Thursday, February 24, 2011

महेश वर्मा की तीन नई कविताएं




अनुवाद

      दरवाजे के दो पल्ले अलग-अलग रंगों के, दो आदमियों के बीच अपरिचित पसीने की गंध और एक आदमी की दो पुतलियाँ अलग अलग रंगों की. एक तहजीब में परिचय का हाथ आगे बढाते तो दूसरी सभ्यता के अभिवादन से उसे पूरा करते. शराब मेज़ से उठाये जाने से लेकर होठों तक आने में अपना रंग और असर बदल चुकी होती. उधर से कोई गाली देता तो इधर आते तक खत्म हो रहता उसका अम्ल. एक देश के सिपाही का खून बहता तो दूसरे देश के सिपाही के जूते चिपचिपाने लगते. यहाँ जो चुम्बन था वहाँ एक तौलिया. एक आदमी के सीने में तलवार घोंपी जाती तो दूसरे गोलार्द्ध पर चीख सुनाई देती, यहाँ का आंसू वहां के नमक में घुला होता जो यहाँ के समंदर से निकला था.
      एक कविता जो उस देश की ठंडी और धुंधली सांझ में शुरू हुई थी दूसरे देश की साफ़ और हवादार शाम पर आकर खत्म होती. वहां का घुडसवार यहाँ के घोड़े से उतरेगा. यहाँ की नफरत वहाँ के प्रतिशोध पर खत्म होगी लेकिन लाल ही होगा खून का रंग. जहाँ प्यार था वहाँ प्यार ही होगा जहां स्पंदन था वहीं पर स्पंदन, केवल देखने की जगहें बदल जातीं.
      अनुवादक दो संस्कृतियों के गुस्से की मीनारों पर तनी रस्सी पर बदहवास दौडता रहता, कभी रुककर साधता संतुलन, पूरा संतोष कहीं नहीं था.
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उन दिनों -१ 

     अक्सर लगता कि कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है, कोई दे रहा है आवाज़, देर से बज रही है फोन की घंटी, बाहर बारिश हो रही है. फोन के मूर्ख चेहरे को घूरना छोड़ कर बाहर आते तो दिखाई देता उड़ता दूर जाता पॉलीथीन का गुलाबी थैला. पता नहीं वे कौन से दिन थे और कौन सा मौसम. एक जिंदा खबर के लिए अखबार उठाते तो नीचे से निकल कर एक तिलचट्टा भाग कर छुप जाता अँधेरे मे.
     सुनाई नहीं देता था कोई भी संगीत कोई चिट्ठी हमारी चिट्ठी नहीं थी, किसी को नहीं करना था अभिवादन, कोई शिकायत नहीं थी सड़क की कीचड से या गड्ढे से.
     रात आती तो देर तक ठहरती कमरे में और आँख में. सारे मजाक खत्म हो चुके थे अपने अधबीच, कोई चिड़िया आ जाती भूल से तो रुकी रहती जैसे दे रही हो सांत्वना फिर ऊबकर वह भी चली जाती शाम के भीतर.
    पेशाब करते हुए सामने के धुंधले आईने में जितना दिखाई देता चेहरा, उसे देखते और हंस देते अकेले.
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उन दिनों -२

     बातों की सड़क से उतरकर ख्यालों की पगडंडियाँ पकड़ लेते फिर सड़क को भूल जाते और चौंक कर कहीं मिलते कि बात क्या हो रही थी तो वह ख्यालों का ही चौराहा होता. जैसे एक गूँज से बनी सुरंग में अभिमंत्रित घूमते रहते और बाहर की कम ही आवाजें वहां पहुँच पातीं, कभी कोई आवाज़ आकर चौंका देती तो वह भी गूँज के ही आवर्त में अस्त हो जाता - आवाज नहीं चौंक उठाना.
     उन दिनों बहुत कम बाहर आना होता था अपने डूबने की जगह से. धूप की तरह आगे आगे सरकती जाती थी मौत, प्रायः वह खिन्न दिखाई देती. चाँद नीचे झांकता भी तो फिर घबराकर अपनी राह पकड़ लेता, फूल उदास रहते. खिडकी कोई बंद दिखाई देती तो चाहते खड़े होकर उसे देखते रहें देर तक, देर जब तक शाम उतर न आये.
     डूबने से बाहर आते तो बाहर का एक अनुवाद चाहिए होता. इस बीच लोगों के मरने और विवाह करने की ख़बरें होतीं.
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[ महेश वर्मा हिंदी के चर्चित युवा कवि हैं.
कविता के साथ दी गई तस्वीर गूगल से. ]

