Saturday, July 16, 2011

पंकज चतुर्वेदी की नई कविताएं


[ आगे दी जा रही पंकज चतुर्वेदी की नई कविताओं और उस पर व्योमेश शुक्ल की क्षिप्र टिपण्णी उस महत्वपूर्ण प्रकाशन का हिस्सा है जिसके तहत कवियों ने सबद की पहल पर अपने साथ और इन अर्थों में समकालीन कवियों की कविताओं का चयन कर उस पर अपनी टिपण्णी लिखना स्वीकार किया था. हम पंकज चतुर्वेदी के आभारी हैं, उन्होंने अपनी कविताएं इस श्रृंखला के लिए उपलब्ध कराई . साथ ही व्योमेश शुक्ल के भी जिन्होंने उनकी कविताओं पर अपने मूल्यवान विचार रखे. हमारा धेय्य सीन को किसी तरह इंगेज रखना न कभी था, न है. हम ऐसे और अन्यान्य भी, इस विनम्र कोशिश में लगे हैं कि अच्छी कविता पर रोशनी और कविओं पर ध्यान बराबर जाए. इससे पूर्व आप इस श्रृंखला में नीलेश रघुवंशी, शिरीष कुमार मौर्य तथा सुशोभित सक्तावत की कविताएं पढ़ चुके हैं. ]
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कविताएं


धारा 144

पूरे प्रान्त के विभिन्न शहरों में
तमाम केन्द्रों पर आयोजित थी
डॉक्टरी की बेहद संवेदनशील प्रवेश-परीक्षा

सरकार के हुक्म से
सख़्त इंतिज़ाम थे
कि कोई जालसाज़ी न हो सके

एक जगह पर अनेक लोगों का
जमाव न हो
आवाजाही नियन्त्रित हो
संदिग्ध तत्त्व न देखे जायँ
परीक्षा-केन्द्रों के आसपास

एक शहर में प्रशासन ने
तैयारी बैठक की
सभापति के तौर पर
अतिरिक्त ज़िलाधीश ने कहा :
धारा 144 लागू कर दी गयी है
किसी को कुछ पूछना है ?

एक मुलाज़िम ने कहा :
यह सुनिश्चित करना है
कि परीक्षा-केन्द्रों के
दो सौ मीटर के दायरे में
कोई फ़ोटोकॉपी-मशीन न चलती हो

साहब ने जवाब दिया :
धारा 144 लागू कर दी गयी है

उसने फिर कहा :
इसे एक बार और देख लें
यह धारा 144 में नहीं है

इस पर साहब ने सवाल किया :
वैसे आपका नाम क्या है ?

इसके बाद किसी ने कुछ नहीं पूछा
बैठक ख़त्म हुई
सभागार से सभी
यह कहते हुए निकले :
धारा 144 लागू कर दी गयी है
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सम्बन्ध


कर्मचारियों की सभा में
मालिक ने कहा :
हमारे-आपके सम्बन्ध
कभी ख़राब नहीं हो सकते
क्योंकि वेतन आपको सरकार देती है

कर्मचारी ख़ुश हुए
और मालिक से और भी प्रतिबद्ध

मगर वे यह बात भूल गये
कि वेतन जो सरकार देती है
वह जनता के चुकाये हुए
करों के संग्रह में-से
इसलिए उनकी जवाबदेही
मालिक या सरकार नहीं
जनता के प्रति है

मालिक भी यह नहीं बताता
वह दरअस्ल कहता है :
वेतन आपको कोई दे
रिश्ते हमारे-आपके
अच्छे रहेंगे
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देखिये

सोवियत संघ के पराभव के बाद
जब धर्म की वापसी हो रही थी वहाँ
और दूसरे पूर्व-कम्युनिस्ट देशों में भी
यह क़िस्सा मुझे हिन्दी के
एक कवि ने सुनाया था

सोवियत संघ की यात्रा पर
जब नागार्जुन गये
तो मास्को में एक लिफ़्ट में
उनकी भेंट एक वयोवृद्ध स्त्री से हुई
विदा होते समय उस स्त्री ने
स्वगत शैली में कुछ कहा

नागार्जुन ने पूछा :
वह स्त्री क्या कह रही थी ?

उनके दुभाषिये ने बताया :
वह ईश्वर से आपके लिए
दुआ माँग रही थी

नागार्जुन को अचरज हुआ :
सोवियत संघ और ईश्वर?

