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कथा : ४ : आशुतोष भारद्वाज

9:48 pm


अंतिम आलाप

म।

तुमने उसे एम नाम इसलिये नहीं दिया होगा कि उसकी दोनो पिंडलियों पर मृत्यु के हस्ताक्षर नीले अक्षरों में खुदे होंगे या कि वह तुम्हारे संग उस पहाड़ी कस्बे के उजाड़ कब्रिस्तान में खो जाने को मचल रही होगी जब तुम उन ढहते पत्थरों का उससे जिक्र करोगे न इसलिये कि तुम्हें वह पहली ही मुलाकात में इसी अक्षर के नाम वाले एक कथाकार के किसी उपन्यास की नायिका लगेगी।

ब तुम उसे पहली बार सात मार्च को अपने शहर के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर रात की रोषनियों के बीच काली टी शर्ट, काली स्कर्ट और काले बूट्स में कुलबुलाते देखोगे और फिर उसे होटल ले जाओगे और हॉंलांकि इस बीच वह लगातार तुमसे बात करती रहेगी लेकिन हवाई अड्डे से होटल तक की कार यात्रा में ही तुम अपने और उसके बीच एक ठंडी और तटस्थ दूरी महसूस करोगे जो अटकती भटकती रास्ता टटोलती उसकी बेचैन स्मृति में तुम्हारी ललक और उसके अनुसार तुम्हारी सरफिरी कहानियों में उसकी दिलचस्पी के बावजूद बनी रहेगी -- एक गहरी खाई जो तुम्हें तब तलक नहीं मालूम होगा उसके नाम के अक्षरों में अपनी अकुलाहट हासिल करती होगी। तभी तुम्हें लगेगा आगामी कुछ दिन जो तुम्हें उसके साथ उस पहाड़ी कस्बे में बिताने होंगे इस दूरी के दरमियां ही पिघलने थे। यह तुम्हारे लिये ठीक ही था पिछले पैंतीस दिनों में पृथ्वी जितना भार अपनी देह और रूह पर साधे तुम सबसे दूर चले जाना चाहते थे -- सभी दूरियों को अपने से लपेट। सभी अलगावों को अपने में समेट। अपनी जिंदगी का स्वॉन सॉन्ग रचने। लेकिन तुम्हें नहीं मालूम होगा उससे मिलने के महज अड़तालीस घंटों के भीतर ही तुम्हें उसे और उसे तुम्हें नया नाम देना ही पड़ेगा।

--- तुम मुझे फिर अकेला छोड़ चले गये ए!
--- कहॉं गया... मैं यहीं तो था एम।
--- बेईमान...धोखेबाज ए...तुम नहीं थे। तुम मुझे अकेला छोड़ जाने को मचल रहे हो। अगर तुम्हें नहीं रोकती तो तुम कल शाम ही खिसक लेते।

कैमरा गले में टांगे एम कब्रों के बीच उतरती आयेगी। ठंडी हवा से बेपरवाह उसके काले ओवरकोट के सारे बटन खुले रहेंगे, ओवरकोट खुले परदों की तरह हिलता रहेगा, नीचे काली टी षर्ट झांकती रहेगी। वह तुम्हारे नजदीक आ धम्म से नीचे बैठ जायेगी। बैग खोल पानी की बोतल निकालेगी। उसकी गरदन पर लता की तरह उभरी हरी नसें नीचे उतरती धार से फूलती जायेंगी। तुम्हें लगेगा उसे कम पानी पीना चाहिये नहीं तो नसें फट जायेंगी, पानी गरदन की चमड़ी को फाड़ता फूट पड़ेगा लेकिन तुम उसे नहीं रोकोगे लकीरों को फूलता हुआ देखते रहोगे।

नौ मार्च की उस दोपहर पहाड़ी ढलान पर बिखरी कब्रों के परे गहरी खाई होगी --- देवदार और बन के पेड़ों के बीच दुबकी हुई। सफेद पंख फड़फड़ाते फाख्ता उपर मंडराते रहेंगे। एम नीचे तलक चलती जायेगी लेकिन तुम्हें ढूंढ नहीं पायेगी। उसे नहीं मालूम चलेगा आगे खाई है। पीछे किसी कब्र के सिरहाने दुबके बैठे तुम चाहोगे चिल्ला कर कहो --- एम आगे मत जाओ। लेकिन तुम उसकी काली स्कर्ट के नीचे चमकती पिंडलियों पर मृत्यु के निशान धुंधले होते देखते रहोगे। एम इस पहाड़ी ठंड में भी स्कर्ट पहना करेगी। तुम्हें लगेगा जब वह एकदम गिरने वाली होगी तुम दौड़ कर उसे बचा लोगे या फिर दौड़ते हुये उसके साथ तुम भी खाई में गिर जाआगे। अगले दिन यहॉं बिछी कब्रों में एक तुम्हारी भी होगी जिस पर लिखा होगा ---अपने जीवन का स्वान सॉन्ग इस पहाड़ी कस्बे में रचने आया यह लड़का यहॉं सोया हुआ है उसके बगल में एम लेटी है जिसकी देह से मृत्यु से पहले भी मृत्यु की गंध उठती थी।


लेकिन कगार से ठीक पहले एम रुक जाया करेगी, पीछे मुड़ेगी तुम कहीं दिखलाई नहीं दोगे। महज सेमल के हिलते लाल फूल, पुरानी स्लेटी कब्रें और घास पर रेंगते कीड़े। इस वीरान में एम के सफेद चेहरे पर सुन्न सा सूनापन और भूरा भुरभुरापन उमड़ने लगेगा। एम को कुछ नहीं सूझेगा तो वह किसी चट्टान पर पत्थर से आकृतियॉं बनाने लगेगी। कुछ देर बाद वहीं बैठ अपने बैग से नोटबुक निकाल उस पर पैंसिल से लकीरें बनाने लगेगी। तुम्हें लगेगा वह कोई छोटी बच्ची है जो जंगल में खो गयी है।

तुम इस पहाड़ी कस्बे में पहले भी आ चुके हो पिछले साल और उससे दो साल पहले। कई दोपहरियॉं तुमने इस कब्रिस्तान में बिताई हैं। इन कब्रों पर डेढ़ सौ साल से भी पुरानी तारीखें खुदी हैं। कब्रिस्तान से सटी एक उजाड़ सड़क है जिसका एक सिरा कस्बे की ओर जाता है दूसरा एक सूनी झील पर खत्म होता है। सड़क से परे पहाड़ी जंगल और देवदार, सेमल के पेड़।

पिछली सर्दियों की एक पूरी रात तुम जंगली जानवरों से डरे बगैर इन कब्रों के बीच इस आस में सोते-जागते रहे थे कि कोई मुर्दा उठकर तुमसे बात करने लगेगा तुम्हें अपनी मृत्यु और उसके बाद अपने भटकते प्रेत की कहानी सुनायेगा। लेकिन कोई मुर्दा नहीं आया था सुबह जब तुम अपने होटल लौटे तो तुम्हारी उंगलियॉं ठंड में नीली, होंठ जामुनी पड़ चुके थे।

क कब्रिस्तान तुम्हारे शहर में भी था, जिसमें तुम बांये नथुने में चमकती लौंग पहनती म को ले गये थे। अक्टूबर में। यह तुम्हारी दूसरी ही मुलाकात थी। एक बहुत ही भीड़ वाली सड़क के बांयी ओर अचानक से एक फाटक आ जाता था जिसके संकरे दरवाजे से सिर झुका अंदर जाना होता था जहां से कब्रों की कतार षुरु होती थीं। बाहर गाड़ियों के हूंकारते हॉर्न थे लेकिन अंदर सिसकता सन्नाटा। पहाड़ी कब्रिस्तान में कब्र खुले में बेतरतीब बिखरी थीं, यहां लोहे के बड़े फाटक के परे पत्थरों की निखरी पंक्ति खिंची जाती थी।

--- मैं इस षहर में बचपन से हूं, इस सड़क से हजारों बार गुजरी हूं। मुझे मालूम ही नहीं था यहां कोई कब्रिस्तान भी है।

---कुछ साल पहले जब मैं इस शहर में नया आया था, सामने फ्रैंच सेंटर में फिल्म देखने आया था। मैं थोड़ा जल्दी पहुंच गया था तो सड़कों पर टहलने लगा। अचानक मुझे यह फाटक दिखलाई दिया और मैं भौंचक रह गया कि शहर के एकदम बीच में कब्रिस्तान भी हो सकता है। मुझे लगता था मरने की जगह शहर से दूर होती होगी... तुम्हें एक चीज दिखाऊं।

--- क्या?

तुम म के साथ कब्रों के बीच बनी संकरी पगडंडी पर चलते गये। कब्रों के बीच घास उगी थी। कई कब्रों के उपर भी पतवार सिमट आयी थी उन पर लिखी इबारत दुबक गयी थी। तुम एक जगह जाकर रुक गये। चारों ओर देखा, ढेर सारी कब्र जिन पर बाइबल की पंक्तियां खुदी थीं। तुम कुछ गिनती कर रहे थे... चार यहां, उनके पीछे दो छोड़ कर लाल पत्थर वाली कब्र के बगल वाली...

--- क्या हुआ?
--- यहॉं एक कब्र थी, मैं उसे तुम्हें दिखाना चाह रहा था।
--- किसकी... क्या था उसमें?

तुमने फाटक की ओर देखा। बांयी ओर तकरीबन पचास मीटर दूर था। उसके सहारे पगडंडी चलती गयी थी। क्या तुम जगह भूल रहे थे? ऐसा तुम्हारे साथ अमूमन नहीं होता है। जगह, नक्शे तुम्हें अर्से तक याद रहते हैं। लेकिन मुर्दों के बीच तुम्हारा दिशा बोध भी शायद गड़बड़ा गया था। तुम चारों ओर देख रहे थे.... सैकडों कब्र। छोटे छोटे क्रॉस। गुलमोहर के पेड़। तभी एक बिल्ली तुम्हारे पंजों को लगभग छूती निकल गयी।

--- तुम किसी से पूछ क्यों नहीं लेते... नहीं भला?
--- किससे पूछूंगा?
--- कोई चौकीदार, केयरटेकर होगा यहॉं। वह तो सारा हिसाब रखता ही होगा कौन कहॉं है।
--- हिसाब! मुर्दों का भी कोई हिसाब होता है क्या?

तुम खुद ही ढूंढते रहे थे जो कुछ देर बाद तुम्हें मिल गयी थी। गेंदे के पीले फूलों के बीच एक बारटैंडर मॉडल सोयी थी जिसके माथे पर किसी ने महज इसलिये गोली मार दी थी कि उसने बार बंद हो जाने के बाद शराब देने से मना कर दिया था। चमकते काले संगमरमर का उभरा पठार। एक लाल कारनेशियन भी रखा था जो भले तकरीबन हफ्ता भर पुराना था, उसकी पंखुड़ियॉं अभी भी कुम्हलाई नहीं थी। तुम बचपन में सोचते थे अगर किसी को देने से पहले फूलों को देर तक देखता रहा जाये तो निगाहों से चल कुछ ऐसा उनके भीतर समा जाता है कि वे देर तक ताजे रहे आते हैं।

---तुम ऐसे कबसे हो?
--- ऐसा मतलब?
--- तुम्हें कब्रिस्तान इतने क्यों लुभाते हैं?
---इन कब्रों को देखो... लंबी कतार में चुपचाच सोते लोग। अपने में मशगूल। बेफिक्र।
--- मुर्दे भी कहीं बेफिक्र होते हैं?
--- पता नहीं... मैं शायद अपनी मौत के बाद मिलने वाले घर से परिचित हो जाना चाहता हूं।
--- अपने जीवन में तो कोई घर बनाने की इच्छा है नहीं तुम्हारी।
--- हॉं, इसलिये तो मौत के बाद कोई घर होना ही चाहिये ही न... नहीं क्या?
--- मौत के बाद घर... क्यों भला?

स रात म अपनी डायरी में लिखेगी ---

ज हम देर तक उस सुनसान में घूमते रहे कुछ देर बाद हमें प्यास लगी हम फाटक के पास बैठे बूढ़े चौकीदार के पास गये और उसने कब्रों के बीच लगे हैंडपंप की ओर इशारा कर दिया लेकिन पानी पीने जाने से पहले उसने चौकीदार से पूछा कि यह कब्रिस्तान तो लगभग भर चुका है नये मुर्दे अब कहां आते होंगे चौकीदार ने कहा इस शहर के कब्रिस्तानों में अब बहुत कम जगह बची है उनकी एडवांस बुकिंग चलती है लोग अब इस शहर से सटे दूसरे शहरों में अपने मुर्दों को दफनाने ले जाते हैं फिर उसने कहा कि वह अपनी बुकिंग करवाना चाहता है तो चौकीदार हॅंसने लगा कि इतनी कम उम्र वाले की बुकिंग थोड़े होती है वो तो अंतिम समय पर आ पहुंचे  किसी इंसान की ही जगह रिजर्व की जाती है उसने जिद की कि मृत्यु का कोई भरोसा नहीं हो सकता है वह आज ही मर जाये अगर उसकी जगह रिजर्व हो जायेगी तो उसे मौत का डर नहीं होगा वह बेफिक्र हो तेज गति से चिल्लाते हुये कार चला सकेगा कि मर भी गया तो उसका कोई घर तो होगा...


बूढ़े चौकीदार को लगा शायद वह मौत से डरा हुआ कोई लड़का है, या वाकई वह था भी, या उसे कोई लाइलाज रोग है, या वाकई उसे था भी, और चौकदार ने उसकी चर्च के बारे में पूछा तो उसने झूठ बोल दिया डायोसीज चर्च जबकि वह ईसाई है ही नहीं फिर चौकीदार ने उसे सुझाया कि वह ग्रेवयार्ड कमेटी वालों से या अपनी चर्च के अधिकारियों से बात कर ले तो शायद लाइलाज रोग के आधार पर वे उसकी जगह बुक कर दें उसने बूढ़े को शुक्रिया कहा और हम पानी पीने चले गये....


हले उसने हैंडपंप चलाया मैंने मुंह  धोया जब मैं हैंडपंप चला रही थी वह पाइप से निकलता पानी अंजुरि में ले चेहरा धो रहा था उसके बालों से पानी रिस रहा था उसके गाल पर एक लकीर फिसल रही थी उसकी नारंगी टी शर्ट से चमकती धूप में संवलाई बॉंहों पर मांसपेशियॉं उभरी थीं मुझे लगा इन्हीं कब्रों के बीच ही मैं उसे छू सकती हूं जीवित इंसान हमारे उन्माद को सहन नहीं कर पायेंगे....

र कुछ दिन बाद तुमने म को इस पहाड़ी कब्रिस्तान के बारे में बताया था। तभी तुम दोनो ने तय किया था इस पहाड़ी कस्बे में आओगे, उजाड़ कब्रिस्तान में रातों में तब्दील होती दोपहरियॉं बिताओगे...कहॉं मालूम था तुम्हें तुम बहुत जल्द इन सूनी कब्रों के बीच होगे लेकिन तुम्हारे साथ म नहीं एम होगी, तुम छुप जाना चाहोगे लेकिन वह तुम्हें कब्र के पीछे से ढूंढ निकालेगी।

--- तुम मुझे फिर छोड़ चले गये ए!