Wednesday, February 16, 2011

कवि की संगत कविता के साथ : १० : मोहन राणा



आत्मकथ्य

कविता अपना जनम खुद तय करती है. मैं उसके लिए शब्द नहीं बटोरता, कविता अपने शब्द भी खुद लाती हैहालाँकि यह हमेशा संभव नहीं हो पाता कि उसे पूर्णता से व्यक्त कर पाऊँलगता है जैसे हर कविता, पिछली कविता का कोई छूट गया अंश ही हो जो छूट गया, और फिर रह जाता है अधूरा ही हर नई कविता में.

मेरा मानना है कविता किसी माध्यम पर अंकित-टंकित शब्दों के विन्यास में नहीं वह पाठक के भीतर है. उनमें मौजूद आवाज उन्हें पढ़ कर ही फिर से बोल पाती है कभी हम उसे पहचान लेते हैं कभी वह आवाज हमारे अंर्तलोक के शोर में गुम हो जाती है.


कविता हमें कुछ याद दिलाती है उस वर्तमान की जो घट चुका है, यह वह अतीत जिसे अभी भविष्य बनना है पर हमें याद नहीं है.

पिछले कुछ बरसों से सच
, प्रेम, अस्मिता और यथार्थ प्रकृति के सवालों की ओर मैं बार बार लौटता हूँ या कहें कि वह साथ ही हैं छाया की तरह, अतृप्त अपने ही जवाबों से.  इस हलचल में मैं एक  दूर और पास के दैनंदिन आतंरिक भूगोल के  अन्वेषण में लगा हूँ. मेरा इरादा कोई नक्शा तैयार करना नहीं हैं वह मुझे लगता है पहले से ही बना हुआ है, उपस्थित है प्रकृति के नियमों की तरह ,उसकी पुष्टि भर करनी है.

लेखक कविता और शब्द संरचना के बीच कार्बन पेपर की तरह है,जो हम छपा देखते-पढ़ते हैं वह दरअसल एक अनुभव का अनुवाद है जिसमें एक सच्चाई उकेरा गया है. कविता दो बार किसी भाषा में अनुवादित होती है पहली बार जब उसे शब्दाकार दिया जाता है दूसरी बार जब उसे पढ़ा और सुना जाता है.

कविता अकथनीय सच का अंर्तबोध है और प्रेम का दिशा सूचक, भय मुक्त जीवन को जीने की रास्ता है. हर शब्द इस रास्ते पर एक कदम है. और हर कदम एक रास्ता है.
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कविताएं 

पानी का रंग
(जेन के लिए)

यहाँ तो बारिश होती रही लगातार कई दिनों से
जैसे वह धो रही हो हमारे दाग़ों को जो छूटते ही नहीं
बस बदरंग होते जा रहे हैं कमीज़ पर
जिसे पहनते हुए कई मौसम गुजर चुके
जिनकी स्मृतियाँ भी मिट चुकी हैं दीवारों से

कि ना यह गरमी का मौसम
ना पतझर का ना ही यह सर्दियों का कोई दिन
कभी मैं अपने को ही पहचान कर भूल जाता हूँ,

शायद कोई रंग ही ना बचे किसी सदी में इतनी बारिश के बाद
यह कमीज़ तब पानी के रंग की होगी !
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अरे यह क्या है

