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Showing posts from January, 2011

शताब्दी स्मरण : शमशेर बहादुर सिंह

[हिंदी में शमशेर होने के अलग मानी हैं, जैसा सरल वाक्य बनाने पर शमशेर शायद ऐसे ही मुस्कराते, जैसे कि यहां दी गई तस्वीर (सौजन्य : एक जिद्दी धुन) में मुस्करा रहे हैं. सच तो यह है कि शमशेर एक कठिन लिपि में निबद्ध हैं, जिन्हें सिर्फ़ अर्थ की संभावनाओं में पढ़ा जा सकता है. उनकी ज़िन्दगी और उनके बारे में किस्से इस मामले में नाकाफी साबित हुए हैं. शमशेर के टेक्स्ट को पढ़ने के लिए 'कठिन प्रस्तर में अगिन सुराख़' की दरकार है. और इस कठिनाई से हिंदी आलोचना कितना बचती रही है, यह बताने की ज़रूरत नहीं है. शमशेर पर लिखे साही और मलयज के निबंध और डायरियों को छोड़ दें तो उन्हें समझने के छिट-पुट तरीके यादगार नहीं और उनके जन्म-शताब्दी वर्ष के आते-आते भी इनका रवायती, पूर्वानुमेय और अंततः अपर्याप्त होना सालता है. जैसे हर बड़े कवि को, उसी तरह शमशेर की इबारत को भी उनकी अनेक अर्थ-छवियों में पढ़ने की ज़रूरत इसीलिए बरक़रार है. यहां कवि-आलोचक व्योमेश शुक्ल ने उनके भाषिक संसार में प्रवेश कर कुछ विशिष्ट के अर्थापन की कोशिश की है.]

जहाँ ‘तारे जुगनू होने चले गए हैं’ व्योमेश शुक्ल
‘‘देखो, रात बिछलन से भरी हुई है (तार…

कुछ कविताएं

डिठौना

एक तिल है बाईं आंख की सरहद पर तुम्हारी
जो मेरी निगाह से रार ठाने रहता है.
उसे समझाओ !... या थोड़ा काजल बढ़ा कर छिपा ही दो.
डिठौना करीब २८ में ठीक नहीं.
इसे हमारे बच्चों के लिए रख छोड़ो.
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गुदगुदी

तुम्हारी हंसी की अलगनी पर मेरी नींद सूख रही है.
तुम उसे दिन ढले ले आओगी कमरे में, तहा कर रखोगी सपने में.
मैं उसे पहन कर कल काम पर जाऊंगा और मुझे दिन भर होगी गुदगुदी.
****

कोई भाषा नहीं

तुम्हारे होठों पर सर्जरी के बाद छूट गई खंरोच का तर्ज़ुमा मैं 'दाग़ अच्छे हैं'
करता था जैसे बहुत खुश को तुम 'कुछ मीठा हो जाए' कहा करती थी. विज्ञापनी भाषा की सारी चातुरी की ऐसी-तैसी कर हम वस्तुओं की जगह ख़ुद को कितनी आसानी से नत्थी कर लेते थे और हमारी ख़ुशी ने उस बेहोश वक़्त में
'प्रेम न हाट बिकाय' कभी हम पर ज़ाहिर नहीं होने दिया.
जबकि तुम जिन वजहों से सुन्दर और करीबतर थी उन वजहों की कोई भाषा नहीं.
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एक यह भी सही
देख कर तुम्हें कभी यह नहीं लगा कि तुम्हारी उजली हंसी पर प्रेम की वह छाया भी पड़ती है जो तुम्हें चुप और उदास बनाती है और मुझे उन सब अभिनेय भूमिकाओं के लिए धीरे से तैयार जो अ…

