: आगरा और जयपुर टीम की मीटिंग बाद में भी हो लेगी. अनिकेत को ‘सेल्स मीट’ के बहाने रितु से मिलने के लिए जाना ही जाना था, इसलिए तय यह हुआ : यहाँ से किसी निजी वाहन पर टँग कर पटियाला जाना होगा, वहाँ से रात के दस बजे हरियाणा रोडवेज की एक बस पेहवा, इस्माईलाबाद होते हुए दिल्ली जाती है.

यह जगह शहर के बाहर थी. कैंचिया मोड़ पर पुलिस वाले जरूर थे पर शाम के नाते जरा सी आवाजाही बढ़ गई थी. दूध का एक टैन्कर और खुली हुई एक जीप आई जिसमें कुछ औरते और बहुत सारी बकरियाँ थी. अनिकेत को ऐसी सवारियाँ साधने से परहेज न था पर दोनों संगरूर तक ही जा रही थी.

शाम चढ़ रही थी और इनका इंतजार बढ़ता जा रहा था. सुखपाल ने दिल्लगी की: सर क्यों मुश्किल में पड़ते हो? कुछ उल्टा सीधा हो गया तो? होने वाली भाभी को हम क्या मुह दिखायेंगे? जैसा कि होता है, सेल्स टीम जल्द ही द्विअर्थी बातों पर उतर आती है, यहाँ भी अट्ठाईस वर्षीय अनिकेत को लेकर ‘डबल’ चलने लगा. तब तक एक कार आती हुई दिखी. हाथ दिया. कारचालक ने ऐसी तेज ब्रेक लगाई कि सड़क की चीख निकल गई. यह बूझते ही कि कार उनके ही हाथ देने से रूकी, दोनों दौड़ पड़े.

कार में दो जने थे. एक ड्राईवर साईड और दूसरा कंडक्टर साईड. सुखपाल ने उनसे बात की. उन्होने सुखपाल से पूछा; जाना कहाँ है? और क्या दोनों जा रहे हैं? जबाव में पटियाला सुनकर उन दोनों ने एक दूसरे को देखा और बताया कि वो भी पटियाले ही जा रहे हैं.

कार के भीतर आते ही अनिकेत ने अपनी आंखे बन्द कर राहत की दो छोटी छोटी साँस ली. खुशी से उसकी मुट्ठी भिंच गई थी. आँखे खोल सामने देखा तो पाया - सामने जो आईना (रियर व्यू मिरर) था उसमें से दो जोड़ी आँखे उसे देखे जा रह थीं. अपलक. जब अनिकेत की निगाह आईने की उन नजरों से मिली तब तक कार चल पड़ी थी. बठिंडा छूट रहा था और अगली सुबह उसे दिल्ली होना था.

अनिकेत की नजर फिर फिर सामने उठी तो पाया कि आईने से वो दो जोड़ी आँखे अब भी उसे देखे जा रही हैं. उनकी आँखों में गम्भीरता और अपरिचय का गहरा भाव दिख रहा था. निगूढ़. अनिकेत को भारी बेचैनी होने लगी पर उसने आँखों ही से मुस्कुराकर टाल दिया और खिड़की से बाहर देखने लगा. बाहर जो लाईलाज अन्धेरा था वो सुबह की रौशनी के इंतजार में पसरा हुआ था.

सामने बैठे लोगों ने अपना परिचय दिया. मुझे लकी कह सकते हैं और इसे (कार चला रहे शख्स की ओर इशारा कर) मेजर कहा जाता है. और सर, आपका परिचय? अनिकेत: अनिकेत दीक्षित, रहने वाला गाँव बौली, जिला देवरिया का हूँ, रहता चंडीगढ़ हूँ. लकी: काम क्या करते हैं? यह लैपटॉप है? अनिकेत: जी हाँ. साथ में इंटरनेट भी. लकी: फोन भी होगा? अनिकेत: वह भी है. लकी: काम नहीं बताया? यह सवाल अनिकेत को खटका पर उसने जबाव में अपनी कम्पनी का नाम बताया और अपना पद भी, जो हर छ: सात महीने में तबादलों के साथ बदलता रहता था.

मेजर: सर, आपका पहचान पत्र भी होगा? अनिकेत : हाँ. कई सारे हैं. मेजर : सर, बुरा ना माने तो आपका पहचान पत्र देख सकता हूँ? अनिकेत भला क्यों बुरा मानता. कार चल रही थी. सड़क पर शाम की गर्म हवा के बाद अब वातानुकूल से अनिकेत सुस्त हो रहा था. कार्ड निकाल ही रहा था कि उसका फोन बजा - सुखपाल था. कह रहा था, दिल्ली पहुंच कर खबर कर देना, बॉस. अनिकेत ने हँसी में लपेटकर कहा, पहले दिल्ली पहुंचने तो दो.

फोन से ध्यान हटा तो पाया कि लकी उसकी ओर देख रहा है. अनिकेत ने विजिटिंग कार्ड थमा दिया. कार्ड निरेखते हुए लकी ने पूछा: सर, आप दिल्ली जा रहे हैं? अनिकेत: जी. लकी (अनिकेत को प्रश्नवाची निगाह से देखते हुए): पर आपने तो हमें पटियाला बताया था? अनिकेत: मतलब? लकी: अरे! मतलब तो आप मुझे बतायेंगे. अनिकेत अचम्भे में पड़ गया. हँसने की अधूरी कोशिश करते हुए बताया: दरअसल पटियाला से दिल्ली के लिए रात के ग्यारह बजे की बस है. दंगे के कारण बठिंडा में कर्फ्यू था और वहाँ से बस सेवा आज ठप्प थी.

लकी: सर, इसमें हँसने की बात कहाँ थी? आप हमारी गाड़ी में बैठ हम पर ही हसेंगे? अगर आपको दिल्ली जाना था तो हमें पूरी बात बतानी थी. अनिकेत(परेशान होते हुए): जी. लकी: जी, क्या? बताना चाहिए था या नहीं? अनिकेत: हाँ. लकी: तो बताया क्यों नहीं? अनिकेत: हमें लगा पटियाला बताने से काम हो जायेगा. लकी: काम? कौन सा काम? आप हैं कौन? ये काम, दिल्ली, झूठ ..ये सब क्या लगा रखा है आपने, मिस्टर अनिकेत? यह आपका वास्तविक नाम है या नहीं? अनिकेत(सम्भाल कर बोलते हुए): आप मेरा कार्ड देख लीजिए. अनिकेत ( हँसते हुए ): आप तो पुलिस वालों सी हरकत करने लगे हैं.

फोन फिर बजने लगा. बॉस थे. यस सर, कल पहुंच रहा हूँ...हाँ ..हाँ. एक कमरा मेरी खातिर बुक करा दीजिएगा. रात के दो ढाई बज ही जायेंगे. थैंक यू सर.

फोन से ध्यान हटा तो पाया कि लकी की गर्दन उसकी तरफ घूमी हुई है. अनिकेत ने आँखों से पूछा: क्या? लकी : सर, एक बात कहूँ? क्या आप सिस्टम में यकीन नहीं रखते? आप हमारे आगे फोन को तरजीह देंगे – यह हमारा अपमान नहीं है ? या आपको नाफरमानी की आदत है? आप मुझे अपना पहचान पत्र नहीं देंगें?

अनिकेत : अभी मैंने अपना विजिटिंग कार्ड दिया तो था. लकी : कब? कब दिया, साहब ? इसके मानी तो ये हुए कि मैं झूठ बोल रहा हूँ? मेजर, क्या मैं झूठा हूँ? अनिकेत उसे दुबारा अपना कार्ड देता है और जाने क्यों उसके मन मे ख्याल आता है कि रितु से बात हो ही जानी चाहिए. बेबात की उसकी नाराजगी अलग ही मुश्किल का सबब है.

लकी कार के भीतर बल्ब जलाता है पर उसकी हरकतों से अनिकेत समझता है कि उसे कुछ भी साफ दिखाई नही दे रहा है. लकी खिड़की का शीशा नीचे करता है, कहता है : मुझे रौशनी के बजाय अन्धेरे में पढ़ना आसान लगता है. पर उसके हाथ से कार्ड छूट जाता है. लकी अपना हाथ अनिकेत की तरफ बढ़ा देता है. अनिकेत दिग्भ्रम की हालत में उस चौड़ी हथेली पर तीसरा कार्ड रख देता है.