तुम कुछ नहीं कहोगे, चुप देखते रहोगे उसकी पिंडलियों पर चमकते मृत्यु के हस्ताक्षर और इर्द गिर्द बिखरी चट्टानों को। एक टूटी बोतल भी पड़ी होगी जिसका स्टीकर तो उखड़ गया होगा लेकिन उसके ढक्कन से तुम अनुमान लगाओगे वह किंगफिशर बीयर की होगी।

ह पहाड़ी कस्बा विचित्र है। बर्फ यहॉं नहीं गिरती सिर्फ देवदार से ठंड झरती है। पचास साल पहले किसी देश से भाग कर आये कुछ मैरून चोगेधारियों ने यहॉं अपने घर बना लिये हैं, उनकी मोमबत्तियों की आंच में पूरा दिन इसकी गलियॉं सुलगती हैं, उनके प्रार्थना चक्रों की रुनझुन हवाओं में बजती है। अपने शहर से रात भर की बस यात्रा कर तुम और एम नौ मार्च की सुबह यहॉं आओगे। उस ठंडी सुबह तुम दोनो बस स्टैंड पर देर तलक खड़े रहोगे --- मोमो बेचती एक औरत, प्रार्थना चक्र लिये जाते दो बूढ़े, फुटबाल खेलते तीन बच्चे, बीयर बार और इनके परे हरे पहाड़।


--- तुमने बताया था तुम इस शहर में तीसरी बार आ रहे हो।
--- हां।
---तुम्हे यहां कुछ अजीब सा नहीं लग रहा?
--- अजीब सा?

तुम एम को देखते रहोगे। काले ओवरकोट से परे सफेद गरदन पर उभरी हरी नसें। पहाड़ों के उपर धुंध में बही जाती एक नारंगी लकीर। तुम दोनो चल पड़ोगे लेकिन एम कुछ कदम बाद ही रुक जायेगी। तुम्हे लगेगा पहाड़ी रास्ते पर बस में देर तक हिचकोले खाने के बाद उसकी तबियत बिगड़ गयी है।

क विचित्र से अंदाज में उसके होंठ बांये गाल की ओर खुलते जायेंगे, उसकी उंगलियां हवा में मचलेंगी कि कहीं कुछ लटका हुआ है जिसे तोड़ वह अपने समीप लाना चाह रही है, लेकिन वह चीज उससे छिटकती रहेगी, वृक्ष से झरते हवा में बिखरते सेमल के फूलों की तरह। तभी तुम्हें याद आयेगा परसों हवाई अड्डे से कार में आते वक्त तुमसे बात करते में एम बार बार खिड़की से बाहर या कार के ही अंधेरे में कुछ खोजने लगती थी, कल तुम्हारे शहर की सड़कों पर तुम्हारे साथ टहलते में भी बीच में रुक हवा में अटकी अदृष्य चीजें ढूंढने लगती, उसकी निगाह उपर जाती, साथ चलते तुम्हारी ओर मुड़ती फिर सड़क पर चलती गाड़ियों को टटोलने लगती।

--- ये लोग एक जैसे नहीं दिख रहे...भिंची ऑंखें, छोटे बाल, मरून कपड़े। कई सारे मवेशी झुंड में जा रहे हों।
---पता नहीं ये चोगेधारी इतनी सुबह उठ क्यों जाते हैं। झुंड बनाकर कस्बे की गलियों में चक्कर लगाते रहते हैं। मैं जब पहली बार आया था चौंक गया था... धीमे धीमे ये लोग सड़क पर चलते हैं, नहीं चलते भी नहीं, अपनी जगह खड़े बस हिलते हैं हिलते में ही आगे खिसकते जाते हैं मानो मरून पुतले हवा में हिल रहे हों।

किसी धनुष की प्रत्यंचा के माफिक खिंचा यह कस्बा एक गहरी खाई के मुहाने पर टिका था जिसके परे पहाड़ शुरु हो जाते थे। भले ही खाई जंगल में दुबक जाती थी कस्बे के किसी भी कोने पर जाओ पहाड़ कुछ ही दूर पर दिखलाई देने लगते थे तुम्हारे और पहाड़ों के बीच किसी गहरे गढ्ढे का आभास बना रहता था। भले ही न गिरो लेकिन गिरने की संभावना लगी रहती थी।

--- कभी कभी गिरने का मन होता है न। सब कुछ भूल एकदम गिरते जायें।

पीठ पर बैग टॉगे तुम दोनो चलते चलते एक मुंडेर पर आ जाओगे। एम नीचे झांकेगी, जंगली पेड़ों के बीच फिसलती खाई। सुबह के बादल का एक भूरा कतरा खाई पर पर्दे की तरह टंगा रहेगा।

--- यहां पूरी तरह गिर ही नहीं पाआगे। पेड़ों में ही उलझ कर रह जाओगे।
--- तुम कभी गिरी हो?
--- बहुत चोट लगीं हैं मुझे। मेरे बदन पर निशान देखोगे तो चौंक जाओगे।
--- वो चोट नहीं...ऐसे निशान तो मेरे भी बहुत हैं। इस तरह लुढ़कना कि मौत भी न संभाल पाये। द फ्री फॉल।

म देर तक पगडंडी पर खड़ी रहेगी। अपना बैग नीचे रख ओवरकोट के बटन बंद कर लेगी। तुम्हें अचानक याद आयेगा तुम महज शर्ट पहने हो और भले ही पिछले बीस मिनट से तुम इसी शर्ट में होगे लेकिन यह याद आते ही तुम्हें अचानक से ठंड लगने लगेगी।

--- तुम्हें इस शहर में विचित्र सी गंध नहीं आती?
--- गंध?
--- मौत की गंध।
--- मौत की गंध?
--- थोड़ी देर ही हुयी है बस से उतरे लेकिन न मालूम क्यों....।

तुम कहना चाहोगे मौत की गंध कहीं उसकी देह से ही तो नहीं आ रही लेकिन महज इतना कहोगे...

--- तुम्हें पता है यहॉं एक कब्रिस्तान भी है जिसकी कई कब्रों पर सवा सौ साल पहले के किसी हफ्ते की तारीखें खुदी हुईं हैं। जब मैं पहली बार यहॉं आया था चौंक गया था क्या सामूहिक आत्महत्या की थी लोगों ने यहॉं? या सबने मिलकर अपनी सम्मिलित मृत्यु को चुन लिया था?

म तुम्हें जरा भी नहीं सुनेगी। चारों ओर देखती रहेगी। उपर उठते पहाड़, देवदार के बीच चलती पतली पगडंडी, नीचे खिंची खाई और सोती हुई गायें। एम शायद कहना चाहेगी मरून चोगेधारी उसे किसी अतृप्त प्रेत की तरह दिखलाई दे रहे हैं जो अपने ठौर की तलाश में भटक रहे हैं। वह अचानक चुटकी बजाने लगेगी। दोनो हाथों से। तुम्हें लगेगा उसके सफेद चेहरे पर कोई गुलाबी बादल कंपकंपाता हुआ आ ठहर गया है।

--- क्या हुआ? तुम ठीक तो हो?
--- तुम मेरे साथ परेशान हो रहे हो न...।

म बस अड्डे से आगे जाती सड़क के किनारे लगी पत्थर की बैंच पर बैठ जायेगी। उसकी पुतलियां मचलने लगेंगी। वह काले ओवरकोट की जेब से अपना हाथ निकाल तुम्हारी हथेली जकड़ लेगी।

---मेरे वाक्य अक्सर लड़खड़ाते रहते हैं। सड़क पर चलते में, घर में भी मैं खुद को बड़ा असुरक्षित महसूस करती हूं मुझे लगा रहता है मैं कहीं भी कुछ भी भूल सकती हूं मेरे साथ कुछ भी हो सकता है, शैम्पेन का गिलास बजाय हलक में उतारने के बेसिन में भी ले जाकर फैला सकती हूं। तुम्हारे साथ न जाने क्यों मैं खुद को बड़ा सुरक्षित महसूस करने लगी हूं। शायद इसलिये ही तुम्हारे साथ तुरंत होटल में रुकने को तैयार हो गयी। कल रात जब बस रास्ते में रुकी थी और तुम मुझे बिना बताये उतर गये थे तो घबरा गयी।

--- तुम उस समय सो रहीं थीं।
--- हॉं, लेकिन तुम्हारे उतरते ही मेरी नींद खुल गयी थी। क्या ऐसा नहीं हो सकता जब तक मैं तुम्हारे देश में हूं तुम मेरे साथ रहे आओ।

हुत दिन नहीं हुये थे जब किसी और ने तुमसे ठीक यही कहा था --- म ने। एक दूसरे पहाड़ी शहर में। फर्क सिर्फ इतना था उस शहर कुछ दिन को छुट्टी बिताने गये तुम और म यह खेल खेल रहे थे कि म के सिर पर चोट लगी है, वह अपनी आवाज खो चुकी है, स्मृति के कुछ अंश ही बचे हैं जिनसे वह चीजों को थामने का प्रयास किया करती है, तुम्हें पल भर को भी आंख से परे नहीं होने देना चाहती। तुम दोनो साइन लैंग्वेज में बात किया करते, तुम्हारा होटल वाला समझता तुम अपनी बीमार पत्नी का कितना ख्याल रखते हो। उन्हें नहीं मालूम था वह महज खेल था।

क्या एम भी तो कहीं कोई खेल नहीं खेल रही। लाल सेमल के नीचे बैठी एम को तुम देर तक देखते रहोगे। नौ तारीख की सुबह। पहाड़ से उठती धुंध की एक लकीर के बीच। न मालूम क्यों तुम्हें लगेगा एम की काया पर एक पारदर्शी परत बिछी हुई है जिसके परे तुम देख ही नहीं पा रहे हो। तुम उसकी त्वचा का नकाब उघाड़ोगे तो उसकी असलियत सामने आ जायेगी या शायद उसके साथ असलियत जैसा कुछ है ही नहीं। प्याज के छिलकों की तरह तुम उसकी परत उतारते जाओगे लेकिन नीचे महज हवा होगी कि वह जो कुछ कह रही है उसके मायने नहीं वह निरा झूठ भी हो सकता है क्योंकि एम एक लड़की नहीं किसी कथा में, कथा को जीती महज एक किरदार है।

--- तुमने कहा था तुम्हारी छुट्टियां चौदह तक हैं। कम अस कम तब तक तो मेरे साथ रह ही सकते हो न।

पीठ पर बैग टांगें एम उस पहाड़ी सड़क पर ठिठक जायेगी। सुबह का लाल सूरज बेनूर होगा जब एम क्षितिज की ओर अपना चेहरा किये खड़ी होगी। नहीं। तब तलक वह एम नहीं होगी। उसका नामकरण उस पहाड़ी सुबह के तकरीबन सात घंटे बाद होगा जब दोपहर को तुम उसे कब्रिस्तान ले जाओगे। थोड़ी देर पहले अचानक आयी बारिश में तुम दोनो भीग कर सूख रहे होगे। सुनसान सड़क के बांये ढलान पर उतर अचानक से यह कब्रिस्तान आ जायेगा। न कोई दीवार, न फाटक चौकीदार। मुर्दे खुले आकाश  के नीचे सोये होंगे कोई उन्हें जगाना भूल गया होगा। वह एक एक कब्र पर ठहरेगी, उस पर जड़ी इबारत अपने कैमरे की ऑंख से देर तक देखती रहेगी। वह झुकेगी, काली स्कर्ट बूंद भर उठेगी, सफेद पिंडलियों पर मृत्यु के नीले हस्ताक्षर चमकने लगेंगे। तभी तुम्हें एहसास होगा वह नाम जो उसके ईमेल पर आता था तुम दोनो के बीच एक तटस्थ दूरी, एक अलंघ्य खाई खींच देता था जिसको बिना बदले तुम्हारे लिये उसके साथ सहज हो पाना संभव नहीं था।

--- मैंने तुम्हें कल बताया था न जब मैंने तुम्हें परसों रात पहली बार देखा तो मुझे लगा एक ऐसी दूरी है हमारे बीच जिसे मैं कभी पार नहीं कर पाऊंगा।
--- हां, तो....।

तरती पहाड़ियों के बीच लेटी कब्रों की तस्वीर लेती एम अपना कैमरा तुम्हारे उपर ठहरा देगी, नहीं एम नहीं, तब तक वह एम नहीं थी।

--- इन कब्रों के बीच अचानक मुझे लगा वह दूरी तुम्हारे नाम के अक्षरों की है...तुम्हारा नाम तुमसे कतई मेल नहीं खाता... उसके अक्षर, ध्वनियॉं किसी और दुनिया की लगती हैं...।
--- कौन सी दुनिया... वो जिसे मैं खो चुकी हूं?
--- पता नहीं....मैं तुम्हें एम कहूं चलेगा?
--- एम? मतलब?
--- एम मतलब एम।

तुम खाई की मुंडेर पर आ गये। नीचे झांक कर कहा।

--- ए.....म....एम।
--- एम, क्या?
--- एम नहीं...। ए...म....एम।
--- ए....म....एम।
--- दोनो एक साथ कहेंगे, हमारी आवाज हवाओं में मिल जायेगी।

स दोपहर आवाजों के दरमियां फासले मिटने लगेंगे। दो होंठों से निकली आवाजें हवा में, पहाड़ों पर घुल जायेंगी। आवाज का अर्थ महज आवाज, आवाज के भीतर महज आवाज। आवाज के पिंजरे में कैद तुम दोनो।

--- ये कब्र देखो... अठारह सौ बासठ में कोई छब्बीस की उम्र में चला गया था।

हते चटके पत्थरों की कब्रों के बीच तुम दोनो देर तक खड़े रहोगे। 1836--1862 । उस छब्बीस साल के इंसान की कब्र पर धुंधलाते नाम को पढ़ते हुये। लेकिन A के अलावा कुछ और नहीं दिखलाई देगा। सारे अक्षर धुंधला चुके होंगे ...." In The Loving Memory Of My Darling Husband A..." से तुम्हें मालूम चलेगा वह कोई लड़का रहा होगा।

तुम्हारे जूतों पर कीचड़ लग चुकी होगी। कुछ छींटे उसकी पिंडलियों पर धब्बे छोड़ जायेंगे। एम बैग से टिष्यू पेपर निकाल साफ करना चाहेगी लेकिन रहने देगी। काले धब्बे मृत्यु के नीले निषानों में

घुलने लगेंगे। एम नीचे झुक एक तस्वीर कब्र की लेगी फिर तुम्हारा क्लोज अप जिसमें उस कब्र के सिरहाने लगा क्रॉस समा जायेगा।

--- मैं तुम्हें ए बुलाऊंगी...Al Pacino.
--- तुम भी Al Pacino की फैन हो...मैं पागल हूं उसके लिये!
--- मैं बहुत पहले ही समझ गयी थी! स्कारफेस कितनी बार देखी है?