यह सामान कैसा
अब यह रास्ता नहीं
कुछ रखने की जगह है

यह आवाज कैसी
इतने शोर में
कि सन्नाटा भी चुप हो गया सुनकर

यह स्पर्श किसका
कि नग्नता भी हो गई देहमुक्त

यह पहचान किसकी
कि झुक गया सिर सच का भी
देखकर अपना झूठ

यह बात कैसी निजी
कि सब सुन रहें हैं कानों को बंद किये

चोर समय चुरा रहा है अपने आपको ही
पर विलाप कोई और करता ईश्वर के खो जाने का.
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एक पैबंद कहीं जोड़ना

वो जंगल पहले सूखा मेरे भीतर
पत्थर हुई नदी
आकाश  हुआ बांझ वहाँ
धरती हुई परती सबसे पहले वहाँ
फैला मरूथल
सोखते की तरह सोख लेता हर नमी को
कि हर आकार गिर पड़ता अपनी ही जड़ों में
पहले पहल किया मैंने रेत के पुल को पार वहाँ
उसे शब्दों में कहने से पहले,
पावों तले दिखा कुछ हरा सा सूखता
एक याद जो बालू हो गई छूते ही
वहीं खो गए मेरे पदचिन्ह
बौराई घूमती है एक गरम हवा
उधड़ेती सांसों को फेफड़ों से,

बाहर दिखते भीतर के अंतरलोक में
बचे हैं व्यतीत दिन  मकड़जालों में
टूटी हुई कुदालों के साथ बैठी हैं आशाएँ
दिन के अधूरे छोरों पर
एक पैबंद कहीं जोड़ना
कि बन जाय कोई दरवाजा
इस सदी को रास्ता नहीं मिल रहा समय की अंधी गली में,

खुली आंखो से दिखता है जो अब
ये दुनिया इसका आसपास
धूल होते शब्द
पहले मेरे भीतर ही उड़ी थी आँधी
****

लार्ड मैकाले का तंबू

मैं वर्नकुलर भाषा में कविता लिखता हूँ
आपको यह बात अजीब नहीं लगती
मैं कंपनी के देश में वर्नकुलर भाषा में कविता लिखता हूँ,

मतलब कागज पर नाम है देखें
मिटे हुए शब्दों में धुँधली हो चुकी आँखें
ढिबरी से रोशन गीली दोपहरों में,
कबीर कह चुके असलियत
माया महाठगनि हम जानी,
और मैं केवल अपने आप से बात कर सकता हूँ
पहले खुद को अनुसना करता हूँ

कोई नहीं संदर्भ के लिए रख लें इस बात को कहीं
आगे कभी जब दिखें लोग आँखें बंद किये
तो पार करा दीजियेगा उन्हें रास्ता कहीं कुछ लिख कर,
मैं खुद भी भूल गया था इसे कहें रख
कुछ और खोजते आज ही मुझे याद आया
मैं भाग रहा था  अपने ही जवाबों के झूठ से
कहता मैं सच की तलाश में हूँ

मैंने अपने बगीचे में बाँध रखीं हैं घंटियाँ पेड़ों से
एकाएक मैं जाग उठता हूँ उनकी आवाजें रात में सुनकर
कहीं वे गुम ना हो जाएँ
मेरे वर्नकुलर शब्दों की तरह
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[ इस स्तंभ के अन्य कवि को इस रस्ते पढ़ा जा सकता है : ९  इससे पहले यहां. साथ में दी गई तस्वीर मधुमिता दास के कैमरे से. ]

Tuesday, February 08, 2011

अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविताएं


कवि का वक्तव्य :


एक होता हैं मेहनती आदमी, आत्मनिर्भर. घर से कुछ नहीं लेता, स्वयं जमीन तोड़ कर जीविका चलाता हैं. बुरी आदतों से दूर, ईमानदार. दूसरा होता हैं ऐय्याश. खानदानी रईस. कमाता एक नहीं गँवाता लाख हैं. उसे सब चाहिए-पुरखों के हीरे-मोती, बाप की जमीन, माँ का बक्स, भाई का बटुवा, नानी के लड्डूगोपाल का चांदी का पालना.

ऐसे ही दो कवि होते हैं, मैं शायद दूसरा वाला कवि हूँ. मुझे अपनी पूरी परंपरा चाहिए. उसकी पूरी समृद्धि पूरा श्रम.

वाल्मीकि चोरों में कवि हुए और मैं कवियों में चोर हूँ.