दुभाषिये ने कहा :
भाषा का क्या किया जाय
भाषा में ईश्वर---
यह शब्द तो है

मुझे लगा, क़िस्सागो कवि से कहूँ :
अगर यह आपकी चेतना में है
तो आप सिर्फ़ इशारा कर रहे हैं---
एक निर्वैयक्तिक इशारा---
देखिये, यह सब
कहाँ से लौट आया है
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तीन बातें

कोई किसी को
माफ़ नहीं करता

कोई किसी पर
एहसान नहीं करता

और आप जो कुछ हैं
अपनी बदौलत हैं
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कविताओं पर व्योमेश शुक्ल

पंकज
अनुभव को राजनीति के सामान में बदल लेते हैं. यह अनुभव की अनंत संभावनाओं में एक और संभावना की तलाश है या इस वक़्त के कवि का कर्त्तव्य. इस कर्त्तव्य को वह कलात्मक चुनौती की तरह स्वीकार करते हैं और एक निहायत सादा, ताज़ा, आदिम और क़ाबिलेयक़ीन 'मौलिक-विशेष', यों, आज की कविता को हासिल हो जाता है.

दिक़्क़त यह है कि कवि की ऐसी राजनीतिक उपलब्धि को हिंदीसाहित्यसंसार में 'मुहावरा' वगैरह कहकर समझ लिया जाता है. जगमग दृश्य में पंकज उन बहुत कम, अनोखे कवियों में से हैं जिन्होंने एकदूसरे जैसी कविता नहीं लिखी और वर्चस्वशाली शिल्पों से असहमत रहे आए. उनकी रचना में उपलब्ध के साथ सामंजस्य, सहयोग या संतुलन का अभाव है, लेकिन यह अभाव भी किसी वाचालता में ख़ुद को ज़ाहिर नहीं करता, बल्कि नमी, व्याकुलता, वैराग्य, यथार्थ की निरुपायता और एक असमाप्त मननशील युयुत्सा की मिलीजुली रौशनी से उसकी आवाज़ बनती है. ऐसी आवाज़ जितनी बनती है, उतनी बढ़ती भी है. ऐसी आवाज़ में व्यक्ति की भीतरी परतें भी पारदर्शी होकर सामाजिक सचाइयाँ बन जाती हैं. ऐसी आवाज़ में, जैसा निर्मल वर्मा मलयज के लिए कह गए हैं, हमेशा एक मंद्र 'अर्जेंसी' होती है. ऐसी आवाज़ का आत्म ही मुक्तिबोध के शब्दों में, एक 'आभ्यंतरीकृत विश्व' होता है.

अपमान उनकी कविता का प्रमुख मुद्दा है. ग़ौरतलब है कि व्यक्ति के अपमान को पंकज कितने सिरों से उठाते हैं, ग्रामप्रधान की बैठक यानी अन्यायमय सामाजिक यथास्थिति के 'ग्राउंड ज़ीरो' से शुरू करके 'निर्वैयक्तिक इशारे' करते रहने वाले चमकदार हिंदी कवियों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म 'कंडीशंड रेफ्लेक्सेस' तक. ऐसे अप्रत्याशित और विविध उनके लिये सुविधाएँ और अलंकरण हो सकते थे, लेकिन रचना में वे सरोकारों के हिस्से बनकर मौजूद हैं.

रघुवीर सहाय की कविता जिस एक दर्जा नीचे रहने के दर्द की ख़ातिर कविता को खोलती है, वह मुक्ति पंकज की कविता के लिये किस क़दर आजीवन कर्त्तव्य बन गयी है, इसे देखा जाना चाहिए और इस कविता की राजनीति को बहस और साहित्यिक सामाजिकता के कुछ और बीच में ले आना चाहिए. पंकज की कविता को ताक़त के अन्यायी रूपों की आलोचना के तौर पर पढ़ा जाना भी बाक़ी है. वैसे तो हमारे यहाँ अनिवार्य चीज़ें लगातार बाक़ी हैं. नब्बे के दशक, जिसके कवि पंकज बोलचाल में माने जाते हैं, की भीड़ में से प्रतिनिधि कवियों की नेक, विश्लेषणसम्मत और ऐतिहासिक तलाश का काम बाक़ी है.बहरहाल, पंकज जैसी कविता पढ़ते हुए हम कविता की अपनी शक्ति पर भरोसा रख सकते हैं और विश्लेषण के लिये प्रतीक्षा कर सकते हैं.
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Tuesday, July 05, 2011

बही-खाता : १३ : अर्नस्ट हेमिंग्वे



 तुमने पहले भी लिखा है, तुम फिर लिखोगे...