! न मालूम कितने नाम तुम्हारे भीतर सहसा उमड़ते आएंगे। उस ठंडी दोपहर कोई चिमगादड़ तुम्हें छूता निकलता जायेगा। तुम अपनी कहानियों में संयोग के हिमायती नहीं रहे हो, संयोग क्या किसी भी चीज के हिमायती नहीं। लेकिन जब कुछ दिन बाद तुम इस कथा को, अपने स्वान सॉन्ग को लिखने बैठोगे तो तुम्हें एहसास होगा ए और एम/म --- पूरी कथा इन दो अक्षरों के इर्द गिर्द ही घूम रही थी।

नाम। तुम कई सालों से कहानियॉं लिख रहे हो। किरदारों के नाम तुम्हें बहुत लुभाते हैं। तुम उन लेखकों में से नहीं जो सर्वनाम तक ही सिमट जायें। नाम तुम्हारे किरदारों को एक आत्मीय धागे में बॉंध देता है। तुम्हें लेकिन नहीं मालूम था एक दिन तुम ऐसी कथा के बीच, ऐसे पहाड़ी कस्बे में अपने को पाओगे जिसके किरदार अपने नामों के बावजूद अधूरे, अनाथ दिखेंगे और तुम्हें उन्हें नये नाम देने ही होंगे।

गर तुमने इस काले ओवरकोट वाली से उसका नाम-नकाब हटा उसे एम कहना शुरु किया था तो बांये नथुने में लौंग पहनने वाली उस लड़की ने तुमसे मिलने से पहले खुद ही अपना नाम म रख लिया था।

--- तुम्हारा नाम किसी धनुष की सी प्रत्यंचा पर तनी तुम्हारी काया को अभिव्यक्त नहीं कर पाता। तुमने अगर अपना नाम न भी बदला होता तो भी मैं तुम्हे नया नाम देता।

ह तुमने म से पहली ही मुलाकात में कहा था। मार्च की इन दोपहरियों से पॉंच महीने पहले।

। मार्च।

ह अक्षर इस कथा में कई जगह उभरेगा। ए की ही तरह।

पंद्रह दिन पहले जब तुम म से आखिरी बार मिले थे उसने तुम्हारा हाल पूछा था और तुम पिछले दिनों तुम्हारे साथ होती विचित्र घटनाओं को बताने लगे थे।

--- तुम्हारे नाम से मिलता एक विदेशी लेखक का नाम है। उसके एक उपन्यास में नायिका अचानक नायक को छोड़ चली जाती है और नायक अजीब चीजों,घटनाओं के बीच खुद को पाता है। मेरे साथ ऐसा ही हो रहा है। इन दिनों बतौर पत्रकार मैं एक बहुत बड़े कांड की तफ्तीश कर रहा हूं, खुफिया जानकारियॉं खुद ब खुद मेरे पास आ रही हैं।

तुम्हारे साथ चल रही होगी। पेड़ों से घिरी उन्हीं सड़कों पर जिन पर वह कुछ दिन पहले तक रोज तुम्हारी बॉंह थामे देर रात तक टहला करती होगी, जिन सड़कों पर कुछ दिन बाद तुम आठ मार्च की दोपहर एम के साथ चलने वाले होगे।

--- तुम तो हफ्ते भर में ही बहुत दुबले हो गये हो। अपना ख्याल क्यों नहीं रखते।

तुम म की ओर पलटे, वह ठिठक कर तुम्हें ही देख रही थी। फरवरी के पतझड़ की पत्तियों की ढेरी फुटपाथ पर किसी छोटी पहाड़ी की तरह उग आयीं थीं। तुम दोनो एक ढेरी के बीच अपने पंजे फंसाये खड़े थे।

--- उस उपन्यास का नायक अपनी रूह किसी अजगर की गिरफ्त में पाता है, कई दिन एक अंधेरे कूएं के तल में भी जाकर भूखा प्यासा बैठा रहता है लेकिन अचानक उसकी जिंदगी में अजीब इंसान, लड़कियॉं आने लगती हैं। मेरी हड्डियॉं पिघल रही हैं, पिछले बीस दिनों में वजन आठ किलो कम हो गया है, चलते में भी डर लगा रहता है लुढ़क न जाऊं। कार को किसी अंधेरे कोने में खड़ा कर उस पर कवर ढक रात भर उसके अंदर दुबका बैठा रहता हूं।

--- तुम्हें लगता है मैं हमेशा को चली गयी हूं, अब नहीं लौटूंगी?

तुम दोनो चलते चलते एक पुराने मकबरे में आ गये थे। तुम्हारे उपर चिमगादड़ मंडरा रहे थे। उनकी गंध में डूबे तुम दोनो के चार महीने मकबरे के अंधेरे में बज रहे थे।

--- तुम्हें मालूम है न तुम मेरे कमरे में आयी पहली लड़की थी। मैं तुम्हें अंतिम भी बनाना चाहता था....।

स अंधेरे में भी म की लौंग चमक रही होगी, वही लौंग जो ग्यारह अक्टूबर की उस रेल यात्रा में सिहरी होगी जो तुम दोनो की पहली मुलाकात होगी, तुम दोनो एक दूसरे शहर से अपने शहर लौट रहे होगे। तुम दोनो फर्स्ट क्लास एसी के कंपार्टमैंट में होगे, वह रात ठंडी और लंबी होती जायेगी।

लेकिन मकबरे की वह दोपहर दस फरवरी को सुलगा रही होगी। तुम्हारी रूह चिटख कर जल रही होगी, तुम उपन्यास के नायक को बतलाते जाआगे जो अचानक खुद को एक चक्रव्यूह में पाता है।

ठीक एक महीने बाद दस मार्च की सुबह तुम इस पहाड़ी कस्बे की सूनी झील के किनारे एम के साथ बैठे उसी कथाकार के एक दूसरे उपन्यास को बतला रहे होगे। कस्बे से आती पगडंडी अचानक से जंग लगे लोहे के रिवॉल्विंग दरवाजे पर खत्म हो जायेगी जिसे पार कर झील शुरु होती होगी। पहाड़ों से घिरी इस झील के दूसरी ओर प्राचीन मंदिरनुमा गुफा मृत देवता का रास्ता देखती रहेगी।

--- विचित्र कस्बा है यह ए। महज दो गलियॉं हैं जो चौक से शुरु होती हैं मरून चोगेवालों के गुरु के घर में मिल जाती हैं। उन गलियों में सभी मंडराते रहते हैं। लेकिन यह पहाड़ी सड़क, कब्रिस्तान और झील.... यहॉं कोई नहीं आता।
--- कल तुमने मुझे जिद करके रोक लिया एम जबकि मेरा जाने का बहुत मन हो रहा था। लेकिन आज लगता है शायद ठीक ही हुआ मैं नहीं गया।
--- क्यों?
--- अगर मैं चला जाता तो कभी नहीं जान पाता तुम्हारे साथ जो दूरी मैंने हवाई अड्डे पर महसूस की थी वह दरअसल तुम्हारे नाम के अक्षरों में बज रही थी। दूसरा, मैंने हवाई अड्डे से होटल जाते में कहा था न कि तुम उस उपन्यासकार की कोई नायिका लगती हो जिसका नाम तुम्हारे नाम से मिलता है और जो तुम्हारी मां के देश का भी है।
--- हॉं, लेकिन तुम नहीं बतला पाये थे तुम्हारे जेहन में कौन सी नायिका और कौन सा उपन्यास है।

तुम देर तक तीन ओर से पहाड़ों से घिरी झील को देखते रहोगे। बहुत कम लोगों को मालूम होगा इस कस्बे में कोई झील भी होगी। हंस का एक जोड़ा एकदम थिर पानी में चुपचाप तैर रहा होगा। झील के दूसरे सिरे पर।

--- क्या सारी चीजें जान लेना, बतला देना जरूरी है.... काश मैं भी तुम्हारी तरह चीजों को अधूरा छोड़ आगे बढ़ना सीख जाता।
--- अधूरा?
--- तुम कई सारी चीजें भूल जाती हो। कुछ बताते वक्त भी तुम्हें काफी कुछ याद नहीं आता लेकिन तुम फिर भी चलती चली जाती हो।

म अपने गले में लटका कैमरा आंख से लगायेगी, तुम्हें हॉंलॉकि नहीं दिखेगा उसके व्यूफाइंडर के परे क्या है लेकिन तुम कैमरे की दिशा से अनुमान लगाओगे कि क्लिक की ध्वनि पर हंस उसकी रील पर ठहर गये होंगे।

---मैं एक द्वीप पर रहती हूं, दुनिया भर के परिंदे आते हैं वहॉं लेकिन यह पक्षी नहीं देखा कभी।

सकी बांयी आंख भिंची होगी, दांयी बंद। तुम्हें याद आयेगा वह सारे काम दांये हाथ से करती थी लेकिन कैमरे से तस्वीर खींचते वक्त बांयी ऑंख पर भरोसा करती थी। उसकी इस आंख से बेखबर हंस चुपचाप तैर रहे होंगे और सहसा हमेशा तुम्हारे साथ चलता एक सपना तुम्हारे पास आ जायेगा -- स्वान सॉन्ग। तुम्हारा मन होगा नजदीक जाकर हंसों को देर तक देखो लेकिन अपनी जगह ही बैठे रहोगे।

--- तो तुम चीजों को भूलना चाहते हो।

म अपना ओवरकोट उतार बगल में रख लेगी। काली टी शर्ट के नीचे उसकी सफेद बॉंहें। वह जब भी कुछ खास कहना चाहती ओवरकोट उतार लेती।

--- भूलने के लिये तुम्हें भी किसी एक्सीडैंट से गुजरना होगा।
--- एक्सीडैंट?
---कुछ साल पहले मेरा एक्सीडैंट हुआ था। हॉस्पीटल में होश आया तो अपना नाम तक भूल चुकी थी। मुझे कुछ चेहरे याद रहते लेकिन उनके साथ अपना संबंध नहीं बिठा पाती। मुझे कई भाषायें आतीं थीं। मॉं जापानी, पिता आयरिष होने की वजह से जापानी, अंग्रेजी के अलावा फ्रेंच, इटालियन, स्पेनिश और अमरीकी रैड इंडियंस की भी। लेकिन मैं सब कुछ भूल गयी। अब अंग्रेजी भी ढंग से नहीं बरत पाती हूं, मेरी क्रियायें, विषेषण लड़खड़ाने लगते हैं।
--- एक्सीडैंट के बाद कुछ महीने तो मैं अक्सर अपने बजाय पड़ौसी के घर में घुस जाया करती थी। मेरा मॉडलिंग कैरियर खत्म हो रहा था, मैं सब कुछ भूल रही थी और उन्हीं दिनों मेरी रंगों से दोस्ती हुई। मुझे बहुत अधिक नहीं याद उन दिनों का लेकिन मैं दिन भर कैनवास पर ब्रश फिराती रहती थी। मैं ज्यादा देर तक कुछ भी सोच नहीं पाती थी किसी भी चीज पर एकाग्र नहीं हो पाती थी लेकिन न मालूम रंगों में क्या था कि मैंने शब्द भाषा खोई तो रंगों की वर्णमाला मेरी होने लगी। मैं शब्दों में नहीं रंगों में सोचने लगी। बात करते में मैं कोई चीज भूलती तो कागज पर रेखायें खींचने लगती। कोई भी विचार, मसलन खुद को खत्म करने की चाहत, मुझे रंगों में उमड़ती। मैं मृत्यु के रंगों की कल्पना किया करती कि मौत का रंग कैसा होता होगा, जब मरूंगी तो मेरी देह किन रंगों में उघड़ती जायेगी।

म बिना तुम्हारी ओर देखे बोलती जायेगी। कैमरा गले से उतार ओवरकोट पर रख देगी। सैंडिल भी उतार देगी। नंगे पंजों से उपर उठती पिंडलियां।

तुम्हें लगेगा दूर देश से आयी एम चित्रकार नहीं कोई लेखक ही है जो सही शब्द की तलाश में है या फिर दो प्रजातियों का लहू अपने में समाये जीती वह षायद दो दुनियाओं के बीच मंडलाती है --- एक जो जिग्सा पज़ल की तरह बिखरी है जहॉं धुंध है, विस्मृति का पर्दा है, अधूरे रंग, टूटी लकीरें, अबोली आकांक्षाएं और धुंधले अक्षर हैं और दूसरी जिसमें पज़ल की टूटती-बनती आकृतियॉं हैं, अतीत के कूएं से डोलची में खींच कर लाया गया छलकता पानी है। यह दो दुनिया उसकी देह को विपरीत दिशाओं में खींचती, वह घिसटती जाती। उसकी यह फिसलन इतनी चमकीली होती कि हंसों को इस झील में तैरते देखते हुये भी तुम उसे महसूस कर सकते थे।

हंस अब जंग खाये लोहे के रिवॉल्विंग दरवाजे की ओर जा ठहर जायेंगे। तुम्हें अजीब सा लगेगा एकदम खुली झील है यह। कोई दीवार नहीं। कब्रिस्तान की तरह। कभी यहॉं दीवार रही हो इसका भी कोई निशान नहीं। फिर यह तीन फुट ऊंचा घूमता हुआ दरवाजा क्यों है यहॉं जिससे एक बार में सिर्फ एक ही व्यक्ति अंदर जा सकता है, दूसरे व्यक्ति को अंदर जाने के लिये उस दरवाजे को अपनी ओर घुमाना पड़ेगा। अंदर! इस निर्बाध वीरान में अंदर और बाहर का मतलब ही क्या है? जो बाहर है वही अंदर भी है और इसका विलोम भी सही है। क्या एम की दो दुनिया भी ऐसी ही तो नहीं --- पहली दुनिया ही दूसरी है और इसका विलोम भी सही है। क्या वाकई दो दुनिया हैं भी या महज एक ही है। न मालूम क्यों तुम्हें लगेगा चीजें वो एकदम नहीं हैं जो तुम्हें दिखलाई दे रहीं हैं या एकदम वही हैं जो तुम्हें दिखलाई नहीं दे रही हैं या इसका विलोम भी सही है। कोई खेल खेला जा रहा है क्या यहॉं?

म घुटनों में सिर झुकाये बैठी होगी तुम्हें लगेगा जमीन पर उंगलियों या डंडी से कोई आकृति बना रही होगी तुम कनखियों से झांकोगे लेकिन जमीन उसके बालों तले ढकी होगी तुम अपनी जगह से थोड़ा खिसकोगे और तुम्हें जमीन खाली दीख जायेगी उसकी उंगलियॉं पैर का अंगूठा मसलती होंगी। शायद एम अपने पंजों के नीचे कोई तीसरी या चौथी दुनिया टटोलती होगी। उसके पंजों पर चढ़ता एक कीड़ा पिंडलियों पर खुदे मृत्यु के हस्ताक्षर पर आ ठहर जायेगा। तकरीबन ढाई इंच का वह कीड़ा घास के रंग का होगा इसलिये जमीन पर दिखलाई नहीं देगा। लेकिन जब वह उसकी टांगों पर ठिठका हुआ होगा तो सफेद मांस सा दिख रहा होगा, उसकी देह का ही कोई अंश लग रहा होगा। बस उसके लाल नुकीले डंक लपलपा रहे होंगे। काली स्कर्ट हवा में आहिस्ते से हिलेगी लेकिन कीड़ा वहीं रहा आयेगा।

तुम्हारा मन होगा उसे हटा दो लेकिन उसके डंक को नीले निशान पर टकटकाते देखते रहोगे। अगर वह कीड़ा जहरीला हुआ तो? तुम आसपास देखोगे, हरे पानी की सूनी और सुन्न झील सिर्फ। देवता का मुंतज़िर एक प्राचीन गुफानुमा मंदिर। एक खोखा जिसमें शायद कोई बुढ़िया चाय और टोस्ट लिये बैठती होगी लेकिन कुंडी बंद कर जा चुकी होगी। कस्बा यहां से चार किलोमीटर दूर होगा, कोई वाहन सूने पहाड़ी रास्ते में नहीं मिलना होगा। यानी अगर एम को कीड़े ने काट लिया और वह जहरीला हुआ और अगर एम बेहोश हो गयी तो उसे कस्बे तक पहुंचाने से पहले ही शायद वह मर जायेगी। लेकिन तुम उसे ले कैसे जाओगे? क्या तुम उसे वहॉ तक अपनी गोद में उठाकर ले जा पाओगे। और अगर वह मर जाती है तो दो चीजें साबित हो जायेंगी --- पहली, वह वाकई उस कथाकार के उस उपन्यास की नायिका है जिसका ख्याल तुम्हें कुछ देर पहले आया था।

दूसरा, तुम्हारी कथा में दो नायिका निर्णायक तौर पर आ जायेंगी।

लेकिन तुम्हारी और म की कथा में एम आयी ही क्यों? जब तुम इस पहाड़ी कस्बे आ रहे थे तो भले ही एम तुम्हारे साथ थी लेकिन तुम्हारा गूंगा हंस आकाश की ओर सर उठा म को ही संबोधित होना चाहता था। क्या एम को महज इसलिये होना था कि तुम म के पास कहीं निर्णायक तौर पर, कम अस कम स्मृति में ही सही, मुड़ सको? या उसे इसलिये होना था कि तुम म से मुक्त हो सको?