स्मरण : भीमसेन जोशी

नश्वर देह का अमर राग
  मंगलेश डबराल
उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी वर्षों में उस्ताद अब्दुल करीम खां की जादुई आवाज ने जिस किराना घराने को जन्म दिया था, उसे बीसवीं शताब्दी में सात दशकों तक नयी ऊंचाई और लोकप्रियता तक ले जाने वालों में भीमसेन जोशी सबसे अग्रणी थे। किराना घराने की गायकी एक साथ मधुर और दमदार मानी जाती है और इसमें कोई संदेह नहीं कि जोशी इस गायकी के शीर्षस्थ कलाकार थे। अर्से से बीमार चल रहे जोशी का निधन अप्रत्याशित नहीं था, हालांकि उनके न रहने से संगीत के शिखर पर एक बड़ा शून्य नजर आता है। लेकिन सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि भीमसेन जोशी किराना घराने के सबसे बड़े संगीतकार थे। दरअसल उनकी संगीत-दृष्टि अपने घराने से होती हुई बहुत दूर, दूसरे घरानों, संगीत के लोकप्रिय रूपों, मराठी नाट्य और भाव संगीत, कन्नड़ भक्ति-गायन और कर्नाटक संगीत तक जाती थी। 
यह एक ऐसी दृष्टि थी जिसमें समूचा भारतीय संगीत एकीकृत रूप में गूंजता था। कर्नाटक संगीत के महान गायक बालमुरलीकृष्ण के साथ उनकी विलक्षण जुगलबंदी से लेकर लता मंगेशकर के साथ उपशास्त्रीय गायन इसके उदाहरण हैं। दरअसल भीमसेन जोशी इस रूप में भी याद क…

पीतालोक प्रसार में काल गल रहा है

हमें उन लड़कियों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जिन्हें देखकर, मिलकर, बातें करते हुए या रेस्तरां में साथ चाय/कॉफ़ी पीते हुए हमारे मन में एक हूक उठी थी : एक हिचकी जो अब शांत है, पर जिससे पहली दफ़ा अंदाज़ा हुआ था कि हम प्यासे हैं, हमें पानी की ज़रूरत है ...

पुराने कमरे उन प्रेमिकाओं की तरह होते हैं जिनसे यों तो हमारा संबंध टूट गया है, पर जिनकी याद है, लगाव है, कभी-कभार का लौटना भी. आखिर उनके साथ इतना वक़्त जो गुजारा हुआ होता है हमने : निजी और आत्मीय.

हम प्रेम करते हुए अक्सर अकेले पड़ जाते हैं. दुःख इस बात का नहीं कि यह अकेलापन असह्य है. दुःख इस बात का है कि इसे सहने का हमारा ढंग इतना बोदा है कि हमसे वह आलोक तक छिन जाता है, जो प्रेम के इस सुनसान में हमारे साथ चलता.
कोशिश करके भूलना बेतरह याद की निशानी है. इसलिए हम कुछ भी भूलना अफोर्ड नहीं करते : न चीजें, न चेहरे, न हमारे साथ हुआ/अनहुआ. असल में विस्मृति स्वयं उन घटनाओं, चीज़ों, चेहरों और ब्योरों को हमसे अलग करती जाती है जिनका बेतुका संग-साथ हमसे बना रहता है.

इधर रात का रवैया कुछ ठीक नहीं. यों उससे अपनी पुरानी यारी है. कभी ऐसा भी रहा …

सिद्धान्त मोहन तिवारी की कविताएं

[सिद्धान्त अपनी ताज़ा कविताओं के साथ आपके सम्मुख हैं. कविताओं के साथ दी गई चित्र-कृति प्रीती मान की बनाई हुई है.]

फ़िर से...


आज मैं फ़िर से लिखूंगा
पहले से ज़्यादा लिखूंगा
और ज़्यादा
इतना ज़्यादा
कि मुझे फ़िर से प्यार हो जाए
जैसे पहले हुआ था
जब मैनें पहले लिखा था
उसके पहले से ज़्यादा
उसे होना होगा
बार-बार
कई बार
हमेशा
मुझे लिखता हुआ बनाए रखने के लिए
****

मोनालीशा ब्यूटी पार्लर

हाँ, उसका नाम मोनालीशा ही होगा जो शहर और आस-पास के इलाक़ों में
ब्यूटी पार्लरों के नामकरण का सामान बनी

उन जगहों पर जहाँ एक मोटे परदे से
हमसे दूरी बनाई जाती है
और यूँ ही व्याप्त हो जाता है
रहस्य

उस परदे के पीछे क्या है
मैंने और कईयों ने हमेशा जानने की कोशिश की है
परदे के पार की दुनिया
ज़्यादा रोचक होती है
बजाय इधर की दुनिया के