बीते दिनों मध्यप्रदेश के वृक्षों पर एक सौ एक कविता लिखने की योजना हुई हैं. हो सकता हैं यह योजना वर्ष भर में पूरी हो जाएँ या सौ वर्ष की आयु भोग कर जब मैं मरुँ तब भी निन्न्यांबें कवितायेँ ही पूर्ण हों. फिलहाल पांच कवितायेँ प्रस्तुत हैं.
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[ तस्वीर : मधुमिता दास ]

कविताएं :

गूलर

तुम तो कहते थे गूलर दिख जाने
से दारिद्रय आता हैं. कोढ़ी
बता गए नागार्जुन भी इसे पर
गुंफित डालियों पर गुल्म गोदों
का हर्ष से भरता हैं ज्यों दूध से
यह गूढ़, गुथुवन तना भरा हैं.
मारी गुच्छों पर गुलेल से गोटियाँ
गिरा दिए आठ-दस फल. फूटा
डंठलों से दूध. हेमदुग्धा यों ही
न कह गए पुरातन कवि. ऐसी
श्री किसके निकट हैं, कहो तो! तब क्यों
कटाते हो? रह भी जाने दों.
जब बचेगी न साग न कोदों घर में;
खाया करेंगे गोदों ढेर.
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कदम्ब

कर्बुर शब्दों से बने वाक्य का एक ही रंग
होता हैं जैसे कदम्ब के सब फूलों का हैं
एक ही रंग. जो होते हैं प्रकट वृक्ष पर
जैसे फूटता हैं अर्थ शब्दों का मस्तिष्क में.
नेपथ्य अभिनेत्रियों का झुण्ड सजा खड़ा हो
मंच पर उजागर संकेत भर में हो,
यों सुन भीषण मेघ डम्बरी इसके पोर
फूट पड़ते हैं फूल औचक. क्लिष्ट, घना
स्वरूप बाणभट्ट की कादंबरी सा इसका
हैं. तर्कशास्त्रियों ने इसके नीचे पाए
जाने वाले अन्धकार पर युगों विवाद ही
किया हैं. इसका फल होता हैं ललछोंहा
सूर्यास्त सा. जब काला पड़कर गिरता हैं
पाषाण जैसा कठोर हो जाता हैं. छोकरों
की कनपटियों पर किशोरियां साधती हैं
निशाना. कादम्ब फलों की अबतक मैंने
मार ही खायी हैं. फल कभी नहीं खाया. स्वाद
पर चर्चा फिर कभी, कहीं करूँगा बाबू.
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बबूल

टीबे की ओंट खड़ा हूँ. मेरी भी टूम-टिमाक
हैं. टहनियों टसकें हैं फूल टहटहे
मगर टुंच अपनी टीप हैं. टूटरूं टोंट
उठा टहक रहा हैं. आ बैठता एकाकी
कौआ कभी. मेरा यह मजबूत कलेवर
लेकर कृषक सिला पर पैदा कर सकता
धान. ऐसी टांठी काठ हैं मेरी. दातुन लेने
टाँकी मारते हैं बूढ़े बस. टोली ने टांकी
से लौटते टार्च मारी थी मुझपर, टिहुक
उठा था मन मगर वह टोहा-टाई तो
किसी प्रेत को टोंचने के लिए थी. फूलों पर
किसकी नजर जाती? हल की मुठिया बन
जाने की कामना लिए खड़ा हूँ मैं टिढ़-बिंगा
सहता आप-आतप-अपमान-गर्हणा।
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बेर

मर्कट-दल उत्पात मचा कर
अभी अभी गया हैं.
बदरी का बेचारा बालक वृक्ष इसी बरस तो
फला था .
हरे हरे बेर टूंग टूंग कर
फेंक गए वानर.
तुम दुखी मत हों बदरी गाछ.

जानता हूँ गौधूलि
लौटती बेर असंख्य शुकों का झुण्ड
विश्राम पाता था तुमपर जरा अबेर.
पियराते बेरों के लिए ललचाता किन्तु अगली
ऋतु और भी फलोगे तुम.
अरुण-पिंगल फूलों से झोल खा जाएँगी
डगालियां.