मुक्ति? कोई पहाड़ों पर मुक्ति के लिये आता है क्या? क्या आलाप कभी अंतिम होता भी है? तुम आगे बढ़ जाना चाहोगे और सहसा एहसास होगा यह तो महज आरंभ था, अब आरोह उमड़ कर आयेगा। क्रीड़ा तो अब शुरु होगी।

तुम देर तक झील के किनारे बैठने के बाद एम के साथ इन पहाड़ियों पर चढ़ने लगोगे, महज एक शर्ट पहने तुम्हें ठंड लग रही होगी, वह तुम्हें अपना ओवरकोट पहना देगी। तुम जींस की जेबों में हाथ ठूंसे चल रहे होगे।

--- तुम कुछ ढूंढ रहे हो?
--- ढूंढ  रहा हूं....नहीं तो।
--- फिर सिर झुकाये इतना धीमे क्यों चल रहे हो।

तुम चढ़ते में रुक जाओगे। जींस की जेब से हाथ निकाल ओवरकोट की जेब में डाल लोगे। स्ट्राबेरी लिपबाम, टिशु पेपर और कुछ सिक्के तुम्हारी उंगलियों से टकरा जायेंगे।

--- एम, अमरीकी अपने अतीत के प्रति इतने बेफिक्र क्यों होते हैं?

म पलट कर तुम्हें देखेगी, उसे लगेगा तुमने अचानक उसके ओवरकोट से कोई कबूतर निकाल उसके सामने लहरा दिया है।

--- अमरीकी दुनिया भर की खोज करते फिरते हैं लेकिन उन्हें इसकी कोई फिक्र नहीं उनके पुरखे कहां रहते थे। उनके पुरखों के घर, कस्बे यूरोप में बिखरे पड़े हैं लेकिन उन्हें खोजने, उनके अंतिम चिन्ह बटोरने कोई नहीं आता। हम भारतीयों को देखो, अपने अतीत के लिए मरे जाते हैं।

म तुम्हारे पास आयेगी, तुम्हारे सीने पर लहराते ओवरकोट की अंदर वाली जेब से छोटा चाकू निकाल लेगी। उसे खोल तुम्हारे चेहरे पर लहरायेगी, तुम चाकू की धार की चमक में आंखों को फूटता महसूस करोगे। वह हंसेगी, पीछे हट जायेगी। देवदार का तना चाकू से खुरचने लगेगी।

--- मेरी मां जिद करती थी मुझे जापान जाना चाहिये, लेकिन मैं सिर्फ एक बार गयी थी। बचपन में। शायद मुझे फिर से जाना चाहिये।

ह कुछ चित्र छाल पर बना चुकी होगी। दो छोटे त्रिकोण, उन्हें बीच से काटती दो लकीरें।

--- ये मेरी मां के कस्बे का नाम है। जहॉं उनका जन्म हुआ था। लकड़ी का घर था, बस इतना याद है मुझे। हो सकता है पहले कुछ और भी याद हो लेकिन भूल गयी शायद।
--- पता है एम, मैंने जब तुम्हें पहली बार देखा था तो तुम्हें लैटिन अमरीकी समझा था। मैक्सिको या अर्जैंटीना। तुम गैब्रिएला सबातीनी सी लगी थीं। मोनिका बलूची सी भी।
--- ये पहली वाली कौन है?
--- टेनिस खेलती थी। बोरिस बेकर के समय की थी।
--- अक्सर लोग मुझे लैटिनो समझ जाते हैं। काले बाल और कर्वी फिगर, अमरीकी औरतें अक्सर ऐसी नहीं होतीं।

म अब तक तने पर कई आकृतियॉं बना चुकी होगी, एक देवदार के बाद दूसरे की छाल खुरच रही होगी। तुम्हें याद आयेगा उसने कहा था वह आकृतियों और रंगों में कहीं बेहतर सोच पाती है। जब भी उसे कुछ याद करना होता है वह लकीरें खींचने लगती है अतीत की तलछट सतह पर आने लगती है। तुम भी एक पेड़ पर जा डंडी से तने को छीलने लगोगे। देर तक छीलते रहने के बाद बिना उसकी ओर मुड़े कहोगे।

--- एम क्या ऐसा भी होता है अगर कोई लड़की किसी के साथ खुद को बहुत स्वतंत्र, उनमुक्त पाती है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह उसके लिये पागल भी होगी। कई बार ऐसा भी होता है लड़की का उन्माद उस इंसान के लिये उमड़ता है जहॉं वह खुद को उसकी गिरफ्त में, गुलाम, घुटता हुआ महसूस करती है। बार बार उस फंदे में कैद होने उसके पास आती है।

म तुम्हें देखेगी लेकिन तुम्हारी पीठ उसकी ओर होगी। वह फिर से अपने रेखाचित्र बनाने लगेगी।

--- फिक्र न करो, चीजें इस तरह खत्म नहीं होतीं।
---नहीं एम। अब हमारे बीच कुछ नहीं बचा।

म चित्र बनाना छोड़ तुम्हारे पास आ जायेगी। तुम्हारा चेहरा अपनी हथेलियों में बांध लेगी। उसकी आंखें  तुमसे छुलने लगेंगी, तुम उसके बाल अपनी गरदन पर सिहरता महसूस करोगे। एक बहुत बारीक आवाज उमड़ती आयेगी..

--- इस बेवकूफ लड़के से कोई दूर जा सकता है कभी। वह जिसके पास लौट गयी है, उसके साथ ज्यादा देर नहीं रह पायेगी। मुक्ति का एहसास कहीं बड़ा होता है। तुम्हारी कहानी में अभी बहुत कुछ होना बाकी है।

 तुम दोनो उभरे पत्थरों के बीच कदम जमाते धीमे धीमे चढ़ते जाआगे। उलझी लताओं में तुम्हारे जूते फंसेंगे, तुम लड़खड़ाओगे, पैर बाहर निकालोगे। जंगली जानवरों के निशान गीली मिट्टी में बने होंगे। सुबह की बरसात के बाद मिट्टी अभी भी रिस रही होगी। रास्ते में तुम अचानक अटक जाओगे। किसी गाय का शायद गोबर पड़ा होगा। तुम नीचे झुकोगे, गौर से देखोगे, एम पलट कर तुम्हें देखेगी, चौंक जायेगी कि तुम किसी जानवर के किये कराये में क्यों दिलचस्पी ले रहे हो। तुम उसे डंडी से टटोलोगे, हां, वह गाय का ही होगा। तुमने बचपन में बहुत सी गाय देखी होंगी। तुम गोबर को न पहचान ही नहीं सकते। लेकिन गाय इस पहाड़ी पर जंगली पेड़ों के बीच कैसे चढ़ कर आयी होगी। वो भी गोबर करने।

--- तुम रस्सी नहीं कूदते?
--- रस्सी?

म कुदकती हुई चलती जायेगी मानो रस्सी कूदती जा रही हो।

---स्किप योर ब्लूज़ अवे। जब भी उदास हो रस्सी कूदना षुरु कर दो।

तुम देवदार की कतार के बीच चढ़ती जाती एम को देखते रहोगे। किसी गिलहरी की तरह कुदकती हुई वह आगे जा चुकी होगी। पीछे मुड़कर तुम्हें देखेगी।

--- जल्दी आओ। उदास होने का अधिकार सिर्फ मुझे है। तुम्हारा काम सिर्फ मुझे खुश रखने का है। इस कहानी की उदास किरदार मैं हूं, तुम नहीं।

तुम चुप एम को सुनते रहोगे। बहुत समय नहीं बीता था जब म भी यही कहा करती थी --- मैं ट्रेजिडी क्वीन हूं। तुम सिर्फ और सिर्फ मेरा ख्याल रखने के लिये बने हो।

तुम उस सुनसान चढ़ाई पर उभर आये किसी पत्थर पर बैठ जाओगे। सेमल के लाल फूल की पंखुड़ियां नोंच-नोच कर फेंकते रहोगे। यह भले ही दोपहर थी लेकिन तुम उस जगह आ गये थे जहां आकाश की रोशनी पेड़ के पहाड़ों को चीर नहीं पाती थी, पूरा दिन धुंधलका छाया रहता था।

म कभी किसी परी की तरह बांहों को पंख बना लेती। नाचती सी मुद्रा में बांहें फड़फड़ाती पहाड़ी ढलान से उतरती कि उसके पंख हैंड ग्लाइडिंग के यंत्र हों और वह हवा में उड़ने ही वाली हो। तुम्हें पुकारती लेकिन तुम वृक्षों से उठती धुंध तले बैठे रहते। और तब तुम्हें लगता आखिर क्यों तुम्हारे साथ होते हुये भी म किसी और के जाले अपने इर्द गिर्द बुन रही होती थी। कुछ अनुपस्थितियां हमें किसी अन्य की उपस्थिति में कहीं साफ दिखलाई देने लगती थीं। यह उपस्थिति अनुपस्थिति को कहीं गाढ़ा और चमकीला बना देती थी। ऐसा नहीं कि यह उपस्थिति कहीं कमतर थी, दरअसल यह इतनी संकोची हुआ करती थी कि खुद ही उस अनुपस्थिति को अपना घर बनाने के लिये अपनी रूह छील कर जगह दे दिया करती थी।

हां होगी म इस वक्त? कितना अजीब होता है जिसे तुमने चाहा था कभी उसे अपनी कल्पना में किसी अन्य के साथ दृश्य करना।

तुम सिर झटकोगे, पत्थर से उठ जाओगे। एम अभी भी आगे खड़ी होगी। आधी बाजू की काली टी शर्ट में। तुम ओवरकोट उतार उसे पहना दोगे। देर तक तुम्हारी देह पर काले ओवरकोट में बसी उसकी गंध ठहरी रहेगी। तुम्हें सहसा अपने बचपन का एक खेल याद आयेगा।

ह तुम्हारा प्रिय खेल था। तुम बचपन में रात को सोते वक्त नींद न आने पर एक किरदार को गढ़ लेते थे, फिर उसे दो भागों में बांट देते। आईने में प्रत्यावर्तित होती उनकी छवियां  काढ़ देते। वे दो प्रतीत होने लगते थे। फिर तुम उनके कई और टुकड़े करते जाते। तुम्हारी कहानी में इस तरह कई किरदार आने लगते। तुम्हारे भीतर खुफिया मौज उमड़ती। तुम्हें लगता इस तरह तुम सबके साथ एक खेल खेल सकते हो जो भी तुम्हारी कहानी पढ़ेगा सोचेगा तुमने इतने सारे किरदार गढ़ दिये हैं लेकिन वह कभी नहीं जान पायेगा कि किरदार महज एक ही था, तुम ही उसे अलग लिबास, चेहरे पहना दिया करते थे, और तुम चैन से सो जाया करते थे।

लेकिन यह तुम भी नहीं जान पाओगे कि कोई किरदार कहीं था ही नहीं, न ही कोई कस्बा या कब्रिस्तान हुआ करता था। समूचा खेल महज तुम्हारी ही फुरसत और फितूरों का कमाल और करिश्मा था। तुम ही एकमात्र किरदार थे जो लंबी रातों में नींद न आने पर खुद को ही गढ़ते , मढ़ते और पढ़ा करते थे।

हसा इस देवदार के जंगल के बीच तम्हें कुछ सूझेगा। तुम दोनो एक पेड़ के इर्द गिर्द आ ठहर गये जाओगे।

--- जिस उपन्यासकार का मैं जिक्र कर रहा था एम, उसका नाम तुम्हारे ही अक्षर से शुरु होता है और वह तुम्हारी मां के ही देश का है।

तुमने बोतल खोल एक घूंट पानी पिया है, बोतल उसकी ओर बढ़ा दी है।

--- उसके एक उपन्यास में एक लड़का अपने पिता की रहस्यमय हत्या के बाद घर से भाग जाता है। उसे शक है यह हत्या उसकी मां ने की है, वह औरत जिसे उसने कभी नहीं देखा। दूर किसी शहर में वह एक औरत से मिलता है जो उसके अनुसार उसकी मां है और वह उसके साथ एक बार सोना चाहता है। उस औरत को कतई यकीन नहीं होता कि वह उसकी मां है, वह उसे कोई सरफिरा लड़का समझती है लेकिन फिर भी उसे उसकी फिक्र होने लगती है। और उससे एक दिन एकांत में मिलने के तुरंत बाद वह मर जाती है।

तुम अचानक से चुप हो जाओगे। एम के चेहरे का रंग बदलने लगेगा। अजीब सी हरी परत उसके गालों पर बजने लगेगी। वह अपने कोट की जेब में रखे चाकू को जकड़ लेगी।

--- मैं तुमसे थोड़ी बड़ी हूंगी बस, लेकिन तुम्हारी मां की उम्र की तो नहीं हूं।

हुत देर तक तुम उसे, वह तुम्हें देख रही है। सेमल पर शाम सिसक रही है। एम के हाथ में थमी बोतल पकड़ ढीली हो जाने की वजह से अचानक फिसल नीचे जा लुढ़की है। उसका पानी एम के पंजों को भिंजो रहा है।

--- तुमने वह उपन्यास ढंग से पढ़ा तो है ए, ऐसा तो नहीं कि उस लड़के ने ही अपने पिता की हत्या की हो और इसी वजह से वह घर से भाग आया हो और अब इस अपराध बोध से बचने के लिये वह अपनी मां को भी मार डालना चाहता हो, जिसने शायद उसकी यह मंशा भांप ली थी कि वह अपने पिता का कत्ल कर उसके साथ सोना चाहता था।

! पिता का कत्ल! न मालूम कहॉं से उमड़ता एक अक्षर तुम्हारे पास आ जायेगा। तुम जंगली लताओं में फंस जाओगे, कपड़ों पर उनका रस लिसड़ आयेगा।

--- तुम्हें पता है एम मेरा एक पूर्वज है, जिसका नाम भी ए से ही शुरु  होता है जिसकी हत्या का आरोप शायद मेरे ऊपर ही आयेगा क्योंकि बजाय फूल चढ़ाने के मैं उसकी कब्र तोड़ डालना चाहता हूं लेकिन विश्वास मानो एम, मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगा। जब तलक मेरे साथ हो तब तक तो नहीं।

र दस मार्च की रात अपने होटल के कमरे में जब तुमने छत तक जाती कांच की खिड़की का पर्दा हटाया तो पहाड़ों के पीछे छायी रुपहली धुंध को देख तुम्हें लगा इस पहाड़ी कस्बे में तुम्हारा अंतिम आलाप सिर्फ म को ही नहीं तुम्हारे उस पुरखे को भी संबोधित होना था जिसे तुम हमेशा ठुकराते आये थे और जो अपनी कब्र में से भी शायद हर वक्त तुम्हें पुकारता रहता था। थोड़ी देर पहले ही म का इसी चीज पर एसएमएस आया था। यह पूर्वज तुम्हारी ही भाषा में लिखता था लेकिन तुम्हें इसके अक्षर अनजाने शब्द शर्मनाक भाषा भयानक लगा करती थी। म न जाने क्यों चाहती थी तुम अपने इस पूर्वज की तलाश में निकल पड़ो, उसने कई बार तुमसे कहा था तुम्हें इस मृत बूढ़े को मरा हुआ नहीं मान लेना चाहिये, उसकी भटकती आत्मा से संवाद करना चाहिये। पंद्रह दिन पहले जब तुम आखिरी बार मिले थे, म ने कहा था।

---वह तुम्हारा पितामह था।
--- मेरा उससे कोई संबंध नहीं। मैं इस वक्त उसके बारे में नहीं सोच पा रहा हूं। तुम जानती हो मैं इस वक्त कुछ भी नहीं सोच पा रहा हूं।

तुम दोनो मकबरे के अंधेरे में खड़े थे। काले चिमगादड़ तुमसे बलिश्त भर की ऊंचाई से गुजरते जाते थे। तुम्हें अचानक याद आयेगी ए नाम वाले उस फिल्मकार की वह फिल्म जिसका इसी नाम का नायक अपने पुरखों की तलाश में कई देश पार कर उनकी मातृभूमि में जाता है। तुम्हारा पितामह तो तुम्हारे ही देश का था।

--- मेरा अब तुमसे कुछ भी कहने का कोई हक नहीं लेकिन क्या तुम उससे संवाद नहीं कर सकते? तुम्हारी पीढ़ी में सिर्फ तुम ही हो जो उसकी प्रेत साधना कर सकते हो। हो सकता है उसका प्रेत तुम्हें वह रोशनी दिखला दे जिसमें तुम खुद को और शायद मुझे भी इस अंधेरी सुरंग से बाहर ला सके।
--- सुरंग? तुम तो अब रोशनी में आ गयी हो...तुम्हें तो एकदम साफ साफ दिखने लगा है कि तुम्हें क्या चाहिये....नहीं क्या?