लकी : मेजर, यह बिजनेस कार्ड है. यह तो कहीं भी छप सकता है. अनिकेत साहब, अगर यही आपका नाम है तो, हमें क्षमा करियेगा पर क्या आप हमें कोई ऐसा पहचान पत्र नहीं दिखा पाए जो सरकार की ओर से दिया हुआ हो. सरकार पर आप को यकीन तो होगा? हमें है.

अनिकेत की थकी समझ दगा दे रही है. ये क्या हो रहा है? वो लकी से कहता है : आप मुझ पर भरोसा रखें. लकी : भरोसा ? उसे ही कायम रखने के लिए तो हम आपका कार्ड माँग रहे है, वीर जी. क्या आपको हम पर भरोसा नहीं है? देखने में आप हिन्दू ही जान पड़ते हैं पर यह शर्तिया साबित हो जाए तो सफर सुहावना रहेगा. है ना ! और हाँ, जहाँ तक भरोसे का सवाल है, आपके लम्बे जीवन की कामना करते हुए मैं आपको मूलमंत्र देता हूँ - भरोसा सिर्फ प्रेम में ही नहीं, व्यवसाय में भी घातक होता है.

अनिकेत कोई जबाव दिए बिना, अपना ड्राईविंग लाईसेंस निकाल कर दे देता है. हैन्ड ब्रेक के पास जो चबूतरेनुमा जगह है वहाँ कॉच की दो ग्लास, रेड वाईन की बोतल और चिप्स पैकेट रखा हुआ है. अनिकेत के डी. एल. को अपनी जेब के हवाले करते हुए लकी तीसरा ग्लास निकालता है. क्या लेंगे, अनिकेत साहब? वाईन, व्हिस्की या दम? दम के लिए लकी उसे चिलम दिखाता है जो सामने रखी हुई है. बुझी हुई.

अनिकेत इंकार करता है. वो ज़िद करते हैं. अनिकेत दूनी जिद से मना करता है : मैं, दरअसल पीता ही नहीं हूँ. इस पर लकी ग्लास पीछे खींच लेता है. सामने के आईने से अनिकेत को देखते हुए पूछता है : अच्छा अनिकेत साहब, अगर यही आपका नाम है तो, क्योंकि अभी तक आप साबित नही कर पाए, व्यवस्था में आपका कितना यकीन है?

अनिकेत को इस नामाकूल प्रश्न का जबाव नहीं जँचता है. वजह कि सीधे सीधे वो किसी व्यवस्था में यकीन नहीं रखता है. जो है, वह इतना बुरा है कि यकीन सम्भव नही है, ग़ुजर भर हो रही है. जो नहीं है, उसमें यकीन क्या, वो तो है ही नहीं और उसके स्वप्न मात्र बिकते हैं. लकी पहली बार इससे कड़ाई से पेश आते हुए पूछता है: देश में यकीन तो होगा, बिरादर ? अनिकेत को इस प्रश्न का जबाव नहीं सूझता. छोटी सी हुँकारी से काम चल सकता है. अनिकेत : हाँ. लकी : वाह रे खिलाड़ी ! देश में यकीन है, और हमारी व्यवस्था में नहीं ?

लकी, वाचाल मशीन में तब्दील होता जा रहा था. हमारा सिस्टम देखिए, हमने आपको टॉप क्लास गाड़ी मुहैया कराई, एअर कंडीशन, महँगी शराब, जो आप पी नहीं रहे. अब आप यह न कहना कि इसे पीना आपके बूते में नहीं. यह कहना दरअसल हमारा अपमान है. और इस देश की शिक्षा व्यवस्था का भी.

अनिकेत की समझ खुल नही पा रही थी और उसने मान लिया कि शराब ने इनका सर पकड़ लिया है. उसने अपनी आवाज नीचे की : लकी जी, बुरा ना माने तो एक बात कहूँ ? आपका सवाल इक्कीस आने सही है पर क्या हम थोड़ी देर बाद इस विषय पर बात करें? लकी : शौक से, मिस्टर.

अगले दस मिनट फैसलाकुन बीते.

लकी ने एक पंजाबी गाना बजा दिया : इक खबर सुनी है वो सच्ची है या झूठी / पा के यारा दी झाँझरा गैरा दी डेरे नच्ची. अनिकेत को लगा कि कोई सुनसान है जो बज रहा है. उनके बीच जो यह तनाव बन आया था उसपर स्टीरियो की आवाज लोरीनुमा लगी थी. इस बीच अनिकेत के दो फोन आये. पहला फोन माँ का था. उसने कहा, माँ मैं थोड़ी देर में लगाता हूँ. हुआ यह कि अनिकेत के फोन बजते ही लकी ने स्टीरियो की आवाज तेज कर दी थी. बहुत तेज. जैसे शादियों के फूहड़ उत्सवों में होता है. लकी ने अनिकेत के फोन रखते ही आवाज मद्धिम कर दिया और उपर लगे आईने के रास्ते अनिकेत की तरफ तिरछी एक मुस्कान उछाली.

अगला फोन बॉस का था. लकी ने आवाज फिर ऊंची कर दी. इस बार अनिकेत से रहा नहीं गया. जब तक वो आवाज कम करने की दुहाई देता, फोन कट चुका था. लकी ने आवाज नीचे कर दी. अनिकेत ने दुबारा फोन मिलाया और जैसे ही बात का मिसरा उठाया कि लकी ने इस बार आवाज बेहद बेहद तेज कर दी. आजिज आकर अनिकेत ने लकी को कन्धे से पकड़ कर हिलाया, कहा : आप जानबूझ कर मुझे परेशान कर रहे हैं, मिस्टर.

लकी के आदेश पर मेजर ने काले सुनसान में गाड़ी रोक दी. दोनो चुपचाप अनिकेत को देखते रहे. सामने के आईने से नहीं, बाकायदा पीछे घूम कर. दो जोड़ी आँखों से लगातार घूरे जाना अनिकेत झेल नहीं पाया और वो खिड़की से बाहर झाँकने लगा. बाहर अन्धेरा था, जो उसे बेबस कर रहा था. औचक ही बोल पड़ा : लकी साहब, लिफ्ट देने के लिए शुक्रिया. आप मुझे यहीं छोड़ दीजिए.

लकी कुछ कहे बिना गाड़ी से उतर गया. मेजर अलबत्ता इसे घूरता रहा. अनिकेत अपना सामान सहेजने लगा और लकी ने पीछे का दरवाजा खोल दिया. अनिकेत उतरने की तैयारी करने लगा. लैपटॉप बैग को आगे जैसे ही बढ़ाया लकी ने गाड़ी का दरवाजा जोर से बन्द कर दिया. यह सब इतनी तेजी और कारीगरी से हुआ कि अनिकेत सारा कुछ समझ गया.

फाटक बन्द होते ही मेजर ने सेंट्रल लॉक डाल दिया और उछलते हुए अनिकेत को गर्दन से जकड़ लिया. उन दोनों का संघर्ष तब तक चला जब तक कि लकी ने अनिकेत को पीछे की सीट में दबाकर तीन चार थप्पड़ नहीं लगा दिए. इस अपमान की वजह से वह निरा चुप होकर इन दोनों को देखने लगा.

लकी : अनिकेत साहब, आपने खामखा मुद्दा बना दिया. चोट तो नहीं आई? मैने आपको गाड़ी से उतर जाने दिया होता पर आपका ड्राईविंग लाईसेंस मेरे पास था और उसे दिए बिना आपको जाने देना मुझे अच्छा नहीं लगता. फिर वह मेजर से मुखातिब हो गया : उन्होने मुझे कन्धे से छुआ भर था और तुमने उनकी गर्दन तोड़ दी.

अनिकेत उसी कैफ़ीयत में गिरा पड़ा था. उसके चेहरे पर हजारो हजार भावों की आवाजाही मची थी. अगर वो आईना देख पाता तो एक नई पहेली सुलझा देता : उसका अपना चेहरे तब कैसा दिखता है जब वो डरा हुआ हो.

मस्तिष्क के उस हिस्से से, जहाँ प्रेम के सुनहले फूल मुर्झा रहे थे और टूट टूट कर गिर रहे थे, यह आभास उसे मिल रहा था कि एक आखिरी बार रितु से बात हो ही जाए. उसी मस्तिष्क का एक बड़ा हिस्सा जो माँ के फोन से अभी उबरा नहीं था, कह रहा था कि दरअसल लकी सही है, उससे ही कोई चूक हो गई और लकी ने वाकई डी. एल. देने के लिए ही दरवाजा बन्द किया था.