निराश होना ठीक नहीं यों.
बीत जाने दो शीत-काल, पड़ जाने दो तुषार.
वसंत आते ही
फुनगियों फूल जायेंगे लजीले फूल हज़ार.
****

अमरुद वृक्ष

सहस्र दिन पुरातन मूत्र-गंध
से त्रस्त थे नासापुट महू
के रेलगाड़ी स्टेशन पर.
ऊबकाई ले रही थी फिर
फिर प्रौढ़ाएं. नकुट ढंके थे
चन्दन चर्चित मुनियों के दल.
तब अचानक जैसे आकाश
में द्रोणमेघों का झुण्ड हो
उठता. उठी किसी विजयी की
ध्वजा सी अमरूद की गंध.
चौकोर गवाक्ष में छपरे
में तिरछौहे तिरछौहे धर
अमरूद एक श्याम किशोर
खड़ा था. बाहर बाहर हरे
भीतर आरक्त. एक योगी
ने परमहंस परंपरा के
चलाई प्रत्यग्र फल पर छुरी.
ज्ञानी कहते जो आये हैं
कि बीज में वृक्ष हैं. प्रत्यक्ष
हो उठा अमरूद-तरु समक्ष.
रंगों की प्रयोगशाला में
अपूर्व शोध अमरूद वृक्ष
ने किया हैं और तब जाकर
प्रकट हुए हैं हरे रंग के
विविध वर्ण. फुनगियों बाल-शुक
सा हरा. भीतर की टहनियों
का रंग वृद्ध कुटुरु के खीन-
जर्जर पंख सा गहरा. फलों
के हरे रंग के भी अनेक
छंद हैं. कोई कोई वृक्ष
का फल जैसे चौपाई हो-
हरे से हरिद्ररंगी. ऊपर ऊपर
अरुणिम. कोई फल तो
मानों किसी मानिनी के हो
स्तन जो बाहर तनिक पिंगल
प्रतीत तो होते हैं, किंचित
कक्खट भी किन्तु दांत लगते
लाल हो उठते हैं. बालिका
सा बढ़ता हैं अमरूद वृक्ष.
वर्ष में फलता हैं दो बार.
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Sunday, February 06, 2011

शब्दों से गपशप : कुंवर नारायण



[ कुंवर जी की नोटबुक का एक हिस्सा आपने सबद पर पहले पढ़ रखा है. उसका दूसरा हिस्सा यहां दिया जा रहा है. यह चयन भी थीमैटिक है और मुख्य थीम की ध्वनि शीर्षक में सुनी जा सकती है. कुंवर जी समेत कुछ अन्य लेखकों की नोटबुक से चयन वक़्त-वक़्त पर सबद में प्रकाशित किये जाएंगे . साथ में दी गई तस्वीर गूगल से.  ]
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शब्दों से गपशप का शौक़ीन हूँ. आमतौर पर हम शब्दों को मौक़ा ही नहीं देते कि वे अपनी बात भी खुल कर हमसे कहें : उन्हें घेर कर उनसे अपनी ही बात कहलवाना चाहते हैं. लेकिन, खासे गपोड़िया होते हैं शब्द भी - बड़े बूढ़ों की तरह - यादों के अथाह भण्डार. मौक़ा मिले तो न जाने किन-किन ज़मानों के कैसे-कैसे अनुभव सुनाने बैठ जाते हैं. 

कभी-कभी देर रात तक चलती रहती है उनसे बातें. सो जाता हूँ तो नींद में भी अस्फुट कुछ-न-कुछ बोलते ही रहते हैं, अनाप-शनाप सपनों की भाषा में. लेकिन यह गपशप बेकार नहीं जाती. जब वे खुल कर, बेझिझक बोलते हैं तो अपने अंतर्मन में सदियों से छिपी तमाम भूली-बिसरी, दबी-बुझी बातों को भी कह डालते हैं. बस उन्हीं को पाने के लिए मैं शब्दों को खुली छूट देना पसंद करता हूँ...

कई तरह के शब्द होते हैं जिनसे तरह-तरह के शब्दों की दुनिया बनती है. ज़्यादातर शब्द तो मतलबी, लेन-देन, व्यावहारिक और व्यावसायिक मनोवृत्ति के होते हैं. ठोस ज़मीनी अर्थोंवाले शब्द. उनकी भी बातें सुनना ज़रूरी है. शारीरिक दुनिया में रहते उनकी अवहेलना नहीं की जा सकती. 

कुछ शब्द गुरु-घंटाल टाइप के होते हैं - चतुर, चालक, चंट - लेकिन कुछ शब्द सच्चे अर्थों में गुरुओं की तरह होते हैं. वे कम होते हैं. उन्हें खोजना पड़ता है. भीड़-भाड़  से दूर उनके एकांतों में जाकर, उनका शिष्यत्व करना पड़ता है. वे कम बोलते हैं, लेकिन जब भी बोलते हैं, मर्म और ज्ञान की बातें बोलते हैं. उन्हें ध्यान लगा कर सुनना पड़ता है, वरना उनकी बातें बिलकुल हवाई और अ-ठोस ध्वनियों की तरह सिर के ऊपर से निकल जाती है. कभी-कभी उनकी खोज में वनों और इतिहास की चोटियों तक जाना पड़ सकता है. ऐसा भी मुमकिन है कि वे शब्द न मिलें, उनकी जगह केवल एक ''मौन'' मिले. फिर भी, इस खोज का अपना अलग एक रोमांच है. अपने अन्दर एक अलग तरह का साहस और आत्म-विश्वास खोज पाने का आश्चर्य !
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कविता को पढ़ता या लिखता भी मैं कुछ इसी तरह की वजहों से. शब्दों के बीच ''विचरण'' और ''रमण'' ( कबीर की रमैनी) के  लिए. कुछ ''पाने'' या कहीं ''पंहुचने'' के लिए नहीं - भटकता हूँ शब्दों के बीच जैसे भटका जाता है ''विराट जंगलों'' में कहीं भी कुछ देर के लिए खो जाने के लिए. एक अदृश्य रहस्य हो जाने के लिए...

कभी-कभी लुकाछिपी का खेल खेलता हूँ शब्दों के साथ. वे अपने तमाम अर्थों को छिपाए रखते हैं, मानो मुझसे  कहते हैं कि मुझे ढूंढो तो जाने ! उन्हें खोजने की कोशिश में कभी-कभी  ख़ुद भी खो जाता हूँ अपने में, या उनमें. जब पाता हूँ तो चकित रह जाता हूँ कि अरे, वे तो बिलकुल पास ही मेरे एक बहुत बारीक़ परदे की आड़ में छिपे हुए थे.
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मुझे संस्कृत भाषा नहीं आती. संस्कृत भाषा तक पहुंचने का मेरे पास एकमात्र  साधन उसके शब्द हैं, उसका व्याकरण नहीं. मुझे फ्रेंच भी नहीं आती - या शायद संस्कृत की ही तरह - बहुत मामूली सी, बस इतनी कि उसके शब्दों को छू भर लूं. शब्दों का यह स्पर्श, कोरा स्पर्श, मुझे अच्छा लगता है. भाषा के बावजूद, कभी भाषा के सामानांतर, कभी भाषा के विरुद्ध उन शब्दों का मनमाना अर्थ करना अच्छा लगता है - वैसा अर्थ मैं हिंदी, अंग्रेजी  को लेकर नहीं कर पाता. जिन भाषाओं को मैं जनता हूँ उनके शब्दों के अर्थ पहले उन भाषाओं के अर्थ होते हैं - फिर मेरे अर्थ. उनमें शब्द, केवल शब्द, शुद्ध शब्दों को पाने का आनंद नहीं रहता - पाए हुए शब्दों द्वारा किसी पाए हुए अर्थ को दुहराने की मजबूरी सी रहती है.