कुछ नहीं बोली। मकबरे की सीली दीवार से पीठ टिकाये खड़ी रही। मकबरे की जाली से परे आकाष छितराया हुआ था। कबूतरों की पंक्ति मुॅंडेर पर टंगी थी।

स मार्च की इस रात लेकिन पहाड़ के ऊपर उगे नारंगी आकाश में कोई परिंदा न होगा। रंगीन झंडियों की कतारें हवा में फड़फड़ाती रहेंगी। गुरु के घर के उपर सुनहरा गुबंद चमकता होगा। कल उनका नया साल था। मरून चोगेधारी देर तक कस्बे की गलियों में जलती मोमबत्तियां और प्रार्थना चक्र लिये घूमते रहे थे। उनके समर्थन को आये ढेर सारे विदेशी भी उनके साथ चल रहे थे और तभी उस गुरु ने मंच से घोषणा की थी कि वह अब बूढ़ा हो चुका है, थक गया है, संन्यास लेना चाहता है। उसके समर्थक निराश हुये थे, अपनी छाती पीटने लगे थे। उनका पितामह अबोली मृत्यु की ओर बढ़ रहा था, वे अनाथ हो जाने वाले थे।

तुम्हारा पितामह लेकिन बहुत पहले ही मर चुका था और तुम्हारे भीतर अनाथ होने का भाव रत्ती भर नहीं था। तुमने खिड़की खोल ली। ठिठुरती हवा में पर्दे सिहर उठे। तुम्हारी नंगी देह पर कंपकपी लहरा गयी। तुम्हें याद आयीं वे ढेर सारी कब्रें जिन पर सवा सौ साल पहले के किसी हफ्ते की तारीखें खुदी थीं। इतने सारे लोग एक साथ यहां क्यों मरे, दफनाये गए ? तुम्हें कुछ नहीं सूझेगा।

तुम्हें तो इस वक्त यह भी नहीं मालूम होगा दस मार्च की इस रात के ठीक बारह घंटे बाद दूर देश से आयी इस लड़की की मां का देश इस सदी के सबसे भीषण भूकंप से हिल जायेगा, ठीक उस वक्त जब तुम उसकी पिंडलियों पर मृत्यु के निशान कब्रों के बीच अपने कैमरे में उतार रहे होगे, उससे उन निशानों की कहानियां सुन रहे होगे। तुम दोनो ग्यारह की शाम कस्बे में टहल रहे होगे, एक दुकान में चलते टीवी पर भूकंप की खबरों को देख अटक जाओगे। वह उन शहरो के नाम निगाहों से टटोलती रहेगी, अपने नोटपैड पर आकृतियां बनाती चलेगी।

 काफी कुछ है जो तुम्हें अभी से समझ आने लगा है, बाकी तुम्हें जल्दी ही, महज तीन चार दिनों में ही सूझने लगेगा कि तुम बहुत पहले से ही इस कथा को लिख रहे थे। तुम भले ही अपने लैपटॉप पर इसका पहला वाक्य चौदह मार्च को दर्ज करोगे लेकिन यह आलाप तुम्हारी रूह के तार अरसे से झिंझोड़ रहा होगा। वह उपन्यासकार, तुम्हारी बोली में लिखता तुम्हारा पूर्वज, तुम्हारे नाम के अक्षर वाला वह फिल्मकार और उसी अक्षर वाला उसका नायक.... न मालूम कितनी चीजें तुम्हारे भीतर जन्म से ही समाहित थीं। बचपन के उस खेल की तरह जब तुम एक किरदार को अनेक में बांटते जाते थे। लेकिन इसके बावजूद तुम अगर यह आलाप सिर्फ म की काया को ही संबोधित मान रहे थे, तो भले ही वह कहीं भी हो, इस कथा में किरदार कुछ अन्य भी हों, तुम्हारी आवाज सिर्फ म के लिये ही थी।

ह अलग है तुम्हारी इस आवाज को सुनने के लिये म कहीं न होगी। वह जा चुकी होगी। पूर्वज पहले ही अपने शब्द खो, गूंगे हो चुके होंगे। और एम? वह अचानक ग्यारह मार्च की रात इस पहाड़ी कस्बे से गायब हो जायेगी। यानी तुम हमेशा की तरह अपनी कथा के बीच एकदम अकेले मिलोगे।

ग्यारह की सुबह न जाने तुम्हें क्या सूझेगा कि तुम अकेले ही इस कस्बे की गलियों में निकल आओगे। एम सोयी हुई होगी। मैरून चोगेधारी अपने पितामह के घर की ओर चलते जायेंगे। उनके हाथों में प्रार्थना चक्र होंगे। बूढ़े, औरतें और बच्चे भी। वे उससे संन्यास न लेने की विनती करेंगे। उसके सामने अपनी छाती पीटते हुये सिर झुकायेंगे। बच्चों को लेकिन कुछ समझ नहीं आयेगा। उनके पिता भले ही अपनी मातृभूमि पर बरसती मृत्यु से बचकर यहॉं आये होंगे उन्होंने यहीं जन्म लिया होगा। भिंची ऑंखों वाले ये बच्चे विदेशी च्विइंगम चूसते रहेंगे जो बाहर से आये इनके समर्थकों ने इन्हें दी होंगी।

सी भीड़ में तुम्हें एक लड़का मिलेगा जो अपने पूर्वजों की तलाश में मृत्यु के सभी खतरे उठा अपने देश लौट जाना चाहेगा। उसकी स्मृति में सैकड़ों मील दूर पहाड़ी पर बना वह विशाल किला झनझनायेगा जिसकी उसने सिर्फ तस्वीरें ही देखी होंगी जिसके इर्द गिर्द उसके पितामहों के प्राचीन कबीले कई सदियों तक रहे होंगे। क्या आप मेरे साथ कुछ दूर चलेंगे वह तुमसे पूछेगा तुम सिर हिला दोगे और वह तुम्हें एक पहाड़ के पीछे ले जायेगा। देवदार, सेमल के पेड़ों के बीच। तुम्हें कुछ नहीं सूझेगा लेकिन उसके पीछे चलते जाओगे। लताओं और पेड़ों से घिरे एक झुरमुट में आ वह रुक जायेगा।

--- क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं? मेरे सारथी हो सकते हैं?
--- मैं?

ह अपना झोला खोल फटी पुरानी चिन्दियां निकालेगा, पृथ्वी पर फैला देगा। नीचे बैठ जायेगा, तुम्हारा हाथ पकड़ तुम्हें भी बिठला देगा।

---- ये देखिये, ये खुफिया नक़्शे हैं। मेरी मातृभूमि तक पंहुचने का रास्ता। ये हरे निशान यानी जंगल और भूरे यानी पहाड़। यह बड़ा सा चिन्ह उस प्राचीन किले का है। इन जंगलों में खूंखार जानवर हैं, पहाड़ों के बीच खतरनाक, बर्फीले दर्रे हैं जिनसे गुजर मुझे इस किले तक पहुंचना है। यह पूरे रास्ते चलती जाती लाल रंग की कतारें दूसरे देश के बंदूकधारी सिपाही हैं जो किसी भी हरकत पर गोली चला देते हैं, अगर मैं जिंदा पकड़ा जाता हूं तो अपनी संगीनों से मेरी आंखें बड़े आराम से बाहर निकाल लेंगे मेरे चेहरे पर महज दो सुराख चमकते रहेंगे।

--- आप मौत की बात क्यों कर रहे हैं।
--- मुझे कोई डर नहीं, मुझे जाना ही है।

देवदार के जंगलों के बीच वह देर तक तुम्हें अपनी योजना बताता रहेगा, उसके गुलाबी माथे पर मांसपेशियां  उभर आयेंगी, नाखूनों में खूनी हिंसा की छटपटाहट उमड़ने लगेगी।

--- क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं?
--- मैं? मैं क्या मदद कर सकता हूं आपकी?
--- आप राजधानी के एक बड़े अखबार से हैं...।
--- आपको कैसे पता!
--- आप इस वक्त कृपया प्रश्न न करिये....आप अपने अखबार का मेरा आई कार्ड बनवा दें तो अगर मैं दुश्मन के हाथों पकड़ा भी जाता हूं तो यह कहकर बच सकता हूं कि मैं पत्रकार हूं, सीमा के इलाके में इन लोगों के नव वर्ष उत्सव पर रिपोर्टिंग करने आया था। नये साल के ऊपर कोई मुझ पर शक भी नहीं करेगा। वैसे भी हमारे नेता ने संन्यास की घोषणा कर दी है, शत्रु इस समय खुश और इसलिये बेखबर होगा।
--- मैं कैसे आईकार्ड बनवा सकता हूं?
--- आप चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं।
--- अगर मैं कहीं कुछ बेईमानी करूं भी तो भी यह वापस राजधानी जा ही हो पायेगा, आपको भी मेरे साथ चलना होगा और शायद तब तक तो नये साल का उत्सव भी खत्म हो जाये।
--- एक तरकीब है। आप मना न करियेगा....मैं किसी भी तरह किले तक पंहुचना चाहता हूं। मेरी जिंदगी में समय बहुत कम है अब...यह मेरी अंतिम यात्रा होगी। हो सकता है वहां पंहुचते ही शत्रु के सिपाही मेरी असलियत जान जायें, मेरी चमड़ी ब्लेड से खुरच कर उतार डालें...लेकिन मैं फिर भी जाऊंगा। आप मेरी इस अंतिम यात्रा के सारथी नहीं हो सकते?

सके गुरु के घर से घंटे बजने की आवाज आ रही होगी। घर के अहाते में सैकड़ों जमा होंगे लेकिन यह लड़का इस पहाड़ी जंगल में तुम्हारी हथेलियां बहुत देर से थामे खड़ा होगा। तुम उसकी नमी अपनी उंगलियों में समाता महसूस करते रहोगे।

--- आप चाहते हैं मैं आपके साथ चलूं ?
--- नहीं, आप अपना आई कार्ड मुझे दे सकते हैं?
--- आई कार्ड! उसका आप क्या करेंगे?
--- मैं उस पर अपनी तस्वीर चुपका लूंगा... वैसे अगर मैं आपकी ही तस्वीर से काम चलाऊं तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा...हम दोनो की उम्र लगभग एक ही है और चेहरा भी एकदम मिलता है। बस मेरी ऑंखें थोड़ी फर्क हैं और आपके सिर पर बाल थोड़े ज्यादा हैं। लेकिन ये मामूली चीजें हैं इनसे कोई फर्क नहीं पड़ता...कृपया मान जाइये।

तुम उसे देखते रहोगे। जो तुम्हारे चेहरे में अपने होने को देख रहा होगा। तुम उसकी पुतलियों में झांकोगे। तुम्हें नजर आयेंगे सेमल के लाल फूल, देवदार की हरी पत्तियॉं और एक लड़का जो बहुत पहले खो गया होगा। तुम्हें लगेगा उस उपन्यास का नायक शायद मां को ही नहीं अपने भाई को भी खोजने निकला होगा, लेकिन मां तो उस कथा में मर गयी थी। और भाई?

--- आप जो चाहें मुझसे ले लीजिये, लेकिन उस किले तक इस तरह मत जाइये। बहुत खतरा है। दुश्मन के हजारों टैंक, हैलीकॉप्टर, रडार न मालूम कितने सिपाही सीमा पर तैनात हैं। आप चाहें तो मैं आपको किले तक ले चलूँगा। मेरी विदेश मंत्रालय में पहचान है। मैं आपके लिये विशेष पास का इंतजाम कर सकता हूं।
--- आप मेरी बात समझ नहीं रहे हैं। मुझे इन्हीं खतरनाक पहाड़ी दर्रों से होकर किले तक जाना है। वही रस्ता जिससे मेरे पुरखे वहां से यहां भागकर आये थे। मैंने दो खंजर, खुखरी और एक रिवॉल्वर भी रख लिये हैं।

ह तुम्हें अब और कुछ नहीं कहने देगा। खुद ही आगे बढ़ तुम्हारी जेब टटोलने लगेगा, तुम उसे रोक नहीं पाओगे, हाथ उपर उठा दोगे मानो कोई पुलिसवाला तुम्हारी तलाशी ले रहा हो। जेब खाली होने पर वह तुम्हारा बैग तुम्हारे कंधों से उतार देगा और उसकी चैन खोल तुम्हारे पर्स से आई कार्ड निकाल लेगा।

--- मैंने कहा था न आप मेरे सारथी हो सकते हैं। मैं अब चलता हूं, बहुत तैयारी करनी है मुझे। आज रात निकलना है।
--- लेकिन मुझे आपकी सूचना कैसे मिलेगी?
--- आपके आई कार्ड पर आपका फोन नंबर लिखा है। अगर बच गया तो संपर्क करूंगा। वैसे मुझे पक्का यकीन है, मुझे आपकी अभी और जरूरत पड़ेगी। मुझे मालूम है आप नास्तिक हैं लेकिन फिर भी मेरे लिये प्रार्थना करियेगा। ये प्रार्थना चक्र है इसे मेरी याद में दिन में दो बार घुमा दीजियेगा। और ये हमारे प्राचीन देवता की तस्वीर उस लड़की के लिये जो आपके साथ यहां आयी है।
--- लड़की? आपको कैसे पता?
--- इत्ता सा तो यह कस्बा है। दो गलियां सिर्फ। क्या आपने आज से पहले मुझे नहीं देखा यहां कभी?

ह जमीन पर बिखरे चिंदीनुमा नक्शे चार तह में मोड़ अपने झोले में रखेगा, झोले को कंधे पर टंगेगा, चलने लगेगा लेकिन लौट आयेगा। झोला कंधे से उतार जमीन पर रख देगा। आगे बढ़ तुम्हारी पीठ पर टंगे बैग को भी उतार देगा। तुम बेबस से उसे यह सब करते देखते रहोगे। क्या अब वह अपने और तुम्हारे कपड़े उतारेगा? नहीं, वह तुम्हें कस कर भींच लेगा। उसकी बाहें तुम्हारी पीठ पर कसती जायेंगी। फिर वह अपने हाथ झटके से हटा लेगा। तुम्हारी पीठ पर बैग, अपने कंधे पर झोला टांग पीछे लौट जायेगा। तुम्हें लगेगा शायद वह पीछे मुड़ एक बार देखेगा। लेकिन उसका मैरून चोगा उतरती ढलान में धुंधलाता जायेगा। तुम्हें अपनी उंगलियों पर सिर्फ उसकी पीठ याद रहेगी। पीठ को दो फांकों में बांटती रीढ़ की हड्डी पर उभरी खाई। तुम अपनी पीठ को छुओगे वहां भी यही खाई खिंची होगी।

अंत में सिर्फ वही स्पर्श बचा रहेगा। तुम उसे दुबारा नहीं देख पाओगे कम से कम इस कथा में तो नहीं। वह जा चुका होगा किले की ओर। अपनी पूर्वज-भूमि की तलाश में। ए से शुरु होते नामवाले उस फिल्मकार की उस फिल्म की तरह जिसका नायक ए कई देश पार कर अपने पितामह की धरोहर खोजने निकलता है।

तुम कहां थे लेकिन? तुम्हारा पितामह कहां था?