लिखते हुए ऐन उस वक़्त रुकना चाहिए जब तुम रौ में होओ और तुम्हे यह पता  हो कि आगे क्या लिखना है...इसके बारे में अगले दिन लिखने से पहले सोचना या चिंता करना छोड़ दो. ऐसा करने से तुम्हारा अवचेतन अपने आप इस पर काम करता रहेगा कि क्या लिखना है. लेकिन अगर तुम सचेत होकर इस बारे में सोचने लगोगे तो निश्चय ही उसे नष्ट कर दोगे जो कागज़ पर उतरने के लिए तुम्हारे भीतर घुमड़ रहा है और तुम्हारा दिमाग ऐसा करते हुए इस कदर थक जायेगा कि तुम अगले दिन लिखना शुरू नहीं कर पाओगे...विराम की घडी में जब भी तुम्हारा मन उस ओर जाये, उसे रोको, कहीं और लगाओ. यह तुम्हे रोज़ जतन से सीखना होगा...हो सके तो वर्जिश करो, इससे शरीर थकेगा, और क्या ही अच्छा हो कि तुम जिससे प्रेम करते हो, उसके संसर्ग में जाओ. लेखन के अन्तराल में इससे बेहतर तुम कुछ नहीं कर सकते...वह कुआँ जो मेरे लेखन का जल-स्रोत है, उसे मैंने इसी तरह कभी सूखने नहीं दिया...

तुमने जो शुरू किया उसे ख़त्म करो, तब बिलकुल न रुको जब लिखते हुए अपने को तुच्छ या विषयवस्तु के सामने निरुपाय महसूस करो...याद रहे, ''यह अच्छा बना या नहीं'' का बीहड़ संदेह ही कलाकार का पुरस्कार है...

तुम मुख्यतः दो लोगों के लिए लिखते हो : खुद के लिए ताकि पूर्णता या अचरज के अहसास से भरे रहो और उसके लिए जिससे तुम्हे प्यार है, इस बात से जुदा होकर कि वह तुम्हारा लिखा पढेगी या नहीं या वह अब है भी या नहीं. 

किसी लेखक से लोग हमेशा उसकी आखरी कहानी जैसी ही अगली कहानी चाहते हैं...लेखन के साथ यह बड़ी विडंबना है : तुम वैसा कभी नहीं लिख पाते, जैसा लिखा जा सकता था... 

अपनी निजी त्रासदी को भुलाओ. ऐसा सबके साथ होता है और तुम्हे गंभीरता से लिखने के लिए बुरे से बुरा का भुक्तभोगी बनना ही होगा. इतना ज़रूर ख़याल रहे कि जब तुम बुरी तरह आहात हो जाओ, तो वह अनुभव किसी तरह ज़ाया न हो. उसके प्रति एक वैज्ञानिक जैसी निष्ठा रखो.

एक लेखक की पहली सबसे अच्छी ट्रेनिंग उसका बचपन होती है : उदास बचपन. 

अच्छे लेखन को तुम कितनी ही दफा क्यों न पढ़ जाओ, यह बताना हमेशा कठिन होगा कि वह कैसे लिखा गया होगा...हर महान लेखन में रहस्य का एक तीर बिंधा है...तुम जितनी दफा उसे पढ़ोगे, कुछ नया सीख सकोगे. 

एक अच्छा लेखक अपने अनुभवों से जितना सीखता है, अपनी कल्पनाओं में उतना ही सच्चा होता है.   

सबसे कठिन है मनुष्यों के बारे में खरी ईमानदारी से लिखना. इसके लिए सबसे पहले तुम्हे अपने विषयवस्तु को जानना होगा और फिर यह कि इसे लिखा कैसे जाये. मेरे ख्याल में दोनों को जानने में एक पूरा जीवन निकल जाता है. 

फ़िक्र मत करो. तुमने पहले भी लिखा है, तुम फिर लिखोगे. तुम्हे सिर्फ़ एक सच्चे वाक्य की दरकार है. तुम्हे जो सबसे सच्चा वाक्य सूझता हो, उसी  से शुरुआत करो...बतौर लेखक तुम्हे परखने से ज़्यादा चीज़ों को समझने में रूचि लेनी चाहिए.
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अनुवाद : अनुराग वत्स 


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[ लेखन संबंधी अर्नस्ट हेमिंग्वे के इन विचार बिन्दुओं का कलन उनकी मरणोपरांत छपी पुस्तक ''ऑन रायटिंग'' से किया गया है. इस स्तंभ के अन्य लेखक यहाँ .]