किसी ऐसी भाषा का शब्दकोष उलटना जिस भाषा को अच्छी तरह नहीं जानता, जैसे फ्रेंच, जर्मन, इतालवी या पाली, संस्कृत : प्रत्येक शब्द अपनी जगह से कुछ कहता है - भाषा के आग्रह से स्वतंत्र कुछ. मेरा मतलब उन अर्थों से नहीं है जो शब्द के साथ दिए होते हैं, मेरा मतलब उन अर्थों से है जो दिए हुए अर्थों द्वारा संकेतित होते हैं. उसे एक ऐतिहासिक वस्तु की तरह सोचता हूँ, पढ़ता हूँ और अपनी तरह व्यख्याबद्ध करता हूँ - तब वह कोई अर्थ पाता है. सोचता हूँ, एक ऐतिहासिक ईमारत या शिल्प की तरह वह कितने विविध और विचित्र अनुभवों से गुज़रा होगा, कितने विभिन्न युगों में उसकी व्याख्या हुई होगी. अभी कितने दिन और किन-किन रूपों में वह जियेगा और कब तथा किन परिस्थितियों में उसकी मृत्यु होगी या वह मारा जाएगा !

क्या मैं उसे अपने लिए बिलकुल अपनी तरह अपनी कविता में बचा सकता हूँ ?
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भाषा के वृक्ष में लगे हुए शब्द जिन्हें तोड़ने की मनाही की तख्ती की भाषा सब से पहले पढ़ने में आती है. लेकिन जहां यह तख्ती पढ़ना ही न आता हो वहां एक बार तो शब्दों को वृक्ष से तोड़ कर चखने को जी चाहता ही है - बाद में इस अनाधिकार चेष्टा का दंड जो भी हो ! जहां कहीं कोई पका हुआ शब्द दिखाई देता उसे तोड़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाता. 

भाषा के अनुशासन से मुक्त शब्दों की सत्ता. कभी-कभी सोचता हूँ केवल शब्द हैं भाषा नहीं, उनके साथ जुड़े निश्चित अर्थ नहीं, कुछ अनिश्चित अर्थों की यादें हैं. मैं उन यादों में हूँ - उन यादों को हलकोर रहा हूँ - उन्हें पंक्तियों में बांध नहीं रहा हूँ - पंक्तियों में बंधे शब्दों को खोल खोल कर बिखेर रहा हूँ, हवा में इधर-उधर उड़ा रहा हूँ. उनसे खेल रहा हूँ - उनका खेल बना रहा हूँ. 

खेल कभी भाषा के अन्दर है कभी भाषा के इर्दगिर्द, कभी भाषा के परे. मैं भाषा की ज़रूरतों के मुताबिक शब्दों को नहीं रख रहा हूँ : मैं शब्दों को लेकर एक नई भाषा रचने की कोशिश कर रहा हूँ, कोशिश में हूँ.

मैं मान लेता हूँ पहले शब्द रहे होंगे, फिर भाषा बानी होगी, फिर भाषा का व्याकरण बना होगा और इस तरह उस भाषा का आगे बनना बंद हुआ होगा. इसी तरह संस्कृत भाषा के साथ हुआ होगा. और मैं उस व्याकरण को नहीं जानता, तो मैं उस भाषा के शब्दों के साथ एक ऐसी जगह पर हूँ जहां मेरे सामने उन शब्दों को लेकर एक नई भाषा, कविता की भाषा में कोशिश करने की पूरी छूट और सम्भावना है.
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शब्दों के माध्यम से मैं कविता की एक नई भाषा, एक नई व्याख्या तक पहुँचने की कोशिश करता हूँ और कविता द्वारा एक खास तरह की मुक्ति का अनुभव करता हूँ - केवल ''भाषा'' से नहीं उन सब चीज़ों से भी जिनके साथ हमारी परिचित भाषा की शर्तें हमें एक खास तरह बंधती हैं कि हम उनके हैं, उनके बावजूद नहीं हैं.

यह अनुभव शायद मेरा अकेले का अनुभव नहीं है कि कभी-कभी एक शब्द एक पूरी कविता का स्रोत होता है. कविता भाषा से मुक्ति है. भाषा से मुक्ति एक खास तरह से उस दुनिया से मुक्त है जिसे व्यावहारिक भाषा संबोधित है.
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