ग्यारह मार्च की दोपहर तुम इस पहाड़ी जंगल में अपना मोबाइल टटोलोगे। कल रात पौने बारह का एसएमएस। म का कई दिनों बाद आया एसएमएस। कहां हो तुम? क्या तुम अपने उस पितामह से संवाद नहीं कर सकते? मैं उसे सुनना चाहती हूं।

देवदार की छाल से पीठ टिकाये तुम खड़े होगे। नीचे बिखरी पत्तियों में तुम्हें किसी सांप की सरसराहट महसूस होगी लेकिन तुम अपने पैर नहीं हटाओगे। तुम चाहोगे सांप हो तो तुम्हें डस ही ले। जंगल में बेनाम मौत। किसी को पता भी न चले कि तुम यहां मरे पड़े थे। जंगली जानवर तुम्हारी खाल नोंच कर, कुतर-काट कर हजम कर लें ताकि तुम स्वान सॉन्ग न रच पाने और अपने पितामह की हत्या के गुनाह से बच जाओ।

लेकिन तुम यह आलाप विलाप प्रलाप प्रेमालाप का कौतुक करना चाहते ही क्यों हो? क्या यह छलावा नहीं, फिर से? शुरु में तुम्हें लगा करता था लिख कर तुम अपने प्रेतों को मार सकते हो, उनसे उबर सकते हो लेकिन जल्दी ही तुम्हें मालूम हो गया शब्द चीजों को कहीं चमकीली और नुकीली बना देते हैं। कोठरी के संदूक में बंद जंग खाया खंजर शब्द की छुअन पा लपलपाने लगता है, बाहर निकल तुम्हारी छाती को आरी की तरह चीरने लगता है। तल पर दुबका सामान सतह पर आ जाता है, वह सब दिखने लगता है जो अब तक ओझल था।

ह एहसास तो तुम्हें बहुत बाद में होगा कि कथा ही सबसे बड़ा सम्मोहन है, सबसे खतरनाक छलावा है। कथा तुम्हें अपने समूचे में फांसती, छलती, डसती है इस लायक नहीं छोड़ती कि तुम किसी दूसरे व्यामोह के फंदी हो सको। सभी किरदार, प्रलाप झूठे हो जाते हैं। तुम कथा किसी किरदार के लिये नहीं महज कथा के लिये रचते हो। तुम खुद भी कहां होते हो। कथा खुद ही अपने को कहती है। अंत में कोई नहीं बचता, सिर्फ इस छलावे के, एक ऐसा बचना जो खुद भी एक छलावा होता है।

लेकिन यह अंत बाद में आयेगा। दस मार्च की दोपहर तुम और एम झील के किनारे बैठे होगे। दो हंस चुपचाप तैर रहे होंगे। खोखा अभी भी बंद पड़ा होगा। रिवॉल्विंग दरवाजे के अंदर और बाहर की दुनिया बेपर्दा बिखरी होगी। एम नोटपैड पर पैंसिल से लकीरें काढ़ रही होगी। बादल बहुत नीचे तक झुक आये होंगे।

--- एम, ये कौन से बादल हैं?

म सिर ऊपर उठायेगी। सफेद, भूरे, कहीं नीले कतरे।

--- बादल, कौन से मतलब?
--- तुमने स्कूल में बादल नहीं पढ़े....भूगोल की किताबों में हुआ करते थे। सफेद, भूरे, भुरभुरे। कोई गोभी के फूल जैसा भी होता था। कुछ बहुत ऊंचे होते थे, कुछ नीचे।

म अपने गाल फुलायेगी, ढेर सारी हवा बाहर छोड़ देगी। गाल पिचक जायेंगे। काफी देर से हाथ जमीन पर टिकाये बैठी वह हथेलियां झाड़ देगी। हंस तैरते हुये तुम्हारे बहुत करीब आ जायेंगे। पहली बार तुम गौर करोगे कि वे एकदम सफेद नहीं उनके पंखों पर कत्थई धब्बे हैं। उनके पंजे पानी में दुबके होंगे, तुम कल्पना करोगे उन पंजों के आकार की कि वे कैसे तैरने में मदद करते होंगे।

--- तुम्हें तैरना आता है एम ?

म बिना तुम्हारी ओर देखे सिर हिला देगी।

--- मुझे नहीं आता। अगर मेरे पंजे हंस जैसे होते तो मैं अभी झील में उतर तैर लेता।

म तुम्हारी बात पर जरा भी ध्यान नहीं देगी, उन लड़कियों की तरह जो बोर होने के बाद भी लड़कों को वो स्पेस देती जाती हैं कि वे बकवास करते रह सकें।

--- तुम्हें स्वान सॉन्ग का पता है एम?
--- बहुत बढ़िया।
--- एक विशेष प्रजाति का हंस जीवन भर गूंगा रहा आता है। मृत्यु से ठीक पहले वह पहली और आखिरी बार एक गीत गाता है.... तुम पिछले जन्म में विश्वास रखती हो?
--- मैं शायद इस जन्म को भी ठीक से नहीं पहचान पाती। कोई मुझसे पूछे कि तुम जिंदा हो तो ठीक ठीक नहीं बता पाउंगी।

म ने एक कंकड़ पानी में निशाना बना फेंका जो कई बार डूबता, सतह पर आता गया। वह अचानक से खुश हो गयी।

--- मुझे तो मालूम ही नहीं था कि मुझे यह खेल अभी भी याद है। पानी में अंदर बाहर आते इस कंकड़ को देख अचानक मुझे याद आया मैं यह बचपन में बहुत किया करती थी।
--- तुम इसे अपने द्वीप पर भी खेल सकती हो।
--- द्वीप? कौन सा?
--- तुमने ही तो कहा था कि तुम एक द्वीप पर रहती हो।
--- कब कहा था मैंने?

हंस का जोड़ा अब थोड़ा दूर चला गया होगा। तुम्हें अचानक से लगेगा अगर तीनों ओर के पहाड़ इस झील में लुढ़क गये तो आर्कमिडीज के सिद्धांत के अनुसार सारा पानी बाहर आ जायेगा। क्या हंस पानी के बगैर रह पायेंगे? तुम उन्हें कस्बे में ले जाओगे, किसी तालाब में तैरा दोगे। लेकिन अगर कस्बे तक ले जाते में ही वे मर गये हों तो? उनका भी अफसाना अधूरा रह जायेगा, उनकी हत्या का गुनाह भी तुम्हारे मत्थे आयेगा।

--- मुझे अक्सर लगता है, मैं अपने पिछले कई जन्मों में वही गूंगा हंस था जो अपना अंतिम गीत गाये बिना ही मर गया था। भले ही मैं इस बार मानव हूं, लेकिन मेरी रूह उन हंसों की गिरफ्त में है, वे अपनी हसरत मुझसे इस मर्तबा पूरी करवाना चाहते हैं। मेरी सांसों में और कुछ नहीं महज उनकी चाहना बजती है।

म काफी देर बाद तुम्हें पलट कर देखेगी। उसके इयर रिंग के बीच की खाली जगह पर झील झिलमिलाती रहेगी।

--- लेकिन अगर तुम वाकई पिछले जन्मों में हंस थे तो यह सॉन्ग तुम अपनी मृत्यु से ठीक पहले ही गा सकते हो।
--- हां,... इसलिये मुझे लगता है मेरी मृत्यु बहुत करीब है। तुम्हें पता है मैंने अपने शहर के कब्रिस्तान में अपनी कब्र की जगह भी रिजर्व करवाई हुई है।
--- अगर तुम्हें एक ही जन्म में दो बार जन्म लेने का विकल्प मिले तो दूसरी बार किस तरह शुरुआत करोगे?
--- मैं दूसरी बार हंसों के पंजे लेकर पैदा होना चाहूंगा।

म अचानक से उठ खड़ी होगी। तुम्हारा हाथ पकड़ खींचती जायेगी। तुम पूछोगे लेकिन वह जवाब नहीं देगी, तुम चुपचाप उसके पीछे चलते जाओगे। वह बहुत जल्दी में दिखेगी, अमूमन धीमे चलने वाली वह बहुत तेज चलेगी। पहाड़ी सड़क पर बिखरी पत्तियों के बीच तुम दोनो बढ़ते जाओगे। तुम्हें कुछ नहीं सूझेगा लेकिन तुम उससे कोई प्रश्न नहीं करोगे। इस दौरान तुम्हारे भीतर कुछ नहीं उमड़ेगा, न बादल, हंस, पितामह-- कुछ भी नहीं। तुम्हें लगेगा तुम एकदम खाली हो गये हो। एकदम कोरे कागज की तरह तुम चलते चलोगे जिसे अपनी रूह पर कोई इबारत लिखी जाने का इंतजार होगा। एम तुम्हारे आगे होगी तुम पूरे रास्ते पीछे पीछे चलते चलोगे।

पूरे तीन किलोमीटर और करीब पैंतीस मिनट चल कर वह कब्रिस्तान में रुक जायेगी। नहीं, यहां भी नहीं रुकेगी। आगे चलती जायेगी, खाई से ठीक पहले ठिठक जायेगी। अपना पैर एक पत्थर पर टिका देगी।

--- कुल चार मृत्यु दर्ज हैं इन पिंडलियों पर। आखिरी तारीख तीन साल पहले की है। मैं बहुत दिनों से एक नये नाम और तारीख की प्रतीक्षा में थी।

ह अपनी स्कर्ट थोड़ा सा उठा तुम्हें मृत्यु के हस्ताक्षर दिखलायेगी। उसे यह नहीं मालूम होगा कि यह निशान तो तुमने पहली ही रात, होटल की रात, देख लिये थे जब वह बाथरूम से नहाकर निकली थी और तबसे ये निशान तुम्हारे भीतर बज रहे हैं।

--- ये क्या है?
--- वे लोग जिन्हें मैंने जीवन में खो दिया।

म घास पर बैठ जायेगी, दोनो पिंडलियों पर दो दो नाम होंगे। हर नाम के नीचे एक तारीख खुदी होगी। तुम वे अक्षर पढ़ोगे, दो नाम अंग्रेजी या अमरीकी होंगे, एक तुम्हें जर्मन नाम लगेगा, एक लैटिन अमरीकी। एम अपनी दाहिनी टांग आगे कर देगी। पहले नाम पर उंगली  रखेगी...

--- यह मॉडलिंग के दिनों में मेरा एजेंट था। मेरा स्पिरिचुअल गुरु भी। बहुत शांत, सुलझा हुआ....। मुझे माफ करना अगर मैं रोने लगूं तो, मैं बहुत दिनों से रोई नहीं हूं। शायद जब से मैंने चीजों को भूलना शुरू किया, रोने की वजह भी मिट गयी...रोने के लिये भी तो कोई वजह चाहिये न...। हॉस्पीटल में खून देते वक्त इसकी देह में एचआईवी वाइरस घुस गया था। कई साल तक यह एड्स के साथ जीता रहा, फिर...।
--- और यह दूसरा...।

म दांयी पिंडली पर नीचे वाले नाम को छुयेगी।

--- इसका प्रेमी था। बहुत ही जिंदादिल, मस्त। मेरे गुरु से एकदम विपरीत। उसके शरीर से इसको भी एचआईवी हो गया था।

भी एम के चेहरे पर गुलाबी बादल फूट पड़ेगा। उसका चेहरा अनोखी लाली में पिघलने लगेगा। देर तक लकड़ियों के जलने के बाद बचे रहे अंगारों की लाली। बरसते पानी में भीगती अंगारों की लाली। तुम्हारा मन होगा उसे रोक दो, कह दो अब न सुनाओ लेकिन वह बोलती चली जायेगी। इस बार वह लड़खड़ायेगी भी नहीं। न मालूम कहां से शब्द उमड़ते आयेंगे। जिग्सॉ पज़ल के सभी टुकड़े जुड़ते जायेंगे।

--- दोनो की एकदम विपरीत मौत थी। मेरा गुरु जहां एकदम चुपचाप चला गया, यह चीख चीख कर पूरे अस्पताल को पागल करते हुये गया।

सके गाल बरस रहे होंगें। उसे इस बात की भी फिक्र नहीं होगी कि तुम उसे सुन भी रहे हो या नहीं, उसे इसकी भी परवाह नहीं होगी कि तुम वहां हो कि नहीं। वह उन कब्रों के बीच बैठी होगी जिनमें से कइयों पर सवा सौ साल पहले के किसी हफ्ते की तारीख दर्ज होंगी। वह उन्हीं कब्रों से मुखातिब होगी। तुम्हें देखेगी भी नहीं। तुम्हें अपने होने का एहसास तब होगा जब वह अपनी बांयी पिंडली से स्कर्ट उठायेगी।

--- यह तीसरा एक राजनैतिक एक्टिविस्ट था। बहुत ईमानदार। मैं इसके देश में तानाशाही सरकार के खिलाफ चल रहे जन आंदोलन का समर्थन करने गयी थी। बहुत बड़े सपने थे इसके। अपने समाज, दुनिया को बदलने के। एक रात इसका कत्ल हो गया। दुश्मन ने इस तरह कत्ल किया, इतने टुकड़े किये इसके कि इसकी देह को भी पहचानना मुश्किल था। इसने अपनी कलाई पर अपने आंदोलन का चिन्ह, बाज, खुदवा रखा था। दुश्मन ने कलाई से उतने हिस्से की खाल ही उतरवा दी ताकि मालूम ही न हो किसकी कलाई है। वे लेकिन इसकी दांयी बांह पर खुदा इसकी प्रेमिका का नाम खुरचना भूल गये। उससे ही इसकी शिनाख्त हुई।

ठीक इस बिंदु पर तुम एम के मुंह पर हथेली रख दोगे। वह बोलना चाहेगी लेकिन उसके गले से निकलते शब्द तुम्हारी हथेली से बाहर नहीं आ पायेंगे। वह तुम्हारी हथेली हटाना चाहेगी लेकिन तुम्हारी जकड़ कसती जायेगी। तुम्हारी उंगलियों पर गर्म भाप टकराती रहेगी। उसके होंठों पर लगा स्ट्राबेरी लिप बाम तुम्हारी उंगलियों पर बह आयेगा। तुम खाई के एकदम मुहाने पर बैठे होगे। तुम्हें लगेगा तुम्हारा जिस्म एकदम सुन्न पड़ गया है। तुम ही नहीं, यह कबिस्तान, पूरा कस्बा सुन्न पड़ चुका है। किसी ने इंजेक्शन से हर शै का, परिंदे, पेड़, कब्रों का खून खींच लिया है। इस वक्त कहीं कोई हरकत नहीं। तुम्हारे भीतर जरा भी ताकत नहीं। अगर थोड़ी सी भी हवा चली तो तुम दोनो पंतग की तरह खाई में गिरते जाओगे। कब्र तुम दोनो को गिरता देखती रहेंगी।

कुछ देर बाद वह ढह जायेगी। तुम्हारी हथेली अपने आप उसके मुंह से हट जायेगी। तुम भी उसकी बगल में गिर जाओगे। तुम्हारी पीठ के नीचे पत्थर होंगे लेकिन सुन्न पड़ चुके तुम्हारे वजूद को इसका एहसास नहीं होगा। वह ऑंख बंद कर देर तक लेटी, शायद सोती रहेगी। तुम्हारे ऊपर कब्रों को आइने की तरह अपने में साधे आकाश होगा। सहसा तुम्हें याद आयेगा वह झील इतनी शांत क्यों रहती थी, वह बहुत पहले ही सुन्न हो चुकी थी शायद उस दिन से ही जब हंस उसमें आये थे। अगर हंस भी इसी तरह सुन्न हो गये तो वे पानी में एक जगह ही खड़े रहेंगे, हिल भी नहीं पायेंगे। लेकिन सुन्न झील में तुम तैरना न आते हुये भी उतर सकोगे कोई लहर तुम्हें डुबोने नहीं आयेगी। फिर तुम्हें हंस के पंजे लेकर दूसरा जन्म लेने की जरूरत नहीं, तुम इसी जन्म में पानी में उतर सकोगे।