वो सम्भलने लगा. गीत गज़ल बन्द हो चुके थे. कार की गति नहीं से नहीं थी तो 110 या 120 कि.मी. प्रति घंटे की थी. आस्ट्रिया में मारे गये संत के कारण जो दंगे हिन्दुस्तानी पंजाब में दुर्गन्ध की तरह फैले थे उसका सीधा असर इस कार की गति पर दिख रहा था कि यह कार सूटासूट भागे जा रही थी. प्रभाव का ऐसा नियम अनिकेत ने आज तक नहीं देखा था. संत की हत्या से कार की गति प्रभावित. वो खुद को दूसरे तीसरे ख्यालों में ले जाना चाहता था. इनदिनों सुखद जीवन का एक सूत्र यह भी था कि बार बार आप खुद ही में कोई गलती ढूंढे ताकि उसका निवारण भी अपने हाथ में हो.

लकी ने चिप्स का पैकेट पीछे बढ़ाया. अनिकेत ने चिप्स मुँह से लगाया ही था कि लकी हँस पड़ा : अनिकेत साहब, आपने हमारा नमक खा लिया है. अनिकेत भी हँसने लगा. अभी गाड़ी संगरूर से गुजर रही थी, हद से हद घंटे भर का सफर और था. लकी ने कुछ याद आने जैसी मुद्रा बनाई और कहा : चलिए, आपकी पहचान का सवाल भी हल कर लेते हैं. सच सच बताईये, आप हिन्दू हैं या मुसलमान या ईसाई या कुछ और?

अनिकेत : हिन्दू हूँ, सर. लकी : सर कह कर शर्मिन्दा ना करें. फिर भी, हिन्दू हैं तो दंगे के दिन बाहर सड़क पर क्या कर रहे थे? अनिकेत : मैं हिन्दू होने के साथ निजी ही सही पर एक संस्था का मुलाजिम भी हूँ. आज हमारे पंजाब टीम की मासिक बैठक थी और कल दिल्ली होना मेरे लिए अनिवार्य है. लकी: ऐसा !! कोई सबूत? कल की मीटिंग का? दिल्ली को तुम सबने आसान टार्गेट समझ रखा है और इस देश की जनता को मूर्ख. कहीं तुम बठिंडा इस खातिर तो नहीं आए थे कि पावर प्लांट उड़ाने की योजना बना सको. इतना कह कर लकी ने एक मझोली मुस्की मार दी. जस्ट किडिंग. डोंट माईंड. पर आप खुद बताईये, क्या मेरे सवाल गलत हैं? या गैर जरूरी हैं? अनिकेत ने सहमति जताई तो लकी खुश हुआ और राहत की साँस ली. कहा : प्रश्न स्थापित करना सर्वाधिक कठिन और महत्वपूर्ण होता है, मिस्टर और अब जब मेरा सवाल आपके अनुसार सही है तो कृपया जबाव दें. जल्द से भी जल्द.

अनिकेत बार बार खीझ रहा था और और हर बार कठिन प्रयत्नों से खुद को सम्भाल रहा था. वो ऐसी चूक नहीं करना चाह रहा था जिससे सामने वाले नाराज हो जाएँ. फिर भी बोल पड़ा : कैसा सवाल? लकी : आपकी पहचान का. संकट तो बस पहचान का ही होता है. अनिकेत : आपके पास मेरा ड्राईविंग लाईसेंस है, आप जाँच सकते हैं. लकी : पहचान की खातिर और क्या है आपके पास? अनिकेत : मतदाता पहचान पत्र है, पैन कार्ड है.

लकी (मेजर से) : मेजर, यार वो बांग्लादेशी तुझे याद है जिसकी लंगोट से दो मतदाता पहचान पत्र बरामद हुए थे? मेजर कोई जबाव नहीं देता, गाड़ी की रफ्तार जरूर बढ़ा देता है. लकी (अनिकेत से ) : साहब, दिल पर मत लेना, आपने मतदाता पहचान पत्र का जिक्र किया तो बांग्लादेशी याद आ गये. वैसे आप कुछ और बताईये, कैसे साबित करेंगे कि आप अनिकेत हैं. कि आप हिन्दू हैं. कि आप किसी प्राईवेट फर्म में मैनेजर हैं. कि आप दिल्ली किसी मीटिंग मे जा रहे हैं जो, अगर आप का कहा माने तो, आतंकवादी संगठन की मीटिंग नही है. कैसे?

अनिकेत की साँस उखड़ चुकी थी. पूछा : आपलोग मुझसे क्या चाहते हैं? लकी: एक मामूली सवाल का जबाव. अनिकेत: सर, आपको इन कागजातों पर भरोसा करना चाहिए. यहाँ अनिकेत जरा ठहरा, आफत की साँस लेकर बोल पड़ा: आखिर यही सवाल आपसे हो तो आप क्या जबाव देंगे, आप बताईए, मैं भी वैसे ही साबित करने की कोशिश करूँ. लकी: पहली और आखिरी बात मिस्टर अनिकेत कि हमसे यह सवाल पूछा नहीं जा सकता. क्योंकि यह सिस्टम हमारा है. हमने इसे तैयार किया है. इतनी लम्बी गाड़ी, शराब, संगीत, गति, मुफ्त का सफर..ये सब हमने आपको दिया है इसलिए हमसे कोई प्रश्न नहीं बनता.

इस देश से, जो दिन दहाड़े आपकी जमीन की जरा बढ़ी कीमत देकर आपसे खरीद लेता है, आप उस लाखों रूपए में इस कदर डूबते उतराते हैं कि नशा उतरते ही आपके पास जीने का कोई साधन नहीं बचता, ऐसे सिस्टम से आप सवाल पूछ सकते हैं? नहीं पूछ सकते. अलबत्ता वो कभी भी आपको उठा ले जायेंगे और कुछ भी पूछेंगे. आप मेरी बात का अन्यथा ना ले, बन्धु. गाड़ी के बाहर जो तंत्र है, वो जब चाहे तब आप से वह सब कहलवा सकता है जो वो चाहता है. जबकि हम तो इसके उलट, सारा जबाव आप पर छोड़े हुए हैं.

अनिकेत को इसकी समझदारी भली लगी. उसे लगा कि बात बन सकती है. आखिरी कोशिश में कहा: मैं अनिकेत हूँ. मैं अट्ठाईस साल का हूँ और मैं झूठ नहीं बोलता. मेरे पास सारे कागजात हैं जिसे हमारा देश पहचान पत्र के बतौर स्वीकार करता है. आप मेरे घर, मेरी माँ, मेरे दोस्तों से बात कर लें. लकी: पत्नी, बच्चे? अनिकेत: शादी नहीं हुई. लकी: प्रेमिका? अनिकेत: हाँ है. लकी: सुन्दर है? अनिकेत ने इस शब्द को ऐसे ही लिया जैसे वो किसी गाली को लेता और कुछ भी कहने से खुद को रोक लिया. लकी: फिर, आपकी प्रेमिका से ही बात होगी. क्यों मेजर? मेजर: डी.एल., एलेक्ट्रोलर कार्ड, पैन कार्ड? लकी: ठीक, पहले उसे ही जाँच लेते हैं. लकी अपनी चौड़ी हथेली पसार देता है जिस पर अनिकेत एक एक कर सारे पहचान पत्र रख देता है.

लकी, उन्हें तौलने के अन्दाज में उछालता है. हँस कर कहता है: आपकी पहचान का वजन कम है. सारे विजिटिंग कार्ड रख दें. अनिकेत चकित होते हुए सारे विजिटिंग कार्ड रख देता है. उसे तौलने के अन्दाज को दुहराते हुए वो बाएँ हाथ से खिड़की का शीशा नीचे करने लगता है, फिर कार्ड्स को बाएँ हाथ में लेकर देखता है और सारे कार्ड्स खिड़की से बाहर उछाल देता है.

ये सब अनिकेत के सामने हो रहा है.

खिड़की का शीशा उतारते हुए देख कर ही वो समझ गया था पर कुछ कह नहीं पाया. पर जैसे ही उसने कार्ड्स फेकने का यह दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य देखा, लगभग उछलते हुए पीछे से उसने लकी की गर्दन पकड़ ली. उसका हाथ लकी की गर्दन पर कसता जा रहा था पर भूल गया कि वे दो थे.