मोनालीशा भी नहीं जान पाई होगी
परदे का खेल

मैनें देखा है
कुछ लोग मान लेते हैं
अन्दर एक वेश्यालय है
और संचालिका
निम्न दर्जे की एक वेश्या

शक़ होता है
अन्दर जाने वाली महिलाओं पर
और दी जाती है उनके पतियों को
नसीहतें और उलाहना

मोनालीशा की कर्मभूमि के सामने से जाने वाला पुरुष
कभी परदे के किनारों…

अशोक वाजपेयी पर उदयन

[ हिंदी के वरिष्ठ कवि-लेखक और संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी १६ जनवरी २०११ को सत्तर के हो रहे हैं. उनकी उपस्थिति, कविता और बहुस्तरीय सक्रियता पर हालाँकि पहले भी लिखा गया है, लेकिन इतना सहोदर, आत्मीय और वस्तुनिष्ठ होकर उन पर उदयन ही लिख सकते थे. ]  

मैं विलाप करता हूँ पर क्यों ?
उदयन वाजपेयी
(मैं इस पूरे लेख में उन्हें अशोक कहूँगा। यह मैंने पहले कभी नहीं किया है। हम सभी भाई-बहन उन्हें गुड्डन भैया कहकर बुलाते हैं लेकिन मैं इस निबन्ध में उन्हें ‘अशोक‘ नाम की दूरी से देखने की कोशश करना चाहता हूँ। इससे इस निबन्ध में वस्तुनिष्ठता भले न आ पाये पर कम से कम मेरी कल्पना को भटकने का अधिक अवकाश मिल जाएगा।) 

1 विलाप

मैं विलाप करता हूँ:
बना नहीं पाया ऐसा घर
जिसमें रहते दिदिया-काका, अम्मा-दादा, बाबा
ऋभु के साथ,
जिसमें कई सदियाँ न सही, कम से कम एक सदी होती
आँगन की तरह चौड़ी-खुली;
जिस पर लगे कठचन्दन या बकौली के नीचे
सब जमा होते भोजन के लिए;
जिसमें मलाई की बरफ़ और लँगड़े आमों के साथ
कटहल का अचार, दलभजिया, भरे करेले होते
मटर-पनीर, छोले, नान के साथ;
जिसमें परछी में कभी मिरज़ापुर के पण्डितजी
रामचरितमानस पर प्रवचन क…

नए कवि : अम्बर रंजना पाण्डेय की कविताएं

[कविता अगर भाषा के साथ-साथ कवि-कर्म की भी स्मृति है, तो अम्बर रंजना पाण्डेय की कविताएं अपने पीठ पीछे कविता की श्रेष्ठ परंपरा की सहचर है. एक उपलब्ध काव्य-भाषा और भंगिमा से दूर जाने के इस कवि-प्रयत्न की भिन्नता और सार्थकता असंदिग्ध है. अनेक शब्दों और छंदों का पुनर्वास इस युवा कवि की कविताओं में सुहानेवाली ताजगी पैदा करता है. आगे अम्बर की कविताएं हैं. वे किसी पत्रिका में इस तरह पहली ही बार छप रहे हैं. वक़्त -वक़्त पर उनका और काम भी सामने आएगा. साथ में दी गई चित्र-कृति रवि वर्मा की है. ]



केश धोना (परिचय)
शिशिर दिवस केश धो रही थी वह, जब मैंने उसे पहली बार देखा था भरे कूप पर. आम पर बैठे शुक-सारिकाएँ मेघदूत के छंद रटते रटते सूर के संयोगों भरे पद गाने लगे अचानक. केश निचोड़ और बाएं हाथ से थोड़े से ऊँचे कर उसने देखा और फटी धोती के टुकड़े से पोंछ जलफूल उठी नील लता सी. चली. दो चरण धीमे धरे ऐसे जैसे कोई उलटता पलटता हो कमल के ढेर में दो कमल. कमल, कमल, कमल थे खिल रहें दसों दिसियों. कमल के भीतर भी कमल.
केश काढना (झगड़ा)
श्यामा भूतनाथ की ; केश काढती रहती हैं. नील नदियों से लम्बे लम्बे केश उलझ गए थे गई रात्रि जब भूतन…