गर कथा के अक्षर भी इसी तरह धड़कना भूल गये तो? कथा एक जगह ठहर जाया करेगी उन मालगाड़ियों की तरह जो जंगल में सिग्नल न मिलने पर अर्से तक आउटर की पटरियों पर खड़ी रहती हैं, आखिरी डिब्बे की दहलीज पर खड़ा उनका बूढ़ा गार्ड पैसिंजर गाड़ियों को निकलता देखता रहता है। अचानक तुम्हें लगेगा एक कथा ऐसी ही होनी चाहिये, नहीं सभी कथा ऐसी ही होनी चाहिये जो अपनी जगह चुपचाप खड़ी रहे, जो सभी विलाप--प्रेमालाप से परे जा चुकी हो, जिनके अक्षरों से न अपेक्षा हो शब्दों से शिकायत। जिसकी मुंडेर पर तुम बूढ़े गार्ड की तरह हरी झंडी लिये मुद्दतों तक खड़े रहो, चीजों को गुजरते देखते रहो। जो न कुछ कहे, न सुने, न गढ़ें न बढ़ें। जो अपने ही कहे को झुठला दे, अपने को ही मिटा दे। जिसका विलोम भी सच हो जिनका सच ही विलोम हो। जिसका समूचा लहू जम चुका हो, जो भक्क नीली पड़ चुकी हो।

--- तुम्हारे होंठ नीले पड़ गये हैं एम।
--- नीले?
--- हां, और यह ठंड से नीला पड़ना नहीं है। इस वक्त तुम्हारे चेहरे का रंग होंठों से एकदम अलग दिख रहा है।

देर से लेटी एम आंख  मिचमिचाती उठेगी। उसकी पलक के दो बाल नीचे झर जायेंगे। वह ओवरकोट की जेब टटोलेगी। शीशा नहीं होगा।

--- तुम झूठ बोल रहे हो, फिर कोई कहानी गढ़ रहे हो।
--- नहीं एम। रुको, मैं दिखाता हूं।

तुम अपने डिजिटल कैमरे से उसकी तस्वीर खींचोगे, स्क्रीन पर उभरा उसका अक्स उसे दिखाआगे, लेकिन छोटी स्क्रीन पर चेहरे के होंठ नहीं दिखेंगे। तुम एक दूसरी तस्वीर खींचोगे, सिर्फ होंठों  की। उसे दिखाओगे लेकिन वह नहीं मानेगी कि उसके होंठ नीले हैं। वह फिर कहेगी तुम झूठ बोल रहे हो। तुम्हारे पास उसे भरोसा दिलाने का कोई रास्ता नहीं बचेगा।

--- खैर छोड़ो...तुम कह रहीं थी, तुम काफी समय से अपनी पिंडलियों पर एक नया नाम खुदवाना चाह रही हो।
--- क्या? मैंने ऐसा कब कहा?
--- अभी तो कहा तुमने, सोने से पहले...इन नामों की कथा सुनाते वक्त...।
--- नामों की कथा?
--- अभी तो सुनायीं तुमने...।
--- तुम बहुत झूठ बोलते हो। वह लड़की, क्या नाम था उसका, तुम्हें ठीक ही छोड़ कर चली गयी। वैसे मुझे लगता है वह लड़की भी तुम्हारी कोई झूठी कहानी ही है। तुम्हें अपनी कब्र पर लिखवाना चाहिये --- वह इतना झूठ बोलता था कि कहानियां बनाता था। कहां बनवायें तुम्हारी कब्र...वो वहां, उस भूरे पत्थर वाली कब्र के नजदीक। मैं तुम्हारी कब्र को डिजाइन भी कर दूंगी। उस पर चित्र बनाने की जिम्मेदारी मेरी रही।

तुम उसे पलट कर देखोगे। एम के होंठ बाईं ओर अधिक खुले होंगे। एम ने ओवरकोट उतार एक कब्र पर रख दिया होगा। वह एक लंबी सी अंगड़ाई लेगी, स्कर्ट ऊपर उठ जायेगी लेकिन वह उघड़ी रहने देगी। उसके बिखरते पंजों से टकरा एक कंकड़ खाई में गिरता जायेगा। एम बैग से चादर निकाल जमीन पर बिछा देगी। तुम्हारी ओर पीठ कर लेट जायेगी। उस पहाड़ी कब्रिस्तान में बिछी बेनाम कब्रों के बीच। एक कब्र को अपना तकिया बना।

--- तुम्हें क्या लगता है सिर्फ तुम ही कहानियां बनाना जानते हो।

तुम्हें लगेगा यह आवाज किसी कब्र से उठती आयी है।

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[आशुतोष भारद्वाज हिंदी के युवा कथाकार हैं. उनका एक कहानी संग्रह 'जो फ्रेम में न थे' शीर्षक से पिछले वर्ष आया है. उन्होंने हल ही में कथादेश के चर्चित विशेषांक 'कल्प कल्प का गल्प' का संपादन किया है. कथा नाम के इस स्तंभ में इससे पूर्व आप संगीता गुंदेचा, हिमांशु पंड्या, उदयन वाजपेयी को पढ़ चुके हैं. कहानी के साथ दी गई चित्र -कृति पाब्लो पिकासो की है .]
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तीन नई कविताएं : व्योमेश शुक्ल

10:19 pm


[ चित्र-कृति   :  बिलासेंदु शील ] 


जनगणना

और जब बग़ैर किसी ख़ास वजह के आप उनसे पूछते हैं कि आपका नाम क्या है, आप कौन सी नौकरी करते हैं तब पता चलता है कि विजय प्रकाश लाल जनगणना नहीं प्रेम करने निकले हैं. एक कानूनी दिन में सिर्फ़ ५ घरों की जनगणना की जा सकती है, लेकिन वह सुबह से ३४ घरों को निबटा चुके हैं और सूर्यास्त तक पूरे मुहल्ले का हिसाब साफ़ कर देने का इरादा रखते हैं. वह चाय पीने और दूसरी औपचारिकताओं के सामने लगातार सख्त होते इंसान हैं. यों, आजकल जनगणना नहीं इश्क़ हो रहा है मेरे देश में.


जीवन के उन्तालीस मनहूस नागरिक विवरण नोट कराते हुए मालूम हुआ कि अत्यन्त रूढ़ सरकारी हिंदी में अपने निम्नमध्यवर्गीय वाक्य का विन्यास ज़बान पर क़रीने से उठाये विजय प्रकाश अगर इतनी जल्दी-जल्दी अपने कर्त्तव्य पूरे कर रहे हैं तो अपने लिये नहीं, अपनी आभा के लिये. आभा आंगनवाड़ी में काम करती हैं और ऐसे ही किसी सरकारी सिलसिले में उनकी टांग टूट गयी है. 

तो आभा आजकल विजय की आभा हैं. विजय के सुर्ती ठोंकने की लयगति की आभा, पस्ती और स्याह, उनके पास इकठ्ठा पोथी-पतरे और जनगणना के झोले की आभा हैं आभा. विजय के धीरज की रफ़्तार हैं आभा. विजय 'आभा'-'आभा' नहीं कर रहे हैं लेकिन उनमें कितनी आभा 'हैं'. और जब विजय काम में या आभा में हैं, यह ख़याल है कि चुनौती कि नंदन नीलकेणी के इस महाभियान में आबादी जैसा कितना कुछ है जो गिनती बनकर है और प्रेम जैसा कितना, जो गिनती भी नहीं.  
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सड़क

सड़क बनती है पिछली सड़क बीत जाती है
तब तक उस पर पड़े क़दम बीत जाते हैं
उसके पहले की सड़कों पर पड़े क़दम और भी बीत जाते हैं
मज़दूर नेता की शवयात्रा में उसी सड़क पर एक मज़दूर का चप्पल टूट जाने की घटना बीत जाती है
मामूलियत बीत गयी महानताएं बीत गईं जोश बीता लड़ाइयाँ बीतीं
पटाक्षेप का भी पटाक्षेप हो गया

और अब,

पीले और हरे पत्ते गिरते हैं उसी क्षण कोलतार बिछा दिया जाता है
ताज़ा कोलतार पर गाय के गोबर करते ही रोलर चलने लगता है
खत्री जी की हवेली नयी सड़क से कुछ इंच और नीचे हो जाती है

बिल्कुल अभी के अनुभव जीवाश्म बनते हैं झाँकते हैं सड़क के आईने में से
लोग देखते हैं अपनी बीती हुई शक्लें
कभी पत्ता, कभी पीक, कभी गोबर
इस बात के मरणधर्मा प्रमाण कि कभी थे
****

एक प्रेम था

एक प्रेम था. पहले प्रेम-सा था. प्रेम क्या, पूरा निबंध था. उसमें सोलह की गंध थी, यानी नहीं भी थी. वह पृथ्वी पर टहलने की बकवास प्रस्तावना था. उसमें आगामी हस्तमैथुन उबड़-खाबड़ एक-दूसरे के ऊपर चढ़े हुए थे. उसमें शिश्न का भूरा था. वीर्यपात के बाद का वैराग्य था उसमें. अब हम मरे नहीं तो इस बात पर क्या हँसने लगें कि जीने-मरने की कसमें थी वहाँ. उसमें '' बेटा! मामा जी को नमस्ते करो '' था. उसमें बनारस का एम.पी. बन जाने की भीषण योजना थी. उसमें सामंत और आगामी माफिया के संवेदन और प्राप्त कर लेने की लालसा थी. उसमें बचने की उम्मीद और तत्काल की प्रागैतिहासिकता थी. उसमें क्लर्कनुमा सुंदर हस्तलिपि थी. उसमें एक अवसरवादी के जूते की बदबू थी.  
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[ व्योमेश शुक्ल की अन्य रचनाएँ  यहाँ  ]
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शताब्दी स्मरण : अज्ञेय

4:51 pm

[ हिंदी साहित्य में अज्ञेय के अवदान को रेखांकित करना कुछ हद तक इसलिए भी कठिन है क्योंकि लेखक अज्ञेय पर बात करने में कतिपय दिक्कतों से दो-चार होते ही विज्ञ या सामान्य पाठक व्यक्ति अज्ञेय पर बात बनाने में सहूलियत महसूस करते रहे. उनके खिलाफ इस तरह एक पौलिमिक्स ही खड़ी की गई थी, जो हालाँकि वक़्त के साथ निष्प्रभ हो चुकी है, इधर यह नोट करना महत्वपूर्ण है कि अनेक बुद्धिजीवियों-लेखकों ने उन्हें नए सिरे से पढने-देखने का जतन किया है, जिनका अज्ञेय के विचारों से सीधा जुड़ाव कभी नहीं रहा. चंद्रभूषण उन्हीं के बीच से आते हैं और उन्होंने आग्रह करने पर अज्ञेय की कालजयी कृति ''शेखर : एक जीवनी'' पर एक भिन्न नुक्ते से लिखा है. हमें मालूम है कि अज्ञेय का जीवन, जैसा कि उनका साहित्य भी, भरापूरा और बहुवर्णी रहा है. उसे किसी एक नुक्ते से उभारने से उसकी आभा मिल सकती है, सम्पूर्ण आकर नहीं. उनके जन्म-शताब्दी वर्ष में सबद की ओर से यह विनम्र प्रणति. ]


शेखर : एक जीवनी अज्ञेय की सबसे चर्चित लेकिन अधूरी रचना है। उनके रचना-क्रम में यह कहीं बीच में पड़ती है- न सबसे पहले, न सबसे बाद में। हालांकि इसकी प्रस्तावना से पता चलता है कि कच्ची कॉपी या लंबे प्रारंभिक नोट्स के रूप में यह उनके पास बहुत पहले से, लगभग उनकी पहली रचना के रूप में मौजूद थी। कई लेखकों का ऐसा दावा होता है कि अमुक रचना उनके जेहन में पूरी की पूरी एक ही कौंध में आ गई थी, हालांकि इसे बाकायदा रचना का रूप देने में उन्हें काफी समय लग गया।

मसलन, जे. के. राउलिंग हैरी पॉटर सीरीज के बारे में ऐसा कहती हैं और इसके करीब चार हजार पेज पढऩे के बाद लगता है कि गलत नहीं कहतीं। ढाई सौ साल पहले वॉल्तेयर ने इस तरह का दावा अपनी रचना कांदीद के बारे में किया था, हालांकि इस मामले में रचना की कौंध और रचना प्रक्रिया के बीच कोई समयांतराल नहीं था। उनके घर से थोड़ी ही दूरी पर एक तर्कशील नौजवान को धर्मांध ईसाइयों ने जिंदा जला दिया था। इसके प्रतिकार में वॉल्तेयर अपने स्टडी रूम का दरवाजा बंद करके बैठ गए और बिना कुछ खाए-पिए लगातार छत्तीस घंटे लिखते रहने के बाद अर्धचेतन अवस्था में रचना पूरी करके ही बाहर निकले।

शेखर : एक जीवनी इन दोनों मिसालों से एक बुनियादी मायने में अलग है कि यह पूरी होकर ही नहीं देती। अपने संपूर्ण स्वरूप में नहीं, और संभवत: अपनी कौंध में भी नहीं। इसकी वजह शायद यह हो कि इसका स्वरूप आत्मकथा का है। शेखर की जीवनी होने के अलावा यह खुद अज्ञेय की आत्मकथा भी है। रीयल और फिक्शनल की एक ऐसी चढ़ाचढ़ी, जिसमें दोनों को अलग कर पाना अक्सर लेखक के बूते से बाहर हो जाता है। इससे इस रचना में एक अधूरे गीत का सा दुर्दम्य आकर्षण भी पैदा होता है, लेकिन वह अलग मामला है।

बाद में क्रांतिकारी आंदोलन के अपने साथी (और वैचारिक विरोधी) यशपाल की आत्मकथा सिंहावलोकन पर आलोचनात्मक टिप्पणी करते हुए अज्ञेय कहते हैं कि बेहतर होता अगर यशपाल यही सब बातें उपन्यास की शक्ल में कहते। ऐसा होता तो अपना नायकत्व साबित करने के लिए उन्हें कई बार सच के साथ खिलवाड़ करने की जरूरत नहीं पड़ती। एक ही आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकली दो रचनाओं -- सिंहावलोकन और शेखर : एक जीवनी -- में मौजूद साझा सचाई का सत्यापन करना अब हमारे लिए संभव नहीं है। लेकिन सच के (अतिरिक्त?) आग्रह को अज्ञेय की रचना अधूरी रह जाने की एक वजह जरूर माना जा सकता है।

किताब की शुरुआत इस ब्यौरे के साथ होती है कि फांसी की सजा पाया हुआ शेखर ऐन फांसी के दिन अपनी कालकोठरी में बैठा अपनी जीवन यात्रा को समझने का प्रयास कर रहा है। इसका पहला खंड नायक/लेखक के राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन का हिस्सा बनने के साथ समाप्त होता है, जबकि दूसरे खंड के अंत में वह एक गहरे रूमानी रिश्ते की यातना से गुजरता हुआ असाध्य, अंतहीन, आत्मगत विद्रोह के बिंदु तक पहुंचता है। ऐसा कोई कारण समझ में नहीं आता, जो यहां से उसे किसी राजनीतिक अपराध के लिए फांसी की सजा तक पहुंचा सके। एक दुख का अंधकूप है, जिसके आगे सिर्फ भीतर-भीतर भोगना और लिखना ही बचा रह जाता है।