मेजर ने गाड़ी रोक दी. अपना जूता निकाला और उससे, अनिकेत के सर पर मारने लगा. दोनों ने उसे इस तरह खींच लिया था कि अनिकेत का पैर पिछली सीट और सर हैंड ब्रेक के पास था. मेजर अनिकेत को तब तक जूते से पीटता रहा जब तक कि लकी सम्भल नही गया. उन दोनों ने पुन: अनिकेत को पिछली सीट पर बिठाया पर अब अनिकेत के दोनों पैर मजबूत रस्से से बँधे हुए थे. अनिकेत की खातिर इस सृष्टि की देह पर जो दृश्य बच रहा था वो यह कि अनिकेत का दाँया हाथ मेजर के हाथ में था और बाँया लकी के हाथ में. अनिकेत का चेहरा दु:ख के चिन्ह में बदल चुका था और लकी अफसोस जता रहा था कि अनिकेत को कार्ड्स की बात दिल पर नही लेनी चाहिए थी.

लकी ने थोड़ा समय लिया और लहजे को नर्म करते हुए कहा: अनिकेत साहब, हम आपके किसी एक हाथ का अंगूठा तोड़ने वाले हैं. यह सुनना था कि अनिकेत ने पूरे जोर से अपना हाथ छुड़ाना चाहा. पर उन दोनों की पकड़ मजबूत थी. इतने कम समय में यह सब हो रहा था फिर भी अनिकेत ने सारी कोशिश कर ली: नाकाम जोर आजमाईश, सब कुछ न्योछावर कर देने की विनती. उसे लग रहा था कि शोर उसे बचा सकता है. पर लकी ऐंड कम्पनी भी लामकसद नहीं थी: मेरी बात सुनो, अनिकेत. प्लीज. शांत बैठिए वरना हम आपके दोनो हाथ तोड़ देंगे.

अनिकेत पर शायद लकी की बात का असर हुआ या क्या हुआ कि वो स्थिर हो गया. उसके शरीर का नस नस किसी रस्सी की तरह तन चुका था और समय किसी अकुशल नट की तरह उस पर खड़ा था. अंग टूटने के अनुभव से वह सर्वथा अंजान था. लकी और मेजर आपसी बहस में उलझे थे कि कौन से अंगूठे पर जोर लगाया जाए. मेजर ने कहा कि आज उसका मंगलवार व्रत है. यह सुनना भर था कि लकी ने अनिकेत दीक्षित के बाएँ हाथ का अंगूठा मोड़ कर तोड़ दिया. फिर तो जो हुआ वो यह कि लगा, उसकी चीख से कार की छत फट जाएगी. उन दोनों ने अनिकेत का हाथ छोड़ दिया था और वो बीच की जगह में, बेहोश, गिरा हुआ था.

बाँस की खप्चियाँ और क्रेप बैन्डेज से अनिकेत का अंगूठा बाँधने के बाद लकी ने उसके सर पर धार फोड़ कर पानी गिराया. रौशनी इतनी नहीं थी कि कूल्हे की कोई नीली नस ढूंढ कर इंजेक्शन लगाया जाए इसलिए लकी ने न्यूरोवियान 500 एम.जी. से भरा पूरा एक इंजेक्शन अनिकेत की दाहिनीं बाँह में उड़ेल दिया.

आखिरश: अनिकेत को होश आया. दर्द इतना था कि हथेली से कन्धे तक की सारे नसें फटी जा रही थीं पर उसकी कराह दर्द और अपमान दोनों के लिए थी. लकी ने अपने तईं अनिकेत का इलाज किया था.हालाँकि दाहिनी बाँह की सूजन बाईं के मुकाबिल कम थी फिर भी अनिकेत दाहिनी बाँह तक उठा नहीं पा रहा था.

दाहिनी बाँह के ख्याल से यह अफसोस उसे उठा, कि काश, लकी के बजाय मेजर की गर्दन पकड़ी होती. ऐसा करने पर सम्भावना यह थी कि कार किसी पेड़ से टकरा गई होती या सड़क के किनारे गड्ढे में चली गई होती. वो पीछे बैठा था जिस कारण उसे चोट आने की सम्भावना कम कम ही थी. पर हिंसा उसके मूल भाव में नहीं थी इसलिए ही वो ऐसी गलतियाँ करता गया.

यह अफसोस अनिकेत के भीतर कहीं ऐसी गुम चोट कर गया कि वो रोने लगा. बेकल कर देने वाली रुलाई. वह रोना इतना करुण था कि सामने बैठे सज्जन भी विचलित हो गए और लकी ने बचे हुए सारे अंगूठे तोड़ने की धमकी देकर उसे चुप कराया.

अब उसे एहसास हो रहा था कि वो अपने जीवन, अपने लोगों को किस शिद्दत से चाहता है. अब तक वो अपने साथ कितनी लापरवाहियाँ करता रहा. अट्ठाईस की औसत उम्र में वह अफसोस और गलतियों का कारखाना बन चुका था. वह बेतरह सोच रहा था कि रितु से ज्यादा उसे रितु की आजादी से प्रेम करना चाहिए था. जो झगड़े उनके बीच प्रेमिल शुरुआत थे अब जी का जंजाल बन गए थे. उसे समझ आ रही थी कि तानों से अपना काम निकालने का जो तरीका उसने अपनाया वो असफल रहा. उसे खुद से बहुत उम्मीदें थी और अब एकैक कर उसके मस्तिष्क के सभी कोने अतँरों से वे उम्मीदें अपनी अधूरेपन के अफसोस में फन उठा रही थीं.

माँ पर तो यह दॉव नहीं खेला जा सकता पर अनिकेत के चेहरे की जो हालत हो चुकी थी उसे देखकर उसकी माँ के अलावे कोई पहचान लेता इसकी सम्भावना कम थी. रोने से उसकी आँखे बाहर निकल आई थी. चेहरे का जो रँग हुआ था उस रंग की संज्ञा का आविष्कार अभी बाकी था. ललाट और बाकी के किनारे सरदर्द से सूज गए थे.

लकी: हमने तय किया है कि आपकी लख्ते-जिगर से आपकी पहचान की पड़ताल करेंगे. इजाजत दें? अनिकेत के बाहों में इतनी भी कुव्वत नहीं बची थी कि फोन उठा कर उन्हें दे दे इसलिए लकी ने पीछे पलट कर अनिकेत की जेब से फोन निकाल लिया. अनिकेत था कि लकी की आँखों में देखे जा रहा था. लकी ने हँसी बिखरते हुए मेजर से कहा : मेजर, मुझे डराया जा रहा है.

अनिकेत का फोन लकी स्कैन करने लगा. मैसेज बॉक्स में पहला ही सन्देश रितु का था, जिसे लकी सस्वर पढ़ रहा था और अनिकेत चुप बैठा हुआ था. बेभाव. बे-सिकन. उन दोनों ने आपस ही में पढ़ना शुरु किया. पढ़कर कभी मुस्कुराते, कभी ठठा पड़ते और कभी सिसकारियाँ भरने लगते. पाँचेक मिनट बीते होंगे कि लकी ने गुस्से में उबलते कहा, शर्म आती है मुझे इस देश की नौजवान पीढ़ी पर. ऐसी ही भाषा सिखाई गई है, आपके घर आंगन में. अनिकेत ने कुछ नहीं कहा. अपने भीतर कहीं, अपलक देखता रहा.

लकी: रिंग जा रही है पर कोई फोन उठा नहीं रहा. कहीं आपका प्रेम भी आपकी पहचान की तरह झूठा तो नहीं? लकी ने रितु का नम्बर देखा और सोचने हुए कहा: नम्बर तो भारत का ही लगता है. क्यों अनिकेत साहब, अब ? अनिकेत: ऑफिस में होगी. लकी: रात वाला व्यवसाय है क्या? यह कह कर दोनों हँस पड़े. अनिकेत: बी.पी.ओ का नाम सुना होगा आप सबने? लकी: खूब सुना है. सॉरी, अगर हमारा मजाक अच्छा ना लगा हो तो. रियली सॉरी, पर आप हमें अपमानित करने वाले सवाल पूछ कर बाएं हाथ का अंगूठा सहलाने पर मजबूर न करें.

संयोग, या दुर्योग, एक भ्रम है जिस पर भरोसा इंसानियत और मस्लेहत, दोनों का तकाजा होता है. इसका असर यह हुआ कि अनिकेत ने समर्पण कर दिया. लकी, रितु को फोन पर फोन लगाये जा रहा था पर अनिकेत जानता था कि वो फोन क्यों नहीं उठा रही है? दो दिन पहले किसी मामूली बात पर इनके बीच झगड़ा हुआ था पर कोई अजनबी अगर प्रेम के होने या ना होने का सवाल पूछे तो उसे यह भर बताया जा सकता है - प्रेम है या नहीं है. प्रेमिका से झगड़ने की बात बताने का चलन नहीं है पर अब होना यह था कि लकी और मेजर यही मामूली सवाल उसकी पहचान के सन्देह में लपेट कर पूछने वाले थे. यहाँ अनिकेत ने गलती की और खुद ही अपने प्रेम की मुश्किल बता दिया.

लकी: और कितने झूठ बोलोगे, भाई? तब तक अनिकेत की नजर बाहर गई और सड़क की ओर देखते हुए बेसाख्ता बोल पड़ा: यह लुधियाना है. मेजर: हाँ, है तो लुधियाना. आप सो चुके थे, इसलिए हमें रास्ता बताने वाला कोई नहीं था. सोचा कि आपको पुलिस के हवाले भी करते चलें. अनिकेत: आप लोग यह सब क्यों कर रहे हैं? हालाँकि इतना भर कहने में अनिकेत को अच्छी मशक्कत करनी पड़ रही थी.

हालात के आगे समर्पण कर देने के बाद, अनिकेत का मन-मस्तिष्क अलबत्ता खूब खूब पीछे जा रहा था. वो पंजाब के सारे शहर कस्बे पहिचानने लगा था. कई रातें तो उसने पंजाब के गाँवों में ही निकाल दी थी. किसी ने पहचान की खातिर आज तक उससे कुछ नहीं पूछा था. पाश, बीबी नूरा, शिव कुमार बटालवी, सुरजीत पातर, गुरदयाल सिंह के गाँवों में गया था. पंजाब के धनी लोक संगीत में अनिकेत की रूचि गहरी थी और इनदिनों बीबी नूराँ के पोते, दिलबहार से उसकी अच्छी छन रही थी. दिलबहार जब भी मिले, बीबी नूराँ का गाया वह गीत जरूर सुनाता था – कुल्ली राह बिच पाई असा तेरे, कि औन्दा जाँदा तकता रवीं ओ. ये दोनों एक बैन्ड स्थापित करने की बात बना चुके थे जो सिर्फ तफरीह नहीं थी.

गाड़ी स्टेट बैंक ए.टी.एम के पास रूकी. लकी: अनिकेत साहब, पेट्रोल? अनिकेत: मतलब? मेजर: कितने क्रेडिट कार्ड्स हैं आपके पास? अनिकेत चुप रहता है. लकी और मेजर सामने के आईने से इसे देख रहे हैं. इस बीच उन्हें जैसे कुछ याद आया. मेजर : गाड़ी के कागज कहाँ हैं? लकी: दराज में. मेजर : देखो, हैं भी या नहीं. लकी सामने की दराज खोल, कागज ढूंढने के क्रम में सारा सामान बाहर निकाल कर रख रहा है. सबसे पहले उसने बड़े फाल का चाकू निकाला है. मेजर: अनिकेत भाई, कितने क्रेडिट कार्ड्स हैं आपके पास? लकी, चाकू के बाद दो हाथ लम्बी रस्सी निकालता है. फिर कुछेक कागज और अंत में एक रिवॉल्वर निकालता है जो शायद देशी कट्टा है.

कुछ देर की खामोशी और लकी आगे से उठ कर पीछे आ जाता है. सवाल अब भी वही है पर अब लकी, अनिकेत के बाएँ कन्धे पर हाथ रखता है. उसका हाथ नीचे फिसलने लगा है. अनिकेत बोल पड़ता है: एक. मेजर: और डेबिट कार्ड्स? मेजर के इस प्रश्न और लकी की अगली हरकत के बीच खतरनाक लय सधी हुई थी. मेजर के इस सवाल तक लकी का हाथ, अनिकेत की बाहों पर धीमी रफ्तार में फिसलते हुए, उसकी कुहनी तक आ चुका था. पर इस सवाल के बाद लकी ने फिसलने की गति इतनी तेज कर दी कि अनिकेत को जैसे कोई दौरा पड़ गया हो. वो बोले जा रहा था: दो, दो है, दो ए.टी.एम, मुझे माफ कर दीजिए, दो हैं, दो हैं, बस दो, प्लीज लीव मी, दो हैं, दो हैं..

उसकी साँस थी कि बस आ रही थी, अन्दर जा नहीं पा रही थी. इस वजह से वो लुढ़क गया था. जब उसकी बची खुची साँस थमी तब उसने मससूस किया कि लकी का हाथ, उसके बाएँ हाथ की कलाई और अंगूठे के बीच कहीं, किसी रेल की तरह ठहरा हुआ है. लकी अपना हाथ बढ़ाकर अनिकेत के जिंस से उसका वॉलेट निकाल लेता है. तीन हजार के करीब नगद है. दो ए.टी.एम कार्ड, एक क्रेडिट कार्ड, कई सारे विजिटिंग कार्ड्स और एक बहुत छोटा रुद्राक्ष है. लकी : इसका इस्तेमाल कैसे होगा? अनिकेत की आँखों पर धुन्ध छाई है. दर्द इतना है कि वो कहता है: मुझे डॉक्टर के पास ले चलो. फिर उसे अपने अंगूठे का ख्याल आता है और अब लकी के सवालों का जबाव देना चाहता है. पर रुद्राक्ष वाली घटना की रील उसके मन में दौड़ जाती है.

अनिकेत को कम्पनी ने पहली बार गाड़ी दी है और उसे सबसे पहले रितु को दिखाने दिल्ली आया हुआ है. रितु अपना ‘लवली कमेंट’ पेश करती है, जब तुम मैनेजर की तरह बन सँवर के आते हो तो जरा भी अच्छे नहीं लगते. अनिकेत : ओके, मेरी माँ, अभी गाड़ी देखो. टोयटा इन्नोवा, 2009 मॉडल. रितु: वो तुम्हारी ग्रीन टीशर्ट क्या हुई? क्लीन शेव होकर क्यों आये हो? अनिकेत: अरे यार! अभी सिर्फ गाड़ी की बात. रितु: तुम्हारी पुरानी साईकिल से जरा ही अच्छी है और दोनों हँसते हैं. रितु खूब हँसती है. कहती है, मैं भी कार चलाना सीख रही हूँ.

रितु के घर से थोड़ी दूर आगे सिग्नल गहरा लाल हुआ पड़ा है कि एक फकीर गाड़ी की खिड़की पर दस्तक देता है. रितु, अपनी सहजता के अतिरेक में, ऐसे सभी लोगों को भिखमंगे की श्रेणी में रखती है और अक्सर भीख देती है पर उनकी उम्र तथा शरीर की बनावट के अनुसार उन्हें काम बताने लगती है. कभी कभी भिखमंगे इससे नाराज हो जाते हैं. एक ने तो रितु का सिक्का लौटा भी दिया था. खुद को दुनिया की सबसे होशियार जीव समझने वाली, बेहद भोली रितु समझ नहीं पाती कि उसकी समझाईशों में नाराज होने वाली कौन सी बात है?

वो फकीर इन दोनों की जोड़ी सलामत रहने जैसे आशिर्वाद देता है और मोर पंख से अनिकेत का सर भी सहलाता है. इस पर रितु हँस कर कहती है: अरे! मैनेजर साहब के बाल बिगड़ गए. अनिकेत फकीर की बातों से बेईंतिहा खुश होकर उसे बीस रूपए देता है और बदले में फकीर अपनी वाली पर उतर आता है. फकीर, रितु के लिए एक रुद्राक्ष देता है, कहता है, इसे हरवक्त अपनी जेब में रखना. पर अपनी रितु किसी फकीर से कम तो नहीं. कहती है: जाओ बाबा, अपना काम करो. ये सब फंटूशगिरी किसी और पर निकालो. अनिकेत जैसे तैसे उसे मनाता है. फकीर को नहीं, रितु को. वही रुद्राक्ष यहाँ उसे कार में दिख रहा है, रितु ने जिसे रखने से मना कर दिया था.

मेजर: ए.टी.एम का पिन नम्बर? अनिकेत: 2883. लकी: किसका? अनिकेत: दोनों का. हैरान मेजर ए.टी.एम कार्ड्स लेकर नीचे उतर जाता है. अनिकेत इस कदर बिखर चुका है कि किसी ख्याल के लिए भी वो खुद को एकाग्र नहीं कर पा रहा है. उसे भी लकी के अकेले होने का एहसास होता है और वो आखिरी कोशिश करता है. उसकी आवाज टूट रही है. शब्द बिखर बिखर जा रहे हैं. एक शब्द टूट कर दो हो जा रहे हैं और शब्द का दूसरा हिस्सा दूसरे शब्द से मिल, नया शब्द बनाता है, जिसका कोई अर्थ नहीं पर अपने तईं उसकी यह आखिरी कोशिश है: आपलोग ऐ साक्यों करर्र रहेहैं? मूजे डोक्ट रके पास ले चलेओ.

लकी अनिकेत की ओर देखता है. उसे शायद दया आती है या यह भी कोई अदा है कि वो कहता है: हम यह सब क्यों कर रहे हैं, यह कौन सा सवाल आप बान्धे हुए हो? कोई ना कोई कारण तो होगा ही. हो सकता है हम अस्पताल से भाग कर आयें हों. क्योंकि जब हमें वहाँ ले जाया गया हो तब आपके जैसे हाड़ माँस के पुतलों से खूब मिन्नते की हों. यहाँ जब अनिकेत को लगने लगा कि वो विक्षिप्तों के बीच फँस गया है तब तक लकी ने दूसरी कहानी शुरु कर दी. हो सकता है, हमें पैसे चाहिए, जैसे हमारी माँ बीमार हो, उसे दवा दारू देनी हो, या हो सकता है हमारे भीतर क्रोध बहुत हो, जो कि आप देख रहे हैं.

हो यह भी सकता है - जब सरकार ने आपसे कहा हो कि उन्होने हमें डराए धमकाए बिना हमारी जमीने खरीद ली या यह भी कि हमने खुशी खुशी अपनी जमीनें उन्हें दे दिया हो, आज से बीस साल पहले पचासो लाख रूपए जमीन के लिए मिलना, आप कल्पना भी नहीं कर सकते. कईयों को लगा हो कि इतना तो वो पूरे जनम की खेती से नहीं कमा सकते. जिन्होने अपने खेत बेचने में देर की या नहीं बेचा, हम उन्हें अपने पास भी नहीं फटकने देते हों.

खुद मेरी बारात हेलीकॉप्टर से गई हो. दुल्हन हेलीकॉप्टर की चमक से नीली पड़ जाए. पर इससे पहले कि हम होश में आते हम सड़क पर आ गए हों. उस आमदनी की का एकमात्र सबूत यह गाड़ी हो वरना हेलीकॉप्टर की तस्वीरें भी खो गईं. बताईये, आपकी सरकार हमारे साथ बेहतर सलूक नहीं कर सकती थी.

अनिकेत: मेरी सर कारन हीहै. इस रिरियाहट पर लकी का मन हुआ कि इनका अंगूठा दबा ही दिया जाए पर तब तक मेजर आता हुआ दिखा. कार के शीशे पर कोई कीड़ा चिपका हुआ था. उसे हटाते हुए ही लकी को बताया: स्टेट बैंक के अकाऊंट में सत्ताईस और आई. सी. आई. सी. आई और में पैंतीस है. लकी: मात्र? अनिकेत को लगा उसके लिए यह आखिरी मौका है, बता दिया कि पहली तारीख को मेरी तनख्वाह आ जाती है, आप उसे रख लेना, और क्रेडिट कार्ड भी है, लैपटॉप है, मोबाईल है, कपड़े हैं पर .. अभी मुझे मार डालो न ना ना ...मुझे डॉक्टर के पास ले चलो.

दोनों हँसते हैं. अनिकेत से लैपटॉप और बैग पैक लेकर पीछे डिग्गी में डाल देते हैं. इसका जूता उतार लेते हैं. मौजे भी. पैर का बन्धन खोलते हैं, पैंट उतार कर फिर बाँध देते हैं. उसे लगता है कि शर्ट उतारते हुए वो लोग उसके दर्द का ख्याल रखेंगे पर नहीं रखते और फिर जो अनिकेत की दशा होती है वो मरे हुए इंसान के बराबर है. अनिकेत की आवाज, जो किसी गूँज में तब्दील हो चुकी है, उसे खुद समझ में नहीं आती है पर वो कहता है : सारा कुछ तो ले चुके, अब मुझे यहीं छोड़ दो.

लकी कहता है: थैंक्स फोर योर मनी ऐंड एवरीथिंग पर अभी तो आपकी शिनाख्त बाकी है मेरे दोस्त.ये मुल्क हमारा है. कार दौड़ रही है और अनिकेत के भीतर सबकुछ सूख चुका है. डर और चिंता से अलग जीने भर के लिए जो मामूली साहस चाहिये, वो भी अनिकेत को छोड़ चुका है.

उम्मीद की लकीर धुआँ धुआँ दिख रही थी. उसका फोन लाऊडस्पीकर पर डालकर लकी, रितु को फोन मिलाए जा रहा था, और कह रहा था: अनिकेत साहब, आपको प्रेम की बाबत झूठ नहीं बोलना चाहिए था. अनिकेत के पास इतनी भी क्षमता भी नहीं बची थी कि वो चुप रहने का भी निर्णय ले पर उसकी जबान नहीं फूटी.

फोन रितु नहीं उठा रही थी. सब कुछ ले चुकने बाद दोनों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. कार अब जी.टी. रोड पर थी और दो सवारियाँ देख कर लकी ने फोन रख दिया, कहा : अनिकेत साहब अब बता भी दो कौन हो आप. पता नहीं किसका नम्बर दिया है? और हम सच्ची पुलिस के पचड़ों में नहीं पड़ना चाहते. अनिकेत अब भी इनके इशारे नहीं समझ रहा था, कहने लगा : मेरा फोन नम्बर देख वो नहीं उठायेगी. उसे एक एस.एम.एस कर दो.

लकी मुस्कुराया. कहा: मान लो अभी हम तुम्हारी हत्या करें, उसके ठीक पहले तुम किससे बात करना चाहोगे. अपनी मृत्यु के बाबत विचार मात्र से वो चिहुँक गया. उसकी समझ ही में नहीं आया कि सामने वाला ऐसा क्यों कह रहा है? अब उन के कहे पर इसे भरोसा हो गया था. पहली बार उसने यह सोचा कि वह मर भी सकता है. उसने अपने स्वप्निल जीवन के कितने चन्दोवे तान रखे थे. इस भय को आत्मसात करने में उसे कई मिनट लग गए.

मृत्यु के खौफ से उसकी लुटी हुई चैतन्यता वापस आ रही थी. सड़क और अन्धेरा, सब साफ साफ दिख रहे थे. अब जितना भी उसका जीवन बचा था, वह समझ नहीं पा रहा था कि उस मामूली समय में वो क्या क्या कर डाले? क्या क्या सोच डाले? उधर जैसे ही लकी ने इसके बाएँ हाथ पर अपना हाथ रखा, ये बोल पड़ा : रितु से. लकी: गुड ब्वाय. जानते हो मेजर, ये पहला शिकार है जिसे मारने का मन नहीं हो रहा. अनिकेत ने फिर रितु को फोन मिलाया पर रितु थी कि फोन नहीं उठा रही थी.

अनिकेत यही चाहता था.

यह फोन कॉल अन्धेरे की छत में आखिरी सुराख थी. अनिकेत जानता था कि रितु उससे नाराज है और उसका फोन नहीं उठाने वाली है. अब जब तक वो किसी बहाने से उसे मना न लेगा, दिल्ली जाकर, उदास मेल लिख कर, पैर की चोट उभरने की बात का बहाना लेकर (इस बहाने पर वो अनिकेत को देखने चण्डीगढ़ चली आई थी और पाया था कि महाशय आराम से घूम रहे हैं, जो डाँट लगाई थी कि पूछिए मत. मान मनौवल की शर्त इस पर टूटी थी कि रितु को सेक्टर सतारह के बुक स्टाल से जेम्स जॉईस की फिन्नेगंस वेक, यियुन ली की थाउउजेंड ईयर्स ऑफ गुड प्रेयर्स और जोनाथन को की द टेरिबल प्राईवेसी ऑफ मेक्स्वेल सिम दिलाई जाए)बुलाया जाए वरना तब तक वो नाराज रहेगी और अब यही खासियत अनिकेत की जान बचा सकती थी.

अगर इसी तरह, सुबह हो गई तो? यह इनके सम्बन्ध का सबसे बुरा हिस्सा था जो इतना कारगर साबित हो सकता था, तो सोचो जरा, अच्छा कितना अच्छा होगा? अनिकेत को जब यह सिहरता हुआ ख्याल आया तो उसने अपने आप को समेट कर कहा : लकी, तुम जो कहो, मैं करने के लिए तैयार हूँ, जो माँगों, मेरी सारी जमीन, जायदाद ..मैं अपने शरीर का जूता बना कर आपलोगों के पैरों मे पहनाऊँगा पर प्लीज, मुझे जिन्दा कहीं उतार दो. तुम्हारा बहुत एहसान होगा. मैं पुलिस में नहीं जाऊंगा. मेरा भरोसा करो.

रितु के फोन नहीं उठाने की खीझ लकी के चेहरे पर दिख रही थी. लकी, अनिकेत से : तुम्हारे जैसे नामुराद, जीवन के आखिरी मौके पर माँ पिता को छोड़ प्रेमिका से बात करना चाहते हैं, और तुम जिन्दा रहना चाहते हो? ये बताओ, दिल्ली में क्या उड़ाने का इरादा है? बठिंडा पॉवर प्लांट क्यों आये थे? क्या चाहते हो तुम लोग? अनिकेत की खीझ झलक आती है, लकी से कहता है: मैं भी उतना ही इस देश का हूँ, जितना तुम हो. मैं,लुटेरा नहीं हूँ.

अनिकेत का बायाँ हाथ लकी, धीरे से अपने हाथ में ले लेता है. इतने मात्र से अनिकेत का चेहरा विद्रूप हो गया. लकी, अनिकेत से: हम लुटेरे हैं? अनिकेत: नहीं. लकी: कौन लुटेरा है? लकी, मेजर से: गाड़ी कच्ची पर उतार.. लकी, अनिकेत से: लुटेरा कौन है? अनिकेत मन ही मन यह भाँपता है कि लकी ने रितु को फोन मिलाना बन्द कर दिया है और उसने अपनी साँस रोक ली है. लकी, अनिकेत के अंगूठे को छूना शुरु करता है, पूछता है: बठिण्डा क्यों आये थे? दंगे के दिन बाहर क्या कर रहे थे? अनिकेत अपनी बात [ सेल्स मीट में आया था..] पूरी भी नहीं कर पाता कि लकी उसका अंगूठा खींच देता है. चीख- रुलाई तो दरकिनार करिए, अनिकेत वहीं के वहीं गिर जाता है. होश बाकी है. लकी, अनिकेत से: बठिंडा क्यों आये थे? अनिकेत के शब्द नहीं फूट रहे हैं. पायदान की धूल उसके मुँह पर चहलकदमी कर रही है. लकी के हाथ में वो बाँह अब भी है.

अनिकेत, लकी से : बठिंडा ही क्यों? अनिकेत समर्पण कर देता है, कहता है: पॉवर प्लांट के लिए. लकी उसका हाथ जोर से फर्श पर पटक देता है. मेजर से गालिबन अन्दाज में कहता है, क्यों मैं न कहता था. मेजर की कलाई घड़ी में मंगलवार बीत चुका है, इसलिए खुद रस्सी उठाता है. लकी गाड़ी के अन्दर है और मेजर उधर का दरवाजा खोलता है, जिधर अनिकेत की गर्दन पड़ी है जबकि रितु के फोन का सिंगटोन बज रहा है.

पंजाब में गन्ने की खेती कम होने तथा मेजर के गलत जगह की चुनाव की वजह से लकी चिढ़ा रहता है. इसलिए मुख्य सड़क पर आते ही वो मेजर को गालियाँ देने लगा. गोबिन्दगढ़ मंडी तक आते आते उसकी गालियाँ सूख चुकी थी और नीन्द भी घेर घेर कर मार रही थी कि तभी एक सरदार जी दिखे. उनके साथ एक महिला थी और दोनों कार के पीछे आ रही बस को देख खड़े हो गए. मेजर ने रेस दबा दिया.

मेजर, लकी से: दो हैं. लकी: किराये की बात करना, मुफ्त बैठाओगे तो नहीं आयेंगे.

मेजर: दिल्ली? सरदार: नहीं, अम्बाला. मेजर: चालीस रूपये. तब तक बस आ पहुँचती है और सरदारनी बस से चलने की जिद करती है. सरदारनी कहती है, बस छूट जायेगी. सरदार सोचता है, बस रूकते रूकते जायेगी. समय ज्यादा लग जायेगा. लकी इनके हाँ, ना का मूड भाँप रहा है. कहता है; वो जी, बस तो आपको अम्बाला कैंट पर ही छोड़ देगी. हम शहर तक ले चलेंगे. सरदार, सरादारनी की ओर हँस के देखता है.

दरअसल, अम्बाला कैण्ट से अम्बाला शहर आठ किंलोमीटर दूर है। कैंट से ऑटोरिक्शा रात दिन मिलते हैं, पर रात में वे रिजर्व ही जाते हैं और मनचीती कीमत वसूलते हैं. जितना सरदार को पता है उसके मुताबिक रात में ऑटो रिक्शा से सफर असुरक्षित है. दूसरी तरकीब यह है कि अम्बाला छावनी पर उन बसों का इंतज़ार किया जाए, जो शहर की तरफ ले जाएँ. अपने करीब के बस स्टेशन से घर के लिए रिक्शे का इंतज़ार लम्बा हमेशा नहीं होता पर अक्सर बहुत समय ज़ाया जाता है, क्योंकि कालका चौक से आगे बढ़ते ही आप पायेंगे कि सड़क की मरम्मत चल रही है और महीनों से चलती आ रही है.
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[कथा शीर्षक: जगदीशचन्द्र के उपन्यास ‘जमीन अपनी तो थी’ से। इस स्तंभ के तहत छपी अन्य कहानियों के लिए यहां आएं। चित्र गूगल से।]

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कवि कह गया है : ७ : बेन ओकरी

2:38 pm


कविता और जीवन

बेन ओकरी
1

ईश्वर जानता है कि किसी भी समय के मुकाबले हमें कविता की ज़रूरत आज कहीं ज़्यादा है। हमें कविता से प्राप्त होने वाले दुष्कर सत्य की ज़रूरत है। हमें उस अप्रत्यक्ष आग्रह की ज़रूरत है, जो 'सुने जाने के जादू’ के प्रति कविता करती है।

उस दुनिया में, जहां बंदूक़ों की होड़ लगी हुई है, बम-बारूदों की बहसें जारी हैं, और इस उन्माद को पोसता हुआ विश्वास फैला है कि सिर्फ हमारा पक्ष, हमारा धर्म, हमारी राजनीति ही सही है, दुनिया युद्ध की ओर एक घातक अंश पर झुकी हुई है- हमें उस आवाज़ की ज़रूरत है, जो हमारे भीतर के सर्वोच्च को संबोधित हो।

हमें उस आवाज़ की ज़रूरत है, जो हमारी ख़ुशियों से बात कर सके, हमारे बचपन और निजी-राष्ट्रीय स्थितियों के बंधन से बात कर सके। वह आवाज़ जो हमारे संदेहों, हमारे भय से बात कर सके; और उन सभी अकल्पित आयामों से भी जो न केवल हमें मनुष्य बनाते हैं, बल्कि हमारा होना भी बनाते हैं- हमारा होना, जिस होने को सितारे अपनी फुसफुसाहटों से छुआ करते हैं।


2

राजनीति की अपेक्षा कविता हमारे कहीं करीब है। वह हमारे लिए उतनी ही स्वाभाविक है जितना चलना और खाना।

जब हम जन्म लेते हैं, तो दरअसल श्वास और कविता की स्थितियों में ही जन्म लेते हैं। जन्म लेना एक काव्यात्मक स्थिति है- आत्मा का देह में बदल जाना। मृत्यु भी एक काव्यात्मक स्थिति है- देह का आत्मा में बदल जाना। यह एक चक्र के पूरा हो जाने का चमत्कार है- यह जीवन की न सुनी गई मधुरता का एक अपरिमेय चुप्पी में लौट जाना है।

जीवन और मृत्यु के बीच जो भी कुछ हमारा दैनंदिन क्षण होता है, वह भी प्राथमिक तौर पर काव्यात्मक ही होता है: यानी भीतरी और बाहरी का संधि-स्थल, कालहीनता के आंतरिक बोध और क्षणभंगुरता के बाह्यबोध के बीच।


3

राजनेता राज्य के हालात के बारे में बात करते हैं, कवि जीवन की बुनियादी धुनों में गूंजते रहने में हमारी मदद करते हैं, चलने के छंद में, बोलने की वृत्ताकार रुबाइयों में, जीने के रहस्यमयी स्पंदनों में।

कविता हमारे भीतर एक अंतर्संवाद पैदा करती है। यह हमारे अपने सत्य के प्रति एक निजी यात्रा का प्रस्थान होती है।

हम पूरी दुनिया से कविता की आवाज़ों को एक साथ ले आएं, और अपने हृदयों को एक उत्सव में तब्दील कर दें, एक ऐसी जगह जहां स्वप्न पलते हों। और हमारा दिमाग़ सितारों की छांव में अनिवार्यताओं की अकादमी बन जाए।


4

कविता सिर्फ़ वही नहीं होती जो कवि लिख देते हैं। कविता आत्मा की फुसफुसाहटों से बनी वह महानदी भी है, जो मनुष्यता के भीतर बहती है। कवि सिर्फ़ इसके भूमिगत जल को क्षण-भर के लिए धरातल पर ले आता है, अपनी ख़ास शैली में, अर्थों और ध्वनियों के प्रपात में झराता हुआ।

5

संभव है कि प्राचीन युगों के त्रिकालदर्शी मौन हों, और अब हम उन विभिन्न तरीकों में कदाचित विश्वास न करते हों, जिनसे ईश्वर हमसे या हमारे माध्यम से बोला करता था। लेकिन ज़िंदा रहने का अर्थ है कि हम कई सारे दबावों के केंद्र में उपस्थित हैं- समाज की मांग के दबाव, अपने होने के बिल्कुल अजीब ही दबाव, इच्छाओं के दबाव, अकथ मन:स्थितियों और स्वप्नों के दबाव और इस नश्वर जीवन के हर प्रवाह के बीच शक्तिशाली हो जाने की अनुभूतियों के दबाव।

6

हम अपने मतभेदों पर बहुत ज़्यादा ध्यान देते हैं। कविता हमें, हमारे यकसांपन के अचंभे की ओर ले आती है। यह हमारे भीतर विलीन हो चुके उस बोध को फिर से जगा देती है कि अंतत: हम सब एक अनंत परिवार के ही हिस्से हैं और उन अनुभूतियों को एक-दूसरे से साझा कर रहे हैं, जो नितांत हमारे लिए अद्वितीय हैं, और उन अनुभूतियों को भी, जो सिर्फ़ हमारी नहीं, दरअसल हर किसी की हैं।

हमें राजनीति की अपेक्षा कविता की अधिक आवश्यकता है, लेकिन हमें कविता की संभावनाओं में वृद्धि भी करते रहना होगा। कविता अनिवार्यत: दुनिया को बदल नहीं देगी। (अत्याचारी भी कई बार कवि-रूप में जाने जाते हैं, कहना चाहिए कि बुरे कवि के रूप में।) जब तक कविता हमारी बुद्धि को सवालों के दायरे में भेजती रहेगी, हमारी मुलायम मनुष्यता को गहरे से छूती रहेगी, तब तक वह हमेशा सौंदर्य का तेज बनी रहेगी, भलाई का वेग बनी रहेगी, तमंचों और नफ़रतों के शोर को धीरे-धीरे शून्य करती हुई।

7

कविता की असाधारणता का कारण बहुत स्पष्ट है। कविता उस मूल शब्द का वंशज है, जिसे हमारे संतों ने सृष्टि की उत्पत्ति का कारक माना है।

कविता, अपने उच्चांक पर, सृष्टि की सर्जनात्मक शक्ति को अपने भीतर जीवित रखती है। वे सभी चीज़ें, जिनके पास आकार होता है, जो परिवर्तित होती हैं, जो अपना कायांतरण कर लेती हैं- कविता उन सभी चीज़ों का सशरीर अवतार है। शब्द भी कैसी मिथ्या है न! शब्द का वज़न कौन माप सकता है, भले एक पलड़े में आप सत्य का हल्का पंख रख दें, दूसरे में शब्द- क्या वैसा संभव है? फिर भी हृदय के भीतर शब्दों का कितना वज़न होता है, हमारी कल्पनाओं, स्वप्नों में, युगों-युगों से चली आ रही अनुगूंजों में, उतने ही टिकाऊ जितने कि पिरामिड। हवा से भी हल्के होते हैं शब्द, फिर भी उतने ही रहस्यमयी तरीक़े से चिरस्थायी, जितना कि जिया गया जीवन। कविता हमारे भीतर की देवतुल्य उपस्थितियों के प्रति एक संकेत है और हमें अस्तित्व के उच्चतम स्थानों तक ले जा एक गूंज में बदल जाने का कारण बनती है।

8

कवि आपसे कुछ नहीं चाहते, सिवाय इसके कि आप अपने आत्म की गहनतम ध्वनि को सुनें। वे राजनेताओं की तरह आपसे वोट नहीं मांगते।

सच्चे कवि सिर्फ़ यही चाहते हैं कि आप इस पूरी सृष्टि के साथ किए गए उस अनुबंध का सम्मान करें, जो आपने इसकी वायु के अदृश्य जादू से अपनी पहली सांस खींचते समय किया था।
*****

{ बेन ओकरी के नये नॉन-फिक्शन टाइम फॉर न्यू ड्रीम्स’ (राइडर बुक्स)
के पहले अध्याय का हिंदी अनुवाद-
गीत
चतुर्वेदी
बेन ओकरी का चित्र नेट के स्रोतों से.
मुख्यक चित्रकृति- क्रेग वार्ड, लंदन, जिनकी विश्वप्रसिद्द विशेषज्ञता है
कि वह अक्षरों के माध्यम से चित्रों की रचना करते हैं।
इस स्तंभ की अन्य कड़ियाँ
यहाँ }

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व्योमेश शुक्ल की नई कविता

1:54 pm




शुरूआत की शुरूआत या अंत के अंत में


्यास
को लगती है बहुत तेज़ प्यास
भूख कई बार भूखी रह जाती है
नींद को नींद अगर आ गयी तो सपने सपना देखने लगते हैं
झूठ झूठ बोलता है कि वह सच है
सच बोलता है सच कि सच है उसका नाम
ग़लती से हो जाती है ग़लती प्यार को प्यार हो जाता है
सुन्दरता हो जाती है सुंदर चिड़िया चिड़िया हो जाती है आधी रात तक चहकती है - रात की सुबह से रात की रात तक
रात की दोपहर में बंदर तुलसी के पत्ते खाकर अपनी खांसी ठीक कर लेता है
इंतज़ार करता है देर तक इंतज़ार लहरें लहरों की तरह लहराती हुई आती हैं
हवा हवा सी पेड़ पेड़ सा फूल फूल सा

एक
होता है यौवन का बचपन - बुज़ुर्ग यौवन से सीखता हुआ
सीखने की तरह सीखना है छपाक छपाक की तरह
बात बात से बात करती है बात बात से बात करता है
सुबह की सुबह के बाद सुबह की दोपहर के बाद सुबह की शाम शाम की दोपहर

शाम
की शाम सितारों के सितारे और चाँद का चाँद
तुम्हारा आना तुम्हारे आने का इंतज़ार तुम्हारे आने की आहट
तुम्हारे आने की हवा तुम्हारे आने के समाज की राजनीति के आरम्भ के अंत से शुरू होने वाली बात का हल्का सा पुरानापन

यह
जीवन-विन्यास हो भी सकता है
*****


{ व्योमेश शुक्ल की अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। कविता के साथ दी गई तस्वीर आना आडेन, स्वीडिश फोटोग्राफ़र की। }

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संपादन : अनुराग वत्स.

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