कोई सत्ता अगर इसी निरंतरता में उसे फांसी की सजा देने लायक पाती है तो यह चोर के धोखे में किसी नींद में चलते हुए आदमी को मार डालने जैसा होगा। नायक इस बिंदु से आगे अगर सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन या किसी अन्य राजनीतिक मुहिम में भाग लेता है तो इसके लिए उसके एक नए अवतार की जरूरत पड़ेगी। अफसोस कि तीसरे खंड का वायदा अधूरा रह जाने से इसका संधान कर पाना लेखक के लिए संभव नहीं हुआ।

किताब की प्रस्तावना 'प्रवेश' में एक भयानक दृश्य है, सिर्फ जिसके करीब पहुंचने के रोमांच में इस किताब के दोनों खंडों का एक-एक पन्ना चाटा जा सकता है। लेकिन प्रस्तावना के बाद दोबारा ऐसा कोई संदर्भ किताब में नहीं आ पाता। अभी का समय होता तो शायद कोई लेखक पर गलत-सलत विज्ञापन करके अपनी किताब बेचने का आरोप तक लगा देता।

एक बिखरा हुआ शव। उसके दोनों हाथ कटे हुए हैं। एक पैर कटा हुआ है, पेट खुल सा गया है और उसमें से अंतडिय़ां बाहर गिरी पड़ रही हैं। फटी-फटी आंखें ऊपर शाखों के जाल को भेदकर देख रही हैं किसी तारे को, और मुंह एक बिगड़ी हुई दर्द भरी मुस्कुराहट लिए हुए है....यही है उस कवि-हृदय सिपाही की अंत्येष्टि, उस विद्रोही के विद्रोह का अंतिम उफान।....
दृश्य फीका पड़ जाता है। एक निस्सीम श्वेत आकाश में पड़ा हुआ रह जाता है केवल वह शरीर जमते हुए रक्त के एक छप्पड़ में....उसके दोनों ओर दो आकार- एक स्त्री और एक पुरुष। वे एक दूसरे को देख रहे हैं। उनकी आंखें नीचे पड़े उस शव को नहीं देखतीं। उनके हृदय नहीं अनुभव करते कि कि वे किस भव्य पवित्रता की समाधि को भ्रष्ट कर रहे हैं। वे मिलते हैं, बाहों से एक दूसरे को घेरकर बांधते हैं, आलिंगन करते हैं किसी दानवी भूख से, और उसी शव के आरपार!

(दोनों उद्धरण उपन्यास से)

यह
कोई फंतासी नहीं है। कल्पना भी नहीं है। 'प्रवेश' से पहले लेखक पाठकों को शेखर के हवाले छोड़कर परे जा चुका है, लेकिन पढऩे से ऐसा लगता है कि किताब के इस हिस्से में कही गई सारी बातें हकीकत हैं। लेखक और शेखर की साझा हकीकत। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के सशस्त्र क्रांतिकारी धड़े के कम से कम एक नायक भगवती चरण वोरा की मृत्यु कमोबेश उसी तरह- एक बम विस्फोट में- हुई बताई जाती है, जिस तरह इसका वर्णन यहां किया गया है।

सच्चिदानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' कुछ समय के लिए इस आंदोलन के कोर ग्रुप में मौजूद कुछ गिने-चुने लोगों में थे, लिहाजा उनके उपरोक्त गद्यांश के पहले हिस्से का प्रत्यक्षदर्शी होने पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। लेकिन इसका दूसरा हिस्सा वे किसी पेड़ की आड़ में छुपकर नहीं, निश्चय ही अपनी लेखकीय कल्पना की आंखों से देख रहे हैं। गहरी वितृष्णा पैदा करने वाला यह हिस्सा किन लोगों के बीच मौजूद कैसे संबंधों की ओर संकेत करता है?

इस प्रसंग को यहीं छोड़कर हम अपने मूल प्रश्न पर वापस लौट सकते हैं। शेखर : एक जीवनी के अधूरे रह जाने का राज क्या है? क्या इस घटनाक्रम का इसके साथ कोई संबंध हो सकता है? यह सवाल इसलिए, क्योंकि उपन्यास के उपलब्ध दो खंड इसकी कोई व्याख्या किए बिना ही समाप्त हो जाते हैं। इसे दूसरी तरह पूछें तो- अपने बिल्कुल नजदीक घटा इतना लोमहर्षक घटनाक्रम भी लेखक को अपनी सबसे महत्वपूर्ण किताब का अंतिम खंड लिखने के लिए क्यों प्रेरित नहीं कर पाता (ताकि वह इसके बारे में लिखकर अपनी मूल प्रतिज्ञा पर डटा रहे और साथ में पाठक की जिज्ञासा भी शांत हो)? खासकर तब, जब वह अपने रचनाक्रम के अंतिम छोर पर नही, इसके कहीं बीच में हो!

क्या इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि किसी भीषण मानसिक बाधा ने उसे इस रास्ते पर बढऩे से रोक दिया? क्या यह किसी अन्यतम राष्ट्रीय नायक के खिलाफ सार्वजनिक रूप से खड़े होकर समाज में अकेले पड़ जाने का भय था, जिसने जीवनी के तीसरे खंड के लिए उसे कलम उठाने से रोक दिया? किसी ऐसे नायक के खिलाफ, जो इस किताब के आने के बाद अपने बचाव में कुछ कहने के लिए इस संसार में मौजूद नहीं था (और इसीलिए जीवित रहने की तुलना में कुछ ज्यादा ही मौजूद था)?

यहां प्रसंगवश, फांसी से कुछ महीने पहले जेल में भगत सिंह और सुखदेव के बीच हुए उस पत्राचार को याद किया जा सकता है, जिसमें सुखदेव ने भगत सिंह के किसी चारित्रिक दोष की तरफ इशारा किया था। उनके आरोप के जवाब में क्रांतिकारिता और ब्रह्मचर्य के अन्योन्याश्रित संबंध को खारिज करने वाली भगत सिंह की बातें हर लिहाज से क्लासिक हैं और अब से सौ साल बाद भी अगर किसी के पास उन्हें खोजकर पढऩे की फुरसत हुई तो वह इन्हें किसी आधुनिक चीज की तरह ही पढ़ेगा।

शेखर : एक जीवनी के लेखक से यह पूछना जरूरी लगता है कि क्या किसी शहीद की पत्नी या प्रेमिका को किसी अन्य व्यक्ति के साथ प्रेम करने या यौन संबंध बनाने (दूसरे शब्दों में कहें तो एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह जीने) का हक नहीं है? अपने प्रिय की शहादत के बाद क्या उसे जीवन भर उसके नाम की माला उठाए फिरना चाहिए, मरते दम तक इस नैतिक प्रेतबाधा से ही घिरे रहना चाहिए कि ऐसा करके वह किसी 'भव्य पवित्रता की समाधि' को भ्रष्ट कर देगी?

इस उपन्यास को अपने समय के नैतिक मूल्यों पर घातक प्रहार की तरह देखा गया था। मौसेरी बहन के साथ प्रेम संबंध को उस समय (और काफी हद तक आज भी) इंसेस्ट (रक्त संबंधी के साथ यौन आचरण) की तरह देखा जाता था, जो इस उपन्यास की केंद्रीय विषयवस्तु है। और तो और, सुदूर दक्षिण में नायक के हॉस्टल प्रवास के दौरान एक जगह इसमें समलैंगिक प्रेम में भी गहरी गति नजर आती है। लेकिन दूसरी तरफ उपन्यास के पारंपरिक नैतिक आग्रह भी बहुत गहरे हैं। खासकर उन जगहों पर, जहां इनका संबंध क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ता है।

बहरहाल, इस आंदोलन में अपने दखल को लेकर लेखक की दुविधा चाहे जो भी रहे हो, लेकिन रचना की दृष्टि से इसे कंटेंट और फॉर्म का घातक टकराव ही कहा जाएगा। एक ऐसा फॉर्म रचना के लिए चुन लिया जाना, जो एक मुकाम पर पहुंचकर उसके कंटेंट से टकरा जाता है। लेखक के हाथ-पांव बंध जाते हैं और रचना अधूरी छूट जाती है।

अज्ञेय ने एक जगह मुक्तिबोध को अधूरी कविताओं का कवि कहा है, जिसे लेकर प्रगतिशील हलकों में आज भी आक्रोश देखा जाता है। लेकिन अधूरेपन की तकलीफ और उसकी ताकत, दोनों से खुद अज्ञेय से ज्यादा वाकफियत भला और किसकी हो सकती थी- जिसकी सबसे बड़ी और सबसे महत्वाकांक्षी रचना ही अधूरी रह गई हो! यानी मुक्तिबोध के बारे में कही गई उनकी बात का एक अन्य संदर्भ भी लिया जा सकता था, बशर्ते दोनों पक्षों में इसके लिए पर्याप्त सदाशयता होती।

बहरहाल, शेखर : एक जीवनी के अधूरेपन से इस रचना के बड़प्पन के बारे में कोई राय नहीं बनाई जा सकती। एक बड़ी रचना की तरह इसने अपनी भाषा को कुछ बड़ी मन:स्थितियां और कुछ बड़े पात्र दिए हैं, जिनके बारे में अलग से विचार करके हम शेखर के करीब पहुंच सकते हैं (कौन जाने खुद अज्ञेय से भी ज्यादा करीब!) अगर यह काम कभी किया जा सका तो इससे पैदा हुई रचनाकांक्षा किसी को शेखर की जीवनी का तीसरा खंड लिखने की तरफ ले जा सकती है।

अधूरी रचना पूरी करने का ऐसा काम, जिसे शायद दुनिया के किसी भी साहित्य में आज तक संपन्न नहीं किया गया। दरअसल, यह व्यवहार में ही नहीं, सिद्धांत रूप में भी असंभव है। ठीक उसी तरह, जैसे गणित में पाई (वृत्त की परिधि और उसके व्यास का अनुपात) का अंतिम मान ज्ञात करने का काम। फिर भी यह करणीय है- ठीक उसी तरह, जैसे पाई से जूझने वाले पिछले तीन सौ वर्षों में लगातार गणित को समृद्ध करते गए हैं।

वाम विचार सरणियों में आत्म से अधिक वस्तु और व्यक्ति से अधिक समाज के आग्रह ने ही शायद वाम आलोचकों में इस किताब के प्रति इतनी ज्यादा वितृष्णा पैदा की होगी। लेकिन आत्म तत्व की बहुतायत के बावजूद यह शेखर : एक जीवनी का गौण पक्ष ही है। ऐसा न होता तो नायक को हम एकाधिक बार ऐसे लोगों के सामने खड़े न पाते, जिनके घुटनों तक पहुंचने लायक भी (उन विशिष्ट स्थितियों में) वह खुद को नहीं पाता। उसे अपने युग के सबसे बड़े सामाजिक प्रश्नों- जाति, स्त्री, भाषा और राजनीतिक अवसरवाद- से जूझता हुआ न पाते, जो राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के पुरोधाओं की नजर से भी प्राय: अछूते रह जाते थे।

शेखर : एक जीवनी के तीन पात्र बाबा मदन सिंह, मोहसिन और शशि मूलभूत अर्थों में विद्रोही हैं। शेखर का जीवन उसकी जीवनी में जितना भी आ पाया है, इन तीनों पात्रों से कुछ न कुछ सीखते हुए ही गुजरता है- जैसे यह किसी सर्वांगीण विद्रोह की तैयारी हो।

इस नायक की सबसे अच्छी बात यह कि उसके अंदर सीखने को लेकर कोई हड़बड़ी नहीं है। किताब की शुरुआत से ही अपनी अद्वितीयता के अतिरिक्त आग्रह के बावजूद उसकी गरिमा यह मानने में है कि ये तीनों लोग बहुत गहरे हैं। उसकी पहुंच से कहीं ज्यादा गहरे। मोहसिन तो जलती हुई मशाल की तरह भभकता हुआ उसके सामने से गुजर भर जाता है लेकिन मदन सिंह और शशि की मुट्ठियां जरा बंद सी हैं। उनमें मौजूद चीजों की थाह पाने के लिए नायक बार-बार उन तक लौटता है। दोनों की कही हुई बातों के अर्थ उसके सामने कई बार खुलते हैं- हर बार पहले से कहीं ज्यादा बड़े आयाम अपने साथ लिए हुए।

मजे की बात यह कि किताब में सजा-ए-मौत भी इन्हीं तीनों को मिलती है, शेखर को नहीं। फांसी की बजाय कुछ दूसरी शक्लों में, जो हर मायने में फांसी से ज्यादा तकलीफदेह हैं। कहानी से अगर इन तीनों पात्रों को हटा दें, या किसी आग्रह-दुराग्रहवश ये हमसे बिसर जाएं तो किताब की संक्षिप्त छवि के रूप में पाठक के दिमाग में सिर्फ शेखर की ईडियोसिंक्रेसीज बची रहती हैं। आत्मश्रेष्ठता के कुछ बालहठ नुमा आग्रह, जिन्हें खामखा विद्रोह की वैचारिक आधारशिला की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है!
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कि दोष लगते देर नहीं लगती/ न गाँठ पड़ते

7:46 pm


अम्बर रंजना पाण्डेय  की दो नई कविताएं / चित्र : रवि वर्मा ]

१. 
किसी स्त्री की परपुरुष से इतनी
मैत्री ठीक नहीं देवि

कि दोष लगते देर नहीं लगती 
न गाँठ पड़ते

मेरा क्या मैं तो किसी मुनि का 
छोड़ा हुआ गौमुखी कमंडल हूँ 
जो लगा कभी किसी चोर के हाथ 
कभी वेश्या तो कभी किसी ढोंगी ब्रह्मण के

तुम्हारा तो अपना संसार है देवि
अन्न का भंडार हैं शय्या है
जल से भरा अडोल कलश धरा है
तुम्हारे चौके में
संतान है स्वामी हैं 

भय नहीं तुम्हें कि रह जाऊंगा 
जैसे रह
जाता हैं कूकर रोटी वाले गृह में

चोर हूँ तुम्हारी खिड़की से लटका 
पकड़ा ही जाऊंगा 
मेरा अंत निश्चित है देवि
मेरा काल देखो आ रहा है

मसान है मेरा ठिकाना 
शव मेरी सेज
देखो मुझसे उठती है दुर्गन्ध 
युगों जलती चिताओं की

मत लगो मेरे कंठ 
मेरे कंधे पर नाग का जनेऊ 
मेरे कंठ में विष है देवि.
****

२.
अधगीले चौके में वह
छौंकती है खिचड़ी आधी रात
उजाले को बस डिबरी है
सब और सघन अंधकारा है

मावठा पड़ा है पूस की काली रात
शीत में धूजते है
उसके तलुवे
मुझे लगता है मेरे भीतर
बांस का बन जल रहा है

सबसे पहले धरती है पीतल
भरा हुआ लोटा सम्मुख, फिर पत्तल पर 
परसती हैं भात धुन्धुवाता
सरसों-हल्दी-तेल-नौन से भरा

'यहीं खिला सकती हूँ
मैं जन्म की दरिद्र, अभागिन हूँ 
खा कर कृतार्थ करें
इससे अधिक तो मेरे पास केवल यह
देह है
मैल है धूल है, शेष कुछ नहीं'

संकोच से मेरी रीढ़ बाँकी होती 
जाती है ज्यों धनुष 
वह करती रहती है प्रतीक्षा 
मेरे आचमन करने की
कि मांग सकें जूठन 

और मेरी भूख है कि शांत ही नहीं होती
रात का दिन हो जाता है
अन्न का हो जाता है ब्रह्म.
****
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सबद से जुड़ने की जगह :

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आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
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गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

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गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी